Monday 31 August 2015

नहीं तो फिर तीन पूली पर ब्रेड पकोड़े खाओ जनाब !

गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। राजनीति मेँ सक्रिय खास व्यक्तियों की मीडिया मेँ प्रशंसा, आलोचना, समालोचना होना सामान्य बात है। जिनकी  अच्छी, बुरी चर्चा ही ना हो तो फिर वह काहे के नेता। इसलिए राधेश्याम गंगानगर, राजकुमार गौड़ और कामिनी जिंदल का जिक्र इस स्थान पर करने के बाद जगदीश जांदू को नजरंदाज करना उनके प्रति अन्याय होगा, और अन्याय उचित नहीं । वैसे  भी इत्ती सी बात पर किसी को नाराज किया भी क्यूँ जाए। नगर परिषद की राजनीति के विशेषज्ञ जगदीश जांदू।  पार्षदों के प्रिय सभापति जगदीश जांदू । नागरिकों का ईमानदार, कर्मठ  सभापति जगदीश जांदू। बानिया सभापति जगदीश जांदू। विनम्र, सहनशील, लचकदार जगदीश जांदू। नगर परिषद की राजनीति को नई दिशा और दशा देने वाले सभापति जगदीश जांदू। सभापति के चुनाव मेँ निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मेँ ताकत दिखाने वाले जगदीश  जांदू। इसी ताकत, लोकप्रियता  को देख कांग्रेस को मजबूर होना पड़ा था उनको विधानसभा चुनाव मेँ उम्मीदवार बनाने के लिए। ऐसे नेता की जितनी बड़ाई करें, उतनी कम। ऐसे काबिल बंदे का जिक्र ना करें तो क्या करें! जनता ने उनको विधायक बनने का मौका नहीं दिया। मौका क्या, उनको उनकी जमानत राशि तक भी वापिस नहीं की। असल मेँ गंगानगर विधानसभा की अघोषित सवर्ण सीट पर ओबीसी वाले जगदीश जांदू की उम्मीदवारी जनता को पसंद नहीं आई। इसलिए रख ली उनकी जमानत। कर दिया उनकी राजनीति का बंटाधार। शरीफ आदमी को कहीं का नहीं छोड़ा। अगली बार टिकट मांगने लायक भी नहीं रखा, लाडले जांदू जी को। चलो जांदू जी के साथ तो जो होना था हुआ, उनके साथ साथ बीजेपी वालों के भी कान खड़े हो गए। अपने आप को बाऊ जी का विकल्प मान कर राजनीति कर रहे व्यक्ति जगदीश जांदू जी की स्थिति देख अब तक सन्नाटे मेँ हैं। जबकि चुनाव को काफी समय हो चुका है। लगता नहीं ये टिकट मांगने की हिम्मत करेंगे। करेंगे भी तो दूसरे जगदीश जांदू का चिट्ठा सामने रख देंगे कि देख लो ओबीसी उम्मीदवार का क्या हाल हुआ था। फिलहाल जांदू जी के पास अब अधिक विकल्प भी नहीं दिखते । सादुलशहर मेँ तो उनके नाम राशि आ चुके हैं। गंगानगर ने उनको अपनाया नहीं। ऐसे मेँ क्या किया जाए? ये प्रश्न तो उनके और उनके समर्थकों के जहन  मेँ भी होगा ही। इस स्थिति मेँ या तो वे जिला परिषद की राजनीति मेँ अपने आप को सक्रिय करें या फिर से नगर परिषद के चुनावों का इंतजार। नगर के छोटे, बड़े आंदोलन मेँ सूरत दिखाओ। ऐसा नहीं कर सकते तो फिर तीन पूली पर बैठ कर अपने दोस्तों के साथ ब्रेड पकोड़े खाओ। वैसे कितनी हैरानी की बात  है कि आज के दिन गंगानगर की राजनीति मेँ गुरु - चेला दोनों,  एक ही मुकाम पर खड़े दिखाई देते हैं। ये भी नहीं कह सकते कि इनका किस्सा समाप्त हो गया। क्योंकि राजनीति मेँ कौन, कब, किस वक्त कहां पहुँच जाए, कौन जाने । ना, ना इससे पहले के कॉलम मेँ राधेश्याम गंगानगर को समय की प्रतिकूलता  देख मात्र  चुप रहने की सलाह भर दी गई है। कोई ये समझने की भूल ना करे कि राजनीति मेँ उनका किस्सा ही समाप्त हो गया। वक्त ने साथ दिया तो वे फिर कोई नया किस्सा लिख सकते हैं। जैसा 2003 की हार के बाद लिखा था।
दो लाइन पढ़ो—
जब बच्चा था ,तब अच्छा था

वो सब करता, जो मन करता। 

कार की टक्कर से घोड़ी की मौत



श्रीगंगनागर। पी ब्लॉक मेँ काली माता मंदिर के पास रात को हुई एक सड़क दुर्घटना मेँ घोड़ी की मौत हो गई। आज सुबह तक घोड़ी मालिक अनिल धोबी मुकदमा दर्ज करवा आगे की कार्यवाही करवाने मेँ लगा था। पुलिस भी मौके पर थी। रात को लगभग साढ़े नो बजे अनिल बग्गी वाले की घोड़ी सुखाडिया सर्किल से विनोबा मार्केट की तरफ आ रही थी। उस पर लड़का भी सवार था। कार की टक्कर से घोड़ी गिर गई। कार उसकी गर्दन के ऊपर से निकल गई। जिससे घोड़ी के बहुत गहरा घाव हो गया। घोड़ी खून से नहा गई। तड़फ रही घोड़ी के इलाज के लिए डॉक्टर को फोन कर बुलाया गया। आधी रात को घोड़ी ने तड़फ तड़फ कर जान दे दी। दुर्घटना के बाद  घटना स्थल पर लोगों की भीड़ लग गई। घोड़ी के मालिक अपने परिवार सहित मौके पर रहा। समाचार लिखे जाने के समय तक उसके परिवार के सदस्य मृत घोड़ी के पास बैठे थे। पुलिस वाले कार्यवाही मेँ लगे थे। पुलिस के अनुसार केस दर्ज हो चुका है। गाड़ी कब्जे मेँ ले ली गई है। कार मालिक के खिलाफ नंबर के आधार पर नामजद रिपोर्ट दर्ज होगी। 

Friday 28 August 2015

यह प्राचीन शिवालय है बाबू, इधर कोई वीआईपी नहीं


श्रीगंगानगर। [गोविंद गोयल] नगर मेँ बड़ा धार्मिक आयोजन, अनुष्ठान और कर्ता लाइम लाइट मेँ नहीं। है ना अचरज की बात। लेकिन अनुष्ठान  प्राचीन शिवालय मेँ हो तो किसी को कोई अचरज नहीं हो सकता। क्योंकि शिवालय कोई टॉफी, गोली, झांकी, बाँकी, सीधी वाले बाबा जी का स्थान तो है नहीं कि कर्ता और उसके खास मीडिया मेँ छाए रहें। नगर की गली गली मेँ आयोजन के बहाने लोग अपना प्रचार करें। सौ प्रकार के आडंबर कर धर्म की मार्केटिंग करें। ये तो वो जगह है जहां कर्ता और कारक केवल शिव है। इसलिए इधर आने वाला हर व्यक्ति समान है। शिवालय मेँ  23 अगस्त से नव कुंडीय श्री महरुद्र यज्ञ हो रहा है। जिसकी पूर्णाहुति 29 अगस्त शनिवार को दोपहर सवा बारह बजे होगी। अनुष्ठान के प्रेरक, कर्ता सब कुछ सांसारिक रूप से तो महंत कैलाश नाथ जी हैं। परंतु वे ये बात नहीं मानते। उनके शब्दों मेँ तो सब कुछ शिव ही करता और करवाता है। इस आयोजन मेँ कैलाश नाथ जी कभी भी, किसी भी समय अगुआ के रूप मेँ दिखाई नहीं दिये। उनकी प्रकृति मेँ ही नहीं है दिखावा, आडंबर। वे या तो अपनी कुटिया मेँ बैठे होते हैं या फिर बरामदे मेँ। कभी जी किया तो दूर बैठे यज्ञ को निहार लिया।  मन मेँ आया तो किसी काम को देखने के लिए आ खड़े हुए, बस। उनके स्थान पर कोई और ऐसा यज्ञ करवाने वाला होता तो अब तक ना जाने कितने वीआईपी के साथ उनके फोटो मीडिया तक पहुँच गए होते। अफसरों को बुलाया जाता। नेताओं को पटाया जाता। उनकी आवभगत कर फोटो खिचवाते, छपवाते। उनको सम्मानित करते। खुद होते। फूल मालाओं का आदान प्रदान होता। कितने ही व्यक्ति इन वीआईपी को माला पहना अपने आप को धन्य समझते।  परंतु ये प्राचीन शिवालय है। शिव का स्थान। कोई अफसर आए या नेता, सब के सब बराबर। इधर कोई चोर दरवाजा ही नहीं है। ना भोजन के लिए और ना दर्शन के वास्ते। किसी को कोई वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं। चाहे कोई तुर्रम खाँ आ जाए, कोई आगे पीछे नहीं घूमता। कोई कहीं बैठा है, तो कोई उठाता नहीं। खड़ा है तो कोई बैठने के लिए नहीं कहता। जब शिवालय सभी का है तो कौन किसकी आवभगत करे! बाबा जी को कोई प्रणाम करने आ गया, तो कोई अहंकार नहीं। नहीं आया तो कोई गिला नहीं। ना साधो से लेना, ना माधो का देना। ऐसे ही इस अनुष्ठान मेँ लगे सेवादार हैं। अंजान व्यक्ति को तो पता ही ना लगे कि ये सेवादार हैं। क्योंकि बाकी स्थानों की तरह कोई बैज, बिल्ला, विशेष ड्रेस अथवा पटका नहीं है किसी सेवादार के पास। सब के सब चुपचाप उस काम मेँ लगे हैं, जो बाबा जी ने सौंप रखा है। हर सेवादार बाबा जी के इशारों को समझता है। उनके प्रति श्रद्धा और विश्वास रखता है। शायद शिवालय ही एक ऐसा धर्मस्थल है, जिधर बिना आडंबर के धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। वरना तो छोटे छोटे आयोजनों पर उतना खर्च नहीं होता, जितना आयोजक अपनी फोटो छपवाने के लिए खर्च कर देते हैं। कर्ता, कारक, यजमान और विप्रवर सभी खुश और आनंदित नजर आते हैं। बाकी तो वह शिव जाने, जिसकी छत्रछाया मेँ यह अनुष्ठान हो रहा है। दो लाइन पढ़ो—तेरे प्यार से भरा हूँ, बस इसलिए खरा हूँ। 

Thursday 27 August 2015

सभापति ने विधायक से पूछी उनके वादों की हकीकत


श्रीगंगानगर। सभापति अजय चाण्डक ने विधायक श्रीमती कामिनी जिंदल सिंगला से विधानसभा चुनावों में जमींदारा पार्टी द्वारा किए गए वादों की हकीकत के बारे मेँ पूछा है ?एक प्रेस नोट मेँ सभपति ने सवाल किया है कि  विधायक कोटे के दो करोड़ रुपए के अलावा निजी तौर पर खर्च किए जाने वाले 18 करोड़ रुपए कहां हैं? विधायक के कार्यकाल के दो साल पूरे होने जा रहे हैं, जिसके हिसाब से अब तक शहर में 36 करोड़ रुपए खर्च होने चाहिए थे, जबकि अब तक उन्होंने निजी तौर पर फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं की। साथ ही, वोट बटोरने के लिए शुरू की गई स्कूली बच्चों की छात्रवृत्तियां और बुजुर्गां की पेंशन भी बंद कर दी गई हैं। जनता के साथ हुए छलावे का हिसाब विधायक को सार्वजनिक मंच पर देना चाहिए।
सभापति ने विधायक श्रीमती कामिनी जिंदल सिंगला की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि विधानसभा चुनाव के समय उनकी पार्टी ने डबल डेकर नहर बनाने, हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बॉर्डर खुलवाने, गरीबों के लिए 44 बीघा जमीन पर स्कूल बनाकर मुफ्त शिक्षा देने तथा हजारों युवाओं को रोजगार देने जैसे झूठे ख्वाब दिखाकर वोट बटोरने की ओछी राजनीति की, जबकि अब जनता ऐसे सब्जबागों की हकीकत से वाकिफ हो चुकी है। यही वजह है कि सोमवार को चक्काजाम के दौरान विधायक के साथ एकमात्र उनका पीए ही पहुंचा था और बाकी समर्थक गायब थे। सभापति ने कहा है कि विधायक बनने के बाद से ही जनता की आंखों से ओझल हो गई। श्रीमती कामिनी जिंदल सिंगला कोतवाली पुलिस थाना में गुमशुदगी रिपोर्ट दिए जाने के बाद ही नजर आनी शुरू हुई हैं। अभी जुम्मा-जुम्मा हफ्ते-दो हफ्ते से दोबारा जनता के बीच आई विधायक को यह गलतफहमी हो गई है कि वे जो कुछ भी कहेंगी, जनता मान लेगी और उनके पीछे हो लेगी। जबकि हकीकत यह है कि जमींदारा पार्टी को जनता पिछले लोकसभा चुनावों, पंचायत चुनावों और अभी हाल ही में हुए निकाय चुनावों में आइना दिखा चुकी है। सभापति अजय चाण्डक ने विधायक से बयानबाजी करने की बजाए काम करने को कहा है, क्योंकि जनता ने उन्हें विकास कार्य करवाने के लिए जिताया था, उनके तथाकथित एंग्री यंग वूमैन वाले डायलॉग सुनने के लिए नहीं।



Wednesday 26 August 2015

नेतृत्व का दमदार मौका गंवा दिया विधायक ने

नेतृत्व का दमदार मौका गंवा दिया विधायक ने
गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर।  राजनीति मेँ भीड़ उसी की होती है जो मौके पर उसे कब्जा ले। जलसा, जुलूस का नेतृत्व भी वही करता है, जो भीड़ को कब्जाने का हुनर जानता हो। कोई नेता किसी अधिकारी के चेम्बर मेँ जन हित के किस मुद्दे पर उसके साथ चाहे जैसा बरताव करे, कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन यही नेता सड़क पर भीड़ के सामने अधिकारी को लताड़े , आँख दिखाए, उसे ऊपर नीचे करे तो वह जन जन मेँ लोकप्रिय हो जाता है । जनता जनार्दन उसकी जय जय कार करती है। कुछ ही क्षण मेँ उसकी रॉबिन हुड स्टाइल वाली छवि के चर्चे सबकी जुबान पर आ जाते हैं। ऐसा हुनर दिखाने के मौके कभी कभी ही आते हैं। जो ऐसे मौके को  कैश कर ले, वही सिकंदर। वही लीडर। चूक गए तो गए काम से और साथ मेँ नाम से भी। छोटी उम्र मेँ एतिहासिक जीत दर्ज कर विधायक बनीं कामिनी जिंदल के पास भी ऐसा ही अवसर था, अहिंसा सर्किल पर। उस अहिंसा सर्किल पर जहां  जनता सड़क निर्माण के लिए चक्का जाम की तैयारी मेँ थी। बीजेपी के अलावा सभी पार्टी के नेता थे। साथ मेँ थे, व्यापारिक संगठनों के पदाधिकारी। अनेक पार्षद। भीड़ तो थी ही। नहीं था तो केवल नेतृत्व। कामिनी जिंदल चाहती तो अपनी लंबी अनुपस्थिति को एक झटके मेँ ही दमदार उपस्थिति मेँ बदल सकती थीं। लेकिन ऐसा हो ना सका। उनको कुछ अधिक नहीं करना था। थोड़ा आक्रामक होना था और उसी के अनुरूप जोश से लबरेज तोड़ा एक्शन होता। उसके बाद तो जो होता उसका जिक्र लंबे समय तक रहता। आप विधायक हैं। उस बी डी अग्रवाल की बिटिया हैं, जो बिंदास बोलने के लिए जाने जाते हैं। साथ मेँ हो आईपीएस की बीवी। बैठ जाना था सड़क पर। हल्ला करना था, प्रशासन और सरकार के खिलाफ। मांग लेकर कलक्टर के पास जाने की बजाए उनको मौके पर बुलाना था। कलक्टर को आना पड़ता। खुद तो आते ही साथ मेँ लाते संबन्धित विभाग के अधिकारी। आखिर उस  विधायक की बात को कब तक अनसुनी करते, जो बीच सड़क पर जनता के साथ विकास की जायज मांग के लिए बैठा हो। कुछ ही देर मेँ खबर जिला प्रशासन से होती हुई जयपुर मेँ सत्ता के गलियारों तक पहुँच चुकी होती। पूरा का पूरा प्रशासन हाथ बांधे सड़क पर विधायक कामिनी जिंदल के सामने खड़ा होता। और शहर की जनता अहिंसा सर्किल पर, विधायक के आस पास। वे नेता भी फिर विधायक की हां मेँ हां मिलाते जो उधर आए हुए थे। मीडिया तो है ही विधायक कामिनी जिंदल का। उसके बाद तो वही होता जो विधायक कहतीं। आखिर वे विधायक हैं। विधायक होना कोई छोटी मोटी बात नहीं। विधायक पार्षद नहीं होता, जिसे कलक्टर कुछ भी कह कर शर्मिंदा कर दे। कुछ ही देर मेँ विधायक कामिनी जिंदल की बल्ले बल्ले हो जाती। ये तो पता नहीं कि विधायक के  इस एक्शन से सड़क बनती या नहीं, लेकिन छवि जरूर बनती। बल्ले बल्ले जरूर होती। राजनीति मेँ ऐसा होता ही आया है। मंच होता किसी का है, कब्जा कोई लेता है। परंतु ये सब होता है अनुभव के साथ। अनुभव मेँ समय लगता है।  समय नहीं हो तो फिर कोई गाइड करने वाला हो। अगर दोनों ही नहीं तो मौके ऐसे ही हाथ से जाते रहेंगे। सबको पता है कि राजनीति मेँ ऐसे मौके रोज रोज आते नहीं। कचरा पुस्तक की दो लाइन—
सरकार की तरह मस्त रहो जनाब

पेट भरे ना भरे दिखाते रहो ख्वाब।