Monday 9 November 2009

क्या पाया पाप कमा के

----चुटकी----

तेरे यहाँ
होते हैं
अब तो
रोज धमाके,
बता तो सही
पाक
तूने क्या पाया
पाप कमा के

Friday 6 November 2009

प्रभाष जोशी को नमन

श्री प्रभाष जोशी चले गए। वह वहां चले गए जहाँ कोई जाना नहीं चाहता लेकिन सभी ने बारी बारी से जाना जरुर है। यह जाना किसी भी प्रकार की अप्रोच से रुक ही नहीं सकता। सब इस बात को जानते हैं। इस जाने पर कोई विवाद नहीं,कोई झगड़ा नहीं। बस, जैसे ही कोई गया उस के मुहँ पर चादर ढक देते हैं। कोई बड़ा हुआ तो उसकी मुहँ दिखाई अन्तिम दर्शनों के रूप में चलती रहती है। जाना इस जीवन का एक मात्र सत्य है। इसके बावजूद हम इस सच्चाई को भूल कर अपनी दिनचर्या को निभाते हैं। एक क्षण में आदमी है, दूसरे ही क्षण नहीं है। हैं ना कमाल की बात। हाँ, जाने का दुःख उतना होता है जितना जाने वाले से सम्बन्ध। थोड़ा सम्बन्ध तो क्षण भर का शोक,अधिक है तो दो चार दिन का। सम्बन्ध बहुत -बहुत अधिक है तो फ़िर यह शोक कई दिन, सप्ताह,महीने साल,सालों तक रह सकता है। समय धीरे धीरे इस शोक को आने वाली छोटी-बड़ी खुशी से कम करता रहता है। ऐसा ना हो तो जीवन चल ही नहीं सकता। बस इसी प्रकार से हम सब इस दुनिया में अपना पार्ट अदा करके इस रंग मंच से विदा हो जाते हैं। जैसे श्री प्रभाष जोशी चले गए। हमारा रोल अभी बाकी है इसलिए हम हैं। जब हमारा रोल समाप्त हो जाएगा तो हम भी चले जायेंगें श्री जोशी की तरह। उनकी तरह नहीं तो किसी आम आदमी की तरह। जाना तय है,जाना ही पड़ेगा। श्री जोशी को नमन। उनसे मिलने का अवसर कभी नहीं मिला। एक बार १९९६ में हमने श्रीगंगानगर में उनको एक पत्रकार सम्मलेन में आमन्त्रित किया था। लेकिन वे आ नहीं सके थे।

Sunday 1 November 2009

घर से चाँद तक रोड

लल्लू ने नारायण नारायण का जाप करके भगवान विष्णु को प्रसन्न कर लिया। विष्णु जी प्रकट हुए।

विष्णु जी--लल्लू मैं तुम्हारी भक्ति से खुश हूँ,वर मांगो।
लल्लू-- भगवन, मेरी चाँद पर जाने की इच्छा है। मेरे घर से चाँद तक रोड बना दो।
विष्णु जी--हमारे विधान के अनुसार यह सम्भव नहीं है, कोई और वर मांग लो वत्स।
लल्लू --ठीक है। मेरी बीबी को मेरी आज्ञाकारी बना दो।
विष्णु जी--रोड सिंगल चाहिए या डबल।

Saturday 31 October 2009

कनस्तर का आटा

---- चुटकी-----

जब से ख़त्म
हुआ है
कनस्तर में आटा,
तब से
पसरा हुआ है
घर में सन्नाटा।

Tuesday 27 October 2009

मायका है एक सुंदर सपना


नारदमुनि कई दिन से अवकाश पर हैं। अवकाश और बढ़ने वाला है। जब तक नारदमुनि लौट कर आए तब तक आप यह पढो, इसमें विदा होती बहिन के नाम कुछ सीख है। मायके वालों का जिक्र भी है। जिक्र उस स्थिति का जब उनके घर से उनकी लड़की,बहिन,ननद.....कई रिश्तों में बंधी बेटी नए रिश्ते बनाने के लिए अपना घर झोड़ कर अंजान घर में कदम रखती है। उम्मीद ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि यह आप सबको बहुत ही भली लगेगी। क्योंकि यह तो घर घर की कहानी है।

Saturday 24 October 2009

बीजेपी की पिटाई

----चुटकी-----

कांग्रेस
आई,
भाजपा की
पिटाई,
चौटाला की

लाज बची,
हुड्डा की
खिंचाई।
--------
भक्त जनों कई दिन से अपने प्रदेश की राजधानी गया हुआ था। इस लिए यहाँ से गायब रहा। कोशिश रहेगी आपके साथ हर पल जुड़े रहने की। नारायण नारायण ।

Monday 19 October 2009

अपमान को कर कैश

---- चुटकी----

जिंदगी में
चाहता है
अगर तू
हर पल ऐश ,
स्वाभिमान को
भूल जा,
अपमान को
कर कैश।

Sunday 18 October 2009

राम-राम,राम-राम


आज बस राम-राम। दोस्त को भी और उनको भी जो मुझे अपना दुश्मन समझतें हैं या वो मेरे दुश्मन है। राम राम अपनों को भी,परायों को भी। अच्छे को भी, बुरे को भी।
इस धरा पर रहने वाले सभी जीवों को, जड़ को, चेतन को, अवचेतन को दिवाली की राम-राम। तस्वीर बीबीसी से साभार ली गई है। बीबीसी का धन्यवाद करता हूँ।

Saturday 17 October 2009

तालिबान का क्या कसूर

आज बस दिवाली की शुभकामना ही देना और लेना चाहता था। मगर क्या करूँ,पड़ौस में रहता हूँ इसलिए पड़ौसी पाकिस्तान याद आ गया। पाकिस्तान याद आया तो तालिबान को भी याद करना मज़बूरी थी। जब दोनों साथ हो तो न्यूज़ चैनल्स वाले आधे घंटे की स्पेशल रिपोर्ट दिखाते हैं। हमारी इतनी समझ कहाँ! हम केवल चुटकी बजायेंगे।
---- चुटकी----

बेचारे तालिबान का
इसमे क्या कसूर,
जिसने जो बोया
वह,वही काटेगा
यही तो है
प्रकृति का दस्तूर।

Friday 16 October 2009

जो बोया वही काटेंगे

बंगाल की टीवी रिपोर्टर शोभा दास के खिलाफ केस, चंडीगढ़ में प्रेस से जुड़े लोगों को कमरे में बंद किया, जैसी खबरें अब आम हो गई हैं। महानगरों में रहने वाले,बड़ी बड़ी तनख्वाह पाने वाले, ऊँचे नाम वाले पत्रकारों को कोई अचरज इन ख़बरों से हो तो हो हमें तो नहीं है। हो भी क्यूँ, जो बोया वही तो काट रहें हैं। वर्तमान में अखबार अखबार नहीं रहा एक प्रोडक्ट हो गया और पाठक एक ग्राहक। हर तीस चालीस किलोमीटर पर अखबार में ख़बर बदल जाती है। ग्राहक में तब्दील हो चुके पाठक को लुभाने के लिए नित नई स्कीम चलाई जाती है। पाठक जो चाहता है वह अख़बार मालिक दे नहीं सकता,क्योंकि वह भी तो व्यापारी हो गया। इसलिए उसको ग्राहक में बदलना पड़ा। ग्राहक को तो स्कीम देकर खुश किया जा सकता है पाठक को नहीं। यही हाल न्यूज़ चैनल का हो चुका है। जो ख़बर है वह ख़बर नहीं है। जो ख़बर नहीं है वह बहुत बड़ी ख़बर है। हर ख़बर में बिजनेस,सनसनी,सेक्स,सेलिब्रिटी,क्रिकेट ,या बड़ा क्राईम होना जरुरी हो गया। इनमे से एक भी नहीं है तो ख़बर नहीं है। पहले फाइव डब्ल्यू,वन एच का फार्मूला ख़बर के लिए लागू होता था। अब यह सब नहीं चलता। जब यह फार्मूला था तब अख़बार प्रोडक्ट नहीं था। वह ज़माने लद गए जब पत्रकारों को सम्मान की नजर से देखा जाता था। आजकल तो इनके साथ जो ना हो जाए वह कम। यह सब इसलिए कि आज पत्रकारिता के मायने बदल गए हैं। मालिक को वही पत्रकार पसंद आता है जो या तो वह बिजनेस दिलाये या फ़िर उसके लिए सम्बन्ध बना उसके फायदे मालिक के लिए ले। मालिक और अख़बार,न्यूज़ चैनल के टॉप पर बैठे उनके मैनेजर,सलाहाकार उस समय अपना मुहं फेर लेते हैं जब किसी कस्बे,नगर के पत्रकार के साथ प्रशासनिक या ऊँची पहुँच वाला शख्स नाइंसाफी करता है। क्योंकि तब मालिक को पत्रकार को नमस्कार करने में ही अपना फायदा नजर आता है। रिपोर्टर भी कौनसा कम है। एक के साथ मालिक की बेरुखी देख कर भी दूसरा झट से उसकी जगह लेने पहुँच जाता है।उसको इस बात से कोई मतलब नहीं कि उसके साथी के साथ क्या हुआ,उसे तो बस खाली जगह भरने से मतलब है। अब तो ये देखना है कि जिन जिन न्यूज़ चैनल और अख़बार वालों के रिपोर्टर्स के साथ बुरा सलूक हुआ है,उनके मालिक क्या करते हैं। पत्रकारों से जुड़े संगठनों की क्या प्रतिक्रिया रहती है। अगर मीडिया मालिक केवल मुनाफा ही ध्यान में रखेंगें तो कुछ होनी जानी नहीं। संगठनों में कौनसी एकता है जो किसी की ईंट से ईंट बजा देंगे। उनको भी तो लाला जी के यहाँ नौकरी करनी है। किसी बड़े लाला के बड़े चैनल,अखबार से जुड़े रहने के कारण ही तो पूछ है। वरना तो नारायण नारायण ही है।