Monday 3 November 2008

कुत्ते को घुमाते हैं शान से

---- चुटकी----
बुजुर्ग माँ-बाप
के साथ चलते
हुए शरमाते हैं हम,
अपने कुत्ते को
सुबह शाम
घुमाते हैं हम।
------
अधिकारों के लिए
लगा देंगें
अपने घर में ही आग,
अपने कर्त्तव्यों को
मगर भूल जाते हैं हम।
----
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
खंड खंड हो रहा है देश
फ़िर भी अनेकता में एकता
के नारे लगाते हैं हम।
----
सबको पता है कि
बिल्कुल अकेले हैं हम,
हम, अपने आप को
फ़िर भी बतातें हैं हम।
----गोविन्द गोयल

7 comments:

Anil Pusadkar said...

कडुआ सच्।बेहतरीन पोस्ट ।

seema gupta said...

सबको पता है कि
बिल्कुल अकेले हैं हम,
हम, अपने आप को
फ़िर भी बतातें हैं हम।
" wah "
"kyun khud apne aap ko behalty hain hum, tanhaee mey khud se he bteeyatn hain hum.."

Regards

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" said...

बुजुर्ग माँ-बाप
के साथ चलते
हुए शरमाते हैं हम,
अपने कुत्ते को
सुबह शाम
घुमाते हैं हम।
इस यथार्थ के रेखांकन के लिए आभारी हूँ.........!
इस सचाई को भोगता भारत वानप्रस्थ की याद दिलाता है ,
तब और अब में फर्क ये है नारद जी की अब इन्हीं सब कारणों से
वृद्धाश्रम की ज़रूरत हुई है !!
अच्छी रचना के लिए बधाइयां

Udan Tashtari said...

बुजुर्ग माँ-बाप
के साथ चलते
हुए शरमाते हैं हम,
अपने कुत्ते को
सुबह शाम
घुमाते हैं हम।


--एकदम सटीक निशाना, मुनिवर!! बहुत उम्दा!

रंजना said...

कटु यथार्थ का सुंदर सटीक बिम्ब खींचा आपने.बहुत सही कहा..

sandhyagupta said...

Naradmuni ji puri duniya ka bhraman karte hain aap. Kabhi mere blog par padharen. Narayan Narayan

guptasandhya.blogspot.com

राज भाटिय़ा said...

गोविन्द गोयल जी एक ऎसा कडवा सच जिसे हम जुठला कर शान से बेशर्मो की तरह से चलते है,खुद को महान कहते है.
धन्यवाद