Friday 28 January 2011

हिन्दुमलकोट बोर्डर खोलने का आग्रह


जयपुर-राजस्थान के कृषि विपणन मंत्री गुरमीत सिंह कुनर ने केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा को पत्र लिख कर श्रीगंगानगर जिले के हिन्दुमलकोट बोर्डर से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार आरम्भ करने की सुविधा प्रदान करने का आग्रह कियाहै। श्री कुनर ने अपने पत्र में श्री शर्मा को बताया है कि भारत-पाक सीमा पर स्थित हिन्दुमकोट ग्राम आजादी से पूर्व व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। कपास मंडी के रूप में इसकी दूर दूर तक पहचान थी। आजादी के बाद कारोबार जगत की प्रमुख मंडी एक ग्राम बन कर रह गई। श्री कुनर का कहना है कि श्रीगंगानगर जिले में नरमा,कपास,गेंहू,मुंग,मोठ,सरसों,मूंगफली आदि फसलों का उत्पादन बहुत बड़ी मात्रा में होता है। यहाँ की कृषि जिंसों का निर्यात पाकिस्तान को लगातार हो रहा है। लेकिन इनका निर्यात अन्य स्थानों से होता है इसलिए परिवहन व्यय की वजह से इनकी कीमत बढ़ जाती हैं। श्री कुनर ने केन्द्रीय मंत्री को बताया कि मुनाबाब-खोखरापार मार्ग बाघा चौकी से दोनों देशों के बीच व्यापार आरम्भ होने के बाद से राजस्थान और पंजाब में कारोबार बढ़ा है। श्री कुनर ने पत्र में कहा है कि यदि हिन्दुमलकोट बोर्डर व्यापार के लिए खोल दिया जाये तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रीगंगानगर में उत्पादित कृषि जिंसों का कारोबार बहुत अधिक बढ़ जायेगा। जिस से इलाके के किसान और व्यापारी लाभान्वित होंगे। श्री कुनर ने श्री शर्मा से इस बारे में जल्दी कार्यवाही करवाने का आग्रह किया है।

Thursday 27 January 2011

अधिकारियों का समूह चित्र

श्रीगंगानगर--चार दशक पहले प्राइमरी स्कूल में पांचवी की अंतिम परीक्षा से पहले चौथी कक्षा के विद्यार्थियों ने पांचवी को विदाई पार्टी दी। उस दिन पांचवी के विद्यार्थियों ने मास्टरों के साथ समूह चित्र खिंचवाया। क्योंकि पांचवी के बाद सब यहाँ से चले जाने थे। कौन कहाँ जायेगा,फिर मिलेगा या नहीं? इसलिए चित्र के लिए सभी में उत्साह था। ताकि याद बनी रहे। ऐसा ही दृश्य गणतंत्र दिवस पर कलेक्टर की कोठी पर उस समय साकार हो गया जब सभी प्रशासनिक अधिकारियों ने कलेक्टर के साथ ग्रुप फोटो खिंचवाया। इसके लिए अधिकारियों को बुलाया गया। ज्याणी जी को आवाज लगाकर एक अधिकारी बोला, ज्याणी जी के बिना सब अधुरा है। इनमे फोटो के लिए ठीक वैसा ही जोश देखने को मिला जो पांचवी के बच्चों में था। ये तो फोटो खिंचवाने वाले जाने या सरकार कि कौन कौन विदा होने वाला है!
इस बार कलेक्टर के यहाँ कांग्रेस का कोई नेता,कार्यकर्त्ता नहीं पहुंचा। उनमे से भी कोई नहीं जो शादी के जश्न में इन्ही अधिकारियों की मेजबान के रूप में आव भगत में लगे थे। कांग्रेस का कोई धड़ा नहीं था। यूँ लगा जैसे समारोह का अघोषित बहिष्कार कर रखा हो। पूर्व,वर्तमान जिला प्रमुख को गिनती में शामिल ना करें तो बीजेपी का भी कोई बंदा नहीं था। यह अचरज की बात थी। निर्दलीय सभापति के साथ एक दो पार्षद आ गये थे बस। हर बार कलेक्टर,मंत्री या अन्य वीआईपी सोफे पर बैठते हैं। उनसे निकटता जताने के लिए जानकर लोग सोफे के आस पास वाली कुर्सियों पर कलेक्टर के आने से पूर्व ही बैठ जाते हैं। इस बार भी यही हुआ। किन्तु इस बार कलेक्टर उनसे अधिक चतुर है। वे सोफे पर बैठने की बजाये खड़े ही रहे। लोग अपने साथ लाये फोटोग्राफरों से कलेक्टर के निकट खड़े होकर फोटो उतरवाते रहे। एस पी साहब आये नहीं अभी इसलिए उनका ज़िक्र तब जब वे आ जायेंगें। फ़िलहाल तो डिप्टी राजेन्द्र सिंह कलेक्टर के लाडले बने हुए हैं। यूँ दीक्षा कामरा भी हैं। लो एस पी भी पहुँच गए। बदन पर पठानी सूट, पैरों में तिल्ले वाली पीली जूती। कोई कह ही नहीं सकता था कि ये इनोसेंट दिखने वाला सिख नौजवान श्रीगंगानगर जैसे जिले का एस पी है। उनके आने तक आधे से अधिक लोग जा चुके थे। कलेक्टर ने उनके साथ जलपान लिया। एक बात और अधिक हैरान कर देने वाली थी। वह यह कि इस बार कांडा बंधू नहीं आये। अशोक गहलोत के झटके का असर है या कोई जरुरी काम आन पड़ा,कौन जाने! मनिन्द्र कौर नंदा यह बताना नहीं भूलती थी कि वे एक माह कि विदेश यात्रा करके आई हैं। श्री कृष्ण लीला एंड कंपनी को पहली बार देखा गया। वे दो अम्बुलेंस कलेक्टर की मार्फ़त जनता का समर्पित करवाने आये थे। कलेक्टर के झंडी दिखाते ही वे वहां से चले गए। कलेक्टर के साथ एक झंडी डीवाईएसपी राजेन्द्र सिंह के हाथ में भी थी। अचानक सभापति भी आ गए। राजेन्द्र सिंह ने अपनी झंडी उनको पकड़ा डी। इसके साथ ही फोटो में कई चेहरे बढ़ गए। गणतंत्र और स्वतन्त्र दिवस के मुख्य समारोह के बाद कलेक्टर निवास पर जलपान समारोह होता है। झंडा फहराने के लिए कोई मंत्री आया हो तो यहाँ आने वालों की संख्या अधिक होती है। समारोह में कौन आ सकता है,कौन नहीं? किसको किस कारण से निमंत्रण दिया जाता है। इस बारे में कुछ खास नहीं मालूम। ये पता जरुर है कि हर बार पुरानी लकीर ही पीटी जाती है। नासिर काज़मी कहते हैं-फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आये,फिर पत्तों की पाजेब बजी तुम याद आए। एसएमएस--एक मेंढक ज्योतिषी के पास गया। ज्योतिषी बोला-बच्चा!आज तेरी किस्मत में एक लड़की है। वो तेरे बारे में सबकुछ जानना चाहती है। मेंढक ने खुश होकर पूछा-मगर महाराज वो मिलेगी कहाँ? ज्योतिषी ने गंभीरता से कहा,बायो लैब में।

Tuesday 25 January 2011

सम्मान! कोई कारण भी तो हो

श्रीगंगानगर--प्रशासन के छोटे -बड़े वे बाबू इसे अपने दिल पर ना लें जो मन,कर्म,वचन से भ्रष्ट आचरण से बचने की कोशिश में लगे रहते हैं। भ्रष्टाचार कभी का शिष्टाचार बन कर सिस्टम का जरुरी हिस्सा मान लिया गया है। आज २६ जनवरी है। गणतंत्र दिवस है। वह संविधान लागु हुआ जो राजनेताओं की वोटों की लालसा के चलते बार बार संशोधित होता रहा है। इसी दिन प्रशासन उन लोगों को सम्मानित करता है जिन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया हो। प्रशासन हर साल जिनको यह सम्मान देता है उनमे अधिकांश उसके अपने सरकारी कर्मचारी होते हैं। इस बार ३८ में से २१ प्रशासन के अपने हैं। कोई ये पूछने वाला नहीं कि इन्होने ऐसा क्या किया जिसके लिए इनको सम्मान के लायक समझा गया। सरकार का जो काम ये करते हैं उनकी तनख्वाह लेते हैं। जिसकी सेलरी लेते हैं उसका काम करना ही पड़ेगा। सरकारी काम के अलावा इन सम्मानित कर्मचारियों ने समाज,राज्य,देश के लिए क्या उल्लेखनीय,वन्दनीय,सराहनीय कर्म किया? अगर है तो फिर प्रशासन ही क्यों उसको तो हर स्थान पर सम्मान मिलना चाहिए।हर साल यही होता है। बारी बारी से सभी कर्मचारी सम्मानित हो जाने हैं। कितनी हैरानी की बात है कि इतने बड़े जिले में प्रशासन को केवल अपने कर्मचारी ही क्यों नजर आते हैं? जिले में अनेक प्रकल्प समाज के लिए चलाये जा रहे हैं। परिवार अपने परिजनों की मृत देह का संस्कार करने की बजाये शिक्षा के लिए उसको दान कर इस बात को झूठा साबित करने में लगे हैं की मरने के बाद आदमी किसी काम का नहीं रहता। मतलब पशु से भी गया बीता है। ये तो बस उदाहरण हैं। प्रशासन तो बहुत कुछ पता करवा सकता है। किन्तु वह अपने तालाब से बाहर निकले तभी ना। निहाल हो गया-- गौड़ साहब के तीन ख्याल, बनवारी,जे पी ,शिवदयाल। शिवदयाल पहले निहाल हो चुका है। जे पी कल हो गया अपने बेटे की शादी का जश्न देख कर। साधारण से इस आदमी के परिवार ने कभी ख्वाब में भी इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि उसके बुलावे पर सब चले आयेंगे। सुखवंत पैलेस के गेट पर बावर्दी सिपाही सिटी बजाकर आने वालों के वाहन ठीक से लगवा रहा था। प्राइवेट वाहनों की तो गिनती ही क्या लाल बत्ती का ताज लगाए सरकारी वाहन भी कांग्रेस ब्लाक अध्यक्ष के यहाँ आकर गौरवान्वित हो भी रहे थे और गौरवान्वित कर भी रहे थे। जिला कलेक्टर सहित नागरिक,पुलिस प्रशासन के अधिकारी,कर्मचारी जे पी श्रीवास्तव को बधाई देने पहुंचे हुए थे। विधायक राधेश्याम गंगानगर के अलावा बीजेपी के कई नेता भी वहां थे जो पहले कांग्रेस में रहे थे । वर्तमान में गौड़ साहब से जुडा हर छोटा बड़ा नेता कार्यकर्त्ता तो था ही इस जश्न में। शायद जे पी को पहली बार अहसास हुआ होगा कि वो खुद क्या चीज है आज के दिन। उसके लिए तो यह सब एक सपने जैसा था। ऐसा सपना जिसके ख़त्म होने की कोई नहीं सोचता।

तिरंगा ना फहराना

--- चुटकी---

लाठी,गोली
बम
कुछ भी चलाओ,
बस
लाल चौक पर
तिरंगा
न फहराओ।

Monday 24 January 2011

राजनीति की अपनी जुबां है

श्रीगंगानगर-राजनीति है ही ऐसी,कई बार वाणी के स्थान पर मौन, बोडी लैंग्वेज , चेहरे पर आते जाते भाव बहुत कुछ कह जाते हैं। जैसे गत दिवस मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किया। छब्बे जी बन जाने के उम्मीद पाले एक इन्सान को एक बार तो दूबे जी बना दिया। उन्होंने पंचकोसी से लौटते समय ज्योति कांडा के यहाँ चाय पीने का अनुरोध स्वीकार कर लिया, केवल चाय और कुछ भी नहीं। वापसी के समय उन्होंने इस बारे में पता भी करवाया क़ी चाय का ही इंतजाम है या और कुछ भी। श्री गहलोत और उनके पर्सनल स्टाफ को आयोजकों ने बार बार यही विश्वास दिलाया गया कि केवल चाय ही है। श्री गहलोत ने गाड़ी रुकवाई और कारखाने में चले गए। वहां तो मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए कलियाँ ,फूल बिछे थे। इस से पहले क़ी उनके मंत्री उनके पीछे अन्दर पहुँचते वे तो वापिस आ गए। ये क्या , फटाफट गाड़ी में बैठे और झटपट ये जा वो जा। गाड़ी में उनके साथ बैठे एक मंत्री ने श्री गहलोत को बताया कि फलां मंत्री जी रह गए, जो उनके साथ थे। मगर गहलोत जी फलां मंत्री के लिए भी गाड़ी नहीं रोकी। गाड़ी में मुख्यमंत्री ने अपने सुरक्षा ऑफिसर से इस बात पर नाराजगी दिखाई कि उसने ठीक से पता नहीं किया कि आयोजकों ने केवल चाय ही रखी है या बहुत कुछ। गहलोत जी को निकट से जानने वाले इस बात को जानते है कि कड़क चाय क़ी तलब उनको रहती है। इसी कारण वे सफ़र में अपने साथ थर्मस रखते हैं। किन्तु इसके साथ साथ वे इस बात का भी पूरा ध्यान रखते हैं कि वे कहाँ हैं और किस माहौल में हैं। किसी के अंतिम संस्कार से लौटते समय आम आदमी भी रास्ते में स्वागत सत्कार से परे रहता है ये तो मुख्यमंत्री हैं। जिनके हर कदम पर जन जन की नजर लगी रहती है। इसलिए भड़क गए स्वागत का तगड़ा ताम झाम देखकर। इसमें कोई शक नहीं कि श्री गहलोत कांडा परिवार को जानते हैं। हाँ ये संभव है कि कांडा परिवार के उत्साही सदस्य श्री गहलोत के स्वभाव को ठीक से ना जानते हों। वरना कोई जानबूझकर मेहमान के मूड के प्रतिकूल आचरण करके इस प्रकार अपनी उपेक्षा क्यों करवाता। सुना है कि ज्योति कांडा यू आई टी की चेयरमैनी के दावेदार हैं। वैसे पंचकोसी जाते समय उन्होंने अपना थर्मस साधुवाली में प्रशासन को सौंप दिया था चाय के लिए।मुख्यमंत्री की इस यात्रा की थोड़ी और चर्चा कर लेते हैं। मुख्यमंत्री किसकी गाड़ी में बैठते है,किसको अपने साथ रखते हैं। राजनीति में यह सब बहुत महत्व रखता है। शोक की इस यात्रा का कोई दूसरा अर्थ ना निकले,उन्होंने जयपुर से अपनी गाड़ी यहाँ मंगवा ली थी। लालगढ़ हवाई पट्टी पर मुख्यमंत्री श्री गहलोत लोगों से मिल रहे थे। किसी नेता ने गुरमीत सिंह कुनर को राय दी कि वे मुख्यमंत्री की गाड़ी के निकट खड़े हो जाएं ताकि रवानगी के समय मुख्यमंत्री उनको निकट खड़ा देख अपने साथ बिठा लें। ऐसा करना कुनर के स्वभाव में नहीं था। काफिला यहाँ से रवाना हो गया। कुनर अलग गाड़ी में। साधुवाली में श्री गहलोत का तीसरा नेत्र खुला। उन्होंने खुद कुनर को बुलाया और अपने साथ बिठा कर पंचकोसी की ओर चल पड़े। जयपुर से जल संसाधन मंत्री परसराम मदेरणा भी श्री गहलोत के साथ आये थे। उनके रिश्तेदार विधायक संतोष सहारण ने उनसे गाड़ी में बैठने के लिए निवेदन किया। श्री मदेरणा ने इंकार कर दिया। वे रामलाल जाट के साथ हो लिए। अब इसका कोई कोई भी मतलब निकाले कोई क्या कर सकता है।

कृपा शंकर शर्मा "अचूक" का शेर है-ये कोई खेल नहीं जिंदगी के जीने का,लगी है शर्त तो! सिक्का उछल कर देखो। एस एम एस राजू ग्रोवर का--सूरज मेरे अपनों को पैगाम देना,ख़ुशी का दिन हंसी की शाम देना। जब वो पढ़े प्यार से ये सब ,उनके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान देना।

Wednesday 19 January 2011

फ्लैट सिस्टम अब श्रीगंगानगर में भी


महानगरों में लम्बे समय से बहुमंजिला आवासीय फ्लैट लोगों को अपनी ओर खींचते रहे हैं। अब ऐसा ही कुछ श्रीगंगानगर में शुरू हो रहा है। इसके लिए श्रीगंगानगर को-ऑपरेटिव इंडस्ट्रीयल एस्टेट लिमिटेड ने अग्रसेन टावर निर्मित करने का फैसला किया है। फ्लैट की बुकिंग आरम्भ हो गई है। पहली फ्लैट योजना की जानकारी लेने के लिए इच्छुक व्यक्ति संस्था के पदाधिकारियों से संपर्क कर रहे हैं। पदाधिकारियों को योजना को अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है।

Wednesday 12 January 2011

राजनीति की चटर पटर

श्रीगंगानगर-- क्या यह संभव है कि कोई मंत्री, किसी विभाग का मुखिया सीएमओ को महत्व ना दे! ऐसा नामुमकिन नहीं तो मुश्किल बहुत है। आरपीएस की तबादला लिस्ट के बाद इस प्रकार की चटर पटर कई जगह सामने आई। कुछ समय पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और गृह मंत्री शांति धारीवाल के बीच दूरी या वैचारिक,राजनीतिक मतभेद थे। तब सीएमओ की लिस्ट ही विभाग की तबादला सूची होती थी। जनप्रतिनिधि सीएमओ में डिजायर भेजते। इन दिनों दोनों में सम्बन्ध सामान्य है। इसलिए सी एम आम तौर पर डिजायर सीधे गृह मंत्री को देने का संकेत करते थे। फिर भी मुख्यमंत्री को गृह विभाग से सम्बंधित डिजायर मिलती ही रही। सीएमओ ने किसकी सिफारिश की किसकी नहीं की। यह तो वही जाने । मगर बहुत सी डिजायर का परिणाम नहीं निकला। इस वजह से चर्चा ये होने लगी कि गृह मंत्री सीएमओ की सिफारिश की अधिक परवाह नहीं करते। अब डीजीपी और गृहमंत्री में खटपट की खुसर फुसर है। दोनों एक दूसरे की बात पर कभी कभी कान नहीं धरते। फ़िलहाल जिसकी डिजायर के माफिक नियुक्ति नहीं हुई उनको सी एम के पास जाने को कहा जाता है। वहां तक जाने की हिम्मत कम ही करेंगे। यही तो वे चाहते हैं। तभी तो बड़े अफसर कई स्थानों पर अपने प्यादे फिट करने में सफल हो जाते हैं। हालाँकि इस प्रकार की खटपट को कोई साबित नहीं कर सकता। लेकिन कार्यप्रणाली से कहाँ क्या क्यूँ हो रहा है इसका अंदाजा जरुर लग जाता है।
ये तो पहले सोचते--बी एस पी छोड़ कांग्रेस का पल्लू पकड़कर मंत्री बने विधायक बेबस हैं। ऐसे ही एक मंत्री ने बैठक में सीएम से कहा कि उसके इलाके में छः क़त्ल हो गए। बार बार कहने के बावजूद सीआई नहीं बदला गया। दूसरे मंत्री ने कहा कि दौरे के समय कांग्रेस के दफ्तर खुले नहीं मिलते। असली कांग्रेस का मंत्री बोला, तो अपने दफ्तर में चले जाया करो। इस ताने पर दलबदलू मंत्री को ताव आ गया। आइन्दा हम अपने दफ्तर में ही रुका करेंगे , वह बोला। बैठक के बाद उनको कई शुभचिंतकों ने बताया कि अपना घर छोड़ने का क्या नुकसान होता है।मंत्री तो हैं परन्तु चलने चलाने को तो राम जी का नाम ही है।
बात का बतंगड़--कृषि विपणन मंत्री गुरमीत सिंह कुनर के लिफ्ट में फंसने की खबर ने खासकर इस इलाके में खूब पाठक बटोरे। असल में तो कोई बात ही नहीं थी। श्री कुनर अपने एक अधिकारी के साथ लिफ्ट में दाखिल हुए। लिफ्ट मैन तो था ही। एक मंडी समिति का अध्यक्ष आ गया जो बीजेपी का था। लिफ्ट का बटन दबाया वह चली नहीं। लिफ्ट मैन ने यह कहकर कि वजन अधिक है अध्यक्ष को लिफ्ट से बाहर कर दिया। लिफ्ट फिर भी ऊपर नहीं उठी । लिफ्टमैन खुद भी निकल आया। श्री कुनर ने एक,दो मिनट बटन दबाया,लिफ्टमें कोई हरकत नहीं हुई। श्री कुनर बाहर आ गए। हाँ लिफ्ट में फंसने की खबर छपने के बाद श्री कुनर के पास शुभचिंतकों के फोन बहुत आए। इसके अलावा जो भी उनको मिलता यही सवाल करता, लिफ्ट में कैसे फंस गए? किसी को बता देते किसी के सामने बस मुस्करा कर रह जाते।
अब एक एस एम एस । भेजने वाले का नाम नहीं पता। सन्देश है--एक करोड़ को कहते हैं एक खोखा। पांच सौ करोड़ को एक कोड़ा। अब एक हजार करोड़ का मतलब है एक राडिया। दस हजार करोड़ अर्थात एक कलमाड़ी। एक लाख करोड़ को एक राजा। दस कलमाड़ी प्लस एक राजा बराबर एक शरद पवार ।

Friday 7 January 2011

सुलट" जाने के ख्वाब पर मुस्कान की बर्फ


जयपुर--सचिवालय,मीडिया , राजनीतिक गलियारों के साथ चाय की थडियों पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मुस्कान के चर्चे हैं। एक पखवाड़े से जिस गुर्जर आन्दोलन ने सरकार के अस्तित्व को लगभग नकार दिया था वह समाप्त हो गया। विरोधी, श्री गहलोत के सुलट जाने के सपने देख रहे थे। उनके सपने हकीकत का रूप नहीं ले सके। मुख्यमंत्री की बल्ले बल्ले हो गई। जयपुर से दिल्ली तक आशंका थी कि ये हो जायेगा। वो हो जायेगा। गहलोत विरोधी इसी ये हो जाये,वो हो जाये की इंतजार में थे। दिल्ली में बैठे गहलोत के राजनीतिक विरोधी आलाकमान के कान भरने को उतावले थे। वो नहीं हुआ जो गहलोत के विरोधी चाहते थे। वह हुआ जो मुख्यमंत्री गहलोत की मंशा थी । कड़ाके की ठण्ड के बावजूद सचिवालय में गुर्जर नेता और सरकार गर्मजोशी से मिल रहे थे। जैसे जैसे सूरज अस्त होने लगा। सर्दी का प्रकोप बढ़ा। समझौते की गर्मी बाहर महसूस होने लगी थी। मीडिया कर्मियों ने सुलह पर दोनों पक्षों के दस्तखत होने से पहले ही सब कुछ शांति से निपट गया कहना आरम्भ कर दिया था। जैसे ही सुलह की अधिकृत घोषणा हुई। मुख्यमंत्री को बधाई मिलनी आरम्भ हो गई। श्री गहलोत हल्की मुस्कान के साथ बधाई स्वीकार करते रहे लगातार। कहीं कोई अहंकार नहीं। ना वाणी में ना चलने,उठने ,बैठने में। जो राजनीतिक आन्दोलन में गहलोत के निपट जाने के चर्चे चुपके चुपके करते थे, वे चुप हो गए। लाठी,गोली चलाये बिना आन्दोलन समाप्त करवा कर गहलोत आलाकमान की नजर में हीरो बन गए। उनको बैकफुट पर जाना पड़ा जो फ्रंटफुट पर आने की तैयारी में लग गए थे। हालाँकि श्री गहलोत कब क्या करेंगे कहना मुश्किल है किन्तु अब वे मंत्री परिषद् में फेरबदल, राजनीतिक नियुक्तियां अधिक ताकत से करने में सक्षम होंगे। ऐसा राजनीतिक हलकों में माना भी जा रहा है और लग भी ऐसा ही रहा है। कांग्रेस में अशोक गहलोत मजबूत थे। अब आन्दोलन को शांति पूर्ण तरीके से निपटा कर वे और अधिक मजबूत हुए हैं इसमें कहीं किसी का किन्तु परन्तु नहीं है। बिल्ली को देखकर कबूतर आँख बूंद ले तो अलग बात है।जयपुर के श्री गहलोत की चर्चा के बाद श्रीगंगानगर के "गहलोत" का ज़िक्र ना करें तो ठीक नहीं। एक कार्यकर्त्ता के बेटे का पुलिस वाले ने चालान क्या किया कि गौड़ साहेब पहुँच गए मौके पर। गौड़ साहेब ने तो अपने बन्दे के लिए ठीक किया। राजनीतिक,प्रशासनिक गलियारों में इसको गलत कदम कहा जा रहा है। एक बड़े पुलिस अधिकारी की तो ये टिप्पणी थी " अरे! गौड़ साहेब तो हर जगह पहुँच जाते हैं"। कहने वाले कहते हैं कि गौड़ साहेब को जाने की जरुरत नहीं थी। एस पी को फोन करके पुलिस वाले को वहां से हटवा देते, बात ख़तम। चालान का क्या। वह तो सौ,दो सौ में नक्की हो जाता। पब्लिक रोज ही करवाती है। एक दिन उनका कार्यकर्त्ता करवा लेता तो क्या हो जाता। यूँ भी गौड़ साहेब, उनका चेयरमान कार्यकर्त्ता किसी पुलिस अधिकारी को फोन कर देते तो वह खुद रसीद कटवा कर घर भेज देता। ज़िक्र चल ही निकला तो एक और कर लेते हैं। गौड़ साहेब ने केसरी चाँद जांदू को सी ओ सिटी लगवाने के लिए डिजायर दी। गंगाजल मील ने श्री जांदू की डिजायर सूरतगढ़ के लिए दी। श्री जांदू की नियुक्ति सूरतगढ़ के लिए हो गई। अशोक मीणा की तो कोई डिजायर गई ही नहीं।

Saturday 1 January 2011

कलेंडर के अलावा क्या बदला

श्रीगंगानगर--आओ मन बहलाएं, बदल कर एक कलेंडर नया साल मनाएं । कलेंडर के अलावा आज क्या बदला है? कुछ भी तो नहीं। हजारों घरों में तो कलेंडर भी नहीं बदला होगा। देश- दुनिया के साथ हम अपनी कल वाली सोच लिए वैसे ही तो हैं जैसे कल थे। संभव है बहुत से लोग इसको नकारात्मक कह कर नजर फेर लें। इसके बावजूद दो और दो का जोड़ चार ही होगा तीन या पांच नहीं । सच्चाई यही है कि कलेंडर ही बदला जाता है। हम और कुछ बदलना चाहते ही नहीं। डेट,वार,दिन रात का छोटा बड़ा होना,गर्मी,सर्दी,बरसात,पतझड़,आंधी,तूफान के आने जाने ,उनका अहसास करवाने के लिए प्रकृति कलेंडर बदलने का इंतजार नहीं करती। वह यह सब पल पल ,क्षण क्षण करती ही रहती है। ऐसा तब से हो रहा है जब कलेंडर बदलने का रिवाज आया भी नहीं होगा। जिस नए का अनुभव हमें आज हो रहा है वह नया तो होता ही रहता है। किन्तु हम इसको तभी मन की आँख से देख पाते हैं जब कलेंडर बदलते हैं। जिन घरों में कलेंडर नहीं बदले जाते वहां भी प्रकृति के वही रंग रूप होते हैं जैसे अन्य स्थानों पर। जहाँ कलेंडर बदले जाते हैं संभव है वहां भौतिक साधनों से प्रकृति के असली रंग रूप को अपनी पसंद के अनुरूप ढाल लिया जाता हो। सृष्टी का सृजन करने वाली उस अदृश्य शक्ति के पास तो बहुत कुछ नया है। वह तो इस नए पन से रूबरू भी करवाता रहता है। हम खुद इसे ना तो देखना चाहते हैं ना मिलना। जो नयापन वह शक्ति ,प्रकृति हम हर रोज प्रदान करती है उसको महसूस हम तब करते हैं जब पुराना कलेंडर उतारते हैं। नया कलेंडर ही अहसास है नए साल का। यह अहसास होता नहीं तो करवाया जाता है उनके द्वारा जिनके लिए यह एक बाज़ार के अलावा कुछ नहीं। ये भावनाओं का बाज़ार इस प्रकार से सजाते हैं कि आँखोंऔर दिल को नया ही नया लगता है। बहुत बड़ा बाज़ार हर उत्सव,वार और त्योहार की तरह। ऐसा बाज़ार जहाँ गंजे भी कंघी खरीदने को अपने आप को रोक ना सकें।एक कवि की इन पंक्तियों के साथ बात को विराम दूंगा--रेगिस्तानों से रिश्ता है बारिश से भी यारी है,हर मौसम में अपनी थोड़ी थोड़ी हिस्सेदारी है। अब बैंगलोर से विनोद सिंगल का भेजा एस एम एस --बड़ी सुखी सी जिन्दगी जदों पानी दे वांग चल्दे सी, हुण नित तूफान उठदे ने जदों दे समन्दर हो गए।