Tuesday, 24 December, 2013

सपनों की अनोखी दुनिया है फेसबुक


श्रीगंगानगर-सपनों की एक अनोखी दुनिया है फेसबुक. एक अंजानी दुनिया. अलौकिक संसार.ऐसा संसार जिसमें अपने हैं भी और नहीं भी. इस निराली दुनिया में ख़ुशी,गम,सुख,दुःख,अवसाद,उल्लास,उमन्ग,तरंग,निंदा,आलोचना,प्रशंसा,बुराई,अच्छाई,पक्ष,विपक्ष,काम के ,बेकार,मोती,पत्थर सब के सब मिल जाएंगे. एक से एक विद्वान मिलेंगे तो एक से बढ़कर लम्पट भी टकरा जाएंगे आपसे. जिंदगी का कोई भाव ऐसा नहीं जो आपको इधर ना मिले. बे भाव को भी इधर भाव मिल जाता है. आप वास्तविक दुनिया में किसी के हैं,नहीं हैं. कोई आपका है नहीं है. मगर इधर सब आपके हैं और आप सबके हो. जिनसे आपको फेस टू फेस मिलना सम्भव ना हो. जो जीवन की इस दौड़ में आगे पीछे हो गए हों,वे भी आपको इधर घूमते मिल जाएंगे. या सम्भव है आप उनको विचरण करते हुए मिल जाओ.इस मिलन से कितनी ख़ुशी होगी इसकी कल्पना करो. ऐसा हर रोज होता है. किसी को हम ढूंढ लेते हैं तो कोई हमें.फेसबुक केवल मिलने  मिलाने का ही  काम नहीं करती.और भी बहुत कुछ है इसके जिम्मे.  इसके माध्यम से तो कितनी ही घटनाओं की जानकारी मिनटों में पूरी दुनिया में फ़ैल जाती है. कितने ही समाचार,फ़ोटो मिडिया में बाद में दिखाई देते हैं फेसबुक पर पहले.कितने ही समाचार फेसबुक से लिए जाते हैं मीडिया के द्वारा. केवल घटना मात्र नहीं .उस पर विद्वानों की टिप्पणियां. ऐसी ऐसी की क्या कहने. किसी की बखिया उधेड़ी जाती है तो कोई सिलाई करने वाला नहीं मिलता. फेसबुक  हर प्रकार की भावनाओं को व्यक्त करने का शानदार माध्यम है. कोई ख़ुशी है, बांट लो. कोई गम है, शेयर कर लो. कोई सन्देश देना है,दे दो. कोई रोकने वाला नहीं. टोकने वाला नहीं.विद्वानों के लिखे लेखों से रुबरु करवाता है यह. एक से एक जानकारी इससे मिल जाती है. विचारों का आदान प्रदान किया जाता है. आपके क्षमता दूर तक पहुंचाने का बढ़िया साधन है फेसबुक. जिन शहरों में आप कभी गए नहीं,वहां तक आपकी अप्रोच बढ़ा सकता है ये फेसबुक. सब कुछ है इसमें. अच्छाई है तो बुराई भी कम नहीं. गन्दी से गन्दी बात इसमें मिल जायेगी. तो संतों की वाणी की भी इसमें कोई कमी नहीं है. बस,आपको जो पसंद है वैसा हो जाता है. अब ये तो आप और हम पर निर्भर है कि हम इस समंदर में से मोती निकालते हैं या पत्थर. हमारी सोच पर निर्भर है कि हमारे दिलो दिमाग को क्या चाहिए. जो चाहिए वैसा इसमें मिल जाएगा. कोई कमी नहीं है इसके खजाने में. सम्भव हैं आपके वास्तविक दुनियां  में कोई दोस्त लेकिन इधर आप चाहे जितने दोस्त बना सकते हैं. फेसबुक लड़कियों के लिए खौफ भी हैं. उनके लिए जो बड़े सहज और सरल तरीके से अपने बारे में सब कुछ इस पर अंकित कर देती हैं.उनके भटकने का जरिया भी बन जाता है कई बार. कुछ गंदे दिमाग के लोग इसमें केवल गन्दगी ही डालने का काम करते हैं. वे शायद असल जीवन में भी ऐसे ही होते होंगे. मगर इनसे बचा जा सकता है. बचते भी हैं.आखिर गन्दगी डालने वाले अलग थलग पड़ जाते हैं समझो उनका फेसबुक बायकॉट हो जाता है. थोडा संभल कर इधर सैर को आएं तो इस दुनिया में बड़ा ही आनन्द है. अति तो हर चीज की बुरी होती है. तो इसकी भी अच्छी कैसे हो सकती है. 

Monday, 23 December, 2013

राजनीति में एक उजली सुबह की उम्मीद "आप" से

श्रीगंगानगर-नए चेहरे.नए नकोर सपने. अलग प्रकार की  नई  सोच. कुछ कर दिखाने का जुनून,उत्साह,उमंग,इरादे. यही तो है राजनीति में एक नया प्रयोग.घिसे पिटे मुरझाए,मुर्दा  पुरानी शक्लों से बिलकुल अलग. उनसे बिलकुल अलहदा जिनको देख देख कर राजनीति से घिन   होने लगी थी. जिनके लिए मांगे गए थे "नोटा". राइट टू रिजेक्ट. बात ये नहीं कि "आप"  की सरकार कितनी लम्बी चलती है. बात ये कि गंदली राजनीति में,कीचड से लथपथ कही जाने वाली राजनीति में कुछ नया तो शुरू हुआ. सरकारें तो जाने माने राजनीतिज्ञ चरण सिंह और चंद्रशेखर की भी नहीं चली थीं. अटलबिहारी वाजपई की सरकार केवल 13  दिन में बैठ गई थी.   इससे उन लोगों का  महत्व तो  कम नहीं हुआ जो आगे आए नए विचारों के साथ. "आप" कौन लोग हैं सब जानते हैं. आम से खास होने का मतलब आज अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों से अधिक और कौन जान सकता है. जिन्होंने कभी राजनीति नहीं की. वे एकदम से आते हैं और दिल्ली की सत्ता हासिल कर लेते हैं. उस दिल्ली की जहां लगातार कांग्रेस ने तीन बार सरकार बनाई.बेशक आप को कोई अनुभव नहीं है सरकार चलाने का. राजनीति करने का. तो उनको आंदोलन करने का कौनसा अनुभव था. उनके साथियों ने कौनसा हड़तालें की थीं. वह भी तो किया. जनता की आवाज बने. जनता को जोड़ा.उनकी दम तोड़ती उम्मीदों को जिन्दा किया. राजनीति से नाउम्मीद हो चुके आम जन को एक नया नेतृत्व देने का भरोसा दिलाया.जनता ने भी विकल्प के रूप में आप को स्वीकार कर सरकार की टोपी सर रख दी. हर तरफ यही प्रश्न,सरकार कैसे चलेगी? आप वादे कैसे पूरे करेगी? वादे  व्यावहारिक   नहीं.इससे पहले भी इसी प्रकार के प्रश्न मिडिया में थे.आप राजनीतिक दल कैसे बनाएंगे? कैसे चलाएंगे?चुनाव कैसे लड़ेंगे? जीत कैसे मिलेगी? सब कुछ जनता के सामने हैं. होता चला गया.बड़े बड़े राजनीतिज्ञों के करियर पर एक बार तो झाड़ू फेर दी. सवाल अपनी जगह जायज भी थे और आज भी हैं. क्योंकि कई दशकों से ऐसी सोच विकसित ही नहीं हुई कि ऐसा भी हो सकता है जैसा आप कहते हैं. उम्मीद ही नहीं होती थी किसी राजनीतिक दल से कि वह आम जन को वादों और आश्वासन के अतिरिक्त कुछ देगा. इसमें कोई शक नहीं कि आप के भी अभी तक वादे हैं. अब उनको मौका मिला है वे अपने वादे किस प्रकार से पूरे करते हैं उस पर देश की निगाह टिकी है. कितने वादे पूरे होते हैं! सीएम का बंगला,बड़ी सुरक्षा न लेने की बातों पर कितना अमल होता है. अरविन्द केजरी वाल सीएम बनने के  बाद आम जन को कितना उपलब्ध होते हैं,यह  कुछ दिन बाद पता लगेगा किन्तु इतना जरुर है कि राजनीतिक लोगों के प्रति बढ़ते अनादर के इस दौर में कुछ तो ऐसा हुआ है जिसकी वजह से आम आदमी आप के किसी नेता को अच्छी नजर से अभी देखे चाहे ना लेकिन देखने के बारे में  सोच तो सकता है.भ्रष्टाचार से तंग आया आम आदमी उससे निजात पाने के सपने एक बार फिर देखने लगे तो बुरी बात क्या है. अभी शुरुआत है. ठीक वैसी ही जैसी 1985 -86 में असम में हुई थी जब कॉलेजियट ने सरकार बनाई और चलाई थी.आप के माध्यम से राजनीति में एक नई पूरी तरह उजली सुबह की उम्मीद तो कर ही सकते हैं.दिन आगे कैसे बढ़ेगा?वह कैसा होगा? उसमें क्या कुछ घटित होगा? कौन चलेगा कौन नहीं,शाम, और रात कैसी आएगी? यह थोडा समय बीत जाने के बाद आप और हैम के सामने आ जाएगा.  

Saturday, 14 December, 2013

आप की ईमानदारी देश पर अहसान नहीं है


श्रीगंगानगर-किसी काम में,बात में  मीन मेख निकलना सबसे आसान है. करना कुछ भी नहीं.  बस ऊँह बोल के  गर्दन ही तो उधर घुमानी है झटके से. दूसरे की बात हो या काम हो गया उसका तो बंटाधार. देता रहे सफाई. जैसे मैदान में क्रिकेट खेल रहे खिलाडियों के खेल पर हम लोग टिपण्णी करते हैं, बेकार खेला,. ऐसे नहीं वैसे शॉट मारना चाहिए था. राम लाल की जगह शाम लाल से बोलिंग करवाते तो जीत जाते. ऐसी ही सौ प्रकार के कमेंट्स. मैदान के बाहर बात करने में जाता क्या है. मगर जब मैदान में खेलना पड़े तो पता लगे  कि कैसे खेला जाता है. यही मीन मेख निकालने का काम अरविन्द केजरीवाला एंड कंपनी मतलब आप  कर रही है.  महीनों हो गए इनको ऐसा करते हुए. जनता ने सोचा इनको दो मौका. ये बढ़िया चलाएंगे सरकार. क्योंकि हर बात पर नुक्ता चीनी. तो तुम संभाल लो भाई. सुना है और पढ़ा है कि आप  की टीम ईमानदार है. होगी! उनकी क्या किसी की ईमानदारी भी ना तो देश पर कोई अहसान है और ना किसी दूसरे पर. ईमानदार होना ही चाहिए इंसान को.  लेकिन ईमानदारी का ये मतलब तो नहीं कि आप घमंड में चूर हो जाओ. ईमानदारी के गुरुर में रहो. ईमानदारी का नशा आपके सर चढ़ कर बोलता रहे और जनता सुनती रहे. वह सब जो आप बोलते हैं. कितने दिन हो गए जनता की निगाह आप पर टिकी है. पूरा देश आप की तरफ देख रहा है. आप की वाह वाह हो रही है. मगर ये तो कोई राजनीति नहीं है कि ना समर्थन देंगे ना लेंगे. जनता ने जो दिया उसको सर माथे लगा चुचकारो. उसको  थैंक्स कहो. जैसी स्थिति है उसके अनुसार आगे कदम बढ़ाओ. ये क्या मजाक है कि ना खुद सरकार बनानी ना किसी को बनाने  देनी. जनता  ऐसे ही चाहती है तो ऐसे ही काम करके दिखाओ. रोज हर किसी की मीन मेख निकालने वाले आप को जब जनता ने मौका दिया तो पलायन के बहाने खोजने लगे. आप जब से उप-राज्यपाल से मिल के आए हैं तब से तो हालत ख़राब ही हो गई. कहते हैं बीजेपी-कांग्रेस के प्रस्ताव को जनता के बीच लेकर जाएंगे. दिल्ली के विभिन क्षेत्रों में सभा कर जनता से सरकार बनाने के बारे में पूछेंगे. लो कर लो बात. श्रीमान जी आपकी पार्टी को जो सीट मिली है वह जनता का  जवाब ही तो है.अब नए जनमत की क्या जरुरत पड़ गई.जनता ने  तुम्हे चुनकर जिम्मेदारी दे दी. अब बनाओ सरकार या बैठो विपक्ष में.जो निर्णय करना है करो विवेक से.कुछ करके दिखाओ. फिर जाना जनता के बीच.आप को जनता का निर्णय मिल जाएगा.  आप ने एक बार जनता के सामने काम किया तो उसने सर आँखों पर बैठाया. अब जो काम सौंपा है उसे शुरू करो. यूं बार बार जनता के बीच में जाने का मतलब कि आप में   आत्म विश्वास नहीं है. आप अपने आप को सरकार चला पाने के योग्य नहीं समझते.कहीं ऐसा ना हो कि जनता आप को ऐसा कर दे कि फिर कभी कोई उसे याद ही ना करे.लोकतंत्र में जनता की भावनाओं का सम्मान ही सबसे बड़ी बात है.परन्तु आप को पता नहीं क्या हुआ है. 

Monday, 9 December, 2013

चिंता करण दी कोई लोड़ नई...


श्रीगंगानगर-दोपहर के लगभग बारह बजने को है. गांव के अंदर घुसते ही मैदान में चारों तरफ गाड़ियां ही गाड़िया खड़ी हैं. लोगों के अलग अलग झुण्ड आपस में चर्चा करते हुए. चबूतरे पर बड़ी संख्या में लोग एक व्यक्ति को घेर कर बैठे हुए हैं. व्यक्ति ने सर पर कोई टोपी ले रखी है और कन्धों पर ड़ाल रखा है एक शॉल.कोई आकर हाथ मिलाता है कोई प्रणाम करता है.कुछ लोग उठते हैं तो दूसरे बैठ जाते हैं. विचार विमर्श होता है. बात चीत चलती रहती है. कुछ क्षण पश्चात टोपी वाला व्यक्ति उठता है और विनम्रता से ये कहता है कि सर पर पानी ड़ाल लूं,नहा लूं, कुछ खा के दवा ले लूं. तब तक आप करो आपस में बातचीत. इतना कह वे अंदर घर के अंदर की तरफ चले, रस्ते में कोई उदास व्यक्ति मिला. उसका कंधे पर हाथ रख बोले, फेर की होआ...हार जित होंदी रहंदी ए. इतना कह वे अंदर चले गए. ये था 25 बीबी गांव. जहां सुबह से लोगों का तांता लगा हुआ था गुरमीत सिंह कुन्नर से मिलने का. श्री कुन्नर वहीं सुबह से ही लोगों से मिल रहे थे जहां हमेशा मिला करते थे. . चेहरे पर हलकी मुस्कान लिए.अंदर गुरमीत सिंह कुन्नर की बीवी बलविंदर कौर की हिम्मत तो इससे भी बढ़कर. चेहरे पर मुस्कान से स्वागत. पराजय की कोई टेंशन नहीं. वहीँ अंदाज मिलने का और वही चाय लस्सी पिलाने का.बस एक वाक्य में ही उन्होंने जैसे सब कुछ कह दिया, गहलोत सरकार ही हार गई. हमारी क्या बात है. वैसे भी हार की चिंता,गम टेंशन वो करे जिसके लिए राजनीति कमाई का साधन है. हमने क्या करना था. पल्ले से लगे तो लगे. सुबह से शाम तक लोग आते थे. फोन पर काम हो जाता था. हार जीत की कोई बात नहीं,बस सब के सब खुश रहें और किसी को कोई दुःख ना हो.यही बहुत है. चुनाव तो आते जाते रहते हैं. हार के बारे में कोई उनसे थोड़ा अफ़सोस करे भी तो यही कहते हैं वे सब, चिंता करण दी कोई लोड़ नई. इस बीच कुछ महिलाएं आती हैं और वे खड़ी हो उनसे मिलने के लिए चली जाती हैं.उनके चेहरे से ये नहीं लगता कि कुछ घंटे पहले उनके पति मंत्री थे और अब पराजित कांग्रेस प्रत्याशी. घर में वैसी ही चहल पहल और रौनक. नहीं थी तो वह सरकारी लाल बत्ती वाली गाड़ी. एक व्यक्ति ने तो गुरमीत सिंह से गांवों के दौरे का प्रोग्राम बनाने को कहा. गुरमीत सिंह बोले,अभी नहीं. एक महीने बाद. उनके आस पास भीड़ देख कर कोई अंजान व्यक्ति ये नहीं कह सकता कि ये एक दिन पहले चुनाव में हारे हुए किसी व्यक्ति के यहां है. एक साइड में दो चार व्यक्तिचुनाव की समीक्षा करने में लगे थे. गत चुनाव के बाद और आज के दिन में एक फर्क जरुर था वो ये कि उस दिन काफी लोग फूल माला भी लेकर आये थे. किसी के हाथ में मिठाई भी थी. वह आज नहीं था.भीड़ के लिहाज से आज का दिन उन्नीस नहीं इक्कीस ही कहा जा सकता है.

विधायक को चुन कर भूल जाते हैं हम


श्रीगंगानगर-अब तक चुने गए चौदह विधायकों में से सात विधायक सत्ता पक्ष के साथ रहे और पांच विपक्ष में बैठे. दो को इनमें से किसी भी श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. क्योंकि इनमें से एक तो निर्दलीय था और आज चुनी गई नई विधायक जमींदारा पार्टी की है. अब ना तो निर्दलीय को विपक्षी माना जा सकता है और ना जमींदारा को. इनको सत्तारूढ़ पार्टी का तो किसी भी हालत में नहीं कहा जा सकता. जनता किस को चुनती है ये उसका अधिकार है. लेकिन चुनने के बाद हाय तौबा मचाए कि हाय हमारे विधायक तो विपक्षी ही होते हैं.हाय-हाय वे तो किसी काम के नहीं. तो भाई उनको चुनता कौन है! आप और हम ना! और तो और हम उनको चुन कर भूल और जाते हैं. विधायक कुछ करे ना करे,जनता चुप्प. आज तक इस शहर के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ जब आम मतदाता ने किसी विधायक के पक्ष या विपक्ष में कोई आवाज उठाई हो. कुछ करे तो उसको शाबाशी नहीं देनी और कुछ ना करे तो लानत नहीं भेजनी. हम तो चुन कर भूल जाते हैं. कोई सही बात करे भी तो उसकी आवाज में आवाज नहीं मिलानी. यह किसी का कसूर नहीं. यहां का कल्चर ही ऐसा है. अब भी ऐसे ही होना है. किसको याद रहेगा कि जमींदारा पार्टी ने इस क्षेत्र को डबल डेकर नहर बना कर देने की बात कही है. ये भी भला कौन याद रखेगा कि इसी पार्टी ने पाक प्रधानमंत्री से मिलकर 2014 में हिन्दुमलकोट बॉर्डर खुलवाने का वादा किया है. हम तो कभी उन विधायकों के सामने ही नहीं बोले जो पूरा दिन नगर की सड़कों पर पैदल घूमते मिल जाया करते थे. उनको भी कुछ नहीं कहा जो कई दशक से नगर को चंढीगढ़ का बच्चा बनाने के सपने दिखाते रहे हैं. फिर नए को तो कहने की हिम्मत ही किसकी होगी. वह भी उसे जो ना तो गंगानगर में रहता है और ना उन तक सीधे किसी की अप्रोच है.अभी तो विधायक बने हैं सम्भव है वे जनता से सीधा संवाद रखने का कोई जरिया बनाएं.वैसे हमारी जनता इस बात की परवाह भी नहीं करती. क्योंकि हम तो चुन कर भूल जाते हैं. आज तक किसी को कुछ भी नहीं कहा. अब क्या कहेंगे. हमें काम भी क्या हैं जो उनको पास जाएं. वैसे आपको बता दें कि जो पहले दो विधायक कांग्रेस के रहे. तब प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता थी. 1962 में निर्दलीय केदारनाथ विधायक चुने गए थे. उसके बाद भी वे दो बार चुने गए. तब प्रदेश में कांग्रेस सरकार थी और हमारे विधायक दूसरी पार्टी के. 1977 ,1980 में उसी पार्टी का विधायक चुना गया जिसकी सरकार बनी. 1985 में फिर विधायक किसी और पार्टी का और सरकार कोई और. 1990 में यहां का विधायक सत्तारूढ़ पार्टी का था. 1993 में गंगा घर चल के आई.हमें ऐसे व्यक्ति को विधायक चुनने का मौका मिला जिसे मुख्यमंत्री बनना था. हमने उसे तीसरे नंबर पर धकेल दिया. 1998 में हमारा विधायक सत्तारूढ़ पार्टी का था. जो मंत्री भी रहा. 2003 में भी यही स्थिति थी. बीजेपी का विधायक और सरकार भी इसी पार्टी की. 2008 में फिर उलटा. विधायक बीजेपी का और सरकार कांग्रेस की.इस बार तो और भी अलग हो गया. विधायक जमींदारा पार्टी की. आईपीएस की बीवी और सरकार बीजेपी की. हम फिर चुप रहेंगे. क्योंकि हमें तो विधायक को चुन कर भूल जाने की आदत है. 

Thursday, 5 December, 2013

सालों बाद समझा
तेरी उस ख़ामोशी का अर्थ,
मेरी नादानी ने
मुझे गुनहगार बना दिया .