Wednesday 2 April 2014

पुरुषों को भी मिले महिला सशक्तिकरण का ईनाम

श्रीगंगानगर-"जहां नारी की पूजा होती है,वहीं देवता विराजते हैं." ऐसे वाक्य सदियों से  संसार में कहे,पढ़े  और सुने जाते हैं.हिंदुस्तान में तो धन,बुद्धि और शक्ति की मालिक ही देवियां हैं. श्रीराम से पहले सीता और श्रीकृष्ण से पहले राधा रानी का नाम लिया जाता है. शायद इसलिए ये कहा जाने लगा होगा कि सफल पुरुष के पीछे नारी होती है. मतलब,नारी सृष्टि का मूल आधार है. पुरुष जो कुछ है वह नारी के कारण ही है. हम भी क्यों इंकार करने  लगे. सत्य वचन हैं  सबके सब. शास्त्रों में लिखे ब्रह्म वाक्य हैं. परन्तु ये सब लिखने और साबित करने वालों को क्या पता था कि कलयुग  में कभी श्रीगंगानगर नामक एक शहर होगा. जहां ऐसे अनेक व्यक्ति और  संगठन इन वाक्यों को चुनौती देंगे. इनको अर्द्ध सत्य साबित करेंगे. नो! कोई टेंशन नहीं . कोई झगड़ा टंटा नहीं. किसी प्रकार की प्रतियोगिता भी नहीं. यह सब तो पुरुषों द्वारा महिलाओं को सशक्त करने के लिए किये जा  रहे उनके प्रयास  हैं. महिलाओं को समाज,देश में आगे और आगे बढ़ाने के लिए उनकी लगन और मेहनत  हैं. शहर में  नजर दौड़ाने पर अनेक ऐसे संगठन और महापुरुष दिखाई देंगे जो महिलाओं को भारत के नक़्शे पर स्थापित करने के लिए जी तोड़ प्रयास कर रहे हैं. ऐसे प्रेरणा पुरुष महिलाओं के संगठन बनाते हैं. उनको चलाते हैं. उनके एक से एक प्रोग्राम करवाते हैं. शहर से लेकर प्रदेश स्तर तक उनको सम्मानित करवाते हैं. कोई ऐसा तीज त्यौहार नहीं जब ऐसे प्रकाश पूंज महिलाओं को आगे ना रखते हों. कई बार तो ऐसा लगता है कि प्रशासन,सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए जो कुछ भी करती है वह इन महापुरुषों की तुलना में कुछ भी नहीं. सरकार को तो वोट लेने होते हैं. ये महापुरुष निस्वार्थ भाव से ये सब करते हैं.इनके काम को देख हमारा तो ये मानना है कि सरकार महिला सशक्तिकरण के नाम पर महिलाओं को गलत पुरस्कृत करती है. महिला सशक्तिकरण के लिए सम्मान,ईनाम तो उन देवतुल्य पुरुषों को मिलना चाहिए जो नारियों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं. ऐसे इंसान  तो पदम सम्मान लेने के हक़दार हैं जो महिलाओं को सशक्त कर यह  साबित करने में लगे हैं कि पुरुषों की सफलता के पीछे नारी होने की बात अब गुजरे जमाने की कथा  हो गई है. अब तो  सफल नारियों के पीछे पुरुष होते हैं. सरकार को इन संगठनों और पुरुषों के काम को गम्भीरता से लेना चाहिए. ताकि दूसरे शहरों के पुरुषों को भी इन से प्रेरणा मिल सके. अपने घर की नारियों के लिए तो सभी करते हैं,दूसरों का उत्थान और सशक्तिकरण करने वाले तो विरले ही होते हैं. ऐसे व्यक्तियों का सम्मान तो होना ही चाहिए. क्योंकि ऐसे ही पुरुषों के सद्प्रयासों की बदौलत भविष्य  के तुलसी दास नारी को ताड़ना का अधिकारी लिखने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे.