Tuesday 26 April 2016

इबादत तेरी करने लगा और 
इश्क खुदा से, 
तेरे ख्याल ने यारा सब 
गड्ड मड्ड कर दिया। 
[2g]

....
सस्ते मेँ ही बेच दिया मुझको 
कुछ तो मोल लगाते जनाब। 
रिश्ते झूठे, पैसे सच्चे 
सच एक है, यही जनाब।
बिछड़ गए सब संगी साथी 
अब तो है, बस याद जनाब।
झूठी हकीकत, सच्चे ख्वाब
मेरी पूंजी, इतनी जनाब।
[2g]

Monday 22 February 2016

दुविधा

3- 
दादा पिता लाहौर मेँ सब कुछ छोड़ के आए थे। इसलिये इधर था ही नहीं अधिक कुछ। दो पैसों के लिए कभी 5-10 पैसे वाले पुड़ी के पत्ते लगाता। कभी कुछ करता। एक दो बुरी बात भी थी। नगर पालिका पार्क की लाइब्रेरी के स्टोर से दरवाजे के नीचे से झाड़ू की सींक से अखबार निकाल लेते थे। करना क्या था....पार्क मेँ ही खेलते। पिता जी कारखाने मेँ काम करते थे। सर्दियों मेँ मैं अक्सर रात को वहीं सोता। एक मिस्त्री था, उन्होने रुमाल का चूहा बनाना और उसे हाथ पर चलाना सिखाया। वह आज भी बड़े शानदार ढंग से बनाना और चलाना आता है। बच्चों को बना और चला के दिखाता हूँ। स्कूल मेँ किसी मास्टर की मार तो नहीं खाई लेकिन घर मेँ माँ की जरूर खाई। माँ कहती थी, मैं कभी कभी कुछ ना कुछ गुनगुनाता रहता था। ऐसे ही कोई शब्द। बात। कुछ लाइन। मेरे दादा श्री मंगल चंद जी तीन भाई थे। श्री मांगी लाल जी और निहाल चंद जी उनके भाई थे। तीनों के मकान साथ साथ थे। पार्क के सामने। हर शाम तीनों परिवारों के पुरुष, बच्चे मांगीलाल दादा जी के जरूरु जाते। चबूतरे पर बड़ा लकड़ी का पट्टा था। वहाँ बैठते। बात चीत होती। सर्दी मेँ यह बैठक घर के बाहर वाले कमरे मेँ लगती। गजसिंहपुर मेँ दो भाई बहिन की शादी हो गई। बड़े भाई नेमी चंद गंगानगर आ गए। काम के लिये। फिर ये तय हो गया कि परिवार का गजसिंहपुर को अलविदा करने का समय आ गया...रोटी, रोजी के लिये गंगानगर जाना होगा.....

4--तो ये तय हो चुका था कि गजसिंहपुर को छोड़ना ही होगा। जहां पेट रोटी को तरस जाए, उधर कौन रहना चाहेगा। लाइन पार का पनघट। उसके पास छोटा खाला। आगे जाकर खेत मेँ बना शिवालय। गन्ने से लदी माल गाड़ी से गन्ने खींचना। मंडी से छोड़ने से पहले मोती नामक कुत्ता हमें छोड़ गया। घर के सामने वाले ने उसे दिन दिहाड़े गोली मार दी। क्योंकि एक दिन मोती ने उस पर भोंकने की गलती कर दी थी। मोती बेशक हमारा पालतू नहीं था, लेकिन उसे चौखट हमारी ही प्यारी थी। रिश्तेदार आना है, उसे ट्रेन से लेकर आना। जाना है, तो स्टेशन तक छोड़ के आना। जो दिया, वही खाया। हम स्टेशन पर आ चुके थे। बस, मोती नहीं था हमें अलविदा कहने के लिये। ट्रेन लेट थी। मैं खुश था, ट्रेन मेँ चढ़ना था। गंगानगर आना था। माँ, पिता, भाई, बहिन के चेहरे पढ़ ही नहीं पाया। आता ही नहीं था पढ़ना। परंतु आज सोचता हूँ तो वे चेहरे यकीनन उदास ही रहे होंगे। उन पर अपने भरे पूरे परिवार को, गलियों, घर को छोड़ने का रंज तो रहा ही होगा। हरियाणा के बरोदा बिटाना से बुढ़लाडा, वहाँ से लाहौर फिर गजसिंहपुर.....कैसे कैसे दिन ये दिखाई जिंदड़ी। ट्रेन का आना मेरे लिये उल्लास, खुशी और आनंद का विषय था और शायद माँ के लिये विषाद का विषय रहा होगा। हे भगवान, माँ के प्रस्थान कर जाने के बाद ही यह सब लिखने का विचार क्यों आया.....

Saturday 20 February 2016

दुविधा

2—
शिशु की दिनचर्या जैसी होती है मेरी भी थी। रोना, सोना और दूध पीना। सरका , घुटनों के बल चला। और फिर पैरों पर। आँगन बड़ा था। दहलीज़ ऊंची थी। बाहर जा नहीं सकते थे। पाँच साल का हुआ। सरकारी स्कूल मेँ भर्ती हो गया। फेल होने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। एक कायदा, एक स्लेट और एक तख्ती, यही होता था, कपड़े के थैले मेँ। जो आजकल स्कूल बैग के नाम से जाना जाता है। स्कूल जाने से पहले और आने के बाद खेलना। वह कंचे, सिगरेट की डब्बी, गेंद, शाम को कबड्डी। पतंग उड़ाना। दूसरी, तीसरी मेँ हो गए। दादी जी प्रस्थान कर गईं। स्मृति इसलिये है कि मरने पर जो आज होता है, तब भी वैसा ही हुआ था। मैं नहीं गया था, श्मशान मेँ। गली मेँ खेल रहा था। दादा की दुकान थी। पिता कारखाने मेँ काम करते थे। एक दिन मैंने और चचेरे भाई ने दुकान से दस दस पैसे चुरालिए थे। जो होना था हुआ। पहले लाइन से उस पार स्कूल मेँ था। फिर घर के पास स्थित स्कूल मेँ लगा दिया गया। पड़ोस मेँ एक लड़के की शादी हुई। लड़का परदेश रहता था। उसकी बहू बिलकुल अनपढ़। उन्होने मुझे लिखना सिखा दिया। परदेश से जो पत्र उसके पिया जी उसे भेजते। वह मुझसे पढ़वातीं। चूंकि गली मेँ हम ही ज्ञानवान, गुणवान और राज को राज ही रखने मेँ निपुण थे, इसलिये मुझे वह पत्र पढ़ कर सुनाना होता और उसका जवाब भी लिखना होता। इसके बदले मुझे मिलते दस पैसे, कभी कभी पच्चीस पैसे। कभी पैसे की जरूरत होती तो मैं पूछ लेता, चिट्ठी आई क्या? वह सिर हिला देती। कई बार झिड़क कर कहती...नई आई रे। क्यों जान खा रहा है। काम करने दे.....दोनों उदास। वो अपने कारण और मैं अपनी दस्सी की वजह से। ये तो अब मालूम हुआ कि चिट्ठी आई होती तो मुझे तो पता लग ही जाता.....

Friday 19 February 2016

दुविधा...

कमेंट्स करने से पहले पढ़ लेना प्लीज....
55
साल के इस गोविंद के कई रूप हैं। 55 साल का बेटा, भाई है तो लगभग 25 साल का पिता भी। पति, चाचा, मामा, दादा, ससुर, दोस्त,......जैसे कितने व्यक्ति एक के अंदर गईं....साथ मेँ पत्रकार भी है...आम इंसान भी ...जिज्ञासु.......किस गोविंद का जिक्र करूँ....समझ से परे......गोविंद के प्रेम का जिक्र नहीं होता तो गोविंद की कथा अधूरी है। उलझन है, दुविधा है, लेकिन कहानी है तो शुरू करनी ही होगी। अंत कैसा होगा क्या पता? वो तो क्लाइमेक्स लिखने के बाद ही मालूम होगा। प्रेम! प्रेम तो साथ चलेगा ही।

1-55 साल पहले 16 जनवरी के दिन माँ को सुबह ही अहसास होने लगा था कि मैं आने वाला हूँ। शाम होते होते यह अहसास प्रसव पीड़ा मेँ बदल गया। दादी ने धाओ दाई को बुला लिया। गजसिंहपुर मेँ पालिका पार्क के बिलकुल निकट घर के बीच वाले कमरे मेँ शाम को 7.34 बजे मैं गर्भ गृह से बाहर आया। मैंने इस अलौकिक, दिव्य और अद्भुद सृष्टि को नजर भर देखने की शुरूआत करने की बजाए रोना शुरू कर दिया। माँ से अलग करने के लिए धाओ ने नाल काट दी। माँ प्रसव की तीव्र पीड़ा के बावजूद खुश खुश रही होगी और मैं लड़का होने के बावजूद रो रहा था। शायद पीड़ा माँ को रही थी और रो मैं रहा था। धाओ ने मुझे पोंछ कर माँ के निकट लिटा दिया। माँ देखती रही। कुछ देर बाद कानों मेँ थाली बजने की आवाज सुनाई दी। माँ बताया करती थी, तू जब पैदा हुआ तब तेरे कान छिदे हुए थे। कानों मेँ छेद थे। शायद पिछले किसी जन्म मेँ तू कोई साधू, संत था...............

Saturday 2 January 2016

बीजेपी श्रीमान अजय चान्डक का करेगी क्या



श्रीगंगानगर। हर रोज वही बात अजय चान्डक बीजेपी मेँ जा रहे हैं। नहीं जा रहे। उनको भाव नहीं मिला। उनको नहीं लिया। लेंगे या नहीं इस पर असमंजस है। तमाम बातें आधारहीन हैं। ऐसा लगता है किसी ने अजय चान्डक से बीजेपी मेँ शामिल करवाने का ठेका ले लिया है। माननीय मंत्री टीटी जी का ये कहना कि गंगानगर मेँ बीजेपी के पास कोई लीडर नहीं, उसी ठेके का हिस्सा लगता है। सोचने वाली बात ये कि बीजेपी श्रीमान अजय चान्डक का करेगी क्या? उसके पास ना तो विधायकों की कमी है और ना ऐसे नेताओं की। फिर अजय चान्डक तो सभापति होने के बावजूद कुछ जानते ही नहीं। उनको ना तो सभापति के पद की गरिमा और अधिकारों का ज्ञान है और ना नगर परिषद के काम काज का। फिर अजय चान्डक मेँ ऐसी कौनसी काबिलियत है कि वे बीजेपी के उस खाली स्थान को भर देंगे, जिसका जिक्र टीटी ने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के सामने किया है। इसके बावजूद किसी को अजय चान्डक जी को बीजेपी मेँ शामिल करवाने का जुनून सवार है तो है। उनके आने से बीजेपी को तो कोई राजनीतिक लाभ मिलने वाला नहीं, किसी को व्यक्तिगत फायदा हो तो हो। 

Wednesday 30 December 2015

जाने वाले लौट के जरूर आना, मेरे लिये!


श्रीगंगानगर। कैलेंडर 2015, आखिर तेरे जाने का समय आ ही गया। कितने धूमधाम से आया था तू। कैसा स्वागत हुआ था। और आज तुझे चले जाना है। कभी लौट के ना आने के लिये। प्राणी भी चले जाते हैं यहाँ से । तुम तो फिर  भी कैलेंडर हो। प्राणी कब जाएगा, कोई नहीं जानता, तुम्हारा सबको पता होता है कि कब जाना है। तुम्हारे पास 365 दिन थे। उनमें वे सब भाव थे, जो इंसान कि जिंदगी मेँ होते हैं। अच्छे-बुरे, दुख के, सुख के, गम के, खुशी के, आनंद के, रोने के, हंसी के, शौक के, मस्ती के। हर रंग थे हर  दिन मेँ । किसके को क्या मिला, यह मुकद्दर की बात है, तुम सभी के लिये सब कुछ लेकर आए। सुहानी सुबह। उजला प्रभात। रंग बिरंगी सुबह और शाम की लालिमा। कभी रिमझिम तो कभी तेज बरसात। ठंड के समय ठंड। गर्मी के दिनों मेँ गर्मी। सब कुछ तय था। समय के अनुसार। सब मौसम थे, एक प्यार के मौसम  को छोड़। उसे तुमने तारीखों मेँ नहीं बांधा। क्योंकि तुम जानते हो कि यह तो हर पल करने और महसूस करने वाले भाव हैं, जो ज़िंदगी के लिये सबसे जरूरी है। दुनिया को क्या क्या दिया, मुझे क्या मालूम। परंतु मुझे तुमने खूब दिया। अच्छे सच्चे दिन। खूब सारी खुशी। पुराने सम्बन्धों की मजबूती। नए सम्बन्धों की गरमाहट। नए रिश्तों की आहट । अपनों की चाहत। ढेर सारा सम्मान। जब मौका मिला, तेरी सुबह शाम को निहारा। दूज का चांद को प्रणाम किया। पुर्णिमा के चांद को देखा तो देखता ही रहा। सुबह उगते सूरज की तरफ नजर गई तो सृष्टि के रचियता को मन स्वतः ही प्रणाम करने लगा। सुनो 2015, तुम्हारी तारीखों मेँ मेरी मीठी मीठी याद बंधी है। कई तारीख मेरे रिश्तों से महक रही होंगी । कुछ मेँ निर्मल, सात्विक, पवित्र प्रेम की चहक कानों मेँ पड़ेगी। उसे सुनना जरूर। तुझे गर्व होगा उस तारीख पर। कई तारीख बच्चों के गौरव से जुड़ी है। कोई तो बहुत बड़े आनंद से गूँथी है। किसी मेँ हल्की फुल्की  तकरार भी है, प्यार वाली। उसे भी संभाल कर रखना। मुझे याद रहेंगी ये सब तारीख। क्योंकि ये हैं ही इतनी लाजवाब कि इनको भूल ही नहीं सकता। इनको भुलाने का मतलब है, खुद को भूल जाना। मुझ अदने से को तूने  इतना दिया है कि यह याद भी नहीं कि क्या क्या मेरी झोली मेँ डाला। मेरी झोली भरी हुई है।  नए 365 दिन काम करने के लिये। 365 रात विश्राम के लिये, ताकि काम के लिये और ऊर्जा मिल सके। इंसान हूँ ना । बहुत तारीखें खराब की होंगी मैंने। उसका परिणाम मुझे भुगतना है। लेकिन ये सच है कि तूने 365 दिनों मेँ मुझे देने मेँ कोई कमी नहीं रखी। बे हिसाब दिया। कल्पना से अधिक दिया। तेरा बार बार शुक्रिया कर तेरे दिये को छोटा नहीं करना चाहता। अब इतना सब अच्छा और आनंद दायक मिला तो कुछ चटपटा भी होना चाहिए। तेरे इस पीरियड मेँ गम, शौक, दुख, दर्द, आह! जो भी मिला वो मेरा प्रारब्ध था। उसमें तेरा कोई कसूर नहीं था 2015। तुम अपने दिल मेँ इस संबंध मेँ कुछ भी महसूस मत करना। तूने इतना कुछ दिया कि बार बार शुक्रिया करूँ तो भी कम है। तेरा हाथ पकड़ उसे प्यार से चूम आभार जताऊँ तो भी काफी नहीं। तेरे दिये के बदले दंडवत करूँ, कदमों मेँ सजदा करूँ, तो गुस्ताखी होगी। जितना तूने दिया उतना काबिल नहीं था मैं।  परंतु तेरी मेहर की बरसात का क्या! होती गई, होती गई। मैं सराबोर होता रहा, तेरी रहमत से। तेरी मेहरबानियों से, तेरे प्यार से।  सच मुच तूने मुझे लाजवाब कर दिया। मालामाल कर दिया। जो नहीं था, वह सब मिला। बस एक ही शिकवा है तुझसे कि तू जाते जाते मेरा अतीत, वर्तमान और भविष्य अपने साथ ही ले चला। ये सब ले जाने की वजह तू ही जाने। हम क्या जाने तेरे मन मेँ क्या है।  संभव है  2016 से इस बाबत तेरी कोई बात हुई हो। फिर भी इतनी ख़्वाहिश बार बार है कि 2015 तू बार-बार, हर बार मेरे घर आए, मेरे आतिथ्य स्वीकार कर मुझे धन्य करे। ताकि मैं तारीखों के संग समय बिता खुश हो सकूँ, उन तारीखों के संग, जिनसे मेरी मधुर स्मृतियाँ जुड़ी हैं । दो लाइन पढ़ो—

कौन कमबख्त रोना चाहता है यहां 
इक दर्द ऐसा भी है, जो हंसने नहीं देता। 

Thursday 24 December 2015

AMOGH DIVISION REACHES OUT TO YOUTH OF GANGANAGAR


  SHRIGANGANAGARTeam of Army Officers from Amogh Division delivered motivational lectures in various Colleges & University including Khalsa College, Sihag Nursing College, Government College, Karanpur & Tantia University from 21st to 23rd December on the eve of commemoration of battle of Nagi fought between India and Pakistan in 1971 in Sriganganagar sector.  Students as well as professors had gathered in the college auditoriums to attend the motivational lecture, as Major Shashank Deep & Lieutenant Madhav Kumar eloquently spoke about the heroics of the soldiers of the Indian Army.  The event also acted as motivation to youth of Sriganganagar to achieve desired result of projecting Army as a viable career with the theme ‘Indian Army & Nation Building - Be a winner for India’.Each session was well spent for the students who turned up for the event.  The good turnout at each event made it amply clear that the audience were looking forward to these motivational talks. Young eager minds were not disappointed and were made aware of the sacrifices the Indian soldiers made selflessly for their motherland in the battle of Nagi.The youths were introduced to the army way of life and its strong ethos and traditions, which propels a soldier to make supreme sacrifice.  Battle of Nagi left an everlasting impression on the minds of students and would undoubtedly compel them to realise that battle is the most significant competition in which a man indulges and these heroes should be revered forever.this information have been givan to us by Lt Col Manish Ojha Defence Spokesperson,Rajasthan

Sunday 20 December 2015

सुरम्या अखबार का विमोचन


श्रीगंगानगर। स्वामी ब्रह्मदेव कहते हैं कि शब्दों का प्रयोग बड़ी सूझ से करना चाहिए। इनका प्रयोग करने से पहले ये देख लेना चाहिए कि लिखे और बोले गए शब्द आग लगाने वाले ना हों। स्वामी जी आज सुबह कंगन पैलेस मेँ “ सुरम्या “ अखबार के विमोचन समारोह मेँ मुख्य वक्ता के रूप मेँ बोल रहे थे। उन्होने कहा, शब्दों के कई रूप होते हैं। वे उत्तेजित मन को शांत करने की ताकत रखते हैं तो शांत मन को अशांत भी कर सकते हैं। शब्दों के संसार मेँ विचरण करते हुए स्वामी जी ने कहा कि बुरी सोच और पैर की मोच इंसान को आगे नहीं बढ़ने देती। उन्होने रूहानियत को आत्मा की खुराक बताया। सुरम्या की व्याख्या की। उसकी थीम की सराहना की। प्रकाशित सामग्री को बहुत ही सारगर्भित बताया। श्रीगंगानगर क्षेत्र और उनके निवासियों की प्रशंसा करते हुए स्वामी जी ने कहा कि इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया है। अब तो यह जीवन इसी को अर्पित कर दिया है। झांकी वाले बाला जी के प्रेम अग्रवाल “ गुरु जी “ ने अपने सम्बोधन मेँ सुरम्या की सोच की सराहना की। भटिंडा से आए अंक ज्योतिषी हरविंदर गोयल ने शुभकामना देते हुए सहयोग का वादा किया। पूर्व मंत्री राधेश्याम गंगानगर ने बधाई  देते हुए मीडिया की वर्तमान स्थिति पर पीड़ा व्यक्त की। आरएसएस के कैलाश भसीन ने मीडिया के कारोबारी हो जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए सुरम्या से कारोबार से बचाने की सलाह दी। यूआईटी के पूर्व अध्यक्ष राज कुमार गौड़ ने अखबार को कठिन रास्ता बतलाते हुए मंगल कामना  दी। मंच पर स्वामी ब्रह्मदेव जी के साथ हरविंदर गोयल, प्रेम अग्रवाल और नेमी चंद गोयल मौजूद थे। मेहमानों का गोयल परिवार की ओर से नेमी चंद गोयल, इन्द्र कुमार गोयल, भगवान दास गर्ग, आशु अग्रवाल, सुमित गर्ग, एडवोकेट संजय गोयल, मोहित नारायण गोयल और शिव जालान ने फूल माल पहना स्वागत किया। संचालन  अखबार की संपादक स्वाति गोयल ने किया। सलाहकार गोविंद गोयल ने अखबार की थीम बताई। प्रभारी संपादक उपेंद्र महर्षि ने धन्यवाद दिया। समारोह मेँ बड़ी संख्या मेँ नगर के विभिन्न  क्षेत्रों से जुड़े व्यक्ति मौजूद थे। प्राचीन शिवालय के महंत कैलाश नाथ जी ने सुबह घर पहुँच आशीर्वाद दे अखबार की थीम पर चर्चा की। सुरम्या परिवार के अनुसार स्वास्थ्य, धर्म और अध्यात्म का सुरम्या फिलहाल पाक्षिक के रूप मेँ प्रकाशित होगा। पूजा और नमाज- रविवार को सुबह गोविंद गोयल के निवास पर पंडित जनार्दन शर्मा ने सुरम्या अखबार की पूजा करवाई। दोपहर बाद वहीं रोड़ावाली गाँव के मौलवी इमदाद भाई ने नमाज अता की। वे शुभकामना देने आए थे कि नमाज का समय हो गया। फिर उन्होने वहीं नमाज पढ़ी।   

Friday 11 December 2015

विधायक कामिनी ने शहर के हालात पर शर्मिंदगी जताई, स्वाति ने हालात पीएम को बताई


श्रीगंगानगर। यह संयोग है या कुछ और कि  जिस समय भारी मतों के अंतर से विधायक चुनीं गईं कामिनी जिंदल अपने दो साल की उपलब्धि बताने के बावजूद शहर के हालात पर शर्मिंदगी महसूस कर रहीं थीं, उसी समय पत्रकार गोविंद गोयल की बिटिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख शहर के हालात बता रही थी। हालांकि दोनों मेँ किसी प्रकार की तुलना नहीं की जा सकती। एक तो इसलिए क्योंकि हर इंसान की अपनी पहचान है, दूसरा कहाँ तो एक विधायक और कहाँ एक नागरिक। इससे भी आगे कामिनी जिंदल के पिता जाने माने पूंजीपति और स्वाति के पिता के साधारण इंसान। मगर इतना कहना गलत नहीं होगा कि ये सोच का विषय है। कामिनी ने  विधायक होने के बावजूद ऐसा कुछ नहीं किया जिससे पब्लिक को ये अहसास हो कि विधायक उनके साथ है, जबकि स्वाति के पीएम को केवल पत्र लिखने मात्र से पब्लिक ये कह रही है कि चलो कोई तो है जिसने शर्मिंदगी जताने की बजाए पीएम को पीड़ा बताई। सवाल ये नहीं कि काम होता है या नहीं, बात ये कि किसने समस्या के समाधान के लिए क्या प्रयास किए। दोनों ने अपनी अपनी बात 8 दिसंबर को कही। कामिनी जिंदल को विधायक और बी डी अग्रवाल की बेटी  होने के कारण मीडिया मेँ तवज्जो मिलनी ही थी, स्वाति को भी उसके कद के अनुरूप तवज्जो दी मीडिया ने। फेसबुक पर भी दोनों की खबरों को लोग डाल रहे हैं। एक दूसरे को टैग कर रहे हैं। लोग अपने अपने विचार लिख स्वाति का हौयला बढ़ा रहे हैं। कामिनी जिंदल के समर्थक उसके पक्ष मेँ लिख रहे हैं। किन्तु इसमें कोई शक नहीं कि स्वाति गोयल ने एक साधारण नागरिक होने के बावजूद शहर की पीड़ा को पीएम तक पहुंचाया है।


Wednesday 9 December 2015

दो अधिकारियों की नाक का सवाल बने हैं थड़े


श्रीगंगानगर। विरोध हाईकोर्ट के आदेशों का नहीं, दो अधिकारियों की मनमर्जी का है। एक हैं श्रीमान जिला कलक्टर और दूसरे हैं उनके लाडले यूआईटी के सचिव, जिनके पास कलक्टर की मेहरबानी से नगर परिषद आयुक्त का चार्ज भी है। कलक्टर ऑफिस मेँ 7 अक्टूबर को हुई बैठक की कार्यवाही विवरण मेँ के अनुसार पैटीशनर ने कहा है कि नेशनल हाइवे और स्टेट हाइवे के कब्जे पहले हटाएँ जाएँ। लेकिन ये दोनों अधिकारी ब्लॉक एरिया मेँ लगे हैं। ये किसी के समझ नहीं आ रहा कि कब्जे क्या केवल  ब्लॉक एरिया मेँ ही हैं। इतना ही नहीं प्रशासन ने जो कब्जे चिन्हित कर लाल निशान लगाए हैं उनमें कोई भी चबूतरा शामिल नहीं है। लेकिन दोनों अधिकारियों के मनमर्जी के आगे सब बेबस हो चुके हैं। जन प्रतिनिधियों की खामोशी और जनता के डर ने ऐसा काम किया है कि आज ब्लॉक एरिया के लोग चिंतित हैं। कब्जे करने वाले तो हटा रहे हैं, लेकिन जिनके थड़ों पर कोई कब्जा नहीं वे भी परेशान हैं। जो थड़े शहर की बसावट के समय से हैं। प्रशासन ने खुद नाली बना हद तय कर रखी है, वे अचानक से कब्जे हो गए। मजे की बात ये कि प्रशासन के पास किसी सड़क का कोई नक्शा नहीं दिखता। सड़कें की चौड़ाई दशकों जैसी ही है, लेकिन इन दोनों अधिकारियों ने थड़ों को अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बना रखा है। इस क्षेत्र के एमपी, जो अब केंद्र मेँ मंत्री हैं, कुछ नहीं बोल रहे। विधायक को कुछ पता ही नहीं। ऐसे ही सभापति आ गए। ऐसे मेँ दोनों अधिकारियों को अपनी मर्जी करने का पूरा मौका मिला हुआ है।

चिन्हित अतिक्रमणों मेँ थड़े नहीं, कलक्टर को दिया पत्र

श्रीगंगानगर। हाईकोर्ट के आदेश की पालना मेँ कब्जे हटाने वाले आठ व्यक्तियों ने जिला कलक्टर को पत्र देकर चबूतरे, उनके नीचे बने सैप्टिक टैंक न तोड़ने को कहा है। सुरेन्द्र सिंगला, घनश्याम दास, महेंद्र कुमार सिंगल, चंद्रमोहन, जगीर चंद, कश्मीरी लाल नागपाल और हरीश कुमार की ओर से दिये पत्र मेँ कलक्टर को बताया गया है कि है कोर्ट के आदेश की पालना मेँ चिन्हित अतिक्रमण हटा दिये गए हैं। ज्ञात हुआ है कि प्रशासन उनके मकानों के आगे बने चबूतरों के साथ साथ सैप्टिक टैंक, वाटर टैंक भी तोड़ने जा रहा है। जबकि हाईकोर्ट के आदेश मेँ ये कहा गया है कि जो अतिक्रमण चिन्हित हैं, उन्हीं को तोड़ा जाए। चिन्हित किए गए अतिक्रमण केवल चारदीवारी और चबूतरों पर बने शैड हैं। पत्र के अनुसार चबूतरों को अतिक्रमण के रूप मेँ चिन्हित ही नहीं किया गया है। जबकि हाईकोर्ट ने केवल चिन्हित अतिक्रमण तोड़ने के आदेश दिये हैं। पत्र मेँ कहा गया है कि इस बारे मेँ उचित आदेश पारित कर उनको सूचित करें, अन्यथा उनको अदालत की शरण मेँ जाना पड़ेगा। ज्ञात रहे कि 1 दिसंबर को हाईकोर्ट ने इस सभी को रिट  याचिका मेँ पक्षकार संयोजित करते हुए मौखिक आदेश पारित किया था कि प्रार्थीगण चिन्हित अतिक्रमणों को हटा कर फिर से कोर्ट मेँ उपस्थित होकर चबूतरे पर बने हुए सैप्टिक टैंक, पानी के टैंक आदि के संबंध मेँ अपनी प्रार्थना करें। उसी के संदर्भ मेँ ये अतिक्रमण हटा कर कलक्टर को पत्र दिया गया है। पता चला है कि प्रशासन ने कब्जों की जो सूची हाईकोर्ट मेँ दी है उसमें थड़ों का जिक्र नहीं है।  

टीटी ने कहा, मुझे तो किसी ने बताया ही नहीं


श्रीगंगानगर। प्रदेश सरकार के दो साल पूरे होने पर आज मंत्री सुरेन्द्रपाल सिंह टीटी ने सूचना केंद्र मेँ प्रेस वार्ता की। श्री टीटी प्रैस वार्ता को जनसभा समझ लगभग आधा घंटा से अधिक तक सरकार की कम और अपने मंत्रालय की उपलब्धियां अधिक बताईं। आखिर उनको भाषण से प्रैस वार्ता पर आने को कहा गया। टीटी जी थोड़ा और थोड़ा करते रहे, लेकिन मीडिया नहीं माना। उसके बाद शुरू हुई वार्ता। मामला कब्जों का था। कई पत्रकारों ने पूछा कि गौशाला रोड के कब्जे तोड़े एक माह हो गया, मगर हालत आज भी खराब हैं। हाईकोर्ट के आदेश का जिक्र हुआ। टीटी जी यही कहते रहें, कब्जे तो टूटेंगे। कब्जे तो टूटेंगे। एक पत्रकार ने कहा, कब्जे तोड़ने के लिए कौन मना करता है। लेकिन कोई प्लानिंग तो हो। पहले कब्जे तोड़ के क्या हाल कर दिया। कलक्टर भी बोले, मुझे कब्जे तोड़ने वाला अधिकारी  समझा जा रहा है। लेकिन मैं चाहता हूँ कब्जा तोड़ाने का प्रेसेस धीरे चले। धीरे चलाएँगे। टीटी और कलक्टर एक स्वर मेँ बोले, प्लान बना के भेजा हुआ है। एक दिन मेँ कुछ नहीं होता। प्रेस वार्ता के बाद टीटी जी को पूरी स्थिति से अवगत करवाया गया। उनको बताया गया कि कोर्ट के आदेश मेँ थड़ों का जिक्र नहीं है। ना ही प्रशासन ने थड़ों को कब्जों के रूप मेँ चिन्हित किया है। तब टीटी जी कहने लगे मुझे तो आज तक किसी ने ये बात बताई नहीं। उन्होने भरोसा दिया कि वे इस मुद्दे पर सीएम से बात करेंगे। बाद मेँ उन्होने सर्किट हाउस मेँ भी इस मुद्दे पर चर्चा कर पार्टी वालों से राय ली। 

Monday 7 December 2015

महारानी ने गंगानगर पे लाल स्याही से मार दिया काटा


श्रीगंगानगर। मुख्यमंत्री ने श्रीगंगानगर के नाम पर लाल स्याही से काटा मार रखा है। ये कोई मज़ाक नहीं, सौ प्रतिशत सही बार है। इसकी वजह है बीजेपी नेताओं की आपसी गुटबंदी। एक दूसरे की चुगली की आदत। राजनीतिक हल्कों के सूत्र बताते हैं कि गंगानगर मेँ बीजेपी नेताओं के गई गुट हैं। हर गुट महारानी के दरबार मेँ दूसरे की चुगली करता है। साथ मेँ मांगता है कुर्सी, अपने लिए। दूसरे की चुगली कर अपने आप को बेहतर साबित करते हुए कुर्सी मांग लगातार हो रही है। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप मेँ। रोज रोज, हर बार की इस चुगलखोरी से महारानी गंगानगर के नाम से ही चिढ़ने लगी है। इसी कारण एक समान उन्होने गंगानगर पर लाल स्याही से काटा काटा  दिया। कोई कुछ करे, उनको कोई मतलब नहीं। यही वजह है कि अफसरशाही हावी हो चुकी है। चूंकि महारानी ने गंगानगर की तरफ से आँख बंद कर ली, इसलिए किसी नेता की उधर चलती नहीं है। अफसरों की मौज बनी है। सूत्र कहते हैं कि जो कुछ न दिनों इधर हो रहा है, उसकी जानकारी देने की हिम्मत भी किसी नेता की नहीं है। यहाँ तक कि मंत्री सुरेन्द्र पाल सिंह टीटी और केंद्रीय मंत्री निहाल चंद की भी नहीं। संभव है गंगानगर की जनता को इस राज मेँ यही भोगना पड़े।

गौशाला रोड पर सब व्यापारिक संगठन खामोश हैं

श्रीगंगानगर। चेम्बर ऑफ कॉमर्स मेँ पद पाने के लिए मचे घमासान ने यह साबित कर दिया है कि व्यापारिक संगठनों को कारोबारियों की परेशानियों से कोई मतलब नहीं। शहर मेँ दो-दो संयुक्त व्यापार मण्डल हैं। दो ही चेम्बर ऑफ कॉमर्स हो गए। इनके पदाधिकारियों की बातों पर यकीन करें तो सभी मेँ कई सौ मेम्बर हैं। किन्तु किसी को बाजार की बेहतरी के लिए कोई फुरसत नहीं। अफसरों से विवाद हो तो सौ पंचायत करने पहुँच जाएंगे। होली- दिवाली कलक्टर सही दूसरे अफसरों के घरों मेँ धोक लगाएंगे। परंतु अपनी परेशानी के लिए कुछ नहीं करेंगे। लगभग एक माह से गौशाला रोड का बुरा हाल है। सीवरेज का पानी सड़क पर है।आना जाना तो मुश्किल है। कब्जे हट गए, लेकिन कोई नाली निर्माण नहीं। सड़क नहीं। बिजली, टेलीफोन के खंबे बीच मेँ। ऐसे मेँ कब्जों का हटना, ना हटना बराबर है। किन्तु कोई भी व्यापारिक संगठन आवाज नहीं उठा रहा। कोई लोहड़ी मनाने की तैयारी मेँ है तो किसी ने स्नेह मिलन कर राम राम कर ली। व्यापारिक संगठनों का मूल काम बाजार को देखना है। लेकिन इनके पदाधिकारी अफसरों की तरफ देखते रहते हैं। ऐसा लगता है जैसे शहर कलक्टर, पूनीया, वेद प्रकाश जोशी के अलावा कोई रहता ही नहीं।

 अफसरों और पार्षदों का गठजोड़ रचेगा नया इतिहास


श्रीगंगानगर। जिला प्रशासन  मेँ दो ही अधिकारी हैं आजकल। एक खुद कलक्टर  और दूसरे उनके लाडले आरएएस करतार सिंह पूनिया, जिनके पास नगर परिषद आयुक्त का भी चार्ज है। पूनिया के लाडले हैं दो पार्षद, संजय बिशनोई और लक्की दावड़ा। लक्की दावड़ा किस्मत से उप सभापति भी हैं। अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों के इस गज़ब के गठजोड़ ने बड़ों बड़ों की नाक मेँ दम कर रखा है। संजय बिशनोई के दुश्मन है, राधेश्याम गंगानगर और लक्की दावड़ा के राजनीतिक दुश्मन है सभापति अजय चान्डक। हालांकि राधेश्याम गंगानगर के सामने संजय बिशनोई की कोई राजनीतिक औकात नहीं, लेकिन राधेश्याम किस वजह से खामोश हैं, कोई नहीं जानता। लक्की दावड़ा अभी नए हैं। राजनीति को समझते नहीं। कलक्टर और पूनिया इन दोनों का खूब इस्तेमाल करते हैं या ये पार्षद समझ से परे हैं। इसी चौकड़ी का कमाल है कि बिना किसी प्लानिंग के कब्जे हटाने के बाद लोगों को राम भरोसे छोड़ दिया गया है। आतंक है आज प्रशासन का। ना जाने किस किस अदालत के आदेश फाइलों मेँ पड़े होंगे, लेकिन प्रशासन केवल कब्जे हटाने मेँ लगा है। शहर की जनता के बारे मेँ क्या लिखें! लक्कड़ मंडी मेँ अरबपति लोगों के कारोबार हैं, लेकिन उनके पास इतना समय नहीं कि वे एकजुट हो अपना विरोध कर सकें। ऐसे मरे हुए शहर मेँ प्रशासन और जन प्रतिनिधियों का गठजोड़ यही करेगा। वैसे कलक्टर के घर और ऑफिस के साथ साथ पूनिया जी के दफ्तर मेँ सीसीटीवी लग जाएँ तो पता लग जाएगा कि यह गठजोड़ कैसे क्या करता है। पर मुरदों को कोई लेना देना नहीं। 

Thursday 3 December 2015

एक बार माननीय अदालत खुद देखे शहर के हालात


श्रीगंगानगर। देश की सभी अदालतों को मेरा सादर प्रणाम। वंदन और अभिनंदन। अदालत छोटी बड़ी नहीं होती। जहां न्याय होता हो, वह छोटी कैसे हो सकती है। न्याय के पक्षधर बड़े ही होते हैं। विशाल हृदय के मालिक। न्याय के लिए इधर से आदेश निर्देश जारी होते हैं। उनकी पालना सभी को करने होती है। कोई चूँ चपड़ नहीं कर सकता। क्योंकि अदालत का सम्मान सर्वोपरि है। चाहे कोई हो। आम आदमी हो या फिर खुद सरकार। सबको अदालत के समक्ष दंडवत करना है। सिर झुकाना  है। न्याय के सामने दंडवत करने और सिर झुकाने से उसकी मर्यादा की पालना होती है। उसका सम्मान बढ़ता है। अदालतें सबसे बड़ी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी बड़ी। न्याय छोटा हो ही कैसे सकता है। जिस भी अदालत का जो भी, जैसा भी आदेश हो उसे सभी को मानना है। इसमें अदालत का कोई स्वार्थ नहीं होता। इसमें असहिष्णुता भी नहीं हो सकती। चूंकि देश मेँ अदालत का सबसे ऊंचा और सम्मानित स्थान है, वही सर्वोच्च है तो फिर अपने मन की बात उसी से कही जाए। पीड़ा उसी को सुनाई जाए। उसी के सामने गुहार हो, जो न्याय को समझते हैं। करने मेँ पूरी तरह सक्षम है। चूंकि यह सब न्याय के लिए करना है और न्याय करने वाला ईश्वर तुल्य है, इसलिए शब्दों की मार्फत माननीय, समाननीय अदालत से निवेदन है कि वह खुद एक बार श्रीगंगानगर को अपनी आँखों से देखे। उसकी दुर्दशा को देख कर जाने उसकी पीड़ा । शहर की पीड़ा के साथ साथ जन जन की पीड़ा भी। शहर का और आम आदमी का दुर्भाग्य भी। माननीय अदालत यह भी देखे कि इस दुर्दशा का जिम्मेदार कौन ? किस किस ने इस शहर का बेड़ा गर्क करने मेँ अपना योगदान दिया। आज शहर के पास अदालत के सिवा कोई विकल्प ही नहीं बचा, जिसको वह अपनी पीड़ा बता सके। सुना सके। जो उसकी पीड़ा को महसूस कर न्याय कर सके। माननीय अदालत द्वारा शहर का दौरा संभव है!  यह न्याय  के लिए त्वरित जरूरत भी है। यह किसी भी प्रकार से असंभव नहीं, क्योंकि अदालत ने तो न्याय के लिए आधी रात को भी अपने दरवाजे खोले हैं। इसी लिए तो अदालत सर्वोच्च है। गंगानगर के दौरे से एक और नई नज़ीर पेश की जा सकती है। गंगानगर मेँ ना तो नेतृत्व है और ना ही वह प्रशासन जो शहर हित की बात करे। जन हित के लिए काम करे। लावारिस की तरह जी रहे गंगानगर वालों का कोई लीडर नहीं। प्रशासन सुनने को तैयार नहीं। ऐसी स्थिति मेँ शहर अदालत के समक्ष ही फरियाद कर उसे अपना दर्द सुनाएगा। अदालत दौरा करके यह जान सकती है कि कहाँ कहाँ क्या हुआ? दुर्दशा करने वाले कौन हैं? लोग कैसे प्रताड़ित हो रहे हैं? बेबस, कमजोर, लाचार शहर की सुध अगर अदालत ले लो तो शहर उसे सिर आँखों पर बैठाए। उसकी जय जय कार करे । इससे भी बढ़कर उसके बाद जो न्याय होगा वह नया इतिहास लिखेगा। यह जरूरी भी है और गंगानगर की मजबूरी भी। वह खुद तो चल के तो अदालत जा नहीं सकता। जो व्यक्ति माननीय अदालत को बताते दिखाते हैं, उन मेँ उनका खुद का स्वार्थ होता ही है। मगर अदालत तो निस्वार्थ करेगी। न्याय के लिए देखेगी। चूंकि अदालत न्याय के लिए ही है, इसलिए उसी से प्रार्थना है कि वह समय निकाल कर एक बार आए और गंगानगर को देखे अपनी आँख से। अपने नजरिए से।

शहर के तारणहार जोशी जी का वंदन, अभिनंदन

श्रीगंगानगर। हे देव पुरुष! कलयुग के अवतार! गंगानगर के तारणहार ! महामानव ! शहर के रक्षक! उम्मीद की किरण, श्रीमान वेदप्रकाश जी जोशी को सादर वंदन। कोई पापी ही होगा इस नगर मेँ जो  आपके नाम का स्मरण ना करता हो। आपको ना जानने वाला इस लोक का वासी नहीं हो सकता। जो आपके नाम से अंजान है, समझो, उसको अपना नाम भी नहीं मालूम। वैसे तो मेरी हिम्मत ही नहीं हुई आज तक आपसे बात करने की।  आज पता नहीं कैसे सरस्वती ने कृपा कर दी, आपसे संवाद करने की ताकत दे के। मन भी कहने लगा, कर ले, कर ले बात, तेरी ज़िंदगी का क्या भरोसा। ऐसे अवतार बार बार जन्म नहीं लेते। इसलिए हौसला हुआ, आपसे बात करने का। जानता हूँ आज के दिन आप हीरो हैं मीडिया के। जन नायक भी मान लेते हैं आपको । मुझे ये भी ज्ञान है कि आप इस शहर की शान हैं। इस कहानी से भी अंजान नहीं हूँ कि आप लंबे समय से कब्जों के खिलाफ थे। आपको साधुवाद। मुरदों के शहर मेँ कोई तो जिंदा है। कोई एक तो है, जिसमें पूरे शहर को आगे लगाने का जज्बा है। कोई मर्द तो है जो छाती ठोक के कहने का साहस रखता है कि यह सब मेरे कारण हुआ। दशकों से सुन रहा हूँ। गंगानगर को चंढीगढ़ का बच्चा बनाएँगे, बच्चा बनाएँगे। कहने वालों क्या किया ना किया सबके सामने है, मगर आप ऐसे हैं, जिसने अपनी जर्जर काया के बावजूद इस दिशा मेँ सार्थक पहल की। आप वो हो, जिसको कोई कभी नहीं भूलना चाहेगा। आपके बारे मेँ कम से कम एक चेप्टर तो किसी कक्षा की किताब मेँ होना ही चाहिए। जिससे बच्चों को प्रेरणा मिल सके आप से। ताकि  वे भी शहर के लिए कोई  बड़ा सपना देख सकें। चंढीगढ़ का बच्चा आप बना देना और बच्चे इसे पेरिस बनाने का काम कर दें, बस और चाहिए भी क्या महाराजा गंगासिंह की आत्मा को। आपने इतना कुछ किया तो यह भी प्लान जरूर  किया होगा कि लोग गंदगी मेँ कैसे जिएंगे? महामारी फैली तो मरने वालों को ठिकाने लगाने की युक्ति भी बता दी होगी आपने कोर्ट को।  गौशाला रोड का तो दौरा आपने कर ही लिया होगा। निश्चित रूप से आपके कलेजे मेँ ठंड पड़ी होगी। होता है, जनाब होता है, जब मन का सोचा हो जाए तो सुकून मिलता ही है। मेरा तो मानना है कि आपसे पहले गंगानगर का हितचिंतक कोई हुआ ही नहीं। आगे होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। लोगों की बातों मेँ मत आना कि सीवरेज का क्या होगा? नालियाँ नहीं बनी। सड़क कैसे बनेगी? भाड़ मेँ गए लोग और उनकी समस्या। नेता और अफसरों को ही जन जन की समस्या से कोई लेना देना नहीं तो आप अपनी जर्जर काया मेँ ये टेंशन मत पालना । आप तो अपने टार्गेट पर नजर रखो। आपने इन शब्दों को सार्थक किया है कि कौन कहता है आसमान मेँ छेद नहीं होता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो। आपको सलाम। बस आखिर मेँ इतनी ही गुस्ताखी करूंगा कि जो मजा बनाने मेँ है वह तोड़ने मेँ नहीं। जो आनंद किसी का घर बसाने मेँ है वह उजाड़ने मेँ नहीं। जो सुकून लोगों का दर्द बांटने से मिलता है, वह दर्द बढ़ाने से नहीं मिल सकता। आप कुछ भी कर लो, शहर की इन सड़कों पर टैंक नहीं निकल सकते। चाहे थड़े तुड़वा दो चाहे, मकान। क्योंकि जिस 1965 और 1971 मेँ टैंक निकले थे, तब ना तो आज जितने वाहन थे और ना इतनी जनसंख्या। कोई सड़क ऐसी दिखे तो बताना जिस पर कई कई कारें  पार्क ना होती हों, रात और दिन। आप टैंक की बात करते हो, मैं इसी कॉलम मेँ कितनी ही बार ये कह चुका हूँ कि रात को नगर की अनेक सड़कों पर फायर बिग्रेड और अंबुलेंस तक नहीं आ जा सकती। ईश्वर आपको लंबी उम्र दे। और ताकत दे। ताकि आप अपने काम को और आगे बढ़ा सके। चिंता मत करो, कोई नहीं बोलेगा। ये मुरदों का शहर है। लगे रहो आप तो। दो लाइन पढ़ो—

मुस्कुराने की दुआ दे के चलते बने सब 
मुस्कुराने की वजह देते तो बात होती। 

Wednesday 25 November 2015

देव धाम मेँ भव्य और दिव्य मंदिर, प्राण प्रतिष्ठा 30 को



श्रीगंगानगर। देव धाम मेँ भव्य और दिव्य मंदिर का निर्माण ही चुका है। यह है माँ चिंतपूर्णी दुर्गा मंदिर। यह बना है हनुमानगढ़ रोड पर स्थित अग्रवाल ट्रस्ट के पीछे। इसका निर्माण भी ट्रस्ट ने ही किया है। मंदिर मेँ देवी माँ , हनुमान जी और विष्णु लक्ष्मी के प्रतिमाओं के साथ शिव परिवार की स्थापना की जा चुकी है। प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा 30 नवंबर को सुबह होगी। बताते हैं ही कि जिस दिन मंदिर के लिए नींव की खुदाई हुई उस दिन काले नाग का जोड़ा निकला। उनको यह कह सुनसान क्षेत्र मेँ छोड़ दिया गया कि मंदिर बन जाए तब आ जाना। अब जब मंदिर का निर्माण हो चुका। प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा के लिए अनुष्ठान हो रहा है, तब काले नाग का यह जोड़ा फिर आ गया। यह जोड़ा एक कमरे मेँ है। उनके सामने दूध का कटोरा रखा गया है। चार से पाँच फीट साइज के इस जोड़े के कारण इस मंदिर को दिव्य माना जा रहा है। निर्माण भव्य तरीके से हुआ है। मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही आनंद की अनुभूति होती है। इसका मुख्य द्वार उत्तर की ओर है जबकि एक द्वार देव धाम वाली गली मेँ पूर्व की ओर भी है। संभवतः यह मंदिर नगर का सबसे भव्य मंदिर है। देव धाम उस गली के लिए लिखा गया है जहां बालाजी धाम, गणेश मंदिर, शनि मंदिर, करणी माता का मंदिर है। देव धाम सबसे उचित नाम है। क्योंकि श्रीगंगानगर मेँ एक गली मेँ सबसे अधिक मंदिर यहीं है। भीड़ भी खूब रहती है। 

कार्तिक पुर्णिमा पर मंदिरों मेँ दीप माला

श्रीगंगानगर। कार्तिक मास की पुर्णिमा के मौके पर रात को मंदिर, मंदिर दीपों की रोशनी से जगमग हो गए। हर मंदिर मेँ महिलाओं ने दीपमाला की। कितनी ही महिलाओं ने तो 365-365 दीप जलाए। किसी मंदिर मेँ दीपों से स्वास्तिक बना था तो कहीं ॐ। मंदिरों मेँ खूब रौनक थी। दीपों की कतारों के कारण मंदिरों की शोभा बहुत अधिक आभा युक्त दिखी। अग्रसेन नगर मेँ तो अनेक महिलाओं सड़क किनारे दीप जला रहीं थीं। शाम को तीन पुली पर महिलाओं की अपार भीड़ थी। वहाँ भी दीपक जलाए गए। महिलाओं ने ईंट मिट्टी से घर बनाए। सजाये। उसमें अन्न उगाया। नहर किनारे मेला लगा हुआ था। ऐसा ही दृश्य दिन भर श्मशान घाट मेँ रहा। महिलाओं के जत्थे दीप लेकर आते रहे। हर मूर्ति के सामने दीप जलाया। यमराज और चित्रगुप्त की खास पूजा अर्चना की। यमराज से अकाल मौत ना देने की और चित्रगुप्त से अच्छे कर्म करवाने की प्रार्थना की। नगर मेँ गुरूपर्व की भी खूब धूम रही। कोई गली, सड़क ऐसी नहीं थी जहां विशेष रोशनी ना की गई हो। सुबह से ही सब एक दूसरे को बधाई दे रहे थे। 

Tuesday 24 November 2015

सरफरोश तो पीके गजनी हो गया लगता है


श्रीगंगानगर। आमीर खान! मैं तो आपको राजा हिंदुस्तानी जान के याद करता रहा। अपने मुल्क का सरफरोश समझता रहा। मगर तुम तो गजनी हो गए। भूल गए सब। इस देश मेँ मिला रुतबा, प्रशंसक, मान, सम्मान, पैसा, प्यार, लाड, दुलार करोड़ों की दुआएं जैसे अनमोल खजाने गजनी को कहां याद रहे। देश की मिट्टी, संस्कृति, संस्कार सहिष्णुता जैसी एकता की महक सब भूल गए। अपने मुस्लिम होने का लगान इस देश की संस्कृति, आन, बान, शान भाईचारे से वसूल करने का इरादा है क्या? इरादा क्या, वसूल कर ही रहे हो। हालांकि आप देश विदेश की मीडिया की नजरों मेँ हो, मेरी  और स्थानीय अखबारों की उनके सामने क्या बिसात, लेकिन शब्द दूर दूर तक जाते हैं। लिखे शब्द इतिहास बनते हैं। सहेज कर रखे जाते हैं। खामोश रहें तो सहिष्णु और जवाब दें तो असहिष्णु का लेवल लगा देते हैं आप जैसे महान आदमी। दिल चाहता है एक बार फिर इस देश मेँ रंग दे बसंती की तान छेड़ दी जाए। लेकिन तारे जमीं पर लाने की कोशिश करते थ्री इडियट्स की याद आ जाती है और मन उल्लास, आनंद से भर झूमने लगता है। कलाकार तो रंगीला होता है, तुम पीके हो गए। वही पीके, जो  यह साबित करता नजर आया कि  पाकिस्तानी मुसलमान पूरी तरह पाक है। और हिंदुस्तान के साधू संत चोर, झूठे, मक्कार। देश ने आपकी इस बात को भी सिर आँखों पर लिया । आँखों को नम किया। तालियाँ बजाईं। तारीफ की भावपूर्ण दृश्य की। क्योंकि दर्शक सहिष्णु थे । उन्होने  उसे एक नाटक के रूप मेँ लिया, देखा, ताले बजाई और आपको साधुवाद दिया। क्योंकि देश मेँ सहिष्णुता है और रहेगी। सब उसे फिल्म का सीन समझते रहे, ये तो अब समझ आया कि पीके के पीछे आमीर खान था। उसकी सोच थी। उसके अंदर का धर्म था। जनाब आमीर खान, हिंदुस्तान मेँ सहिष्णुता केवल एक शब्द मात्र नहीं है। यह संस्कार है। संस्कृति है। इसे विकृति मेँ बदलने की कोशिश अब होने लगी है। सहिष्णुता है तभी तो हिंदुस्तान है। जैन हैं। बौद्ध हैं। ईसाई हैं। सिख हैं। मुस्लिम हैं। और साथ है इन सबका हिंदुस्तान। गजनी को याद हो ना हो, लेकिन सरफरोश को तो याद रखना चाहिए कि मेरी फिल्मों को भी वैसा ही प्यार मिला, जैसा दूसरे कलाकारों की फिल्मों को मिला। परंतु आपने तो सब कुछ नजर अंदाज कर दिया। आप बालक नहीं। आपको तो ज्ञात ही होगा कि कलाकार का कोई धर्म या जाति नहीं होती। वह सबका सांझा है। उसे जाति-धर्म के अनुसार वह नहीं मिलता जो आपको मिला। जो मिलता है, उसकी कला को देख मिलता है। मगर आपने तो अपने आप को एक धर्म तक सीमित कर, सहिष्णुता की नई मिसाल पेश कर दी दुनिया के सामने। पूरा देश जिसे अपना मान कर उस पर अभिमान करता था, उसने अपने आप को एक छोटे दायरे मेँ समेट लिया। आपकी अभिव्यक्ति को सलाम तो करना ही होगा। इसमें भी कोई शक नहीं कि झूठे धर्म निरपेक्ष आपके स्वर मेँ स्वर मिलाएंगे। झूमेंगे। नाचेंगे, गाएँगे। क्योंकि उनकी जमात मेँ एक और शामिल हो गया। हिंदुस्तान विरोधी मीडिया आपको फ्रंट पेज से अंदर नहीं जाने देगा। टीवी स्क्रीन से हटाएगा नहीं। सौ प्रकार की बहस करवा, आपके साथ खड़ा होगा। किन्तु याद रखना जनाब ये सब अपने कद को छोटा करने जैसा है। सहिष्णुता, सहिष्णुता केवल लिखने, बोलने से नहीं होती। इसे आचरण मेँ भी लाना पड़ता है। मेरे ये शब्द असहिष्णुता की श्रेणी मेँ नहीं रखना। ये केवल आपको आपकी बड़ी हैसियत, बड़ा कद याद दिलाने के लिए है। गजनी को यह याद दिलाने के लिए है कि वो मंगल पांडे है। दो लाइन पढ़ो-

कदमों की आहट से बच्चे को पहचान लेते हैं 
माँ-बाप ही हैं, जो बिना कहे सब जान लेते हैं। 

Monday 23 November 2015

अशोक नागपाल को आज तक नहीं मिला निलंबन का पत्र


श्रीगंगानगर। बीजेपी की जिलाध्यक्षी से हटाए गए पूर्व विधायक अशोक नागपाल को आजतक पार्टी से निलंबन की लिखित  सूचना नहीं नहीं मिली है। उनके घर आज भी बीजेपी का झण्डा लगा है। श्रीनागपाल ने 13 दिसंबर 2014 को 13 प्वाइंट लिख कर प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी को दिये थे। उनका आज तक ना तो कोई जवाब अशोक नागपाल को मिला है। ना ही उनकी जांच करवाई  गई है। अशोक नापगाल ने इस रिपोर्टर को बताया कि एक साल से वे कई बार प्रदेश अध्यक्ष से मिले हैं। हर मुलाक़ात मेँ उन्होने यही कहा कि वे अगले सप्ताह आपको बुला लेंगे। बात सुन लेंगे। 13 प्वाइंट्स की जांच करवा लेंगे। श्रीनागपाल के अनुसार आज तक इस मुद्दे पर संगठन ने बात नहीं की। उनका कहना था कि वे तो समाचार पत्रों और टीवी समाचारों मेँ आई निलंबन की खबरों से अपने आप को पार्टी से निलंबित मान रहे हैं। लिखित मेँ कुछ नहीं मिला।

जिंदल-टिम्मा अलग हुए, दो होंगे कन्या लोहड़ी उत्सव

श्रीगंगानगर। इस बार नगर मेँ दो दो कन्या लोहड़ी उत्सव मनाए जाएंगे। दोनों मेँ ही लड़कियों को फ्री फ्री शिक्षा के पैकेज दिये जाएंगे। कौन कितने पैकेज देगा ये, आयोजन के बाद पता चलेगा। एक उत्सव हमेशा की तरह चेम्बर ऑफ कॉमर्स का होगा। दूसरा इस बार बाबा दीप सिंह सेवा समिति करेगी कई सालों से कन्या लोहड़ी माना रहा चेम्बर ऑफ कॉमर्स रामलीला मैदान मेँ कन्या लोहड़ी 11 से 13 जनवरी के बीच किसी तिथि को मनाएगा। जबकि समिति ने अभी तिथि की घोषणा नहीं की है। जानकारी मिली है कि दोनों के पदाधिकारी शिक्षण संस्थों से पैकेज लेने के लिए कोशिश कर रहे हैं। चेम्बर का नेतृत्व इंजी बंशीधर जिंदल के पास है जबकि समिति के सर्वेसर्वा तेजेन्द्रपाल सिंह टिम्मा है। कुछ खास व्यक्ति दोनों को फिर से एक करवाने की कोशिश मेँ है। जबकि बड़ी संख्या मेँ ऐसे व्यक्ति भी हैं जो किसी भी सूरत मेँ दोनों को एक देखना नहीं चाहते। दो उत्सव होने के बाद धड़ेबंदी होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। टिम्मा विरोधी जिंदल के इर्द गिर्द जमा हो सकते हैं तो जिंदल विरोधी टिम्मा मेँ हवा भरने से नहीं चूकेंगे। 

Saturday 21 November 2015

सुखद है हरी सिंह कामरा का जिला अध्यक्ष होना


श्रीगंगानगर। ये हरी सिंह कामरा कौन हुआ? हरी सिंह कामरा कौन है? ऐसे कितने ही प्रश्न इन दिनों राजनीतिक गलियारों के साथ साथ उन लोगों की जुबां पर भी हैं जो राजनीति मेँ रुचि रखते हैं। उसे समझते हैं। इसकी चर्चा करते हैं। सच्ची बात तो ये कि हमें भी अधिक नहीं पता। इतनी ही जानकारी है कि ये बिजयनगर नगरपालिका मेँ अध्यक्ष रहें हैं। बीजेपी के वर्कर हैं। और क्या-क्या  थे, पता नहीं। वैसे भी कुछ होते तो पता भी होता। फिलहाल वे उस बीजेपी के जिलाध्यक्ष हैं, जिसकी केंद्र और प्रदेश मेँ सत्ता है। अब इतनी बड़ी पार्टी ने कामरा  जी को जिला अध्यक्ष बनाया है तो उनको सलामी तो देनी ही पड़ेगी। संगठन और सरकार चलाने वाले राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं ।  वो किसी ऐसे वैसे को तो बनाने से रहे। इसलिए कुछ ना कुछ तो कामरा जी मेँ होगा ही, जो उनको जिलाध्यक्षी दी गई है। और कुछ नहीं तो सोढ़ी जी जितना तो देखा ही होगा कामरा जी मेँ। इससे अधिक करना भी क्या है बीजेपी को। सरकार है ही दोनों स्थानों पर। समय से पहले कोई हिला नहीं सकता। तब तक कामरा जी पड़े रहेंगे, बने रहेंगे  सोढ़ी जी की तरह क्या नुकसान है। कामरा जी का जिला अध्यक्ष होना इस बात का सबूत है कि बीजेपी मेँ कार्यकर्ता की कितनी पूछ है। पैदल की कितनी कदर है। शतरंज मेँ पैदल  ही तो होते हैं कुर्बानी देने के लिए। उनको ही आगे किया जाता है रास्ता बनाने के लिए। पहले सोढ़ी जी थे, अब कामरा जी हैं। आप कुछ भी कहें। कुछ भी समझें । इन शब्दों का कोई अर्थ निकालें। परंतु कामरा जी से उचित कोई और हो ही नहीं सकता था। विधानसभा की 6 सीटों वाले इस जिले मेँ बीजेपी  के चार विधायक हैं। इनके अलावा विशाल नेता भी हैं। अगर कोई धुरंधर बना होता तो वो इन विधायकों और विशाल नेताओं को हजम नहीं होना था। क्योंकि सत्तारूढ़ पार्टी का जिलाध्यक्ष होना कोई ऐसे ही नहीं है। मंत्रियों ने आना है। प्रभारी मंत्री ने बैठक लेनी है। सौ पंगे हैं। सत्ता और संगठन मेँ ताल मेल के। खब्ती हो तो सो टंटे कर दे, बैठे बिठाए। अब कामरा जी के बस मेँ तो कुछ है नहीं। क्योंकि ना तो कोई इनकी सूरत जाने ना कभी कोई बड़ा कद रहा। बिजयनगर के अलावा किसी और स्थान पर कोई जानता नहीं हैं। ना प्रशासन जाने ना पार्टी के लोग। ना उनका  कोई नेटवर्क है। कभी इधर उधर गए हों तो जाने भी। संतोषी जीव थे। जो मिला उसी को मुकद्दर समझ के झोली मेँ लेते रहे। उनको क्या पता था कि कोई दिन ऐसा भी आएगा जब पार्टी, बड़े बड़े विधायक और विशाल नेता उनको जिला अध्यक्ष बना देंगे। बेशक, कुछ ना पता हो। पद मिल रहा हो तो लेने मेँ क्या हर्ज है। काबिलयात, अनुभव की बात छोड़ो  जी । कद तो पद मिलते ही बड़ा हो गया। बड़े कद को बड़ा पद मिले ये कोई जरूरी नहीं राजनीति मेँ। इधर सब चलता है। बड़े कद को पड़ा पद मिला था, क्या हुआ? हाथ-पाँव फैलाने की कोशिश की तो घर बैठा दिया। फिर सिर उठाया तो फिर चित कर दिया। कौन? अपने सीधे सादे अशोक नागपाल जी और कौन। कामरा जी और सोढ़ी जी मेँ कोई फर्क नहीं है। कामरा जी सोढ़ी जी से उन्नीस ही रहने की कोशिश करेंगे। पद का महत्व जान, समझ कर इक्कीस बनने का प्रयास करेंगे तो उनको अशोक नागपाल का स्मरण करवा दिया जाएगा । वर्तमान मेँ जो आनंद सोढ़ी हो जाने मेँ है वह अशोक नागपाल होने मेँ नहीं। यही रिवाज है इस पार्टी का। यही कर्म है जिला अध्यक्षी का। क्योंकि जिलाध्यक्ष बेशक संगठन के रूप मेँ विधायकों से अधिक शक्तिशाली हो, किन्तु विधायक कभी ऐसा नहीं चाहेंगे। बड़े नेता भी बर्दाश्त नहीं करेंगे कि वे जिला अध्यक्ष की हाजिरी भरें । इसलिए सोढ़ी, कामरा जैसों के भाग बदलते हैं। उनकी किस्मत चमकती है। घर बैठे सत्तारूढ़ पार्टी की जिला अध्यक्षी मिल जाती है। जिसके लिए बड़े बड़े नेता इधर उधर भागदौड़ करते हैं। सौ प्रकार के प्रपंच रचते हैं। इसलिए कामरा जैसे व्यक्ति का जिला अध्यक्ष होना सुखद है, सभी के लिए। कामरा जी को बैठे बिठाए पद मिल गया और बाकियों को पैदल। जहां मर्जी हो खड़ा कर दो। दो लाइन पढ़ो—
जिन्दा साबित करेगा
रोज मरेगा,
मुर्दा बन के रहेगा
मौज करेगा।