Saturday 10 May 2014

जो सेवक बनने आया उसे शहंशाह बना दिया हमने

श्रीगंगानगर- चुनाव के समय   गली-गली,घर-घर घूम कर जन सेवा के लिए मौका मांग रहे नेता को हम  शहंशाह बना देते हैं.वोटों के लिए लोगों के दरबार में हाथ बांधे खड़े रहने वाले पंच,सरपंच,पार्षद,विधायक,सांसद बनते ही खुद का दरबार लगाना शुरू कर देते हैं.सेवक बनने के लिए आते हैं,शासक बन जाते हैं. ये कसूर उनका नहीं हमारा है. हम तो वोट देने के बाद भूल जाते हैंउनको. हम कभी उनको फोन नहीं करते. उनसे पूछते नहीं. किधर हो? कब आओगे? क्या करोगे? क्या योजना है? क्षेत्र के लिए सदन में क्या बोला? वो मजे से  दरबार लगाते हैं. हम उनको घर बैठे कोसते हैं. पहली बात तो ये कि पता ही नहीं लगता कि नेता कब आते हैं. आ भी जाएं  तो ये चंद लोगों के कब्जे में रहते हैं. कब्ज़ा ना भी हो तो जनता नहीं जाती इनके पास. किसी को दुकान से फुरसत नहीं किसी को नौकरी से. वोट दिया. काम ख़त्म. चूंकि वोटर कभी कुछ कहते नहीं,सवाल जवाब नहीं करते इसलिए नेता भी जनता की परवाह नहीं करते. मनमर्जी करते हैं. होना तो ये चाहिए कि जनता अपने पार्षद से लेकर सांसद तक के टच में रहे. इनको पता होना चाहिए कि जनता जाग रही है. वह हिसाब रखने लगी है उनका. विधायक हो या सांसद,इनसे इनके एक एक दिन का हिसाब मांगा जाए.किधर गए?क्या किया ?किस योजना  पर काम किया जा रहा है? कौनसी नई  योजना लाने की स्कीम है? विकास की क्या प्लानिंग है? कौनसा काम कब तक होगा? नहीं होगा तो क्यों नहीं होगा? एक एक बात पूछनी चाहिए. चैन से मत बैठने दो अपने विधायक और सांसद को. मतदाता कुछ कहते नहीं. बस इसलिए ये उनके बीच रहते नहीं. इनको मजबूर किया जाए जनता के बीच रहने के लिए. उनकी निजता को नुकसान पहुंचाए बिना पूरा हिसाब होना चाहिए उनका. बकरी मरे पर ना आए तो ना आए.अपने परिवार की शादी की शोभा भी बेशक मत बनाओ इनको. परन्तु क्षेत्र से दूर मत रहने दो. संपर्क करो,ताकि बता लगे कि वह बात करता है या नहीं. उसका व्यवहार कैसा है. बात नहीं करता तो उसकी उपेक्षा को सार्वजनिक करो. जन जन तक यह बात पहुंचाओ कि नेता को फोन किया था , उसने बात नहीं की. जब तक जनता  इन पर निगाह नहीं रखेगी, ये नहीं मिलेंगे. रवैया बदलना होगा जनता को अपना खुद का. उसके बाद नेता तो बदल ही जाएगा. मुर्दा रहने से कोई बात नहीं बनती. जिन्दा साबित करो अपन आप को. लाखों नहीं तो हजारों वोटर ही फोन करने लगें इनको तो इनका छिपना मुश्किल हो जाएगा. वरना तो वही होगा जो ये लोग चाहेंगे. बदलाव चाहिए तो एक सप्ताह में दो चार मिनट ही निकाल लो. इनको पुचकारने की बजाए इनको पुकारो. पुकार ना सुने तो लताड़ो. जनता इनकी कर्जदार   नहीं वे जनता के कर्जदार हैं. अपना दिया कर्ज पांच साल में वापिस लो. लेकिन इसके लिए कर्ज का तकादा करना होगा. बिना तकादा किये कोई कर्ज वापिस नहीं करता जी. वो जमाने गए जब लोग खुद कर्ज चुकाते थे. अब तो मांगने पर दे दें वही काफी है. असल में हमारी चुप्पी की वजह से विधायक,सांसद हमारे पालक हो गए.इसीलिए तो दरबार लगाते हैं. असल में होना तो ये चाहिए कि जनता दरबार लगाए.  उसमें विधायक,सांसद आए. जनता के सवालों के जवाब दें. परन्तु विडम्बना देखो कि सेवक कहलाने वाले दरबार लगाते हैं और  जनता अपनी फरियाद लेकर उनके पास जाती है. बस अब ये सिलसिला बंद होना चाहिए. सेवक को सेवक ही रखो. बंद कर दो उसे शहंशाह बनाने की परम्परा. एक बार कर के देख लो. ठीक लगे तो जारी रखना.  वरना बदल देना अगली बार.

Friday 2 May 2014

तलाक से ज्यादा दहेज़ प्रताड़ना कानून ने तोड़े परिवार



श्रीगंगानगर-दो घटनाओं से बात  शुरू करते हैं. पहली-किसी पुलिस ऑफिसर के पास लड़के का पिता परिचित के साथ फरियाद लेकर आया.उसने बताया कि उसकी पुत्र वधु घर में केवल तीन दिन रुकी.उसके बाद पति के साथ शहर चली गई,जहां दोनों नौकरी करते थे. एक दिन  वापिस आई. ससुराल वालों के खिलाफ मुक़दमा किया. वापिस लौट गई ,पति केपास नहीं, अपनी नौकरी पर. पिता ने कहा, इस मामले में आज तक किसी पुलिस अधिकारी ने उनकी नहीं सुनी. दुखी बेबस पिता वापिस लौट गया. दूसरी-लड़की  की शादी बैंक कर्मी से हुई. दस दिन के बाद ही विवाद.पंचायत हुई. लड़के वालों ने दे दिया जो देना था. मगर विवाद नक्की नहीं हुआ. लड़की ने पंचायतियों पर ही केस कर दिया. इसमें कोई शक नहीं कि  लड़की और उसका परिवार वाले ऐसा करके  सुखी नहीं होंगे. लेकिन लड़के और उनके परिवारों पर भी  क्या गुजर रही होगी, ये भी चिंता के साथ साथ चिंतन और मंथन करने की जरुरत है.ऐसी केवल दो घटना नहीं है. सैकड़ों परिवार इस प्रकार से प्रताड़ित हो रहे हैं. उनका जीना ना जीने  के बराबर हो चुका है.  कसूरवार लड़का. उसकी मां,बहिन,जेठ,जेठानी. लड़के की बहिन शादी शुदा है तो बहनोई भी. ऐसे विवादों में जितनी भी पंचायतें होती हैं,उन सब में लड़के के परिवार को दबाया जाता है.जिन घरों की लड़कियों के नाम थानों तक पहुँच गए,उनका जीना भी क्या जीना. थानों में शर्म,लिहाज,संवेदनशीलता,इज्जत,व्यवहार सब कुछ तार तार कर उसके स्थान पर प्रताड़ना दी जाती है. वह भी ऐसी कि जिसकी कल्पना मुश्किल है. ऐसी जैसी उन्होंने बहु को भी नहीं दी होगी. नारीवादी संगठन भी बहु के पक्ष में झंडा लेकर मैदान में आ जाते हैं. इन संगठनों की नारियों को ये दिखाई नहीं देता कि जिनके खिलाफ हल्ला बोला गया है वे भी नारियां ही हैं. एक नारी को कथित न्याय दिलाने के नाम पर अनगिनत नारियों के साथ अन्याय ही तो होता है. बस हर कोई लड़की के नाम पर लड़के वालों के पीछे लट्ठ लेकर पड़ जाता है. पंचायत भी और पुलिस प्रशासन भी. सब के सब लोगों को यही लगता है कि इस दुनिया में अगर कोई दरिंदे हैं तो लड़के वाले. नारीवादी संगठन,वकील,अदालतें,पंचायतों के ठेकेदार और ऐसे मामलों की जाँच  करने वाले अधिकारियों  को  झांक कर देखना चाहिए इन घरों में,ताकि उनको मालूम हो सके कि उनकी जिंदगी कैसे नरक बानी हुई है जिन पर बहु ने मुकदमे कर रखे हैं.  लोग कैसे तिल तिल कर मर रहे हैं. सामाजिक प्रतिष्ठा तो मिटटी हुई ही इसके साथ साथ कदम कदम जो प्रताड़ना झेलनी पड़ती है उसका तो जिक्र ही नहीं होता. ना जाने कितने लोग तो भुगत रहे हैं और ना जाने कितने ही खामोश हो बहु और उसके परिवार की प्रताड़ना सहने को मजबूर है. बोले तो बहु सबको अंदर करवा देगी. और कुछ ऐसा वैसा कदम उठा लिया तो समझो गए सब के सब अंदर. जितने घर तलाक ने बर्बाद नहीं किये होंगे उतने  अकेले दहेज़ प्रताड़ना  कानून ने कर दिए होंगे.  ससुराल हो या पीहर महिला  की स्वाभाविक,अस्वाभाविक मौत दहेज़ हत्या के खाते में चली जाती है. उसके बाद लड़के वाले तो समझो ख़त्म. उनके समर्थन में कोई नहीं आता. समाज खामोश. कानूनविद बेबस. कानून बनाने वालों को ये सब देखने की जरुरत ही नहीं. वे तो समर्थ हैं. समर्थ को कोई दोष होता नहीं. इस कानून से पहले  महिलाओं की सुरक्षा,इज्जत,ससुराल में मान सम्मान नहीं होता था क्या ! इस कानून से  महिलाओं की कितनी सुरक्षा हुई. उनको समाज में कितना ऊँचा स्थान मिला ,पता नहीं लेकिन ये जरूर है कि घर घर की महिलाएं और पुरुष आतंकित जरूर हो गए इस कानून से. पता नहीं कब ऐसा होगा जब समाज और  कानून बनाने वाले लोग इस बारे में चिंतन कर बरबाद होते घरों को बचने के लिए कुछ सार्थक पहल करेंगे.लड़के वालों को बेखौफ इज्जत से जीने का हक़ देंगे.सच में किसी ससुराल में लड़की को प्रताड़ित किया गया है उसको तू सजा मिलनी ही चाहिए. उनमें से एक भी नहीं बचे. लड़की की ससुराल में नहीं बनी.किसी भी वजह से अड्जस्ट नहीं हो पाई. तो पूरे ससुराल को थाने में ला उनकी और अपने परिवार की मिटटी करने से तो बेहतर है आपस में बैठकर फैसला करना.अंत में होता तो यही फैसला ही है. जब यही फैसला होना है तो फिर  पहले ही क्यों ना कर लिया जाए. लड़की वाले भी सुखी और लड़के वाले भी.दो लाइन पढ़ो--तेरी याद से इश्क का कोई रिश्ता नहीं है, याद तो गैरों की भी आया करती है .

मोहब्बत तो कभी मरने की बात नहीं करती


मोहब्बत तो कभी मरने की बात नहीं करती 
श्रीगंगानगर-किस्सा फेसबुक से. ढाई दशक बाद एक व्यक्ति को महिला का सन्देश मिला, आई लव यू.व्यक्ति हैरान ! महिला ने बताया कि वो तो उससे तभी से मोहब्बत करती है जब शादी नहीं हुई थी. बन्दे को क्या पता. न कभी मिले . ना कभी जिक्र ही आया. फिर अब अचानक,ढाई दशक बाद, जब दोनों के बच्चों तक की शादी हो चुकी है.इक तरफ़ा मोहब्बत चलती रही,पलती रही.है ना मोहब्बत का अनूठा अंदाज. दूसरा,. दोनों की कास्ट अलग. मोहब्बत बे हिसाब. परिवार राजी नहीं. कोशिश की.शादी नहीं हो सकी. अलग अलग हो गए. तीस सालों में एक दो बार जब कभी मिले वैसी ही आत्मीयता वही मोहब्बत. तीसरा, लड़का सवर्ण ,लड़की दूसरी कास्ट की. संयोग ऐसा हुआ कि दोनों परिवारों को शादी करनी पड़ी. लड़की ने अपने आप को उस परिवार में ऐसा ढाला कि क्या कहने. किसी को कोई शिकवा शिकायत नहीं. चौथा,लड़का अपने इधर का. लड़की साउथ की. लड़का शानदार पोस्ट पर. परिवार उस लड़की से शादी करने को राजी नहीं. लेकिन लड़का-लड़की ने शादी कर ली. धीरे धीरे परिवार वालों ने भी उसे बहु के रूप में स्वीकार कर लिया. बहु जब भी पति के साथ छुट्टियों में  इधर आती है ,वह अपने संस्कार,काम और बोल चाल से ससुराल वालों का दिल जीतने की कोशिश करती है. ये किस्से कहानी नहीं हकीकत हैं.सब के सब जिन्दा और खुश हैं अपने अपने घर. परन्तु आजकल का तो प्रेम हो ही बड़ा अनोखा गया. इसमें मरने मारने की बात  पता नहीं कहां से आ गई. आजकल कभी प्रेमी-प्रेमिका के एक साथ मरने की घटना होती है तो कभी प्रेमी द्वारा प्रेमिका को मार देनी की. बड़ा अजीब है उनका प्रेम! साथ मरने का ये मतलब नहीं कि वे मरने के बाद साथ रहेंगे. ये फ़िल्मी डायलॉग है कि नीचे मरेंगे तो ऊपर मिलेंगे. दुनिया ने हमें इधर नहीं मिलने दिया,मरकर उधर मिलेंगे,आदि आदि.इस धरती पर मिलन उसी का होता है जो जिन्दा है. मरने के बाद की तथाकथित दुनिया किसने देखी. जो दुनिया देखी नहीं उसमें मिलने के लिए उस दुनिया से चले जाना जिधर मिलने की संभावना रहती है, कौनसी मोहब्बत हुई. ये तो मोहब्बत नहीं कोई आकर्षण था. मोहब्बत में सराबोर नहीं थे,शारीरिक आकर्षण में डूबे थे. जिन्दा रहोगे तो मिलने की आस रहेगी.मरने के बाद तो कुछ भी इन्हीं. मरने वाले बता नहीं सकते कि लो देखो, हम मर कर  मिल गए और सुखी हैं. भावुकता के अतिरेक में मर तो गए लेकिन उसके बाद!  तुम तो मर गए लेकिन परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा तो मिट्टी कर गए.तुम तो अपने ख्याल में मर कर मिल गए ,मगर परिवार को तो किसी से मिलने-मिलाने लायक नहीं छोड़ा. उन मां-बाप का क्या जो जिन्दा  लाश बन गए.घरमें रहो तो  की दीवारें खाने को आती हैं और बाहर लोगों की बातें तीर की तरह बींधती हैं. तुम तो चले गए,लेकिन बाकी भाई बहिन के रिश्तों पर ग्रहण लग जाता है. रिश्ते तो होंगे  लेकिन उनमें  समझौता अधिक होता होगा. जिसके किसी भाई-बहिन ने इस प्रकार मोहब्बत में जान दी हो,उनसे रिश्ते जोड़ने वाले मुश्किल से ही मिलते हैं. इसके लिए कसूरवार कौन है,ईश्वर जाने. लेकिन ये बड़ी अजीब बात है कि दशकों पहले जब इतना खुलापन नहीं था तब तो लोग मोहब्बत में जीने की बात करते थे. अब जब इण्टर कास्ट शादी आम होने लगी है. तब लड़का-लड़की का मरना हैरानी पैदा करता है. मोहब्बत तो जिंदगी में आनंद भरती है.लोग निराश,हताश,उदास होकर मरने क्यों लगे. ऊपर के किस्सों में दो रस्ते हैं.पहला , परिवार की इच्छा को मान देकर रस्ते बदल लो.मोहब्बत में त्याग को महत्व दो. दूसरा, अपनी परिवार की इच्छा को नजर अंदाज कर अपनी मर्जी करो. होता है जो हो जाने दो. समय की राह देखो, जो सब कुछ ठीक कर देता है. मरने की बात तो मोहब्बत में होनी ही नहीं चाहिए. शायद  पहले मोहब्बत बाजरे की खिचड़ी की तरह होती थी जो धीमी आंच पर धीरे धीरे सीज कर स्वादिष्ट बनती थी. अब तो  मोहब्बत दो मिनट की मैगी स्टाइल हो गई है.बनाओ,खाओ और भूल जाओ. दो लाइन पढ़ो--जीने की नहीं मरने की बात करता है हर वक्त, बड़ा कमजोर हो गया है ये नए दौर का इश्क .