Monday 19 March 2012

जो सरक सरक के काम करे वह सरकार

श्रीगंगानगर- जब से कुछ जानने लगा हूं तभी से यही मानता रहा कि सरकार वह जो सरक सरक के काम करे। लेकिन कोई केंद्र सरकार इतनी भी सरक सकती है ये नहीं सोचा था। इसे सरकना कहा तो क्या कहा....यह तो रेंगना हुआ....साफ साफ रेंगना। कई दिन से नाटक खेला जा रहा है हिंदुस्तान की छाती पर....देश की आन,बान,शान को मिट्टी में मिलाने का। इसके पात्र हैं सभी राजनीतिक दल। कोई आदमी तो मजबूर हो सकता है। कोई सरकार भी इतनी मजबूर होगी ये तो कल्पना से परे है। देश की चिंता नहीं। जनता के दुख दर्द से कोई लेना देना नहीं। सब के सब लगे हैं अपनी खुंदक निकालने में। अपने अहंकार को और अधिक पुष्पित,पल्लवित करने में। एक दूसरे को नीचा दिखाने में। अपनी अपनी नाक को ऊंचा रखना है। देश की नाक कटे तो कटे। लगता ही नहीं कि कोई सरकार चला रहें हैं। ये तो धक्केशाही है इस देश के आमजन के साथ। जिस प्रकार ये देश चला रहें हैं इस प्रकार से तो कोई घर नहीं चलता। देश को संभालने की बात तो बहुत दूर की है। ये क्या सरकार....ये कैसा प्रधानमंत्री....जिसका जी किया आँख दिखा दी....जिस किसी कि इच्छा हुई उसने टेंटुआ दबा दिया। ऐसी क्या मजबूरी...अपने जमीर को तो आपने मैडम के कदमों में डाल दिया। देश की प्रतिष्ठा का तो कोई ख्याल करो। इसकी इस प्रकार तो मिट्टी ना करो। कुछ तो मर्दानगी दिखाओ। ममता...मुलायम ताबे नहीं आ रहे तो आ जाओ चुनाव मैदान में। रोज रोज का नाटक तो समाप्त हो। देश का रेल मंत्री...या कोई भी मंत्री कौन होगा....त्रिवेदी...हो या चतुर्वेदी...मुकुल हो या नुकुल....इससे से जनता का कोई मतलब नहीं होता। जनता से पूछ कर कोई किसी को बनाता या हटाता भी नहीं है। परंतु किसी को हटाने...बनाने का ये क्या तरीका हुआ। इस प्रकार तो बच्चों की गली वाली क्रिकेट टीम में भी नहीं होता। पूरा संसार नेताओं का यह नाटक देख रहा है। मामूली सी समझ रखने वाला भी कह देगा कि यह गलत हो रहा है। किन्तु अफसोस इनको खुद को यह महसूस नहीं हो रहा। ओह! इनको महसूस हो भी कैसे....इनके दो वो दिल ही नहीं जो जनता की भावनाओं को समझ सकें। ऐसा होता तो ये नाटक होता ही नहीं। चलो ये पढ़ोमनमोहन जी टिके हुए हैं बिना किए कुछ काम,उनकी जुबां पर रहता है बस इक मैडम का नाम, भज ले नारायण का नाम, भज ले नारायण का नाम

Friday 2 March 2012

बीजेपी में होने लगी राधेश्याम गंगानगर की नाकाबंदी

श्रीगंगानगर-राजनीति में कई बार कुछ कहे बिना ही बहुत कुछ सुनाई,दिखाई देने लगता है। कोई बयान नहीं है। कोई पोस्टर होर्डिंग भी नहीं लगे। फिर भी ऐसा राजनीतिक गलियारों में ये अहसास होने लगा है कि बीजेपी विधायक राधेश्याम गंगानगर की पार्टी में नाका बंदी शुरू हो गई है। यस! क्षेत्र के सबसे परिपक्व राजनेता की नाका बंदी। पार्टी का कोई भी ग्रुप ऐसा नहीं है जो इस काम में अपना योगदान ना दे रहा हो। सभी का एक सूत्री कार्यक्रम कि बीजेपी की टिकट को राधेश्याम की झोली में जाने से रोका जाए। लेकिन सबसे अधिक मुश्किल फिलहाल विकल्प की है। कोई ऐसा नेता नहीं दिख रहा जो बीजेपी की टिकट लेकर चुनाव जीत सके। बी डी अग्रवाल के रूप में एक आशा की किरण पार्टी के ऐसे नेताओ को नजर आई थी। लेकिन उन्होने अपनी पार्टी का ऐलान कर दिया। वैसे तलाश अभी समाप्त कहां हुई है। इनके पास हर बिरादरी के बंदे हैं जो राधेश्याम के मुक़ाबले टिकट के लिए आगे तो किए ही जा सकते हैं। नाम हम लिखते हैं। किसमे कितना दम है,आइडिया आप लगा लेना। तो जनाब नाका बंदी की कोशिश में लगे नेताओं के पास अरोड़ा बिरादरी के सोनू नागपाल,ओबीसी के प्रहलाद राय टाक,राजपूत समाज के गजेन्द्र सिंह भाटी,वैश्य समाज पेड़ीवाल [पार्टी में शामिल होने में कितना समय लगता है] हैं हीं। और नहीं तो प्रदेश में नेताओं का अकाल तो नहीं है। भैरों सिंह शेखावत की तरह बाहर से किसी बड़े लीडर को भी बुलाया जा सकता है। नाका बंदी में जुटे बीजेपी लीडरों को इस बात से कोई लेना देना नहीं कि राधेश्याम के अलावा कोई और जीत सकता है या नहीं। बस उनको तो राधेश्याम गंगानगर की कढ़ी खराब करनी है। चलो मान लो। राधेश्याम की टिकट कटवा दी। किन्तु उनको चुनाव लड़ने से कौन रोक सकता है। आज के दिन जो राधेश्याम गंगानगर के बिना कोई भी राजनीतिक टीकाकार विधानसभा चुनाव की का कल्पना नहीं कर सकता। बेशक नेहरू पार्क में किसान महा पंचायत में राधेश्याम गंगानगर का कोई पोस्टर,होर्डिंग नहीं था। उनके बंदों को भी खास अहमियत नहीं मिली। लेकिन इसका यह राजनीतिक अर्थ नहीं कि राधेश्याम गंगानगर गुजरे जमाने की बात हो गए।