Thursday 28 June 2012

कहीं ना कहीं कोई ना कोई तो जरूर है......


श्रीगंगानगर-चमत्कार होते हैं और संयोग भी। इनके बारे में पढ़ा भी और सुना भी। सृष्टि में कहीं न कहीं कुछ ना कुछ ऐसा जरूर है जो केवल अपनी मर्जी करता है। उसकी मर्जी में हमारा, तुम्हारा, इसका, उसका,किसी का कोई दखल नहीं। वह जो भी है विभिन्न प्रकार से अपने होने का एहसास करवाता रहता है। मौन रहकर घटनाओं के माध्यम से साबित करता है की कहीं ना कहीं किसी ना किसी रूप में मेरा अस्तित्व जरूर है। वह चेताता है...मैं हूं। कोई मानता है...कोई नहीं। कोई मज़ाक उड़ाता है कोई श्र्द्धा प्रकट कर उसकी लीला को प्रणाम करता है। ताजा घटना क्या है....संयोग,चमत्कार,,,,,,उसके होने का सबूत। पाकिस्तान की कोट लकपत जेल में सालों से कैद सरबजीत सिंह और सुरजीत सिंह। कोई ऐसा नहीं जो सरबजीत सिंह के नाम से अंजान हो। ऐसा एक भी नहीं जिसने सुरजीत सिंह के बारे में सुना हो। कहीं कोई जिक्र तक नहीं उसका...उसके परिवार का।  पाक सरबजीत की रिहाई की घोषणा करता है। तब भी सुरजीत सिंह को कोई जिक्र नहीं। कुछ घंटे बाद अचानक पाक घोषणा करता है की सरबजीत को नहीं सुरजीत को छोड़ा जाएगा। जो खुशियां थोड़ी देर पहले सरबजीत सिंह के परिवार के यहां बरसी....उनका रुख बदल गया। वे सुरजीत सिंह के घर छप्पर फाड़ कर आईं। अचानक...एकदम से। जो परिवार सालों से सरबजीत सिंह की रिहाई की कोशिश में लगा था उसका घोषणा के बावजूद कुछ नहीं हुआ। जिसके परिवार का कभी कोई नाम तक नहीं सुना वे अंतर्राष्ट्रीय फीगर बन गए। किसने सोचा था..नाम बादल जाएंगे। किसको पता था की सरबजीत सिंह के साथ कोई सुरजीत सिंह भी है। इस घटना को कोई भी नाम दिया जा सकता है। संयोग....चमत्कार...। जो यह संकेत करती है कि होगा वही जो मेरी इच्छा है। बेशक किसी भी घटना,दुर्घटना,संयोग का माध्यम तो यह संसार ही है...परंतु अंत में होना क्या है वह उसके सिवा कोई नहीं जानता जिसको किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है। अब सबके सामने है कि जिसकी कभी चर्चा नहीं उसको आजादी मिल गई। जिसके लिए लंबे समय से यहां से वहाँ तक आवाज बुलंद की जा रही है, उसकी रिहाई घोषणा के बावजूद रुक गई। तो आज ...इस बात से इंकार कौन करेगा कि कहीं ना कहीं कोई ना कोई तो है जो इस संसार से भी ऊपर है। अब कोई ना माने तो ना माने.... । शायर मजबूर कहते हैं...खुदी को बुलंद कर तो रहा हूं मजबूर, डरता हूं,खुदा मुझसे शरमाये ना कोई।  

Wednesday 27 June 2012

हर बार,बार बार




आगे बढ़ती हो
हाथ बढ़ाती हो
झिझकती हो
लौट जाती हो
हर बार,बार बार

कुए में ही भांग पड़ी है भाई...


श्रीगंगानगर-कुए में भांग पड़ना...इसे सुना तो जरूर है। इसका मतलब क्या होता है...लिखना मुश्किल। शायद यही कि सब कुछ गडमड है। या फिर सबसे एक से हैं...कुछ भी करो...किसी से भी कहो कोई अंतर नहीं पड़ेगा। लाचारी...बेबसी... । चलो आगे बड़े...सब समझ आ जाएगा। कुछ दिन पहले बीजेपी से आउट डेटेड...बढ़िया पढ़ाई किए हुए....समझदार व्यक्तियों को संगीत को शौक लगा। गाने मेडिकल कॉलेज का राग। राग बढ़िया थी। कई और व्यक्ति शामिल हो गए उनके साथ। संगीत का स्वभाव  ही ऐसा है...दूर तक जाती है इसकी धमक। तो  कांग्रेसी नेताओं के कानों में भी पड़े मेडिकल कॉलेज के स्वर। उनको भी भा गया यह संगीत। वे भी आ गए सुर में सुर मिलाने के लिए। ताकि श्रीगंगानगर सर्वे में शामिल हो जाए,श्रेय उनके खाते में। बैठक हुई....मेडिकल कॉलेज के गीत के बारे में बताया गया। डीएम  भी कागज दिया गया। डीएम को भी पसंद आ गया यह राग। कार्यवाही का भरोसा दिलाया। उत्साही मंत्री जी के घर पहुँच गए उनको सुनाने। मंत्री जी सीधे देहाती....गीत अच्छा लगा। मन में आई...ये तो मुख्यमंत्री को सुनाना चाहिए। मंत्री जी राजधानी पहुंचे और सुना दिया वही गीत मुख्यमंत्री को जो उनको आउट डेटेड बीजेपी वालों ने सुनाया था। लाडले मंत्री ने सुनाया तो मुख्यमंत्री जी ने कान धरे। मुख्यमंत्री ने गीत के भाव भेज दिये जरूरी कार्यवाही के लिए। गंगानगर से भी आए पड़े थे। अफसरों को यह गीत कुछ सुना हुआ लगा.....फाइल देखी....आँख खुली....अरे ये तो पहले से ही हैं यहाँ पर। श्रीगंगानगर को तो इस गीत की जरूरत नहीं...। अब आते हैं कुए में भांग पड़ने वाली बात पर। श्रीगंगानगर को सर्वे में शामिल करवाने की मांग शुरू हो गई....सब लग गए...वे भी जो सरकार में थे और वो भी जिनके बारे में यह कहा जाता है कि वे सरकार के निकट हैं। वे भी जो सरकार चलाते हैं। किसी को यह पता ही नहीं या किसी ने यह जानकारी लेने की जरूरत ही नहीं समझी कि असलियत क्या है। सरकार कहती है कि श्रीगंगानगर को सर्वे की जरूरत ही नहीं वह तो हकदार है मेडिकल कॉलेज का। हम सर्वे के गीत गा  रहे हैं। सब के सब लग गए बिना जानकारी लिए। अब ऊपर क्या इमेज बनी होगी गंगानगर की। अब जब गंगानगर हकदार है तो सब चुप हो गए।  दो लाइन पढ़ो... मेरी हंसी से मेरी हालत का अंदाजा मत लगाना ,ये तो दर्द छिपाने के लिए ओठों पर आती है। [कचरा पुस्तक से ]

Thursday 21 June 2012

कलेक्टर ने जगदीश जांदू को आगे बढ़ाया


श्रीगंगानगर-अब इसमे कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस के बड़े नेताओं की या तो जिला कलेक्टर अंबरीष कुमार से कोई ताल मेल नहीं है या फिर जिला कलेक्टर इन नेताओं की परवाह नहीं करते। उनकी किसी से ट्यूनिंग है तो वो है नगर परिषद सभापति जगदीश जांदू। इसका सबूत है जिला कलेक्टर की प्रेस कोन्फ्रेंस। ओवर ब्रिज इस शहर के लिए बहुत बड़ा मुद्दा है। यह कहां बनेगा?कब शुरू होगा?बनेगा या नहीं?कौन इसके लिए प्रयास कर रहा है?ये सब बातें टॉक ऑफ टाउन हैं। कांग्रेस की टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ चुके राज कुमार गौड़ के लिए भी यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात है। जिस मुद्दे पर इतनी भ्रांतियां,शंका हो....वह सब निपट जाएं........ओवरब्रिज की जगह निश्चित हो जाए....मंजूरी हाथ में हो और कांग्रेस का कोई नेता इसकी घोषणा करे तो उसकी बल्ले बल्ले होना स्वाभाविक है। जो घोषणा करेगा श्रेय भी उसकी की झोली में होगा। राजनीतिक मजबूती भी उसे ही मिलेगी। बधाई उसे ही मिलेगी। प्रशासन पर पकड़ उसी की साबित होगी। सरकार तक अप्रोच उसी की दिखेगी। काम करवाने वाला नेता भी वही कहलाएगा। जब नेताओं में  छोटे छोटे विकास अपने नाम दर्ज करवाने की हौड़ मची हो ऐसे में ओवरब्रिज की मंजूरी की घोषणा करने वाले नेता का तो हीरो बनना बनता ही है। लेकिन जिला कलेक्टर ने जगदीश जांदू को छोड़ कर किसी को तवज्जो नहीं दी। जो घोषणा करके कांग्रेस के बड़े नेता को जनता में वाह वाही लूटनी चाहिए थी वह जिला कलेक्टर ने जगदीश जांदू को साथ बैठाकर कर दी। जिला कलेक्टर ने किसी कांग्रेसी  को मौका ही नहीं दिया ओवरब्रिज का श्रेय लेने का। जांदू को साथ ले ओवरब्रिज का ताज उनके सिर रख दिया। उन्होने श्री जांदू की उपस्थिति  में ओवरब्रिज की घोषणा करके उनको आगे बढ़ा दिया। राजनीति में कहने से अधिक दिखने का प्रभाव अधिक होता है। अब सीएम मंच से  नेता की तारीफ करे और फिर बी नेता के कंधे पर हाथ धर उसे साइड में लेकर चला जाए। बात कुछ भी ना करे....लेकिन बी की वो बल्ले बल्ले हो कि क्या कहने। यही जिला कलेक्टर ने जगदीश जांदू के साथ किया। एक तो उन्होने यह संदेश दिया कि मेरे तो जगदीश जांदू जी दूसरा ना कोई....दूसरा ये कि कोई सीएम के निकट हो या किसी ओर के हमारे कोई फर्क नहीं पड़ता। बाकी जनता खुद समझदार है। अर्थ अपने आप निकाल लेती है। कचरा पुस्तक की लाइन पढ़ो...कभी झिझक दिखे कभी तड़फ दिखे हर वक्त तुम्हारी आँखों में, मैं क्या जानू मुझे क्यों दिखता है संसार तुम्हारी आँखों में।


Wednesday 20 June 2012

टिकट की नो टेंशन...चुनाव तो लड़ना ही है



श्रीगंगानगर-जिले के अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में कम से कम एक एक राजनेता ऐसा है जिसे हर हाल में चुनाव लड़ना ही है। ऐसे महानुभाव कांग्रेस में भी हैं और बीजेपी में भी। इनको पार्टी टिकट दे तो वैल एंड गुड....ना दे तो और भी बढ़िया। चुनाव से तो पीछे हटना ही नहीं। तो श्री गंगानगर से शुरू करते हैं। श्रीगंगानगर से शुरू करना है तो राधेश्याम गंगानगर का नाम लिखना ही पड़ेगा। 1977 के बाद कौनसा विधानसभा का चुनाव था जिसमें राधेश्याम जी नहीं थे। 2008 में टिकट नहीं मिली तो पार्टी बदल ली। 2013 में गड़बड़ हुई तो निर्दलीय लड़ेंगे या घर लौटने का रास्ता तलाश करेंगे।  सादुलशहर में यही बात गुरजंट सिंह बराड़ के लिए कही जा सकती है। 1993 में निर्दलीय तौर पर जीते। श्री बराड़ को टिकट मिले ना मिले कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। इनका खुद का वजूद इतना है कि निर्दलीय लड़ कर पूरा समीकरण बदलने की क्षमता है इस परिवार में। ये अलग बात है कि परिवार के राजनीतिक मनमुटाव अब बाहर दिखने लगे हैं। राम प्रताप कासनिया भी इसी श्रेणी के लीडर हैं। पार्टी के विचार,निष्ठा,सिद्धान्त  टिकट मिलने तक ही हैं। ऐसा कौन है जो टिकट ना मिलने पर इनको चुनाव लड़ने से रोक सके। खुद नहीं जीते तो पार्टी उम्मीदवार को चित्त तो कर सकते हैं। रायसिंहनगर के दुलाराम भी इस काम के मास्टर हैं। चुनाव तो लड़ेंगे ही। टिकट दी तो उसका झण्डा उठा लेंगे। राजनीति में इनका एक ही नियम है...चुनाव लड़ना। श्रीकरनपुर के गुरमीत सिंह कुन्नर भी इनसे अलग नहीं है। पिछली बार उन्होने ऐसा ही किया। 2013 में अब अधिक समय नहीं है। असल में इसके लिए इनको दोष देना ठीक नहीं है। अगर ये नेता चुनाव ना लड़ें तो क्या करें...घर बैठ जाएं...और राजनीतिक रूप से हो जाएं शून्य....... । गुरमीत सिंह कुन्नर चुनाव ना लड़ते तो आज कहां होते। जगतार सिंह कंग बनने में देर नहीं लगती राजनीति में। यही होता है राजनीति में। जगह खाली नहीं रहती कभी। आप नहीं तो कोई दूसरा  तैयार है जगह रोकने के लिए। एक बार जगह किसी और ने रोकी नहीं कि आप आउट राजनीति से। अपने आप को राजनीति में बनाए रखने,अपना वजूद साबित करने के लिए टिकट मिले ना मिले चुनाव लड़ना जरूरी हो जाता है। इस बार के चुनाव में कोई नए नाम जुड़ सकते हैं... जगदीश जांदू....अशोक नागपाल....हंस राज पूनिया....बलराम वर्मा.... । राजनीति से हटकर कचरा पुस्तक की दो लाइन पढ़ो...प्रीत का मौन निमंत्रण मिलता मुझे तुम्हारी आँखों में,कभी झिझक दिझे कभी तड़फ दिखे हर रोज तुम्हारी आँखों में।

Saturday 16 June 2012

फेसबुक पर लोग कलाम के पक्ष में



 


श्रीगंगानगर-राष्ट्रपति वही होगा जो कांग्रेस चाहेगी। लेकिन फेसबुक पर अब्दुल कलाम को जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है। फेसबुक पर सक्रिय रहेने वाले अधिकांश व्यक्ति श्री कलाम की फोटो लगा उसके पक्ष में माहौल चला रहे है। हर कोई उनको जनता का राष्ट्रपति बता रहा है। श्री कलाम के बारे में यहां तक लिखा गया कि बेशक उन्होने ऐसा कोई काम नहीं किया कि उनको फिर से राष्ट्रपति बनाया जाए...किन्तु ऐसा भी कुछ नहीं किया कि उनको ना बनाया जाए। एक ने लिखा कि श्री कलाम जनता के उम्मीदवार हैं। इस व्यक्ति ने अपनी ओर से जनता से श्री कलाम के नाम का समर्थन करने की अपील की है। वह जानता है कि इस अपील का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि जनता के हाथ में कुछ भी नहीं है। इसके बावजूद फेसबुक पर लगें हैं लोग श्री कलाम को राष्ट्रपति बनाने के लिए। उधर जैसे ही कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित किया फेस बुक पर उसकी निंदा करने की होड़ लग गई। एक ने लिखाकांग्रेस ने यह साबित कर दिया कि उसे अपनी सरकार में ईमानदार,बेदाग लोगों की जरूरत नहीं। दूसरे ने प्रणब मुखर्जी की हाय हाय कर दी। किसी ने आक्रोश में यह लिखालगता है कि वो बंगाली मछली{पिद्दा} राष्ट्रपति बन कर रहेगा। एक व्यक्ति ने तो फोन नंबर देकर वहां कॉल करने को कह दिया। उसने लिखा – “अगर आप ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति के रूप में देखना चाहते है तो 080-8289-1049 पर काल करे (ये पूर्णतया निशुल्क है). एक मोबाइल से एक ही काल मान्य होगी. तो जल्दी करे कही देर न हो जाये।फेस बुक पर लिखने वाले जानते हैं कि राष्ट्रपति बनाना उनके बस की बात नहीं है इसके बावजूद वे श्री कलाम को राष्ट्रपति के लिए परपोज कर रहे हैं। यह श्री कलाम के प्रति उनकी भावना है। एक व्यक्ति ने प्रणब की उम्मीदवारी को देश का बंटाधार करने वाला कदम बताया है। किसी ने लिखा-जब भी कलाम का नाम "राष्ट्रपति " पद के लिया जाता है तो "सोनिया गाँधी" ऐसे डरने लगती है जैसे वो "कलाम" ने होकर कोई "मिसाईल" हो और "दस जनपथ" पे गिरने वाली हो ......अगर कलाम "राष्ट्रपति " बनते हैं तो "सोनिया गाँधी" की सारी पोल खुल जायेगी....और उनका पाप का घड़ा फूट जायेगा ...और फिर से राहुल गाँधी प्रधानमंत्री बनने से रह जायेंगा ! वो तो हमारे "अटल जी" थे जिन्होंने कलाम को "राष्ट्रपति " बनवाया....क्यूंकि उनका "चरित्र" दूध से धुला था....। और अब भी कलामजी को ही "राष्ट्रपति " बनाना चाहते है। अगर फेसबुक पर राष्ट्रपति चुनाव होते तो श्री कलाम ही राष्ट्रपति चुने जाते।

Wednesday 13 June 2012

राज हठ से टूट सकता है ओवरब्रिज का सपना


श्रीगंगानगर- बाल हठ,त्रिया हठ और राज हठ इनका कोई तोड़ किसी के पास नहीं। घर,समाज देश को इनसे वास्ता पड़ता रहता है। बाल हठ मासूमियत लिए होता है।  त्रिया और राज हठ तो ऐसे विचित्र होते हैं कि दुनिया पनाह मांगने लगती है। देश त्रिया हठ से त्राहि त्राहि कर रहा है। मनमोहन सिंह को  पीएम रखना सोनिया का त्रिया हठ ही तो है। श्रीगंगानगर शहर इन दिनों राज हठ से पीड़ित है। राज हठ के प्रतीक हैं जिला कलेक्टर अंबरीष कुमार। इनका हठ है कि ओवरब्रिज बनेगा तो  करनी मार्ग पर ही बनेगा...चाहे जो हो। इनको इस बात से कोई मतलब नहीं कि यह व्यवहारिक है या नहीं। इनको इस बात से भी कोई लेना देना नहीं कि ओवरब्रिज कहां अधिक उपयोगी है। कहां बनाने से जनता को अधिक सुविधा होगी। बस,कह दिया सो कह दिया। उनके इस हठ के कारण गुड के गोबर होने की आशंका हो गई है। इतने अधिक नेताओं के रहते कलेक्टर साहब को कोई यह बताने वाला नहीं है क्या कि ओवरब्रिज की उपयोगिता कहां है। पर ये तो इनसे डरे,सहमे हैं।ये क्यों बताने लगे। पूरा शहर जानता है कि लक्कड़ मंडी से अधिक उपयोगी जगह ओवरब्रिज के लिए हो ही नहीं सकती। नेशनल हाई वे है....कमर्शियल क्षेत्र है...फाटक से पहले रेल का शैंटिंग  प्वाइंट है...जिसके कारण फाटक बार बार बंद रखना पड़ता है। सूरतगढ़ से लेकर यहां तक कोई मौड़ नहीं। रात को कितना भी ट्रैफिक निकले किसी को कोई तकलीफ नहीं। इसमे कोई शक नहीं कि ओवरब्रिज के निर्माण के कारण यहां का कारोबार प्रभावित होगा....लोगों को नुकसान उठाना पड़ेगा...प्रॉपर्टी की कीमत पर असर होगा...। लेकिन बड़े विकास होते हैं तो यह सब होना स्वाभाविक है। इसके लिए लोग मानसिक रूप से तैयार भी हो चुके थे। राज हठ ने इनका मन फिर बदल दिया। अब चलते हैं करनी मार्ग पर। नेशनल हाईवे से आने वाले वाहन कितने मौड़ काटेंगे...मीरा मार्ग पर तो दिन में ही ट्रैफिक बहुत है....रात को तो फिर क्या हाल होगा। लोग तो रात को चैन से शायद ही सो पाएंगे। मीरा चौक पुलिस चौकी की कीमत बढ़ जाएगी। खीची चौक पर भी जगह बढ़ानी पड़ेगी...हां सभी किसी ना किसी कारण से परेशान होंगे...विकास होता है तो परेशानी होती ही है...परंतु विकास भी तो वहीं हो  जहां उसकी उपयोगिता अधिक हो...लोगों को परेशानी कम से कम। करनी मार्ग पर ओवरब्रिज बनने से लक्कड़ मंडी के ट्रैफिक की समस्या तो वैसी की वैसी रहेगी...करनी मार्ग वाले दुखी हो जाएंगे...बस डेंटल कॉलेज की बल्ले बल्ले जरूर  हो जाएगी। राज हठ यही तो चाहता है शायद...। कचरा पुस्तक की दो लाइन हैं...मैं तो डायरी हूं तेरे मन की जो कुछ तू लिखेगा,ये वादा रहा उसमे तेरा ही अक्स दिखेगा।


Thursday 7 June 2012

बेबस और लाचार हैं कांग्रेस नेता कलेक्टर के सामने

श्रीगंगानगर-कांग्रेस नेता जिला कलेक्टर अंबरीष कुमार का शिकार तो करना चाहते हैं। लेकिन पर्दे के पीछे रहकर। वे कलेक्टर की खिलाफत तो करते हैं मगर नाम ना छापने की शर्त पर मीडिया में। वे भली प्रकार से जानते हैं कि जिला कलेक्टर मात्र बड़ी बड़ी घोषणा करने के मास्टर हैं ,आउट पुट की दृष्टि से केवल जीरो ...इसके बावजूद वे सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं करते। ये नेता इस बात से भी अनभिज्ञ नहीं कि जिला कलेक्टर उनकी लगातार उपेक्षा करता है इसके बावजूद वे चुप हैं। ये सब इसलिए नहीं कि कांग्रेस नेता सहनशील हैं। मर्यादित हैं। सरकार के प्रतिनिधि का आदर कर धर्म का निर्वहन कर रहे हैं। असल में ये कांग्रेस नेता मजबूर हैं। लाचार हैं। बेबस हैं। क्योंकि मान लो कलेक्टर से पंगा ले लिया तो उसको चुटकी बजाकर तुरंत चलता करवाने की हिम्मत तो किसी में नहीं है। कौन है ऐसा जो कलेक्टर की तो छोड़ो...किसी छोटे अधिकारी का भी बिस्तर बँधवाने की राजनीतिक ताकत,इच्छा शक्ति रखता हो। कौन कहेगा मुख्यमंत्री से कि साहब जी इस कलेक्टर को तुरंत यहां से चलता करो...और अशोक गहलोत फटाफट अंबरीष कुमार को बदल देंगे। मुख्यमंत्री भी सालों से जानते हैं अपने इन नेताओं को। दस माह में जिला कलेक्टर ने जो घोषणा की, जनता को सपने दिखाए, नेताओं से भी दो कदम आगे जाकर विकास की बात की...अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस की ऐसी तैसी की...कांग्रेस के किसी नेता ने उनके बारे में कुछ नहीं कहा।कलेक्टर किसी और को भजता रहा...जपता रहा...कांग्रेस नेता अंदर ही अंदर कुढ़ते रहे। क्योंकि इनमें हिम्मत नहीं है...अपने आप पर भरोसा नहीं...वे जानते हैं कि ऊपर कोई सुनवाई नहीं होगी...इसलिए या तो चुप्प रहने में भलाई है या फिर नाम ना छापने की शर्त पर मीडिया का इस्तेमाल किया जाए। कंधा मीडिया का...बंदूक उनकी...खुद आड़ में। निशाना सही लगा तो सामने आ जाएंगे ...वरना कलेक्टर साहब की नजर में भले के भले। ये कैसी वफादारी है जनता के प्रति...किस प्रकार की लिजलिजी राजनीति है इन कांग्रेस नेताओं की। किस से क्यों घबराते हैं....वोट जनता से लेने हैं...तरफदारी करते हो अफसर की। क्यों नहीं धड़ल्ले से राजनीति करते...क्यों नहीं जनता की आँख में आँख मिलाकर बात करते...दो और दो चार कहने की हिम्मत भी नहीं रही क्या...विधायक राधेश्याम गंगानगर...उनको तो चुप रहने में ही सबसे अधिक राजनीतिक लाभ है...या विधानसभा में प्रश्न पूछने में।