Tuesday 23 December 2014

मिट्टी मेँ दबा देना चाहिए ऐसे धर्म को....



श्रीगंगानगर-वह धर्म व्यर्थ है जो पति पत्नी के रिश्तों को असामान्य बना उसे तोड़ने की स्थिति मेँ ले आवे। उस धर्म को भी मिट्टी मेँ दबा देना चाहिए जो गृहस्थ आश्रम की जड़ें खोखली करने का काम करता है। वह धर्म भी किसी काम का नहीं जो हमेशा खिलखिलाते रहने वाले परिवार मेँ कलह का कारण बने। विवाद पैदा करे। संवेदनशील रिश्तों मेँ कड़वाहट घोल दे। पर धर्म तो ऐसा कुछ नहीं करता, कहीं नहीं करता। यह सब जो करता है वह धर्म की आड़ मेँ व्यक्ति का अहम, दंभ, अहंकार ही करता और करवाता होगा । कुंठा होती है किसी व्यक्ति की। उसका अवसाद भी हो सकता है या किसी अपने की उपेक्षा भी । फिर यही धर्म के रूप मेँ पग पग पर बाधा बन सामने आ खड़ा होता है। इंसान मन, कर्म, वचन से सात्विक रहने की बात करता है। रिश्तों की अहमियत भी समझता है ठीक से। उसकी मर्यादा को जानता है और मानता है। इसमें कोई शक नहीं कि धर्म इंद्रियों पर संयम रखने की बात करता है। यही धर्म गृहस्थ आश्रम को सबसे महत्वपूर्ण आश्रम भी मानता है। फिर भी गड़बड़ हो जाती है। दंपती मेँ से एक भी 24 घंटे धर्म मेँ लगा रहेगा, सत्संग की बात करेगा, अपने आप को भजन कीर्तन मेँ लीन रखेगा तो ये निश्चित है कि उनके दाम्पत्य जीवन मेँ रस का अभाव हो जाएगा । विचारों मेँ भिन्नता शुरू हो जाएगी। विवाद होगा। संभव है धर्म, सत्संग, भजन, कीर्तन मेँ मस्त रहने वाले व्यक्ति का मन झूमता रहे। उसे उमंग और आनंद का अनुभव हो, लेकिन दूसरा साथी, परिवार के बाकी सदस्य अपनी भावनाओं को आहत समझ कुंठित होने लगेंगे। ऐसे ही एक घर हुआ। उधर वैल क्वालिफाइड पति-पत्नी अलग अलग कमरों मेँ सोते। वह भी उस उम्र मेँ जब दोनों को एक दूसरे के सहारे, साथ की सबसे अधिक जरूरत होती है। परिणाम, एक इतना कुंठित हुआ कि उसका चेहरे का रंग बदरंग हो गया। फिर अधिक दिन जी भी नहीं सका। पता नहीं ये कौनसा धर्म,सत्संग था जो पति पत्नी को उनके रिश्ते निभाने से रोकता रहा ! ये कोई पहला और अंतिम उदाहरण नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे जीवन मेँ धर्म, सत्संग, कीर्तन हो, लेकिन ये सब इतने भी नहीं होने चाहिए कि पति-पत्नी एक बिस्तर पर एक दूसरे से मुंह फेर कर सोने लगे। एक दूसरे की भावना,पसंद को अपने धर्म पर कुर्बान कर दें या फिर भोग को वासना की विषय वस्तु मान उसकी निंदा शुरू कर दें । गृहस्थ आश्रम मेँ वासना भी होती है और तृष्णा भी। संतोष भी है तो कामना भी। केवल एक की प्रधानता से गृहस्थी नहीं चल सकती। वह काल खंड और था जब इतनी उम्र मेँ गृहस्थ आश्रम, उतनी उम्र मेँ वाणप्रस्थ और उसके बाद सन्यास आश्रम का निर्वहन होता था । तब की परिस्थितियां , खान-पान, रहन सहन कुछ और था अब कुछ अलग। तो फिर आज की परिस्थिति मेँ कैसे इनका विभाजन किया जा सकता है। कौन करेगा वाणप्रस्थ का पालन? कौन निकलेगा सन्यास के पथ पर? कौन जाएगा वन को? असल मेँ धर्म तो मन, कर्म और वचन मेँ होता है। वह खंडन, विखंडन का नहीं संयोग और योग का पक्षधर है। वह विवाद नहीं निर्विवाद करता है। धर्म को धारण करने वाले के अंदर तो लगाव होना चाहिए किसी के प्रति अलगाव नहीं । ज़िम्मेदारी से भागना , अपनों से दूर रहना, उनकी भावनाओं को उचित महत्व ना देना धर्म, सत्संग, कीर्तन नहीं कुछ और ही होता है। यह क्या होता है वही जाने जिसमें यह होता है।

Monday 22 December 2014

मुझे तो पाक से कोई सहानुभूति नहीं है



श्रीगंगानगर [गोविंद गोयल] बेशक यह खुशी मनाने का दिन नहीं है, क्योंकि दुश्मन की मौत पर भी खुशी और उमंग का इजहार करना भारत की संस्कृति नहीं है। मगर पेशावर की घटना पर रंज प्रकट करना। पाक के प्रति सहानुभूति दिखाना भी हिंदुस्तान के लिए उचित नहीं लगता । किस के प्रति सहानुभूति! रंज किस देश और कैसे इन्सानों के लिए ! मोमबत्ती जगा किसको राह दिखाना चाहते हैं ! आतंकवादी हमला पाकिस्तान मेँ हुआ है, हिंदुस्तान मेँ नहीं। वह भी उस पाक मेँ जिसने अस्तित्व मेँ आने के बाद से ही हिंदुस्तान को कभी चैन से जीने नहीं दिया। कश्मीर पर कब्जा, घुसपैठ, 1965 और 1971 का युद्ध, प्रोक्सी वार, आतंकवाद, करगिल, हिंदुस्तान की आन, बान और शान संसद पर आक्रमण, ताज होटल पर हमला कर ना जाने कितने ही जख्म पाक ने हमको दिये। एक बार नहीं ना जाने कितनी बार। कितने हिन्दुस्तानी देश की खातिर शहीद हुए। निर्दोष मारे गए। इन घटनाओं मेँ जो हिन्दुस्तानी शहीद हुए उनके घरों मेँ जाकर देखोगे तब पता लगेगा उनके जख्मों के असहनीय दर्द का। किसी ने पिता खोया किसी ने बेटा। किसी का हाथ की मेहँदी मिटने से पहले ही सुहाग मिट गया। जो भी शहीद हुए वे भी किसी के बेटे तो थे ही। साथ मेँ वे पिता, चाचा, ताऊ, भाई जैसे कितने ही रिश्तों से भी बंधे हुए थे। इनके जाने से किस किस के कैसे कैसे सपने टूटे होंगे, कोई इनसे पूछ कर देखो। क्योंकि किसी ने कहा है- बाप है तो सपने है, बाजार के सारे खिलौने अपने हैं। इनकी भावनाओं को तो समझो। इनके मन को टटोलो। उनसे कोई तो पूछे इनका दर्द । लगे हैं सब के सब पाक के प्रति सहानुभूति दिखाने मेँ। हौड़ लगी है मोमबत्ती जगाने की। तो क्या सभी ने पाक का किया धरा भुला दिया! माफ कर दिया उसकी करतूतों को! वाह! कमाल के संस्कार हैं हिंदुस्तानियों के। बार-बार सलाम करने के योग्य है संस्कृति। दुश्मन की पीड़ा हमारे सीने मेँ भी दर्द करती है। उनके शोक मेँ हमारी आँख भी नम होती है। परंतु जनाब, पाक नहीं समझ सकता हमारी भावनाओं,सद्भावनाओं को। वो नहीं जान पाएग हमारे मन को। उसके दिल मेँ किसी प्रकार की कोई अच्छी भावना नहीं है हमारे देश और देशवासियों के प्रति। इसलिए उसके प्रति किसी प्रकार की कोई सहानुभूति जताने की जरूरत नहीं। रोने दो उसे अकेला। सहने दो अपने जख्म खुद । ताकि उसे मालूम हो कि आतंकवाद की फसल बोने का क्या मतलब होता है! उसका डंक कैसा लगता है। ये हमारे पीएम नरेंद्र मोदी को भी पता नहीं क्या हो गया ! स्कूलों मेँ दो मिनट का मौन ! शांति का नोबल पुरस्कार के लिए इतनी जल्दी। खैर, सरकारों को करने दो अपनी कूटनीति। बोलने दो सहानुभूति की भाषा। निभाने दो सरकारी रस्म। आम जनता को इससे क्या। चर्चा कर लो किसी भी आदमी से , सब के सब यही कहेंगे कि ठीक हुआ पाक मेँ। चलो माना, बच्चों के साथ ऐसी बर्बरता ना हो। उनको टार्गेट नहीं बनाना चाहिए, लेकिन जो इधर मारे गए वे भी तो किसी के बच्चे ही थे। फिर ये खेल भी तो पाक ने ही शुरू किया था। ये भी ठीक है कि नफरत को नफरत से नहीं जीता जा सकता। परंतु, एक तरफा प्यार आखिर कितने दशक तक। हम प्यार जताते रहें और वो नफरत। यह कब तक सहें। जो कुछ पाक ने मेरे हिंदुस्तान के साथ किया उसको याद करके मुझे तो आज पाकिस्तान से कोई सहानुभूति नहीं है। किसी और को हो तो हो। मुझे तो वो तमाम जख्म दिखाई दे रहे हैं जो पाक ने समय समय पर मेरे हिंदुस्तान को दिये। जय जय हिंदुस्तान। जय जय उसके संस्कार और संस्कृति।

Monday 18 August 2014

कृष्ण की ड्रेस पहनने से कोई कृष्ण नहीं बनता



श्रीगंगानगर- केवल कृष्ण का रूप धरने मात्र से कोई कृष्ण बन सकता है? सवाल ही पैदा नहीं हो सकता। कृष्ण बन जाना। कृष्ण हो जाना,बहुत बड़ी और दुर्लभ बात है।ऐसा युगों युगों में कभी होता है। ठीक है, सच्ची का कृष्ण बनना असंभव है,लेकिन यह कोशिश तो हो ही सकती है कि कृष्ण बनने और बनाने वाले कृष्ण को समझें। अपने आचरण में कम से कम एक दो प्रतिशत तो कृष्ण को उतारें। और नहीं तो केवल प्रेम को ही ले आएं,यही बहुत है। क्योंकि जहां प्रेम हैं वहां कोई झंझट,संकट होता ही नहीं। इसमें किसी की जेब से कुछ नहीं लगता । अभिभावक अपने बच्चों को कृष्ण के परिधान पहनाने तक की सीमित ना रहें। वे बच्चे में कृष्ण से संबन्धित जानकारी दें। उसकी कथा,कहानियां बच्चों को बताएं। क्योंकि कृष्ण की तो हर उम्र में कोई ना कोई कथा है। उसकी हर लीला प्रेरणा है। कृष्ण ने  हर कदम धर्म की स्थापना के लिए बढ़ाया। कौनसे कष्ट थे जो उसने नहीं सहे। बचपन से ही विपत्तियों का सामना करना कृष्ण ने शुरू कर दिया था। कृष्ण कर्म की प्रेरणा देते हैं। प्रेम का संदेश देते हैं। अपनों को भरोसा देते हैं।अन्याय बर्दाश्त नहीं करते। जुल्म का सामना करने से नहीं डरते।परिस्थिति कैसी भी हो अपने लक्ष्य को नहीं भूलते। सखा सुदामा जैसा निर्धन हो या अर्जुन जैसा राजकुमार,कृष्ण भेद नहीं करते। जो सुदामा को चाहिए था वह सुदामा दिया और जो अर्जुन को चाहिए था वह उसे। वे कूटनीति के ज्ञाता है। धर्म के अधिष्ठाता हैं। भाव को महत्व देते हैं। ऐसे कृष्ण का थोड़ा सा भी आचरण किसी बच्चे में आ गया तो समझो,हो गया समाज निहाल। इसमें कोई शक नहीं कि आज के युग में कृष्ण बन बन जाना असंभव है। लेकिन इसके बावजूद अभिभावकों और स्कूलों को केवल इतनी कोशिश तो करनी ही चाहिए कि कृष्ण बनने वाला बच्चा बिगड़े तो ना। मात्र प्रतियोगिता जीतने के लिए ही कृष्ण बनना या बनाना कोई महत्व नहीं रखता। नगर में कृष्ण के प्रति श्रद्धा,विश्वास, लगाव बढ़ा है या जन्माष्टमी पर बाजारवाद का असर है,मालूम नहीं,लेकिन ये सच है कि लोगों में अपने बच्चों में कृष्ण बनाने की होड़ लगी रहती है। शिशु से लेकर किशोर अवस्था तक तक के बच्चे हर आयोजन में कृष्ण बने नजर आते हैं। जन्माष्टमी के निकट सामाजिक,धार्मिक संगठन ही नहीं स्कूलों में भी कृष्ण बनाओ प्रतोयोगिताओं का आयोजन होने लगा है। परंतु इनकी सार्थकता तभी होगी जब अभिभावक और स्कूल बच्चों में अभी से कृष्ण का आचरण लाने के प्रयास करें।

Sunday 27 July 2014

एसपी/डीएम जी!कभी आदमी बन के शहर में घूमो


श्रीगंगानगर-सरकार को इस क्षेत्र का दौरा करके गए एक माह होने को आया. ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे ये लगे कि सरकार का दौरा सफल रहा. जिले के एसपी और डीएम आज तक शायद ही कभी दफ्तरों से बाहर निकलें हों. एसपी और डीएम के रूप में तो निकले ही होंगे,किसी प्रोग्राम में चीफ गेस्ट के नाते. किसी कार्यक्रम का उद्घाटन करने के लिए. किसी सेठ या नेता के साथ किसी साईट पर. परन्तु इनसे यह पता नहीं लगता कि शहर के हालत क्या है. एसपी/डीएम  आम आदमी के रूप में
शहर की गलियों में निकले तो उनको ज्ञात होगा कि उनके राज में इस शहर में हो क्या रहा है. एसपी को शायद दिखाई दे जाए कि उनका ट्रैफिक इंचार्ज सिवाए चालान काटने के कुछ नहीं करवाता.ट्रैफिक व्यवस्था को ठीक करवाना शायद वह अपनी ड्यूटी नहीं समझता. एसपी को यह भी दिख जाएगा कि गली गली में किस प्रकार लावारिस गाड़ियां खड़ी रहती हैं जो ट्रैफिक व्यवस्था में बाधा बनती है.मगर ट्रैफिक इंचार्ज को इससे कोई मतलब नहीं.इतना ही नहीं आम आदमी के रूप में ही वे जान पाएंगे कि किस किस क्षेत्र में लड़कियों का सहज रूप से सड़क पार करना मुश्किल हो चुका है. जो पुलिस कर्मी ड्यूटी पर लगाये जाते हैं वे उन लड़कों के साथ गलबहियां होते हैं जिनकी नजर लड़कियों पर रहती है. जब एसपी आम आदमी के रूप में सड़क पर आएंगे तो शायद ये जान सकें कि किस गली में गलत काम होता है और उनका बीट कांस्टेबल इस बात से अनजान है. ऑफिस में बैठे बैठे एसपी साहब वह सब नहीं जान सकते जो पब्लिक जानती है. आपके सभी मातहत क्या कर रहे हैं ये केवल आम आदमी बन जान सकते हो. डीएम हर सप्ताह अनेक बैठके लेते हैं. सड़क पर निकले तो खुद मान जाएंगे कि इन बैठकों का कोई अर्थ नहीं है. नगर परिषद हो या नगर विकास न्यास दोनों के अधिकारी क्या कर रहे हैं यह सड़क पर आने से ही मालूम होगा डीएम को. कोई सड़क ऐसी नहीं जिस पर कब्ज़ा ना हो प्रभावशाली को कोई पूछता नहीं.डीएम साहब,आप आम आदमी के रूप में रात को किसी प्राइवेट हॉस्पिटल में अपना इलाज करवा के दिखा दो.कोई हॉस्पिटल वाला दरवाजा तक नहीं खोलता. आपने जानकारी से खुलवा लिया तो वे सीधे आपको रैफर कर देंगे लुधियाना,जयपुर. कोई कुछ नहीं कर सकता. आप कलक्टर बन कर कितनी ही बार सरकारी हॉस्पिटल गए. कभी आम आदमी बन के जाओ तो पता लगे कि कैसे क्या होता है. कौन कितने मुश्किल में है.केवल आदेश और निर्देश देने से कुछ नहीं होता.एक साधारण इंसान जैसे आप शहर का दौरा करोगे तो आपको खुद ये महसूस होगा कि आप जो ऑफिस में कर रहे हैं उससे कहीं अधिक करने की जरुरत है. एसपी/डीएम के रूप में आपको वही दिखेगा जो अफसर दिखाएंगे. वह नहीं जो आम जन भोगता है. इधर कोई नेता नहीं है. जनता भी मस्त है, इसलिए आपका काम चल रहा है. कोई पूछने वाला नहीं.जिम्मेदारी याद दिलाने वाला नहीं. इसलिए जो आप दफ्तरों में बैठकर करो ठीक लगता है. लेकिन ऐसा नहीं है. सड़क पर आम आदमी बन कर आओ तब पता लगेगा कि क्या हो रहा है और क्या होना चाहिए. 

Monday 21 July 2014

विधायक गंगानगर की,वकालत हनुमानगढ़ की,बाऊ खुश


श्रीगंगानगर- सबसे पुराने वरिष्ठ राजनेता राधेश्याम गंगानगर आज बहुत खुश होंगे.ख़ुशी केवल मन चाहा पा लेने से ही नहीं होती. ख़ुशी तो किसी भी बात से हो सकती है. राजनेताओं की ख़ुशी तो वैसे भी कुछ अलग  प्रकार की होती है. मन तब भी प्रसन्न हो झूमने लगता है जब विरोधी गलतियां करें.राजनीति में आज के दिन राधेश्याम गंगानगर का कामिनी जिंदल से बड़ा विरोधी कोई हो ही नहीं सकता. कामिनी जिंदल कहो या बी डी अग्रवाल एक ही बात है. वो राजनैतिक गलतियां करेंगे तो बाऊ जी के मन में लड्डू फूटेंगे ही. अब देखो, कामिनी जिंदल विधायक तो श्रीगंगानगर की हैं और एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के लिए वकालत
हनुमानगढ़ की कर रही हैं. जमींदारा पार्टी को श्रीगंगानगर  जिले ने दो विधायक दिए और उसकी विधायक कामिनी गीत हनुमानगढ़ के गा रहीं हैं. जितने वोट इस पार्टी को श्रीगंगानगर जिले में मिले और कहीं नहीं. इसके बावजूद इस पार्टी की एक प्रभावशाली विधायक द्वारा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी हनुमानगढ़ में खोलने की वकालत करना ना केवल वोटर्स के साथ अन्याय है बल्कि श्रीगंगानगर जिले का दुर्भाग्य है.प्रदेश में क्या देश में शायद ही कोई ऐसा जन प्रतिनिधि होगा जिसने कभी अपने क्षेत्र को छोड़ दूसरे क्षेत्र की वकालत की हो. मगर जमींदारा पार्टी की कामिनी जिंदल की बात ही अलग है. बड़े लोगों की बात अलग ना हो तो फिर काहे के बड़े. हैरानी है कि जिस समय श्रीगंगानगर जिले के लोग,विधायक,एमपी  अपने अपने ढंग से यह यूनिवर्सिटी श्रीगंगानगर में खुलवाने की कोशिशों में लगे हैं,तब कामिनी जिंदल द्वारा हनुमानगढ़ की वकालत करना यह दर्शाता है कि उनका मकसद यूनिवर्सिटी को खुलवाना नहीं बल्कि उसमें अड़ंगा लगाना है. हैरानी इस बात की कि कोई विरोध नहीं कर रहा.
इधर कोई बोलेगा नहीं और हनुमानगढ़ में जय जय कार होगी.ये सच है कि कामिनी जिंदल के हनुमानगढ़ जिले में यूनिवर्सिटी खोलने के पत्र से कुछ नहीं होने वाला,लेकिन उनकी मंशा तो पता लगती ही है. जनता शायद  ही इससे पहले कभी अपने किसी विधायक से इतना डरी सहमी रही हो,जितना वो कामिनी जिंदल से डरी हुई है. अगर वे डरे हुए नहीं है तो फिर वे  भरे हुए हैं.शर्म से बोल नहीं पा रहे. डरा हुआ या भरा हुआ इंसान कैसे बोले.वरना  अब तक तो बवाल मच गया होता. कोई विधायक अपने क्षेत्र के अतिरिक्त दूसरे क्षेत्र की वकालत करे तो बवाल मचना स्वाभाविक है. यह उनके हकों पर कुठाराघात है.अपने हक़ को किसी दूसरे को कोई कैसे दे सकता है. मगर विधायक कामिनी जिंदल ऐसा करने की कोशिश करे तो कोई नहीं चुसकेगा. कौन नाराजगी  ले बी डी अग्रवाल की  बेटी और आई पी एस की विधायक बीवी से. बाऊ जी और उनके बन्दे घर बैठ तमाशा देखेंगे ही. उनके लिए तो यह सब घर बैठे गंगा आने के समान है. वे तो जमींदारा पार्टी और उनकी प्रभावशाली विधायक की हर राजनैतिक गलती से खुश होंगे. जितनी गलती वे करेंगी उतनी ही बाऊ जी की बल्ले बल्ले. कामिनी जिंदल की झोली वोटों से  भरने  वाली जनता ही नहीं बोल रही तो बाऊ जी क्यों बोलेंगे. वे तो हारे हुए हैं. जनता द्वारा बुरी तरह नकारे हुए हैं. कांग्रेस नेताओं से उम्मीद ही क्या करें! इस पार्टी के नेता तो बात बात पर बी डी अग्रवाल की हाजिरी बजाते हैं. खुद विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी सहित.बाकी बची जनता.वह तो सीधे सीधे किसी का विरोध करती नहीं. फिर दानवीर बी डी अग्रवाल ने उअन्का क्या बिगाड़ा है जो वे उनकी बेटी की इत्ती से बात का विरोध करें.यूनिवर्सिटी खुले ना खुले उनकी बला से. आज इस क्षेत्र की स्थिति वैसी ही है जैसी तब थी जब धुरंधर सुरेन्द्र सिंह राठौड़ विधायक चुने गए थे भारी बहुमत से.ठीक कामिनी जिंदल की तरह. तब भी राधेश्याम एंड कंपनी,कांग्रेस,जनता  खामोश रही थी.परिणाम अगले चुनाव में राधेश्याम गंगानगर पार्टी बदलने के बावजूद विधायक चुन लिए गए. अब जब इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है तो  बाऊ जी का खुश होना अस्वाभाविक तो नहीं कहा जा सकता. दो लाइन पढ़ो--इस दौर में बे मतलब की बात करता है, ये जनाब तो पुराने ज़माने का लगता है. 

Saturday 19 July 2014

कैलाश पर्वत को देख श्रद्धा का झरना फूट पड़ा आंखों से

श्रीगंगानगर-अपने आप को कैलाश पर्वत के सम्मुख पा अनेक यात्रियों की आँखों से श्रद्धा बहने लगी. अनेक विस्मय से सब देख रहे थे बिना पलक झपके. कई तो   ऐसे हो गए कि किस दृश्य को आंखों में समेटे और किसको छोड़ें. सब के सब श्रद्धा से अभिभूत.ख़ुशी से सराबोर.जिस अलौकिक दृश्य के बारे में केवल किताबों में पढ़ा था,संतों और कथा वाचकों के मुख से सुना था, वह साक्षात  उनकी आंखों के सामने था. दृष्टि उससे परे जाने को तैयार ही नहीं थी. पुलकित और आनंदित मन  उस शिव से हटने को तैयार नहीं,जिसके बारे में कहा जाता है कि वह आज भी कैलाश पर्वत पर विराजमान है.प्राचीन शिवालय के महंत कैलाश नाथ जी कैलाश मानसरोवर की तीसरी बार यात्रा करके आए हैं.इससे पहले वे 1998 और 2001 में यह यात्रा कर चुके हैं. वे सामान्य बात चीत ये सब बताते हैं.इस बार की यात्रा अधिक महत्वपूर्ण थी. क्योंकि इस बार कुम्भ है कैलाश पर. इसलिये  इस बार की यात्रा कैलाश मानसरोवर की 13 यात्रों  के तुल्य है.वे कभी किसी को बता देते हैं कि  पूर्णिमा की रात को उधर ऐसा अद्भुद दृश्य था, जिसको शब्दों में बांधा नहीं जा सकता. उस रात को कैलाश पर्वत के निकट  जिसने जो देखा और महसूस किया वह बताना मुश्किल है. ऐसा लगा जैसे चन्द्रमा अपनी पूरी क्षमता से शिव की परिक्रमा  के साथ वंदना कर रहा हो.सबकी अपनी अपनी अनुभूति. कैलाश पर्वत के चारों तरफ आठ पहाड़ हैं.उसकी आकृति शिव की तरह है.पीछे शिव की जटा दिखाई देती है.अग्र भाग में कैलाश के सामने नंदी है. कैलाश पर्वत पूरी तरह सफ़ेद. मन को मोहित कर देने वाला. आंखों सम्मोहित कर देने वाला.स्फटिक मणि की तरह से. उस कैलाश की  परिक्रमा कर भगवान शिव को याद किया गया,जो उसी पर्वत पर विराजमान रहते हैं. कैलाश नाथ जी तीन दिन उधर ठहरे. हवन किया. जिसकी पूरी सामग्री वे अपने साथ लेकर गए थे. दो दिन वे मानसरोवर रुके. उसकी प्रक्रिमा कर स्नान किया. उधर क्या अनुभव हुआ? क्या देखा? क्या दिखाई दिया? इन प्रश्नों का उनके पास एक ही जवाब था, यह सब बताना असंभव है. उन्होंने मोबाइल से अपने एक साथ यात्री से बात करवाई. वह भी इतना ही कह सका,मैंने यात्रा की नहीं,मुझे तो ऐसे लगा जैसे कोई मेरी ऊँगली पकड़ कर यात्रा करवा रहा हो. क्योंकि यह संसार की सबसे विकट यात्रा है. वह बोला,मैं तो कैलाश के सामने बैठ गया. कैलाश पर्वत को निहारता रहा. उसकी छवि नेत्रों में बसाने की कोशिश की. दर्शनों के लिए जैसे ही शिव का आभार प्रकट किया,आँख से आंसू बहने लगे.ऐसा  एक बार नहीं कई बार हुआ.करोड़ों व्यक्तियों में से शिव ने मुझे अपने निकट बुलाया इससे अधिक मेरे लिए सौभाग्य की कोई बात हो ही नहीं सकती,बस! जब से कैलाश नाथ यात्रा से लौटे हैं तब से उनके पास  यात्रा की बातें सुनने के लिए लोगों का आना जाना लगा हुआ है.यात्रा की किसी फोटो को देख रोमांच और विस्मय होता है तो किसी फोटो पर नजर पड़ते ही  मन में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है. कैलाश नाथ  कहते हैं, पैर फिसला तो समझो,जय राम जी की. अर्थात सीधे काली गंगा में जाएगा यात्री. वे बताते हैं,यात्रा के दौरान ऐसी गुफा आती है जिसमें पारिजात का वृक्ष है. कामधेनु गाय है.भैरों की जीभ है. सफ़ेद हंस. सब के सब पत्थर के. ये सब वही हैं जिनका जिक्र शास्त्रों में हैं.भैरों की जीभ से लार टपकती रहती है. कैलाश नाथ के शब्दों में,मौसम बर्फानी रहता है. कैलाश पर्वत पर कभी बरसात नहीं होती. सुबह तमाम देव शिव की आराधना कर बर्फ की चादर उस पर चढ़ाते हैं.वहां की हवा  इंसान के शरीर को काला कर देती हैं.कैलाश नाथ के अनुसार वे पांच दिन तक सोए नहीं. लेटते थोड़ी  देर,फिर उठकर बैठ जाते. चाइना सरकार ने यात्रियों के लिए बढ़िया इंतजाम कर रखा था. हर प्रकार की सुविधा थी. पहले इतने इंतजाम नहीं हुआ करते थे. यात्रा में भी किसी प्रकार की कठिनाई नहीं हुई. सरकार की ओर से डॉक्टर,गाइड की व्यवस्था होती है.भारतीय क्षेत्र में भारत  सरकार की व्यवस्था होती है और  चीन की तरफ चीन सरकार की. 22  दिनों में तीन सौ किलोमीटर की यात्रा करनी होती है.काली गंगा के किनारे किनारे.हर यात्री को यात्रा के बाद प्रमाण पत्र दिया जाता है. जिस पर उसका चित्र भी होता है. कैलाश नाथ जी को आए अभी अधिक दिन नहीं हुए कि वे अगले साल फिर इस यात्रा पर जाने की योजना बना रहे है.बातें बहुत हैं,लेकिन बहुत सी ऐसी होती हैं जिनको बताने और  लिखने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं.वैसे भी श्रद्धा से जुडी बातों का ना तो कोई आदी होता है और ना अंत. शायद तभी तुलसीदास ने कहा था--हरि अनंत हरि कथा  अनंता,कहहु सुनहु बहु विधि सब संता. 

Saturday 14 June 2014

खुद के बच्चों की तारीफ करने में कंजूस हैं हम

श्रीगंगानगर- मित्र के नौवीं में पढने वाले बेटे से मिलने उसके साथी आए. मित्र ने उनसे पूछ लिया, मोनू में ऐसी क्या खास बात है जो तुम उसे घेरे रहते हो? उनका जवाब था, अंकल! ये हमें छोटी छोटी बात पर हंसाता रहता है. मित्र के चेहरे पर मुस्कान आ गई. परन्तु बेटे से कुछ नहीं कहा.एक दो दिन बाद उसने मोनू की तारीफ की. उसकी पीठ थपथपा के नहीं बल्कि लिख कर.किशोरवय अपने पुत्र की तारीफ पिता लिखकर करता है. उसकी बातों को सराहता है. उस पर गर्व होने की बात कहता है. अपने बेटे की प्रशंसा बहुत अच्छी बात है,लेकिन हैरानी इस बात की कि पिता को अपनी भावना लिख कर बतानी पड़ी. जबकि पुत्र कोई हॉस्टल में नहीं रहता. साथ रहता है. पिता भी कोई बड़ा बिजनेसमैन या अधिकारी नहीं कि वक्त ना निकाल पाते हों अपने बच्चों से बात करने के लिए.पढ़े लिखे ठीक ठाक परिवार की सच्ची बात है ये. अपने बच्चे की तारीफ उसी को करने में पता नहीं क्यों हिचक होती है! दूसरों के सामने खूब बड़ाई करेंगे,बच्चे को अपनी भावना से अवगत नहीं करवाएंगे.उससे नहीं कहेंगे,तुझ पर हमें गर्व है. तेरा आचरण हमें पसंद है. पढाई से संतुष्ट हैं. दूसरी गतिविधियां भी प्रशंसा के काबिल हैं. इसके विपरीत यही सब कुछ दूसरे के बच्चों में हो तो खूब तारीफ करेंगे उसकी. सबके सामने उसकी पीठ थपथपा शाबाशी देंगे. चाहे उसका खुद का बच्चा पास ही खड़ा हो. जिसकी तारीफ कर रहे हैं,पीठ थपथपा रहे हैं वह बच्चे का दोस्त ही क्यों ना हो. पास खड़ा वह यह सोचता भी होगा कि पापा ने इन सब गुणों के लिए मेरी तो कभी तारीफ नहीं की. मां ने मुझे तो कभी शाबाशी नहीं दी. हालांकि बच्चे की परवरिश में कोई परिवार वाला कमी नहीं छोड़ता. अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से बढ़िया से बढ़िया करता है. परन्तु प्रशंसा के मामले में सब के सब कंजूस और खड़ूस.हिम्मत ही नहीं कर पाते पैरेंट्स अपने बच्चे की तारीफ कर उसमें और अधिक आत्मविश्वास बढ़ाने की. इसे यूं भी कह सकते हैं कि उनकी हिचक नहीं खुलती ऐसा करने के लिए. इसके विपरीत पैरेंट्स दूसरों से अपने बच्चों की मौजूदगी में बच्चों के लिए ये कहते तो सुने जा सकते हैं कि इसने क्या करना है! सारा दिन तो टीवी देखता है. पढाई में क्या निहाल करेगा! उसका बच्चा देखो, कितना समझदार है! बच्चे की तरफ आंखें करके,एक ये है कि नालायक का नालायक ही रहा. ये वाक्य गुस्से और प्रेम में हर घर में सुने जा सकते हैं. बच्चे के लेट उठने पर चिक चिक. खुद के जूते साफ़ ना करने पर डांट. बाइक-साइकिल साफ़ न करने पर फटकार. होम वर्क करने के बाद किताबें,बैग वहीँ छोड़ देने पर कौनसे पैरेंट्स मुंह नहीं चढ़ाते होंगे. पैरेंट्स क्या इस मामले में तो बड़े भाई बहिन भी ऐसा ही करते हैं. घर घर में हर रोज यही होता है. तो क्या किसी भी बच्चे में ऐसी कोई खूबी होती ही नहीं जो उसे अपने पैरेंट्स,दादा-दादी और बड़े भाई बहिन की प्रशंसा का पात्र बना सके. होती है जी होती है! हर बच्चे में होती है. प्रत्येक बालक-बालिका में ऐसा जरूर होता है जो उसे बाकियों से अलग करता है. लेकिन पता नहीं यह खूबी पैरेंट्स को अपने बच्चे की बजाए दूसरों के बच्चों में क्यों नजर आती है! स्कूलों में पैरेंट्स मीटिंग के दौरान कितने ही पैरेंट्स 95 प्रतिशत से अधिक अंक लेने वाले अपने बच्चे को ये कहते सुने जा सकते हैं,देखा राहुल ले गया ना एक नंबर अधिक. मैंने कहा था,पढ़ ले,पढ़ ले. सुनी नहीं. हो गया ना पीछे. बच्चे में प्रतिस्पर्धा की भावना भरना बढ़िया बात है. उसे दुनिया की दुश्वारियों से लड़ने की शिक्षा देना भी बुरा नहीं. बस, इसके साथ-साथ पैरेंट्स बेटा-बेटी की तारीफ भी करने लगें तो सोने पर सुहागा. छोटी सी बात के साथ बात समाप्त करूंगा. किशोरवय बेटा नहाकर बाथरूम में पाटा उलटा कर देता.पैरेंट्स बच्चे को तो कुछ नहीं कहते,लेकिन आपस में चिक चिक करते. एक दिन पैरेंट्स का मूड ख़राब था. जैसा ही बेटा नहाकर निकला, उसे डांट दिया,ये क्या रोज रोज तू पाटा उलटा कर देता है. बेटे का जवाब था, आपके नहाने से पहले पाटा सूख जाए इसलिए पाटा उलटा करके आता हूं. पैरेंट्स बेटे की बात सुन निरुत्तर हो गए. है ना किशोरवय बेटे की ये खास बात. लेकिन तारीफ नहीं करेंगे. क्योंकि हमें आदत नहीं है,अपने ही बच्चे की तारीफ करने की.

Saturday 10 May 2014

जो सेवक बनने आया उसे शहंशाह बना दिया हमने

श्रीगंगानगर- चुनाव के समय   गली-गली,घर-घर घूम कर जन सेवा के लिए मौका मांग रहे नेता को हम  शहंशाह बना देते हैं.वोटों के लिए लोगों के दरबार में हाथ बांधे खड़े रहने वाले पंच,सरपंच,पार्षद,विधायक,सांसद बनते ही खुद का दरबार लगाना शुरू कर देते हैं.सेवक बनने के लिए आते हैं,शासक बन जाते हैं. ये कसूर उनका नहीं हमारा है. हम तो वोट देने के बाद भूल जाते हैंउनको. हम कभी उनको फोन नहीं करते. उनसे पूछते नहीं. किधर हो? कब आओगे? क्या करोगे? क्या योजना है? क्षेत्र के लिए सदन में क्या बोला? वो मजे से  दरबार लगाते हैं. हम उनको घर बैठे कोसते हैं. पहली बात तो ये कि पता ही नहीं लगता कि नेता कब आते हैं. आ भी जाएं  तो ये चंद लोगों के कब्जे में रहते हैं. कब्ज़ा ना भी हो तो जनता नहीं जाती इनके पास. किसी को दुकान से फुरसत नहीं किसी को नौकरी से. वोट दिया. काम ख़त्म. चूंकि वोटर कभी कुछ कहते नहीं,सवाल जवाब नहीं करते इसलिए नेता भी जनता की परवाह नहीं करते. मनमर्जी करते हैं. होना तो ये चाहिए कि जनता अपने पार्षद से लेकर सांसद तक के टच में रहे. इनको पता होना चाहिए कि जनता जाग रही है. वह हिसाब रखने लगी है उनका. विधायक हो या सांसद,इनसे इनके एक एक दिन का हिसाब मांगा जाए.किधर गए?क्या किया ?किस योजना  पर काम किया जा रहा है? कौनसी नई  योजना लाने की स्कीम है? विकास की क्या प्लानिंग है? कौनसा काम कब तक होगा? नहीं होगा तो क्यों नहीं होगा? एक एक बात पूछनी चाहिए. चैन से मत बैठने दो अपने विधायक और सांसद को. मतदाता कुछ कहते नहीं. बस इसलिए ये उनके बीच रहते नहीं. इनको मजबूर किया जाए जनता के बीच रहने के लिए. उनकी निजता को नुकसान पहुंचाए बिना पूरा हिसाब होना चाहिए उनका. बकरी मरे पर ना आए तो ना आए.अपने परिवार की शादी की शोभा भी बेशक मत बनाओ इनको. परन्तु क्षेत्र से दूर मत रहने दो. संपर्क करो,ताकि बता लगे कि वह बात करता है या नहीं. उसका व्यवहार कैसा है. बात नहीं करता तो उसकी उपेक्षा को सार्वजनिक करो. जन जन तक यह बात पहुंचाओ कि नेता को फोन किया था , उसने बात नहीं की. जब तक जनता  इन पर निगाह नहीं रखेगी, ये नहीं मिलेंगे. रवैया बदलना होगा जनता को अपना खुद का. उसके बाद नेता तो बदल ही जाएगा. मुर्दा रहने से कोई बात नहीं बनती. जिन्दा साबित करो अपन आप को. लाखों नहीं तो हजारों वोटर ही फोन करने लगें इनको तो इनका छिपना मुश्किल हो जाएगा. वरना तो वही होगा जो ये लोग चाहेंगे. बदलाव चाहिए तो एक सप्ताह में दो चार मिनट ही निकाल लो. इनको पुचकारने की बजाए इनको पुकारो. पुकार ना सुने तो लताड़ो. जनता इनकी कर्जदार   नहीं वे जनता के कर्जदार हैं. अपना दिया कर्ज पांच साल में वापिस लो. लेकिन इसके लिए कर्ज का तकादा करना होगा. बिना तकादा किये कोई कर्ज वापिस नहीं करता जी. वो जमाने गए जब लोग खुद कर्ज चुकाते थे. अब तो मांगने पर दे दें वही काफी है. असल में हमारी चुप्पी की वजह से विधायक,सांसद हमारे पालक हो गए.इसीलिए तो दरबार लगाते हैं. असल में होना तो ये चाहिए कि जनता दरबार लगाए.  उसमें विधायक,सांसद आए. जनता के सवालों के जवाब दें. परन्तु विडम्बना देखो कि सेवक कहलाने वाले दरबार लगाते हैं और  जनता अपनी फरियाद लेकर उनके पास जाती है. बस अब ये सिलसिला बंद होना चाहिए. सेवक को सेवक ही रखो. बंद कर दो उसे शहंशाह बनाने की परम्परा. एक बार कर के देख लो. ठीक लगे तो जारी रखना.  वरना बदल देना अगली बार.

Friday 2 May 2014

तलाक से ज्यादा दहेज़ प्रताड़ना कानून ने तोड़े परिवार



श्रीगंगानगर-दो घटनाओं से बात  शुरू करते हैं. पहली-किसी पुलिस ऑफिसर के पास लड़के का पिता परिचित के साथ फरियाद लेकर आया.उसने बताया कि उसकी पुत्र वधु घर में केवल तीन दिन रुकी.उसके बाद पति के साथ शहर चली गई,जहां दोनों नौकरी करते थे. एक दिन  वापिस आई. ससुराल वालों के खिलाफ मुक़दमा किया. वापिस लौट गई ,पति केपास नहीं, अपनी नौकरी पर. पिता ने कहा, इस मामले में आज तक किसी पुलिस अधिकारी ने उनकी नहीं सुनी. दुखी बेबस पिता वापिस लौट गया. दूसरी-लड़की  की शादी बैंक कर्मी से हुई. दस दिन के बाद ही विवाद.पंचायत हुई. लड़के वालों ने दे दिया जो देना था. मगर विवाद नक्की नहीं हुआ. लड़की ने पंचायतियों पर ही केस कर दिया. इसमें कोई शक नहीं कि  लड़की और उसका परिवार वाले ऐसा करके  सुखी नहीं होंगे. लेकिन लड़के और उनके परिवारों पर भी  क्या गुजर रही होगी, ये भी चिंता के साथ साथ चिंतन और मंथन करने की जरुरत है.ऐसी केवल दो घटना नहीं है. सैकड़ों परिवार इस प्रकार से प्रताड़ित हो रहे हैं. उनका जीना ना जीने  के बराबर हो चुका है.  कसूरवार लड़का. उसकी मां,बहिन,जेठ,जेठानी. लड़के की बहिन शादी शुदा है तो बहनोई भी. ऐसे विवादों में जितनी भी पंचायतें होती हैं,उन सब में लड़के के परिवार को दबाया जाता है.जिन घरों की लड़कियों के नाम थानों तक पहुँच गए,उनका जीना भी क्या जीना. थानों में शर्म,लिहाज,संवेदनशीलता,इज्जत,व्यवहार सब कुछ तार तार कर उसके स्थान पर प्रताड़ना दी जाती है. वह भी ऐसी कि जिसकी कल्पना मुश्किल है. ऐसी जैसी उन्होंने बहु को भी नहीं दी होगी. नारीवादी संगठन भी बहु के पक्ष में झंडा लेकर मैदान में आ जाते हैं. इन संगठनों की नारियों को ये दिखाई नहीं देता कि जिनके खिलाफ हल्ला बोला गया है वे भी नारियां ही हैं. एक नारी को कथित न्याय दिलाने के नाम पर अनगिनत नारियों के साथ अन्याय ही तो होता है. बस हर कोई लड़की के नाम पर लड़के वालों के पीछे लट्ठ लेकर पड़ जाता है. पंचायत भी और पुलिस प्रशासन भी. सब के सब लोगों को यही लगता है कि इस दुनिया में अगर कोई दरिंदे हैं तो लड़के वाले. नारीवादी संगठन,वकील,अदालतें,पंचायतों के ठेकेदार और ऐसे मामलों की जाँच  करने वाले अधिकारियों  को  झांक कर देखना चाहिए इन घरों में,ताकि उनको मालूम हो सके कि उनकी जिंदगी कैसे नरक बानी हुई है जिन पर बहु ने मुकदमे कर रखे हैं.  लोग कैसे तिल तिल कर मर रहे हैं. सामाजिक प्रतिष्ठा तो मिटटी हुई ही इसके साथ साथ कदम कदम जो प्रताड़ना झेलनी पड़ती है उसका तो जिक्र ही नहीं होता. ना जाने कितने लोग तो भुगत रहे हैं और ना जाने कितने ही खामोश हो बहु और उसके परिवार की प्रताड़ना सहने को मजबूर है. बोले तो बहु सबको अंदर करवा देगी. और कुछ ऐसा वैसा कदम उठा लिया तो समझो गए सब के सब अंदर. जितने घर तलाक ने बर्बाद नहीं किये होंगे उतने  अकेले दहेज़ प्रताड़ना  कानून ने कर दिए होंगे.  ससुराल हो या पीहर महिला  की स्वाभाविक,अस्वाभाविक मौत दहेज़ हत्या के खाते में चली जाती है. उसके बाद लड़के वाले तो समझो ख़त्म. उनके समर्थन में कोई नहीं आता. समाज खामोश. कानूनविद बेबस. कानून बनाने वालों को ये सब देखने की जरुरत ही नहीं. वे तो समर्थ हैं. समर्थ को कोई दोष होता नहीं. इस कानून से पहले  महिलाओं की सुरक्षा,इज्जत,ससुराल में मान सम्मान नहीं होता था क्या ! इस कानून से  महिलाओं की कितनी सुरक्षा हुई. उनको समाज में कितना ऊँचा स्थान मिला ,पता नहीं लेकिन ये जरूर है कि घर घर की महिलाएं और पुरुष आतंकित जरूर हो गए इस कानून से. पता नहीं कब ऐसा होगा जब समाज और  कानून बनाने वाले लोग इस बारे में चिंतन कर बरबाद होते घरों को बचने के लिए कुछ सार्थक पहल करेंगे.लड़के वालों को बेखौफ इज्जत से जीने का हक़ देंगे.सच में किसी ससुराल में लड़की को प्रताड़ित किया गया है उसको तू सजा मिलनी ही चाहिए. उनमें से एक भी नहीं बचे. लड़की की ससुराल में नहीं बनी.किसी भी वजह से अड्जस्ट नहीं हो पाई. तो पूरे ससुराल को थाने में ला उनकी और अपने परिवार की मिटटी करने से तो बेहतर है आपस में बैठकर फैसला करना.अंत में होता तो यही फैसला ही है. जब यही फैसला होना है तो फिर  पहले ही क्यों ना कर लिया जाए. लड़की वाले भी सुखी और लड़के वाले भी.दो लाइन पढ़ो--तेरी याद से इश्क का कोई रिश्ता नहीं है, याद तो गैरों की भी आया करती है .

मोहब्बत तो कभी मरने की बात नहीं करती


मोहब्बत तो कभी मरने की बात नहीं करती 
श्रीगंगानगर-किस्सा फेसबुक से. ढाई दशक बाद एक व्यक्ति को महिला का सन्देश मिला, आई लव यू.व्यक्ति हैरान ! महिला ने बताया कि वो तो उससे तभी से मोहब्बत करती है जब शादी नहीं हुई थी. बन्दे को क्या पता. न कभी मिले . ना कभी जिक्र ही आया. फिर अब अचानक,ढाई दशक बाद, जब दोनों के बच्चों तक की शादी हो चुकी है.इक तरफ़ा मोहब्बत चलती रही,पलती रही.है ना मोहब्बत का अनूठा अंदाज. दूसरा,. दोनों की कास्ट अलग. मोहब्बत बे हिसाब. परिवार राजी नहीं. कोशिश की.शादी नहीं हो सकी. अलग अलग हो गए. तीस सालों में एक दो बार जब कभी मिले वैसी ही आत्मीयता वही मोहब्बत. तीसरा, लड़का सवर्ण ,लड़की दूसरी कास्ट की. संयोग ऐसा हुआ कि दोनों परिवारों को शादी करनी पड़ी. लड़की ने अपने आप को उस परिवार में ऐसा ढाला कि क्या कहने. किसी को कोई शिकवा शिकायत नहीं. चौथा,लड़का अपने इधर का. लड़की साउथ की. लड़का शानदार पोस्ट पर. परिवार उस लड़की से शादी करने को राजी नहीं. लेकिन लड़का-लड़की ने शादी कर ली. धीरे धीरे परिवार वालों ने भी उसे बहु के रूप में स्वीकार कर लिया. बहु जब भी पति के साथ छुट्टियों में  इधर आती है ,वह अपने संस्कार,काम और बोल चाल से ससुराल वालों का दिल जीतने की कोशिश करती है. ये किस्से कहानी नहीं हकीकत हैं.सब के सब जिन्दा और खुश हैं अपने अपने घर. परन्तु आजकल का तो प्रेम हो ही बड़ा अनोखा गया. इसमें मरने मारने की बात  पता नहीं कहां से आ गई. आजकल कभी प्रेमी-प्रेमिका के एक साथ मरने की घटना होती है तो कभी प्रेमी द्वारा प्रेमिका को मार देनी की. बड़ा अजीब है उनका प्रेम! साथ मरने का ये मतलब नहीं कि वे मरने के बाद साथ रहेंगे. ये फ़िल्मी डायलॉग है कि नीचे मरेंगे तो ऊपर मिलेंगे. दुनिया ने हमें इधर नहीं मिलने दिया,मरकर उधर मिलेंगे,आदि आदि.इस धरती पर मिलन उसी का होता है जो जिन्दा है. मरने के बाद की तथाकथित दुनिया किसने देखी. जो दुनिया देखी नहीं उसमें मिलने के लिए उस दुनिया से चले जाना जिधर मिलने की संभावना रहती है, कौनसी मोहब्बत हुई. ये तो मोहब्बत नहीं कोई आकर्षण था. मोहब्बत में सराबोर नहीं थे,शारीरिक आकर्षण में डूबे थे. जिन्दा रहोगे तो मिलने की आस रहेगी.मरने के बाद तो कुछ भी इन्हीं. मरने वाले बता नहीं सकते कि लो देखो, हम मर कर  मिल गए और सुखी हैं. भावुकता के अतिरेक में मर तो गए लेकिन उसके बाद!  तुम तो मर गए लेकिन परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा तो मिट्टी कर गए.तुम तो अपने ख्याल में मर कर मिल गए ,मगर परिवार को तो किसी से मिलने-मिलाने लायक नहीं छोड़ा. उन मां-बाप का क्या जो जिन्दा  लाश बन गए.घरमें रहो तो  की दीवारें खाने को आती हैं और बाहर लोगों की बातें तीर की तरह बींधती हैं. तुम तो चले गए,लेकिन बाकी भाई बहिन के रिश्तों पर ग्रहण लग जाता है. रिश्ते तो होंगे  लेकिन उनमें  समझौता अधिक होता होगा. जिसके किसी भाई-बहिन ने इस प्रकार मोहब्बत में जान दी हो,उनसे रिश्ते जोड़ने वाले मुश्किल से ही मिलते हैं. इसके लिए कसूरवार कौन है,ईश्वर जाने. लेकिन ये बड़ी अजीब बात है कि दशकों पहले जब इतना खुलापन नहीं था तब तो लोग मोहब्बत में जीने की बात करते थे. अब जब इण्टर कास्ट शादी आम होने लगी है. तब लड़का-लड़की का मरना हैरानी पैदा करता है. मोहब्बत तो जिंदगी में आनंद भरती है.लोग निराश,हताश,उदास होकर मरने क्यों लगे. ऊपर के किस्सों में दो रस्ते हैं.पहला , परिवार की इच्छा को मान देकर रस्ते बदल लो.मोहब्बत में त्याग को महत्व दो. दूसरा, अपनी परिवार की इच्छा को नजर अंदाज कर अपनी मर्जी करो. होता है जो हो जाने दो. समय की राह देखो, जो सब कुछ ठीक कर देता है. मरने की बात तो मोहब्बत में होनी ही नहीं चाहिए. शायद  पहले मोहब्बत बाजरे की खिचड़ी की तरह होती थी जो धीमी आंच पर धीरे धीरे सीज कर स्वादिष्ट बनती थी. अब तो  मोहब्बत दो मिनट की मैगी स्टाइल हो गई है.बनाओ,खाओ और भूल जाओ. दो लाइन पढ़ो--जीने की नहीं मरने की बात करता है हर वक्त, बड़ा कमजोर हो गया है ये नए दौर का इश्क .

Wednesday 2 April 2014

पुरुषों को भी मिले महिला सशक्तिकरण का ईनाम

श्रीगंगानगर-"जहां नारी की पूजा होती है,वहीं देवता विराजते हैं." ऐसे वाक्य सदियों से  संसार में कहे,पढ़े  और सुने जाते हैं.हिंदुस्तान में तो धन,बुद्धि और शक्ति की मालिक ही देवियां हैं. श्रीराम से पहले सीता और श्रीकृष्ण से पहले राधा रानी का नाम लिया जाता है. शायद इसलिए ये कहा जाने लगा होगा कि सफल पुरुष के पीछे नारी होती है. मतलब,नारी सृष्टि का मूल आधार है. पुरुष जो कुछ है वह नारी के कारण ही है. हम भी क्यों इंकार करने  लगे. सत्य वचन हैं  सबके सब. शास्त्रों में लिखे ब्रह्म वाक्य हैं. परन्तु ये सब लिखने और साबित करने वालों को क्या पता था कि कलयुग  में कभी श्रीगंगानगर नामक एक शहर होगा. जहां ऐसे अनेक व्यक्ति और  संगठन इन वाक्यों को चुनौती देंगे. इनको अर्द्ध सत्य साबित करेंगे. नो! कोई टेंशन नहीं . कोई झगड़ा टंटा नहीं. किसी प्रकार की प्रतियोगिता भी नहीं. यह सब तो पुरुषों द्वारा महिलाओं को सशक्त करने के लिए किये जा  रहे उनके प्रयास  हैं. महिलाओं को समाज,देश में आगे और आगे बढ़ाने के लिए उनकी लगन और मेहनत  हैं. शहर में  नजर दौड़ाने पर अनेक ऐसे संगठन और महापुरुष दिखाई देंगे जो महिलाओं को भारत के नक़्शे पर स्थापित करने के लिए जी तोड़ प्रयास कर रहे हैं. ऐसे प्रेरणा पुरुष महिलाओं के संगठन बनाते हैं. उनको चलाते हैं. उनके एक से एक प्रोग्राम करवाते हैं. शहर से लेकर प्रदेश स्तर तक उनको सम्मानित करवाते हैं. कोई ऐसा तीज त्यौहार नहीं जब ऐसे प्रकाश पूंज महिलाओं को आगे ना रखते हों. कई बार तो ऐसा लगता है कि प्रशासन,सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए जो कुछ भी करती है वह इन महापुरुषों की तुलना में कुछ भी नहीं. सरकार को तो वोट लेने होते हैं. ये महापुरुष निस्वार्थ भाव से ये सब करते हैं.इनके काम को देख हमारा तो ये मानना है कि सरकार महिला सशक्तिकरण के नाम पर महिलाओं को गलत पुरस्कृत करती है. महिला सशक्तिकरण के लिए सम्मान,ईनाम तो उन देवतुल्य पुरुषों को मिलना चाहिए जो नारियों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं. ऐसे इंसान  तो पदम सम्मान लेने के हक़दार हैं जो महिलाओं को सशक्त कर यह  साबित करने में लगे हैं कि पुरुषों की सफलता के पीछे नारी होने की बात अब गुजरे जमाने की कथा  हो गई है. अब तो  सफल नारियों के पीछे पुरुष होते हैं. सरकार को इन संगठनों और पुरुषों के काम को गम्भीरता से लेना चाहिए. ताकि दूसरे शहरों के पुरुषों को भी इन से प्रेरणा मिल सके. अपने घर की नारियों के लिए तो सभी करते हैं,दूसरों का उत्थान और सशक्तिकरण करने वाले तो विरले ही होते हैं. ऐसे व्यक्तियों का सम्मान तो होना ही चाहिए. क्योंकि ऐसे ही पुरुषों के सद्प्रयासों की बदौलत भविष्य  के तुलसी दास नारी को ताड़ना का अधिकारी लिखने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे. 

Monday 24 March 2014

मेरे मन को जानने वाले
गुम  हो गए दो नैन,
कौन सुनेगा किसको सुनाऊँ
कैसे मिले अब चैन.
[कचरा]

Thursday 27 February 2014

खुशियां छोटी हो गई और पैकेज बहुत बड़े बड़े



श्रीगंगानगर-पहला  सीन-सुबह सुबह एक परिचित मिल गए। बाइक  पर आगे लगभग डेढ़ साल का क्यूट  बेबी था। साथ में  उसके पहनने,खाने,पीने और खेलने के सामान का बैग। दुआ सलाम के बाद बोला,बच्चे को क्रैच छोड़ने जा रहा हूं । बीवी नौकरी पर जाएगी। मुझे भी जाना है। क्या करें! अकेले से आजकल घर ही चल सकता है और कुछ नहीं। बीवी  ड्यूटी से आएगी तो इसे लेती  आएगी। दूसरा सीन-बड़े पैलेस में  बड़ों की शादी का बड़ा समारोह। पीठ की साइड में दो व्यक्ति बात कर रहे थे। एक, मेरा बेटा फलां कंपनी में है और इतने लाख का पैकेज ले रहा है। दूसरे ने अपने बेटे की कंपनी और पैकेज बताया। दोनों खुश। कुछ क्षण यही पैकेज की बात करते रहे। फिर उनकी आवाज में दर्द आने लगा। दोनों में से कोई कहा रहा था,बेटे को बिलकुल भी समय नहीं मिलता। छुट्टी के दिन भी फुरसत नहीं। ऑफिस जाने का समय तो है लेकिन आने का नहीं। दूसरे ने उसकी हां में हां मिलाई। कुछ क्षण पहले जो पैकेज की बात कर खुश हो रहे थे वे अचानक गंभीर हो गए। जबकि ना तो उनके बच्चों के पैकेज कम हुए थे और ना ही ऐसी कोई उम्मीद थी। लेकिन मन की पीड़ा कब तक रोकी जाती। जब एक ही किश्ती में सवार थे तो बात होनी ही थी, पैकेज की भी जिंदगी की भी। ये बेशक दो सीन हों लेकिन ऐसे दृश्यों की कोई कमी  नहीं है इस शहर में। बच्चे की तरक्की की खुशी अपनी जगह और उसकी जुदाई की पीड़ा अपनी जगह। दोनों को मन में आने से कोई नहीं रोक सकता। जिस स्टेज पर ऐसे बच्चे पहुँच गए वे इस शहर से तो गए ही साथ साथ गए अपने घर –परिवार,रिश्तेदारों और परिचितों से। क्योंकि उनके लिए इधर कोई स्टेटस नहीं है। उनके लायक कोई काम नहीं। कोई कंपनी नहीं जो उनको लाखों के पैकेज दे सके। जब इनका आना इधर होगा ही नहीं तो कौन रिश्तेदार,मित्र इनको याद रखेगा। धीरे धीरे सामाजिक रिश्ते भी समाप्त होने ही हैं। ऐसे पैकेज वाले बच्चों को छुट्टी मिलेगी तभी तो ये अपने दादा,नाना,दोस्त के परिवार में होने वाले विभिन्न समारोह में आ सकेंगे। आएंगे तभी तो रिश्ते और समाजिकता का नवीनीकरण होगा। वरना कौन उनको जानेगा और कौन पहचानेगा। लेता होगा किसी का बच्चा लाखों का पैकेज ! किसी को इससे क्या ! माता-पिता के पास पैसा तो लाखों करोड़ों में आ गया,मगर वह उनकी आंखों  से दूर हो  गया जिसकी खुशी और आनंद के लिए उन्होने दिन रात एक की। ये अपने घर,समाज,गली,मोहल्ले को छोड़ कर जा नहीं सकते। इनमें इनकी रूह बसती है।इनके संबंध इधर हैं। भाई चारा है। बच्चे इधर आ नहीं सकते। बुढ़ापे को अकेला,खामोश होना ही है। जब बच्चों को हमारी जरूरत थी तब हमने उनको अलग कर दिया । जब हमें उनकी आवश्यकता होगी  तो वे आ नहीं सकेंगे। जब सबसे अधिक बच्चों की जरूरत होती है तब अकेलापन! वह भी सब कुछ होते हुए। यही विडम्बना है इस पैकेज की। दो लाइन पढ़ो—मेरी तन्हाई  को वो यूं तोड़ गया, मेरे पास अपने रिश्ते के निशां  छोड़ गया। 

Friday 14 February 2014

प्यार को मैगी मत बनाओ

प्यार को मैगी मत बनाओ
श्रीगंगानगर। प्यार, प्रीत, स्नेह, मोहब्बत दो मिनट में तैयार होने वाली मैगी नहीं है। यह तो वो बाजरे की खिचड़ी है जो धीमी-धीमी आंच पर सीजती है तभी खाने वाले और बनाने वाले को तृप्ति होती है। भूख बेशक मिट जाए लेकिन चाह नहीं मिटती। इस निगोड़े वेलेंटाइन डे ने सात्विक ,गरिमापूर्ण और मर्यादित प्रेम को मात्र जवां होते या हो चुके लड़का-लड़की के प्रेम में बांध दिया। इस अज्ञानी वेलेंटाइन डे को इनके अलावा और कोई दूसरा प्यार ना तो दिखाई देता है और ना उसमें इस प्यार को महसूस करने की क्षमता है। केवल लड़का -लड़की के मैगी स्टाइल प्यार को ही प्यार समझने वाले या तो ये जानते ही नहीं कि प्यार इससे भी बहुत आगे है या फिर उन्होंने यह जानने की कोशिश ही नहीं की प्यार तो इतना आगे है कि इसके अन्दर डूब जाने वाले व्यक्ति के लिए दुनिया अलौकिक हो जाती है। अलबेली बन जाती है। प्रीत से सराबोर व्यक्ति सहजता और सरलता की ओर बढ़ता है। घुंघरू होते तो उसके पांव में हैं और नृत्य उसका मन करता रहता है, हर क्षण। उसकी आखों में मस्ती दिखाई देती है। सबको अपने प्रेम में समाहित कर देने की चाहत नजर आती है। उसकी आंख को हर कोई अपना दिखाई देता है। जुबां पर मिठास और गुनगुनाहट रहती है। झूमता रहता है, गाता रहता है। कोई साथ है तब भी कोई फ्रिक नहीं नहीं है तब भी कोई चिन्ता नहीं। हर वक्त प्रेम के सुरूर में वह मदमस्त रहता है। लेकिन कितने अफसोस की बात है कि वेलेंटाइन डे ने प्यार को बाजार बना दिया। जो मन के अन्दर, आत्मा में, आखों में छिपाने की अधिक है दिखाने की कम, उसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने को मजबूर कर दिया। यह मोहब्बत नहीं बाजारूपन है। यह प्रीत नहीं, प्रीत का कारोबार है। स्नेह नहीं, स्नेह के रूपमें उपहारों की अदला-बदली है। इनको सुदामा की भक्ति में कृष्ण के लिए छिपा दोस्ती का प्यार दिखाई नहीं दे सकता। इनको यह भी याद नहीं होगा कि कभी किसी करमावती ने एक मुसलमान शासक को राखी भेजी और उस शासक ने भाई-बहिन के प्यार की एक नई परिभाषा लिखी। श्रवण कुमार का अपने माता-पिता के प्रति प्यार किसी वेलेंटाइन डे का मोहताज नहीं है। मां-बाप के बीमार होने की खबर सुन ससुराल से दौड़ी चली आने वाली लड़कियां वेलेंटाइन डे के किस्से पढ़कर बड़ी नहीं हुई थी। कृष्ण और राधा के प्रेम के समय तो इस कारोबारी वेलेंटाइन डे का अता-पता नहीं था। रावण ने कौनसा वेलेंटाइन डे पाठ पढ़ा था जो उसने अपनी बहिन सरूपनखा के लिए अपना सर्वस्य निछावर कर दिया। उर्मिला का लक्ष्मण के प्रति प्यार वेलेंटाइन डे पर निर्भर नहीं था। ये चंद उदाहरण वो हैं, जिन्होंने प्यार के रूप में रिश्तों के नए आयाम दिए। बहिन का भाई के प्रति प्यार और बाप का बेटी के प्रति प्यार बहुत बड़ा होता है। समाज में कौनसा ऐसा रिश्ता है जो प्यार के बिना एक क्षण के लिए भी कायम रह सके । परन्तु हमने कारोबार के लालच में प्यार, मोहब्बत, प्रीत, इश्क जैसे शब्दों को बहुत छोटा बना दिया जबकि ये समन्दर से भी अधिक विशाल है। इसकी गहराई भी समन्दर की तरह नापी नहीं जा सकती थी। बस, महसूस की जा सकती है और महसूस वही कर सकता है जिस के दिल में प्यार, प्रीत, स्नेह और मोहब्बत बसी हो।