Wednesday 28 August 2013

सुदामा होने का वर दे

कृष्णा
इतना काम कर दे,
मुझे
सुदामा होने का वर दे।
बन के
फिर से बहुत ही दीन,
हो जाऊँ
तेरी ही भक्ति में लीन।
सुदामा
पैदल तेरे पास आए,
और तू
मुझे फिर गले लगाए।
गले लग
सुदामा परम सुख पाए
द्वारिकाधीश
कलयुग में मित्र धर्म निभाए।
बस  और                                     
तू इतना सा करना
मुझको

खुद से दूर ना करना 

Tuesday 13 August 2013

अपनी दुनिया में किसी और के लिए जगह नहीं

श्रीगंगानगर-इंटरनेट ने दुनिया को बहुत छोटा कर दिया। एक डिब्बे में समेट दिया। सब कुछ कितना पास है हमारे। जिस से चाहो बात करो। जो चाहे प्रश्न पूछो। आपके प्रश्न समाप्त हो जाएंगे,यहा बताना बंद  नहीं करेगा। बेशक दुनिया के नजदीक आए हैं हम सब। लेकिन पड़ौसी से कितने दूर हो गए यह किसी ने नहीं सोचा। जिसका रिश्तों में सबसे अधिक महत्व था। जो सबसे निकट था।  वह बहुत दूर हो गया और हमें  पता भी नहीं चला। दुनिया के बड़े से बड़े व्यक्ति के फोन नंबर हमारे मोबाइल फोन  में होंगे।परंतु पड़ौसी के शायद ही हों। वो भी जमाना था जब पड़ौसी से एक कटोरी चीनी,एक चम्मच चाय पत्ती मांगना सामान्य बात थी। सब्जी का आदान प्रदान तो बड़ी आत्मीयता से होता था। जा मोनु सरसों का साग रश्मि की माँ को दे आ उसे बड़ा चाव है  सरसों के साग का। उधर से भी ऐसे ही भाव थे। कोई तड़के वाली दाल दे जाता तो कोई बाजरे की रोटी ले जाता। पड़ौसी भी रिश्ते की अनदेखी डोर से बंधे होते। चाची,मामी,ताई,दादी,नानी,भाभी,बुआ कौनसा रिश्ता था जो नहीं होता। अपने आप बन जाते ये रिश्ते। सात्विक प्रेम,अपनेपन से निभाए भी जाते थे ये रिश्ते। घर की बहिन,बेटी,बहू छत पर कपड़े सुखाने के समय ही पड़ौस की बहिन,बेटी,बहू खूब बात करतीं। बड़ी,पापड़,सेंवी बनाने के लिए बुला लेते एक दूसरे को। छत से ही एक दूसरे के आना जाना हो जाता। अब तो दो घरों के बीच दीवारें इतनी ऊंची हो गई कि दूसरे की छत पर क्या हो रहा है पता ही नहीं लगता। ऊंची एड़ी करके कोई देखने की कोशिश भी करे तो हँगामा तय है। ये कोई अधिक पुरानी बात नहीं जब घरों के बाहर चार दीवारी का रिवाज नहीं था। किसी भी स्थान पर एक खाट बिछी होती और फुरसत में मोहल्ले की औरतें की महफिल शुरू हो जाती। सर्दी में एक घर की धूप सबकी धूप थी। सूरज के छिपने तक जमघट। अब तो सबकी अपनी अपनी धूप छांव हो चुकी है। ना तो कोई किसी के जाता है नो कोई पसंद करे कि कोई आकर प्राइवेसी भंग करे। अब तो घर घर में सबके अलग अलग कमरे हैं। काम किया,चल कमरे में। सभी के  अपने नाटक टीवी पर।  सब के सब सिमटे हैं अपने आप में। समय ही नहीं है एक साथ बैठने का। बात करने का। चर्चा कर चेहरे पर मुस्कुराहट लाने का। मुखड़ा बताता है कई  झंझट है दिमाग में। तनाव है दिल में। परंतु रिश्ते तो रह गए केवल नाम के इसलिए दिल की बात कहें किस से और किस जुबान से। सच में नए जमाने ने दुनिया छोटी कर दी लेकिन उस दुनिया में इंसान दिनों दिन अकेला होता जा रहा है। इस दुनिया में खुद के अलावा किसी और के लिए ना तो कोई स्थान है और ना अपनापन। कितनी दूर आ गए हम अपने आप से।

Wednesday 7 August 2013

नेताओं की सुरक्षा हटा लेनी चाहिए सुरक्षा बलों को

श्रीगंगानगर-कोई भूमिका नहीं,बस आज सीधे सीधे यही कहना है कि जिन नेताओं के हाथ में देश सुरक्षित नहीं है,देश की रक्षा करने वाले जवान सुरक्षित नहीं है उनको सुरक्षा देने का कोई औचित्य नहीं। उनकी सुरक्षा क्यों करें सुरक्षा बल। उन्हे सुरक्षा किस लिए! इसलिए ताकि सुरक्षा बालों का हौसला गिरे या फिर इसलिए ताकि उनके राज में दुश्मन देश जब जो चाहे हरकत कर मेरे महान भारत और भारतियों की खिल्ली उड़ाता रहे! उनकी सुरक्षा में डटे सभी जवानों,अधिकारियों को हट जाना चाहिए। खुला छोड़ देना चाहिए ऐसे नेताओं को ताकि जनता उनको पत्थरों से नहीं तो अपनी तीखी नजरों से मार दे। इस देश का भाग्य देखो कि सुरक्षा बल उन नेताओं की सुरक्षा कर रहें हैं जिनको भारत की आन,बान,शान की कोई चिंता नहीं। सुरक्षा बल उनकी चौकसी करने को मजबूर हैं जो ना तो सीमाओं की रक्षा कर पा रहें हैं और ना सीमाओं की रक्षा करने वालों की। जब ये नेता किसी काम के नहीं तो फिर इनको सुरक्षा किस बात की! कूड़े कचरे की सुरक्षा करने की जरूरत ही क्या है! पाक जब चाहे हमारी सीमा में आकर जवानों को मार देता है। उनके सिर काट कर साथ ले  जाता है। और हमारे भांत भांत के नेता  अपने  सिरों पर सत्ता का ताज लिए बस खाली शब्द बाण छोड़ देते हैं। ये शब्द बाण पाक का तो कुछ नहीं बिगाड़ते हाँ अपने देश की जनता की छाती भेद कर दिल में उतर जाते हैं। वह रोती है...चीखती है....आक्रोशित होती है.....परंतु नेता राजनीति का खेल खेलते रहते हैं। सत्ता पाने या आई हुई सत्ता को बचाने के जुगाड़ के अतिरिक्त कुछ नहीं करते ये नेता । कैसी लाचारी है इस देश की। कैसी बेबस है इस देश की जनता। आज पूरा देश गुस्से में है....बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक की आँखों में एक ही सवाल कि ये हो क्या रहा है! कब तक,आखिर कब तक पाक इस प्रकार से हमारे सैनिकों को मार हमारे गौरव को  ललकारता रहेगा! देश का हर नागरिक जानता है कि आर्थिक,सामाजिक,धार्मिक,राजनीतिक,कूटनीतिक मोर्चे पर सब कुछ तहस नहस हो चुका है। इसके बावजूद ये नेता अपनी सत्ता लोभी हरकतों से बाज नहीं आते। ये ठीक है कि जवाबी कार्यवाही करने से पहले कूटनीति,राजनीति,विदेश नीति के बारे में बहुत कुछ देखना और सोचना पड़ता है। लेकिन इसका ये अर्थ तो नहीं कि कोई आपके देश पर हमला करे.....एक बार ...दो बार...बार बार.....इसके बावजूद आप कोई जवाब ना दें। केवल इन नीतियों के भरोसे तो देश की सुरक्षा नहीं हो सकती। इनके कारण देश को दुश्मनों के हाथ तो नहीं सौंपा जा सकता। अगर इन नीतियों में घुटने टेकना लिखा है इनको बदल दिया जाना चाहिए। जब तक देश को भरोसा नहीं हो जाता कि ये नेता कुछ करेंगे तब तक इनको राम भरोसे छोड़ देना चाहिए। 

ये कांग्रेस भी मस्त पार्टी है एक जवान की तरह



श्रीगंगानगर-सालों पहले हिन्दी की रीडर डाइजेस्ट पुस्तक में एक किस्सा पढ़ा। पहले वो,उसकेबाद असल बात। सेना का जनरल बार्डर पर गया। एक जवान से उसकी बात हुई। जनरल ने पूछा,ये पूर्व में मोर्चा क्यों? सर,सूबेदार के आदेश पर,जवान ने बताया। पश्चिम में मोर्चा किसलिए,जनरल का प्रश्न था। मेजर के निर्देश पर,जवान का जवाब था। फिर ये उत्तर में किस वजह से,जनरल ने सवाल किया। जवान ने उत्तर दिया
सर,कर्नल का हुकम था। अरे तो ये दक्षिण  में क्यों बना रखा है मोर्चा? जनरल ने झुंझला कर पूछा। जवान ने बताया सर,बड़े साहब ने कहा था। जनरल को गुस्सा आया,बोले जब हमला करने की जरूरत होगी तो कौनसा मोर्चा काम में लोगे? इनमें से कोई नहीं। मौके की नजाकत के हिसाब से हमला होता है। वही  मैं करूंगा,जवान ने शांत मन से उत्तर दिया। तो जनाब,आप इस जवान को कांग्रेस हाई कमान समझ सकते हैं और जनरल को कांग्रेस कार्यकर्ता या वह आदमी जिसकी राजनीति में रुचि है। विभिन्न दिशाओं के जो  मोर्चे हैं उनको कांग्रेस की ब्लॉक कमेटी,जिला कमेटी,प्रदेश कमेटी और चुनाव कमेटी मान लो तो ठीक रहेगा। कांग्रेस हाई कमान उस जवान की तरह किसी को नाराज नहीं करता। सबको मान देता है। इसलिए छोटी बड़ी सभी कमेटी ले रहीं हैं टिकट के  आवेदन। देने वाला भी खुश और लेने वाला भी। इतनी कमेटियाँ इतने दावेदार लेते रहो आवेदन। एकत्रित करते रहो हर बंदे का बायोडाटा। बनाते रहो पैनल- शैनल। ये पैनल-शैनल तैयार करने वाले भी जानते हैं कि उनकी सिफ़ारिश कितना दम रखती है। आवेदन करने वाला भी इस सच्चाई को पहचानता है कि टिकट के मामले में इन पैनलों की कितनी अहमियत है। मगर सब के सब शामिल हैं टिकट वितरण के इस पारदर्शी नाटक में। सब शानदार अभिनय भी कर रहे हैं। ताकि किसी को कोई शक ना हो....जन जन का विश्वास बना रहे। कार्यकर्ता को लगे कि टिकट यहीं से तय होगा। चलो मोर्चे पर चलें....अगर जवान उन मोर्चे के हिसाब से युद्ध के दौरान जवाबी हमला करेगा तो वह कनफ्यूज हो जाएगा....किस को काम में ले किस को ना ले। इसलिए वह खुद निर्णय लेता है। यही कांग्रेस हाई कमान करता है। सबसे पैनल लेता है। लाओ भई, तुम भी लाओ और तुम भी बनाओ। सुनो सबकी करो मन की। किसकी हिम्मत है जो पूछ सके के हमारे पैनल पर क्या चर्चा हुई? कौन सवाल जवाब करेगा हाईकमान से कि हमारे पैनल से क्या निष्कर्ष निकला? कुछ  भी नहीं। अलग अलग कमेटी के पैनल जाएंगे तो स्वाभाविक है नाम भी अलग अलग होंगे। एक तो हो नहीं सकता....क्योंकि सबके अपने अपने उम्मीदवार हैं और सबके अलग अलग गुट। एक नाम  जाए तो फिर हाईकमान को इतनी मगज़मारी करने की जरूरत ही ना पड़े।  उसकी मजबूरी है उस जवान की तरह जो कई मोर्चे तैयार करता है। और युद्ध के समय जैसे  जवान खुद फैसला करता है ऐसे ही कांग्रेस हाईकमान वक्त पर फैसला लेता है कि टिकट किसको देनी है। मोर्चे,मारचे,पैनल -शैनल पता ही नहीं लगते किधर गए। यही होता आया है। अब भी यही होगा। राजनीति और युद्ध में सब जायज है।

Friday 2 August 2013

एसपी-कलक्टर हमारे सामने ठुमके लगाएंगे.......

श्रीगंगानगर-एक समय ऐसा आएगा जब टंकी पर चढ़े लोग कहेंगे कलक्टर-एसपी हमारे सामने ठुमके लगाएं तब हम नीचे उतरेंगे।यह बात बहुत ही सजह अंदाज में कल रात राजवंश गार्डन में एसपी संतोष चालके ने कही। अवसर था राजकीय सेवा से रिटायर हुए श्रीराम चौरडिया के विदाई समारोह का। एसपी संतोष चालके श्री चौरडिया के साथ अनौचारिक क्षणों में हुई बातचीत के अपने अनुभव साझा कर रहे थे....वे कहने लगे, चौरडिया जी लोगों के टंकी पर चढ़ने की बात पर कई बार मज़ाक में मुझसे कहते...एक दिन ऐसा आएगा एसपी साहब! जब टंकी पर चढ़े लोग ये कहेंगे कि हम तो तब नीचे आएंगे जब एसपी और कलक्टर यहां आकर ठुमके लगाएंगे। लेकिन अब ये तो जा रहे हैं। मैं अकेला क्या करूंगा। श्री चालके ने कहा कि युवा अधिकारियों को श्रीराम चौरडिया जैसे अधिकारियों से बहुत कुछ सीखना चाहिए। एसपी ने अपने स्टाइल में मुस्कराते हुए कई अनुभव बताए।  जिससे माहौल में मुस्कान बिखरती रही। श्री चौरडिया की जी भर के तारीफ करते हुए कहा कि वे फुर्सत के क्षणों में  बहुत ही ज़िंदादिल व्यक्ति हैं। श्रीराम चौरडिया ने अपने सम्बोधन में संतोष चालके को अपना छोटा भाई बताया। वे बोले,मैंने हमेशा इनको एसपी नहीं छोटा भाई समझ के बात की। उनका कहना था कि कई काम और करने थे जो नहीं कर पाया उसका अफसोस है।विधायक राधेश्याम गंगानगर,बीसूका के उपाध्यक्ष राजकुमार गौड़,सभापति जगदीश जांदू, चेयरमेन ज्योति कांडा,विधायकसंतोष सहारण,शंकर पन्नू,सीता राम मौर्य सहित कई राजनीतिक व्यक्तियों ने इशारों इशारों में श्री चौरडिया को कुर्ता पायजामा सिला लेने की सलाह दी। उनके अलावा कई और ने भी श्रीराम चौरडिया को राजनीति में आने को कहा। किसी ने तो हल्के फुल्के अंदाज में श्री चौरडिया को टिकट के लिए आवेदन करने की राय भी दे दी। जगदीश जांदू और संतोष सहारण ने तो साफ शब्दों में श्री चौरडिया को कांग्रेस पार्टी में आने का निमंत्रण देते हुए कहा, पार्टी में आयें आपका स्वागत है। श्रीराम चौरडिया के एक तरफ राधेश्याम गंगानगर और दूसरी तरफ संतोष सहारण थे। तीनों लगातार बात करके हँसते रहे। कार्यक्रम में जिले भर के अधिकारी मौजूद थे। कार्यक्रम में शामिल कर्मचारियों,अधिकारियों का कहना था कि ऐसा आनंद दायक,खुशनुमा  माहौल बहुत सालों के बाद देखने को मिला। [समारोह में शामिल व्यक्तियों से हुई बातचीत के आधार पर]