Saturday 14 June 2014

खुद के बच्चों की तारीफ करने में कंजूस हैं हम

श्रीगंगानगर- मित्र के नौवीं में पढने वाले बेटे से मिलने उसके साथी आए. मित्र ने उनसे पूछ लिया, मोनू में ऐसी क्या खास बात है जो तुम उसे घेरे रहते हो? उनका जवाब था, अंकल! ये हमें छोटी छोटी बात पर हंसाता रहता है. मित्र के चेहरे पर मुस्कान आ गई. परन्तु बेटे से कुछ नहीं कहा.एक दो दिन बाद उसने मोनू की तारीफ की. उसकी पीठ थपथपा के नहीं बल्कि लिख कर.किशोरवय अपने पुत्र की तारीफ पिता लिखकर करता है. उसकी बातों को सराहता है. उस पर गर्व होने की बात कहता है. अपने बेटे की प्रशंसा बहुत अच्छी बात है,लेकिन हैरानी इस बात की कि पिता को अपनी भावना लिख कर बतानी पड़ी. जबकि पुत्र कोई हॉस्टल में नहीं रहता. साथ रहता है. पिता भी कोई बड़ा बिजनेसमैन या अधिकारी नहीं कि वक्त ना निकाल पाते हों अपने बच्चों से बात करने के लिए.पढ़े लिखे ठीक ठाक परिवार की सच्ची बात है ये. अपने बच्चे की तारीफ उसी को करने में पता नहीं क्यों हिचक होती है! दूसरों के सामने खूब बड़ाई करेंगे,बच्चे को अपनी भावना से अवगत नहीं करवाएंगे.उससे नहीं कहेंगे,तुझ पर हमें गर्व है. तेरा आचरण हमें पसंद है. पढाई से संतुष्ट हैं. दूसरी गतिविधियां भी प्रशंसा के काबिल हैं. इसके विपरीत यही सब कुछ दूसरे के बच्चों में हो तो खूब तारीफ करेंगे उसकी. सबके सामने उसकी पीठ थपथपा शाबाशी देंगे. चाहे उसका खुद का बच्चा पास ही खड़ा हो. जिसकी तारीफ कर रहे हैं,पीठ थपथपा रहे हैं वह बच्चे का दोस्त ही क्यों ना हो. पास खड़ा वह यह सोचता भी होगा कि पापा ने इन सब गुणों के लिए मेरी तो कभी तारीफ नहीं की. मां ने मुझे तो कभी शाबाशी नहीं दी. हालांकि बच्चे की परवरिश में कोई परिवार वाला कमी नहीं छोड़ता. अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से बढ़िया से बढ़िया करता है. परन्तु प्रशंसा के मामले में सब के सब कंजूस और खड़ूस.हिम्मत ही नहीं कर पाते पैरेंट्स अपने बच्चे की तारीफ कर उसमें और अधिक आत्मविश्वास बढ़ाने की. इसे यूं भी कह सकते हैं कि उनकी हिचक नहीं खुलती ऐसा करने के लिए. इसके विपरीत पैरेंट्स दूसरों से अपने बच्चों की मौजूदगी में बच्चों के लिए ये कहते तो सुने जा सकते हैं कि इसने क्या करना है! सारा दिन तो टीवी देखता है. पढाई में क्या निहाल करेगा! उसका बच्चा देखो, कितना समझदार है! बच्चे की तरफ आंखें करके,एक ये है कि नालायक का नालायक ही रहा. ये वाक्य गुस्से और प्रेम में हर घर में सुने जा सकते हैं. बच्चे के लेट उठने पर चिक चिक. खुद के जूते साफ़ ना करने पर डांट. बाइक-साइकिल साफ़ न करने पर फटकार. होम वर्क करने के बाद किताबें,बैग वहीँ छोड़ देने पर कौनसे पैरेंट्स मुंह नहीं चढ़ाते होंगे. पैरेंट्स क्या इस मामले में तो बड़े भाई बहिन भी ऐसा ही करते हैं. घर घर में हर रोज यही होता है. तो क्या किसी भी बच्चे में ऐसी कोई खूबी होती ही नहीं जो उसे अपने पैरेंट्स,दादा-दादी और बड़े भाई बहिन की प्रशंसा का पात्र बना सके. होती है जी होती है! हर बच्चे में होती है. प्रत्येक बालक-बालिका में ऐसा जरूर होता है जो उसे बाकियों से अलग करता है. लेकिन पता नहीं यह खूबी पैरेंट्स को अपने बच्चे की बजाए दूसरों के बच्चों में क्यों नजर आती है! स्कूलों में पैरेंट्स मीटिंग के दौरान कितने ही पैरेंट्स 95 प्रतिशत से अधिक अंक लेने वाले अपने बच्चे को ये कहते सुने जा सकते हैं,देखा राहुल ले गया ना एक नंबर अधिक. मैंने कहा था,पढ़ ले,पढ़ ले. सुनी नहीं. हो गया ना पीछे. बच्चे में प्रतिस्पर्धा की भावना भरना बढ़िया बात है. उसे दुनिया की दुश्वारियों से लड़ने की शिक्षा देना भी बुरा नहीं. बस, इसके साथ-साथ पैरेंट्स बेटा-बेटी की तारीफ भी करने लगें तो सोने पर सुहागा. छोटी सी बात के साथ बात समाप्त करूंगा. किशोरवय बेटा नहाकर बाथरूम में पाटा उलटा कर देता.पैरेंट्स बच्चे को तो कुछ नहीं कहते,लेकिन आपस में चिक चिक करते. एक दिन पैरेंट्स का मूड ख़राब था. जैसा ही बेटा नहाकर निकला, उसे डांट दिया,ये क्या रोज रोज तू पाटा उलटा कर देता है. बेटे का जवाब था, आपके नहाने से पहले पाटा सूख जाए इसलिए पाटा उलटा करके आता हूं. पैरेंट्स बेटे की बात सुन निरुत्तर हो गए. है ना किशोरवय बेटे की ये खास बात. लेकिन तारीफ नहीं करेंगे. क्योंकि हमें आदत नहीं है,अपने ही बच्चे की तारीफ करने की.