Wednesday 12 November 2008

झूठे हैं तेरे वादे

भोला मन नहीं समझ सका
तेरे चालाक इरादे
तूने तो अब आना नहीं
झूठें हैं तेरे वादे।
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तिल तिल मैं यहाँ जल रही
तूं लिख ले मेरे बैन
चिता को आग लगा जाना
मिल जाएगा चैन।
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कितने सावन बीत गए
मिला ना मन को चैन
बादल तो बरसे नहीं
बरसत है दो नैन।
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तेरे दर्शन की आस को
जिन्दा है ये लाश
इस से ज्यादा क्या कहूँ
समझ ले मेरी बात।

---गोविन्द गोयल

3 comments:

seema gupta said...

भोला मन नहीं समझ सका
तेरे चालाक इरादे
तूने तो अब आना नहीं
झूठें हैं तेरे वादे।
" sach kha wada to jhuta hee kiya jata hai, agar wada saccha ho to fir wadey ko kaun puchega ha ha ha ha ha vo hai na badnaam a honge to naam na hoga.."

रंजना said...

पढ़कर, पुराने दिनों में पत्नियों द्वारा सुदूर रह रहे पति को लिखे उपालंभ भरे पत्रों की स्मृति हो आई.....
आनंद आ गया.

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छा।