Thursday 20 November 2008

हाँ, वह तुम ही तो थी


हाँ वह तुम ही तो थी, उस रोज
मेरे साथ मेरे घर के आँगन में
तुम्ही ने तो मेरा हाथ पकड़ कर
इन तूफानों से निकल जाने की
क़समें खाई थी,
मगर ये क्या,आज तुम कह रही हो
अब और ना चल सकुंगी
मैं तुम्हारे साथ इन तूफानों में,
मगर क्यों,
क्या अब तुम्हे डर लगने लगा है
या किसी नाव के साथ मल्लाह मिल गया है
जो तुम्हे अपने सीने से लगा
बिना किसी डर के तुफानो से
सुरक्षित निकाल कर
किनारे पर पहुँचा देगा,
ठीक है, तुम जाओ
अपने उस मल्लाह के साथ
खुदा तुम्हारे तूफानों को भी
मेरे रास्ते में डाल दे
और तुम पहुँच जाओ
अपने साथी के साथ बे खौफ
अपनी मंजिल पर
और मैं अकेला देखता रहूँ
तुम्हे उस पार जाते हुए।

---गोविन्द गोयल

4 comments:

seema gupta said...

या किसी नाव के साथ मल्लाह मिल गया है
जो तुम्हे अपने सीने से लगा
बिना किसी डर के तुफानो से
सुरक्षित निकाल कर
किनारे पर पहुँचा देगा,
" arey wah..... pr kuch to majbureyan rheen honge, yunhee koee bevfa nahee hotta..."

Regards

राज भाटिय़ा said...

क्या बात है, बहुत सुंदर
धन्यवाद

अनुपम अग्रवाल said...

तुम जाओ
अपने उस मल्लाह के साथ
खुदा तुम्हारे तूफानों को भी
मेरे रास्ते में डाल दे
और तुम पहुँच जाओ
अपने साथी के साथ बे खौफ
अपनी मंजिल पर
और मैं अकेला देखता रहूँ
तुम्हे उस पार जाते हुए।
is toofaanon ko haraate hue zazbe
kaa abhivaadan.
khairiyat to hai?

Vidhu said...

एक सन्नाटे के पीछे दुबका है दुःख ,तूफान जिन्दगी मैं बहुतेरे सही ,लेकिन किसी और के दुःख और मुश्किलों को अपनी राह मत आने दे ,आज ख़ुद इंसान की जिन्दगी की राह मैं कंकड़ पत्थर क्या कम है ,लेकिन अच्छा भाव है ,शुभकामनाये,