Sunday, 3 September, 2017

खबरों की गढ़ाई गढ़ाई जैसी तो हो!
गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। समझ से परे है कि मीडिया/मीडिया कर्मियों को हुआ क्या है! ऐसी ऐसी खबरें जिनका कोई वजूद नहीं! इसमें कोई शक नहीं कि कुछ खबरें होती हैं और कुछ वक्त की मांग के अनुसार गढ़ी भी जाती हैं, यूं कहिये की गढ़नी भी पढ़ती हैं, लेकिन गढ़ाई गढ़ाई जैसी तो हो! ये क्या कि सिर कहीं और पैर कहीं। बाबा गुरमीत सिंह राम रहीम और मंत्री परिषद के पुनर्गठन विषय पर मीडिया ने जो कुछ कहा, उसमें कब कितना सच था, सब सामने आ गया। झूठ, कोरे कयास और गढ़ाई सच की तरह परोसी जाती रही। आम जन के पास ऐसा कोई जरिया होता नहीं जो सच को जान सके। उसके  लिए तो मीडिया और मीडिया कर्मी ही भगवान होते हैं, ऐसे गरमा गरम विषयों पर। बाबा के उत्तराधिकारी के संदर्भ मेँ क्या क्या ना छपा मीडिया मेँ और क्या नहीं दिखाया गया। गुप्त बैठक मेँ क्या हुआ, यह तक बता दिया। बैठक की जानकारी किसी को नहीं है, लेकिन मीडिया ने ये भी बता दिया कि उसमें हुआ क्या! कभी मुंह बोली बेटी को उत्तराधिकारी बताया तो कभी बेटे को। सभी कयास लगा लिए। सभी प्रकार की संभावना जता दी। सच के निकट एक भी नहीं। चूंकि बाबा के नाम पर आज के दिन हर खबर पढ़ी और देखी जाती है, इसलिए आने दो जो आ रहा है। जाने दो जो हवा मेँ जा रहा है। आखिर डेरा की ओर से आए वीडियो ने सच बता दिया कि ऐसा  कुछ भी नहीं है। जिसका जिक्र कहीं ना था, उसको खूब अधिकार थे। बात यहाँ तक कि उत्तराधिकारी बनाने का कोई प्रस्ताव तक नहीं है। खैर! ये तो उस डेरे की बात है, जिसका मुखिया रेप के मामले मेँ सजा काट रहा है। अब बात नरेंद्र मोदी मंत्री परिषद के पुनर्गठन की। जबसे सरकार के  मुखिया ने पुनर्गठन के संकेत दिये, मीडिया मेँ सूत्रों का काम शुरू हो गया। पता नहीं कौन-कौन जानकारी देने के नाम पर मीडिया का मज़ाक बनाता  रहा, मज़ाक उड़ाता रहा। ये सच है कि मीडिया को अपने सूत्रों पर भरोसा करना पड़ता है, किन्तु ये भी तो देखो कि नरेंद्र मोदी हर बार अपने निर्णय से मीडिया को ही नहीं देश भर को चौंकाते रहे हैं, ऐसी स्थिति मेँ अपने सूत्र द्वारा दी गई जानकारी को क्रॉस चैक करने मेँ हर्ज क्या! किसी के मन मेँ क्या है, ये जान लेना असंभव है। राजनीति मेँ किसी का अगला कदम क्या होगा, ये बता पाना नामुमकिन है। इसलिए कयास लगते रहे। संभावित नामों की घोषणा होती रही। बात वही, जो संभावित नाम मीडिया बता रहा था उसमें से इक्का दुक्का ही मोदी जी की असली लिस्ट मेँ थे। संभावित मंत्रियों के नामों वाली लिस्ट मेँ उन व्यक्तियों और नेताओं के नाम थे, जिनके आस पास तक भी मीडिया के कयास नहीं पहुँच पाए। ऐसा तो नहीं कि  मोदी जी मीडिया से कोई खेल ही खेल रहे हों, जो मीडिया कहे उसके अलग हट के किया जाए। राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के चुनाव मेँ भी सेम टू सेम हुआ था। नए नाम। वो नाम, जिनके बारे मेँ मोदी जी के अलावा किसी ने सोचा तक नहीं होगा। हरियाणा मेँ सीएम मनोहर लाल खट्टर होंगे, किसने बताया! कहीं एक लाइन भी ना तो बोली गई और प्रकाशित हुई थी। कितने ही उदाहरण है। इसमें कोई शक नहीं कि राजनीति की हर खबर जन जन की पसंद होती है, किन्तु इसका मतलब ये तो नहीं कि इस पसंद के लिए वह परोस दिया जाए जो सच के आस पास ही ना हो। जनता मीडिया मेँ परोसे गई ऐसी खबरों को हर हाल मेँ सच मानती है, क्योंकि उसकी नजर मेँ मीडिया का हर शब्द सच के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। पता नहीं मीडिया और इस पवित्र काम से जुड़े व्यक्ति व्यक्तियों की किसी के प्रति कोई जवाबदेही भी होती है या नहीं। किसी और से नहीं तो खुद से तो होती ही होगी। भाई, किसी को बुरा लगा हो तो सॉरी। मगर इतना तो कहना ही पड़ेगा कि सच नहीं तो आधा सच तो हो। आधा सच नहीं तो कम से कम सच के निकट तो हो। दो लाइन पढ़ो-
उसकी आँखें जो गीली रहती है
कुछ ना कुछ तो जरूर कहती है।

[शब्दों और वाक्यों मेँ बदलाव करके खबर/आलेख को सोशल मीडिया पर फारवार्ड करने वाले के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है।] 

Tuesday, 4 July, 2017

सलाम....सलाम...सलाम


शब्दों के साथ छपे चित्र मेँ दिखाई देने वाले  इस परिवार को जानता नहीं। पहचानता नहीं। समझता भी नहीं। बस, यूं ही सफर मेँ मिल गए। ट्रेन मेँ चढ़ने के कुछ मिनट के बाद महिला मेम्बर वीडियो कॉलिंग से घर के किसी मेम्बर को यह बताने और दिखाने लगी कि कौन, कहां और कैसे बैठा है। आश्चर्य हुआ, लेकिन मोबाइल के इस दौर मेँ सब संभव था, यह सोच, देखता रहा। यह महिला हर मेम्बर का ध्यान रख रही थी। दो बुजुर्गों को मम्मी, डैडी बोलने वाली महिला ने उनको बैठाने, बर्थ पर चढ़ाने, लिटाने के बाद  खाने को दिया, दवा दी और मुस्कुराते  हुए अपनी बर्थ पर लेट मोबाइल मेँ फेसबुक या व्हाट्सएप मेँ कमेंट्स पढ़ और मुस्कुराने लगी। उसने डैडी’, मम्मी को बताया भी कि किसने क्या लिखा।  मैंने मेरे पास बैठे बुजुर्ग से पूछा, आपकी बिटिया है क्या? ना, मेरी नू [बहू] है। बेटी जैसी बहू। उसके बाद तो कई घंटे के सफर मेँ इस बहू के व्यवहार, आचरण, परिवार के प्रति उनके संस्कार देख उनको मन ही मन सलाम किया। बहू की किसी बात मेँ कोई बनावट नहीं दिखी और ना महसूस हुई। परिवार के मेंबर्स मेँ इतना कोर्डिनेशन, स्नेह, आपसी समझ, अपनापन कि उसे शब्दों मेँ नहीं बताया जा सकता। इस परिवार का लड़के ने पहली बार ट्रेन मेँ सफर किया था। बुजुर्ग 40 साल बाद ट्रेन मेँ  बैठे थे। मैं, नीलम और बहिन शशि हरिद्वार पहुँच कर भी बहू की तारीफ करते रहे। परिवार के आपसी स्नेह की चर्चा कर उनसे प्रेरणा लेने की बात करते रहे। उनके 5 मेंबर्स से किसी यात्री को शायद ही कोई असुविधा हुई हो। और वापसी मेँ ऐसा परिवार मिला, जिसमें आपसी कोर्डिनेशन तो होगा, लेकिन उनको केवल अपनी सुविधा से मतलब था, दूसरों को असुविधा हो तो हो। ईश्वर करे पहले वाले परिवार को खूब खूब यश, वैभव, शांति, सुकून, आनंद, सुख मिले और वे हवाज़ जहाज के मालिक भी बनें तो ट्रेन मेँ यात्रा करें ताकि दूसरों को उनके व्यवहार से प्रेरणा लेने का मौका मिले। दूसरे परिवार को भी यह सब मिले, लेकिन वे ट्रेन मेँ किसी को भी ना मिले। पहले वाले परिवार को सलाम, सलाम सलाम, खास कर बहू को, जो एक उदाहरण है मेरी नजर मेँ। दूसरे  परिवार को नमस्कार बस। अभिनंदन उस कोख का जिसने ऐसी बेटी को जन्म दिया और धन भाग उस परिवार के जहां वो बेटी बहू बन के गई। 

Sunday, 16 April, 2017

विचार बदलते ही संस्कार बदल जाते हैं

श्रीगंगानगर। तीन पुली के पास स्थित श्रीधर्म संघ संस्कृत महाविद्यालय गौशाला का वार्षिक उत्सव आज समारोह पूर्वक हुआ। समारोह मेँ व्यास पीठ से भक्तमाल की कथा सुनाई गई। भजन और कीर्तन हुआ। वक्ताओं ने कहा कि रामायण के महत्व का बखान करते हुए कहा कि इसके बिना तो बैकुंठ भी अधुरा है। इसमें कहां कितनी गहराई है कोई नहीं जान सका। जो जितना गहरा उतरता है उतना ही अधिक पाता है। एक वक्ता ने वेद शास्त्रों और अर्थ की बात कही। उनका कहना था कि जिनके पास अर्थ है। अर्थ का अधिकार है, उनका गौरव और सम्मान वेद की रक्षा के लिए अपना समर्पण करें। वेद शास्त्रों के कारण ही तो धर्म जीवित और ज्वलंत हैं। भारत है। हिन्दू हैं। मुख्य वक्ता ने कहा कि जिस दिन 16 संस्कार समाप्त हो जाएंगे उस दिन हिन्दू नहीं रहेगा। सनातन धर्म नहीं रहेगा। उन्होने यह बार धर्म परिवर्तन, वर्ण परिवर्तन के संदर्भ मेँ काही। वे बोले, धर्म और वर्ण परिवर्तन से कुछ नहीं होने वाला, सदियों से हो रहा है। संस्कार सनातन धर्म का आधार हैं। जब तक ये हैं तब तक सनातन धर्म और हिन्दू समाप्त नहीं हो सकते। एक वक्ता ने कहा कि विचार बदलते ही संस्कार और संसार बदल जाते हैं। कुम्हार जिस मिट्टी से चिलम बनाता है अगर उसी मिट्टी से चिलम के स्थान पर घड़ा बनाए तो मिट्टी का संसार बदल जाता है। उसके संस्कार बदल जाते हैं। कई घंटे के इस आयोजन मेँ स्वामी ब्रह्मदेव जी, संगरिया के दयानन्द शास्त्री, तनसुख राम शर्मा, विधायक कामिनी जिंदल, राजकुमार गौड़ सहित शहर के अनेक नागरिक मौजूद थे। संस्था के संचालक स्वामी कल्याण स्वरूप सहित विभिन्न स्थानों से आए अनेक संत मौजूद थे। ओजस्वी ढंग से मंच संचालन स्वामी स्वदेशाचार्य ने किया। कुछ मिनट के लिए पूर्व मंत्री देवी सिंह भाटी भी कार्यक्रम मेँ पहुंचे। 

Tuesday, 14 March, 2017

लोकतन्त्र मेँ सत्ता का अपहरण

गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। लगभग साढ़े चार दशक पुरानी गोपी फिल्म के एक गीत की पंक्ति है, जिसके हाथ मेँ होगी लाठी भैंस वही ले जाएगा। देख लो, गोवा और मणिपुर मेँ बीजेपी वाले ले गए। क्योंकि वर्तमान मेँ लाठी इनके हाथ मेँ है। लोकतन्त्र का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है। जहां के वोटरों ने बीजेपी को बहुमत नहीं दिया। बहुमत क्या, सबसे बड़े दल के रूप मेँ भी पसंद नहीं किया, वहां बीजेपी सरकार बना रही है। इसे कहते हैं सत्ता का अपहरण। जब सबसे बड़ा दल कांग्रेस है तो फिर उसे ही सरकार बनाने के लिए बुलाया जाना चाहिए। मगर नहीं। शर्म और बेहद शर्म की बात है ये, सभी के लिए। लोकतन्त्र के वास्ते भी और देश की राजनीति के वास्ते भी। अगर ऐसा ही कुछ यूपी मेँ होता तब! बीजेपी यूपी मेँ सबसे बड़े दल के रूप मेँ सामने आती तो बीजेपी को ही बुलाया जाता! उसी का हक बनता। मगर उत्तर से पूर्व की ओर जाते जाते लोकतन्त्र के मायने ही बदल गए। लाठी को हाथ मेँ ले सत्ता इस प्रकार हथियाई जाएगी, किसने सोचा होगा। राजनीति से नीति को निकाल फेंक दिया गया। राज को हासिल करने के लिए नैतिकता, मर्यादा सब को हवा मेँ उड़ा दिया गया। पूछे कौन? सवाल करने की हिम्मत किसकी है? सब देख रहे हैं। कोई कुछ बोलेगा तो भी कुछ नहीं होने वाला। ये तो कुछ भी नहीं एक छोटे से राज्य मेँ अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए विधायकों की इस मांग को भी मान लिया गया कि रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को सीएम बनाया जाए। जिस नेता ने बढ़िया मंत्री के रूप मेँ देश भर मेँ पहचान बनाई। इज्जत कमाई। जिसने देश की सेना का मनोबल बढ़ाया। जिस मंत्री ने सेना मेँ नई ऊर्जा का संचार किया, उसे छोटे से राज्य मेँ भेज दिया गया। बात ये नहीं कि पर्रिकर जैसा रक्षा मंत्री बीजेपी के पास नहीं होगा। खूब होंगे। किन्तु कोई ये तो बताए कि राजनीति मेँ उज्ज्वल छवि के मनोहर पर्रिकर को क्यों एक छोटे से स्थान पर सीमित किया जा रहा है। इस बात से एक बड़ा प्रश्न भी लोकतन्त्र के सामने ही नहीं बीजेपी के सामने भी आ खड़ा हुआ है। आज तो गोवा विधायकों की डिमांड पर मनोहर पर्रिकर को केंद्र से हटा वहां भेजा गया है। कल को यह स्थिति गुजरात मेँ सामने आई तब क्या होगा! विधायकों ने ये डिमांड कर ली कि वे तो केवल नरेंद्र मोदी के साथ ही आएंगे। तब क्या बीजेपी नरेंद्र मोदी को पीएम पद से हटा गुजरात की कमान सौंप देगी? क्या ये संभव है? सवाल ही पैदा नहीं होता। कल्पना भी नहीं हो सकती। बीजेपी को कांग्रेस मुक्त भारत की अपनी सोच को आगे बढ़ाने की इतनी जल्दी है कि उसने गोवा और मणिपुर मेँ सत्ता का अपहरण करने से भी परहेज नहीं किया। यूपी जैसे बड़े राज्य की सत्ता भी उसे संतुष्ट नहीं कर पाई और सत्ता की अपनी भूख शांत करने के लिए वहां भी सत्ता पर कब्जा कर लिया जहां, पहला हक बड़े दल का था। बेशक, बीजेपी वाले खुशी मनावें। शानदार विजय के गीत गावें। परंतु लोकतन्त्र मेँ यह ठीक नहीं है। आज बीजेपी ने अपनी सत्ता के दम पर ये किया है, कल को दूसरे दल भी सत्ता के नशे मेँ ऐसा कर सकते हैं। बीजेपी की शान तो तब बढ़ती जब वह गोवा और मणिपुर दोनों मेँ चुनाव मेँ सबसे अधिक सीट लेने वाले दल को पहले सरकार बनाने का मौका देती। वो इनकार करती या असमर्थता जताती तब वह सामने आती और सरकार बनाने का दावा पेश करती। परंतु ऐसा करने की जरूरत ही महसूस नहीं की गई। झट से सत्ता का अपहरण करने की योजना बनी और सबकी आँखों के सामने यह सब हो गया। कोई कुछ नहीं कर सकता। किसी की हिम्मत नहीं। आज का लोकतन्त्र यही है। चार  लाइन पढ़ो-
वतन से इश्क की बात करते हो 
सड़े, गले पुराने दौर के लगते हो,
अपने मतलब की बात करो जनाब 
दिलों मेँ क्यों फिजूल की बात भरते हो। 


Friday, 13 January, 2017

naya yug

इक युग ऐसा भी आएगा 
राम को वन मेँ मारा जाएगा,
विभीषण होगा रावण का जासूस 
भरत रावण से हाथ मिलाएगा। 
कोई सीता श्रीराम के लिए 
कभी ना खुद को रुलाएगी,
रावण का हाथ पकड़
लंका की पटरानी बन जाएगी............[ जारी है]
[2g]

Tuesday, 26 April, 2016

इबादत तेरी करने लगा और 
इश्क खुदा से, 
तेरे ख्याल ने यारा सब 
गड्ड मड्ड कर दिया। 
[2g]

....
सस्ते मेँ ही बेच दिया मुझको 
कुछ तो मोल लगाते जनाब। 
रिश्ते झूठे, पैसे सच्चे 
सच एक है, यही जनाब।
बिछड़ गए सब संगी साथी 
अब तो है, बस याद जनाब।
झूठी हकीकत, सच्चे ख्वाब
मेरी पूंजी, इतनी जनाब।
[2g]

Monday, 22 February, 2016

दुविधा

3- 
दादा पिता लाहौर मेँ सब कुछ छोड़ के आए थे। इसलिये इधर था ही नहीं अधिक कुछ। दो पैसों के लिए कभी 5-10 पैसे वाले पुड़ी के पत्ते लगाता। कभी कुछ करता। एक दो बुरी बात भी थी। नगर पालिका पार्क की लाइब्रेरी के स्टोर से दरवाजे के नीचे से झाड़ू की सींक से अखबार निकाल लेते थे। करना क्या था....पार्क मेँ ही खेलते। पिता जी कारखाने मेँ काम करते थे। सर्दियों मेँ मैं अक्सर रात को वहीं सोता। एक मिस्त्री था, उन्होने रुमाल का चूहा बनाना और उसे हाथ पर चलाना सिखाया। वह आज भी बड़े शानदार ढंग से बनाना और चलाना आता है। बच्चों को बना और चला के दिखाता हूँ। स्कूल मेँ किसी मास्टर की मार तो नहीं खाई लेकिन घर मेँ माँ की जरूर खाई। माँ कहती थी, मैं कभी कभी कुछ ना कुछ गुनगुनाता रहता था। ऐसे ही कोई शब्द। बात। कुछ लाइन। मेरे दादा श्री मंगल चंद जी तीन भाई थे। श्री मांगी लाल जी और निहाल चंद जी उनके भाई थे। तीनों के मकान साथ साथ थे। पार्क के सामने। हर शाम तीनों परिवारों के पुरुष, बच्चे मांगीलाल दादा जी के जरूरु जाते। चबूतरे पर बड़ा लकड़ी का पट्टा था। वहाँ बैठते। बात चीत होती। सर्दी मेँ यह बैठक घर के बाहर वाले कमरे मेँ लगती। गजसिंहपुर मेँ दो भाई बहिन की शादी हो गई। बड़े भाई नेमी चंद गंगानगर आ गए। काम के लिये। फिर ये तय हो गया कि परिवार का गजसिंहपुर को अलविदा करने का समय आ गया...रोटी, रोजी के लिये गंगानगर जाना होगा.....

4--तो ये तय हो चुका था कि गजसिंहपुर को छोड़ना ही होगा। जहां पेट रोटी को तरस जाए, उधर कौन रहना चाहेगा। लाइन पार का पनघट। उसके पास छोटा खाला। आगे जाकर खेत मेँ बना शिवालय। गन्ने से लदी माल गाड़ी से गन्ने खींचना। मंडी से छोड़ने से पहले मोती नामक कुत्ता हमें छोड़ गया। घर के सामने वाले ने उसे दिन दिहाड़े गोली मार दी। क्योंकि एक दिन मोती ने उस पर भोंकने की गलती कर दी थी। मोती बेशक हमारा पालतू नहीं था, लेकिन उसे चौखट हमारी ही प्यारी थी। रिश्तेदार आना है, उसे ट्रेन से लेकर आना। जाना है, तो स्टेशन तक छोड़ के आना। जो दिया, वही खाया। हम स्टेशन पर आ चुके थे। बस, मोती नहीं था हमें अलविदा कहने के लिये। ट्रेन लेट थी। मैं खुश था, ट्रेन मेँ चढ़ना था। गंगानगर आना था। माँ, पिता, भाई, बहिन के चेहरे पढ़ ही नहीं पाया। आता ही नहीं था पढ़ना। परंतु आज सोचता हूँ तो वे चेहरे यकीनन उदास ही रहे होंगे। उन पर अपने भरे पूरे परिवार को, गलियों, घर को छोड़ने का रंज तो रहा ही होगा। हरियाणा के बरोदा बिटाना से बुढ़लाडा, वहाँ से लाहौर फिर गजसिंहपुर.....कैसे कैसे दिन ये दिखाई जिंदड़ी। ट्रेन का आना मेरे लिये उल्लास, खुशी और आनंद का विषय था और शायद माँ के लिये विषाद का विषय रहा होगा। हे भगवान, माँ के प्रस्थान कर जाने के बाद ही यह सब लिखने का विचार क्यों आया.....

Saturday, 20 February, 2016

दुविधा

2—
शिशु की दिनचर्या जैसी होती है मेरी भी थी। रोना, सोना और दूध पीना। सरका , घुटनों के बल चला। और फिर पैरों पर। आँगन बड़ा था। दहलीज़ ऊंची थी। बाहर जा नहीं सकते थे। पाँच साल का हुआ। सरकारी स्कूल मेँ भर्ती हो गया। फेल होने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। एक कायदा, एक स्लेट और एक तख्ती, यही होता था, कपड़े के थैले मेँ। जो आजकल स्कूल बैग के नाम से जाना जाता है। स्कूल जाने से पहले और आने के बाद खेलना। वह कंचे, सिगरेट की डब्बी, गेंद, शाम को कबड्डी। पतंग उड़ाना। दूसरी, तीसरी मेँ हो गए। दादी जी प्रस्थान कर गईं। स्मृति इसलिये है कि मरने पर जो आज होता है, तब भी वैसा ही हुआ था। मैं नहीं गया था, श्मशान मेँ। गली मेँ खेल रहा था। दादा की दुकान थी। पिता कारखाने मेँ काम करते थे। एक दिन मैंने और चचेरे भाई ने दुकान से दस दस पैसे चुरालिए थे। जो होना था हुआ। पहले लाइन से उस पार स्कूल मेँ था। फिर घर के पास स्थित स्कूल मेँ लगा दिया गया। पड़ोस मेँ एक लड़के की शादी हुई। लड़का परदेश रहता था। उसकी बहू बिलकुल अनपढ़। उन्होने मुझे लिखना सिखा दिया। परदेश से जो पत्र उसके पिया जी उसे भेजते। वह मुझसे पढ़वातीं। चूंकि गली मेँ हम ही ज्ञानवान, गुणवान और राज को राज ही रखने मेँ निपुण थे, इसलिये मुझे वह पत्र पढ़ कर सुनाना होता और उसका जवाब भी लिखना होता। इसके बदले मुझे मिलते दस पैसे, कभी कभी पच्चीस पैसे। कभी पैसे की जरूरत होती तो मैं पूछ लेता, चिट्ठी आई क्या? वह सिर हिला देती। कई बार झिड़क कर कहती...नई आई रे। क्यों जान खा रहा है। काम करने दे.....दोनों उदास। वो अपने कारण और मैं अपनी दस्सी की वजह से। ये तो अब मालूम हुआ कि चिट्ठी आई होती तो मुझे तो पता लग ही जाता.....

Friday, 19 February, 2016

दुविधा...

कमेंट्स करने से पहले पढ़ लेना प्लीज....
55
साल के इस गोविंद के कई रूप हैं। 55 साल का बेटा, भाई है तो लगभग 25 साल का पिता भी। पति, चाचा, मामा, दादा, ससुर, दोस्त,......जैसे कितने व्यक्ति एक के अंदर गईं....साथ मेँ पत्रकार भी है...आम इंसान भी ...जिज्ञासु.......किस गोविंद का जिक्र करूँ....समझ से परे......गोविंद के प्रेम का जिक्र नहीं होता तो गोविंद की कथा अधूरी है। उलझन है, दुविधा है, लेकिन कहानी है तो शुरू करनी ही होगी। अंत कैसा होगा क्या पता? वो तो क्लाइमेक्स लिखने के बाद ही मालूम होगा। प्रेम! प्रेम तो साथ चलेगा ही।

1-55 साल पहले 16 जनवरी के दिन माँ को सुबह ही अहसास होने लगा था कि मैं आने वाला हूँ। शाम होते होते यह अहसास प्रसव पीड़ा मेँ बदल गया। दादी ने धाओ दाई को बुला लिया। गजसिंहपुर मेँ पालिका पार्क के बिलकुल निकट घर के बीच वाले कमरे मेँ शाम को 7.34 बजे मैं गर्भ गृह से बाहर आया। मैंने इस अलौकिक, दिव्य और अद्भुद सृष्टि को नजर भर देखने की शुरूआत करने की बजाए रोना शुरू कर दिया। माँ से अलग करने के लिए धाओ ने नाल काट दी। माँ प्रसव की तीव्र पीड़ा के बावजूद खुश खुश रही होगी और मैं लड़का होने के बावजूद रो रहा था। शायद पीड़ा माँ को रही थी और रो मैं रहा था। धाओ ने मुझे पोंछ कर माँ के निकट लिटा दिया। माँ देखती रही। कुछ देर बाद कानों मेँ थाली बजने की आवाज सुनाई दी। माँ बताया करती थी, तू जब पैदा हुआ तब तेरे कान छिदे हुए थे। कानों मेँ छेद थे। शायद पिछले किसी जन्म मेँ तू कोई साधू, संत था...............