Wednesday 29 April 2009

सोनिया--हेमा गर्मी में मत आना

राजस्थान में मतदान ७ मई होगा। आजकल श्रीगंगानगर में गर्मी के तेवर ४५ डिग्री सेल्सियस के आसपास हैं। ऐसे में हमारे देश की महान आयातित नेता [ जो आयातित होता है उसकी वल्यू ज्यादा समझी जाती है] सोनिया गाँधी जी श्रीगंगानगर आने वालीं है। हेमा मालिनी भी इसी दिन आने की बात कर रहीं हैं।इनका एक मई को श्रीगंगानगर आने का कार्यक्रम है। इतनी गर्मी में इनका आना लोगों को परेशान करना जैसा है। ख़ुद इनको भी कम परेशानी नहीं होगी। बेचारे इनके लीडर भी दुखी होंगें। सभाओं में आजकल लोग वैसे ही नहीं आते। इतनी अधिक गर्मी में उनको घरों से कैसे निकला जाएगा। भीड़ कैसे सभा में ली जाए,इसका गणित लगाया जा रहा है। पहले सभा में नीचे दरी तिरपाल बिछाते थे। इन दिओं कुर्सियां लगे जाती है। इसके बावजूद भीड़ आने की उम्मीद नहीं होती।
सोनिया-हेमा जी आप इस देश की महान नेता हैं। आप जनता की परेशानियों को दूर करने के बड़े बड़े वादे करती हो। इस लिए आप जनता की शुभचिंतक हो। उम्मीद है आप दोनों जनता की परेशानी को समझते हुए श्रीगंगानगर नहीं आयेंगीं। क्योंकि आपकी सभा दोपहर को है ऐसे में लोगों का क्या हाल होगा। भयंकर गर्मी में किसी को कुछ चक्कर-वक्कर आ गया तो आपका और आपकी पार्टी का नाम बदनाम होगा। इसलिए अच्छा है आप ४५ डिग्री तापमान के चलते श्रीगंगानगर का दौरा रद्द कर दें। चुनाव तो हर साल आतें हैं, फ़िर कभी आ जाना।ठीक है।

Monday 27 April 2009

जरनैल सिंह को ढेर सारे थैंक्स

सॉरी, जरनैल सिंह जी। जिस दिन आपने गृह मंत्री पर जूता फेंका था उस दिन मैंने आपको बहुत बुरा भला कहा था। मैं नादान था गलती हो गई। तब तो नारदमुनि यही समझता था कि आजकल कौन पत्रकारों का अनुसरण करता है। उनके किए और लिखे पर कौन ध्यान देता है? अब समझ आ रहा है कि नारदमुनि तू कितना ग़लत था। उस दिन तो जरनैल सिंह ने जूता फेंक कर देश में एक नई क्रांति की शुरुआत की थी। हम इराकी नहीं हैं जो एक बार में बस कर जायें,हम तो वो हैं जो एक बार कोई बात पकड़ लें तो उसका पीछा नहीं छोड़ते। हाँ, बात ही हमारा पीछा छोड़ दे तो अलग बात है। तो जरनैल सिंह जी आपने जो कुछ पत्रकार के नाते लिखा होगा उसका असर कभी हुआ या नहीं आपको पता होगा, लेकिन आप इस बात की खुशी तो मना ही सकतें हैं कि आपके किए का असर हुआ और लोग भी अब आपके पद चिन्हों पर चल रहें हैं। किसी के लिए इस से ज्यादा खुशी और क्या हो सकती है कि देश वासी उसका अनुसरण कर रहें हैं। जरनैल सिंह जी,नारदमुनि दर दर भटकने वाला अज्ञानी है। आपको कोई सलाह , सुझाव,राय देना सूरज को दीपक दिखाना है। फ़िर भी कुछ कहने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। जरनैल सिंह जी आप के पास समय हो तो जूता फेंकने के सम्बन्ध में कुछ टिप्स लोगों को देन। आपने देखा कि आपके जूते ने जितना असर दिखाया था उतना किसी के जूते ने नहीं। इसलिए आप सबको बताओ कि जूता किस एंगल से फेंका जाए। जूता फेंकने वाला नेता से कितनी दूरी पर हो। जूते का वजन लगभग [ मोटे रूप में ] कितना हो। कौनसा समय उत्तम होता है जूता फेंकने के लिए। जूता कोई खास कंपनी का हो या कोई भी कंपनी चलेगी। आप कोई रिकमंड करो तो...... । जूता फेंकने के लिए पहले क्या तैयारी करनी जरुरी है। जूता फेंकने वाले को क्या क्या सावधानी रखनी चाहिए। जूता नया हो या पुराना,या फ़िर नेता की शक्ल सूरत के हिसाब से नया पुराना तय करें।हो सके तो कोई किताब ही लिख डालो। क्योंकि आपके मार्ग दर्शन के बिना जूता क्रांति दम तोड़ सकती है। हम नहीं चाहते कि पत्रकार द्वारा शुरू की गई क्रांति बे असर रहे। जरनैल सिंह जी थोड़ा लिखा ज्यादा समझना। उम्मीद है आप करोड़ों देशवासियों की उम्मीद नहीं टूटने देंगें। कीमती समय में से थोड़ा सा समय निकाल कर मार्गदर्शन जरुर करेंगें।

Sunday 26 April 2009

दिल की बात आलू के बहाने

पड़ोसन अपनी पड़ोसन से चार पांचआलू ले गई। कई दिनों बाद वह उन आलुओं को वापिस करने आई। मगर जिसने आलू दिए थे उसने आलू लेने से इंकार कर दिया। उसके अनुसार आलू वापिस करना उनके अपमान के समान है। बात तो इतनी सी है। लेकिन है सोचने वाली। क्योंकि उन बातों को अधिक समय नहीं हुआ जब पड़ोसियों में इस प्रकार का लेनदेन एक सामान्य बात हुआ करती थी। यह सब बड़े ही सहज रूप में होता था। इस आपसी लेनदेन में प्यार, अपनापन,संबंधों की मिठास छिपी होती थी। किसी के घर की दाल मोहल्ले में ख़ास थी तो किसी के घर बना सरसों का साग। फ़िर वह थोड़ा थोड़ा सबको चखने के लिए मिलता था। शाम को एक तंदूर पर मोहल्ले भर की महिलाएं रोटियां बनाया करती थीं। दोपहर और शाम को किसी ने किसी के घर के चबूतरे पर महिलाओं का जमघट लग जाता था। पास की कहीं हो रहा होता बच्चों का शोर शराबा। पड़ोस में शादी का जश्न तो कई दिन चलता। मोहल्ले की लड़कियां देर रात तक शादी वाले घर में गीत संगीत में डूबी रहतीं। घर आए मेहमानों के लिए,बारातियों के लिए घर घर से चारपाई,बिस्तर इकठ्ठे किए जाते। किसी के घर दामाद पहली बार आता तो पड़ोस की कई लड़कियां आ जाती उस से मजाक करने। कोई नहीं जाती तो उसकी मां, दादी, चाची ताई लड़की से पूछती, अरे उनके जंवाई आया है तू गई नी। जा, तेरी मासी[ पड़ोसन] क्या सोचेगी। तब आंटी कहने का रिवाज नहीं था। तब हम रिश्ते बनाने में विश्वास करते थे। कोई भाभी थी तो कोई मामी हो जाती। इसी प्रकार कोई मौसी,कोई दादी, कोई चाची, नानी आदि आदि। पड़ोस में नई नवेली दुल्हन आती तो गई की सब लड़कियां सारा दिन उसको भाभी भाभी कहती हुई नहीं थकती थीं। गली का कोई बड़ा गली के किसी भी बच्चे को डांट दिया करता था। बच्चे की हिम्मत नहीं थी कि इस बात की कहीं शिकायत करता। आज के लोगों को यह सब कुछ आश्चर्य लगेगा। ऐसा नहीं है, यह उसी प्रकार सच है जैसे सूरज और चाँद। आज सबकुछ बदल गया है। केवल दिखावा बाकी है। हम सब भौतिक युग में जी रहें हैं। लगातार बढ़ रही सुविधाओं ने हमारे अन्दर अहंकार पैदा कर दिया है। उस अहंकार ने सब रिश्ते, नातों, संबंधों को भुला दिया , छोटा कर दिया। तभी तो पड़ोसन अपनी पड़ोसन को आलू वापिस करने आती है।

Thursday 23 April 2009

जंगल में हो रहें हैं चुनाव

सियार ने खरगोश को दुलारा
शेर ने हिरण को पुचकारा
भेड़िये देख रहें हैं
राजा बनने के ख्वाब,
हे दोस्त, जंगल में
कैसे आया इतना बड़ा बदलाव।
लोमड़ी मेमने को गले लगाती है
बिल्ली चूहे के साथ नजर आती है
सूअर बकरी के साथ
घास खा रहा है जनाब,
हे दोस्त ,जंगल में
कैसे आया इतना बड़ा बदलाव।
सुनो भाई,इन जानवरों में
अब भी वैसा ही मरोड़ है
जो दिख रहा है वह तो
कुर्सी के लिए गठजोड़ है,
नकली है इनका भाई चारा
बस क्षणिक है ये बदलाव
सच तो ये है दोस्त
जंगल में हो रहें हैं चुनाव।

Tuesday 21 April 2009

किराये पर कार्यकर्त्ता, ऑफिस शुरू

videoराजनीतिक दलों की सुविधा के लिए श्रीगंगानगर में रतन नागौरी नामक आदमी ने एक कारोबार आरम्भ किया है। कारोबार है, किराये पर कार्यकर्त्ता उपलब्ध करवाने का। जी हाँ, श्री नागौरी सभी दलों को बिना किसी भेदभाव के किराये पर कार्यकर्त्ता "सप्लाई" करेंगें। सब जानते हैं कि भीड़ जुटाने के लिए नेता जी को अंटी ढीली करनी पड़ती है। अब तक यह काम पर्दे के पीछे से होता था। अब यह सब कुछ बाकायदा व्यावसायिक तरीके से होगा। क्यों हैं ना मजेदार बात। सही बात है जब राजनीति पेशा बन गई है तो फ़िर कार्यकर्त्ता पेशेवर क्यों ना हों। उन्होंने क्या कसूर किया है। मलाई नेता खाते हैं,तो खुरचन खाने का अधिकार तो कार्यकर्त्ता को मिलना ही चाहिए। उम्मीद है श्री नागौरी का यह कारोबार खूब चलेगा। मंदी का असर फिलहाल इन पर नही होगा। चुनाव है भाई।

Monday 20 April 2009

नेता की औलाद है तू

--- चुटकी----

ना हिंदू बनेगा
ना तू
मुसलमान बनेगा,
नेता की औलाद है
तू नेता बनेगा।
ना जन की सुनेगा
ना गण की सुनेगा,
जिस से मिलेगा फायदा
तू उस मन की सुनेगा।

Sunday 19 April 2009

महंगाई है महंगाई

सालों पहले रोटी कपड़ा और मकान फ़िल्म में एक गाना था। उस गाने में कहा गया था...... पहले मुठ्ठी में पैसे लेकर थैला भर शक्कर लाते थे,अब थैले में पैसे जाते हैं और मुठ्ठी में शक्कर आती है।
एक फ़िल्म और थी, गोपी। उसका गाना था....रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा, हंस चुगेगा दाना तुनका कौव्वा मोती खायेगा। इसी गाने में कहा गया था.....चोर उच्चके नगर सेठ और प्रभु भगत निर्धन होंगें,जिसके हाथ में होगी लाठी भैंस वही ले जाएगा.....
क्या कमाल की बात है कि जो आज हो रहा है वह हमारे गीतकारों ने उसकी कल्पना सालों पहले ही कर ली थी। उक्त गानों के ये बोल हमारे आज के जीवन में पूरी तरह से फिट है। वैसे इन बातों को ऐसे भी कह सकतें हैं कि घोडों को घास नहीं मिलती और गधे गुलाबजामुन खा रहे हैं।

Saturday 18 April 2009

देख तमाशा जूते का

रतलाम,झाबुआ एवं दाहोद [गुजरात] से प्रकाशित "प्रसारण" अखबार के १२ अप्रैल के अंक में जरनैल सिंह के जूते को खास महत्व दिया है। अखबार ने सन्डे मैगजीन "समग्र" में एक दर्जन से अधिक चुनिन्दा चिठ्ठों की पोस्ट प्रकाशित की। यह सब लेखक के नाम और उसके ब्लॉग के लिंक के साथ प्रकाशित किया गया। इसको प्रस्तुत किया पंकज व्यास ने। श्री व्यास ने बाकायदा अखबार भी भेजा। इस में सरिता अरगरे,राकेश त्रिपाठी,जयराम,अमिताभ फरोग,नारदमुनि जी,गणेश कुमार मिश्रा,केपी चौहान,प्रदीप मिश्र,आदर्श राठोर,कौशलेन्द्र मिश्र,संदीप शर्मा,श्यामल शुक्ल,अक्षतविचार.ब्लागस्पाट.कॉम,तीखीनजर.ब्लागस्पाट.कॉम,सरपंचजी आदि की पोस्ट इस अखबार में प्रकाशित की हैं। अख़बार के संपादक ने दो पृष्ठ पर यह सामग्री दी। अखबार के प्रधान संपादक श्री श्रेणिक कोठारी को साधुवाद। श्री पंकज व्यास को शुक्रिया जिन्होंने इस सब की चर्चा की।

ऐसा तो नहीं होता था

दो दिन से टेंशन में हैं नारदमुनि। टेंशन इस बात कि ये इस देश के राजनेता कौन से स्कूल में और किस से पढ़ते थे। नेता जिस प्रकार से मधुर वाणी बोल रहें हैं उसके लिए यह जानना जरुरी है कि उनको इतनी बढ़िया शिक्षा देने वाले मास्टर जी कौन हैं? ताकि जुबान से रस टपकाने वाले इन नेताओं के मास्टरजी को कुछ सम्मान दिया जा सके अगर उन्होंने शर्म से ऐसा वैसा ना कर लिया हो। बहुत मगजमारी की। इन्टरनेट पर भी खूब तलाश किया। इन नेताओं के कार्यकर्ताओं से पूछा। कोई नहीं बता सका कि ये कहाँ से पढ़ कर आयें हैं। १९७७ से चुनाव में रूचि है। पक्ष - विपक्ष के नेता एक दूसरे के खिलाफ बोलते थे,आलोचना होती थी, उसके जवाब दिए जाते थे। मगर सब कुछ मर्यादा में, एक दूसरे की गरिमा का ध्यान रखते हुए। अब तो ऐसा आभास होता है जैसे ये नेता न होकर किसी मोहल्ले के भाई हो, हफ्ता वसूल करने वाले, जो बीच चौराहे पर एक दूसरे की गर्दन पकड़ कर खडें हैं जनता को अपनी अपनी ताकत दिखाने के लिए। ताकि जनता पर प्रभाव डाल कर हफ्ता की डर बढाई जा सके। पता नहीं ये नेता किस की संगत करते हैं जो ऐसा गन्दा बोलते हैं। या तो इनको पढ़ाने वाले ग़लत थे या इनकी संगत ख़राब रही। सम्भव है उम्र का असर होने लगा हो। कोई ना कोई बात तो जरुर है,वरना भारत के नेता ऐसा तो नहीं बोलते थे। होगा तो कोई एक आधा होगा। अब तो सब के सब एक ही थाली के लगाते हैं। छाज के साथ साथ छलनियाँ भी बोलने लगी है। हमको जय हो बोलना चाहिए कि भय हो। हमारे पास तो कोई और विकल्प भी तो नहीं है। कोई है ऐसा जो इनको समझा और बता सके कि जो वे कर रहें हैं वह ग़लत और पूरी तरह से ग़लत है।

Thursday 16 April 2009

सांई बाबा का चमत्कार, रोटी

श्रीगंगानगर में आजकल सांई बाबा के रोटी वाले "चमत्कार" की गली गली चर्चा है। यह सब कुछ लोगों की आंखों के सामने होता है। गुरुवार के दिन होता है यह सब। चमत्कार है आधी "रोटी" का डेढ़ हो जाना। गुरुवार की शाम को किसी बरतन में वह आधी रोटी रख दी जाती है जो डेढ़ बनी रोटी का हिस्सा हो। "रोटी" के साथ थोड़ी थोड़ी चीनी और चाय पत्ती जरा से पानी के साथ डाल दी जाती है। एक सप्ताह तक सुबह शाम उस बर्तन की पूजा अर्चना की जाती है सांई बाबा के नाम से। फ़िर गुरुवार को वह बरतन खोला जाता है जिसमे आधी रोटी रखीगई थी। बरतन में उस आधी रोटी के साथ एक वैसी ही रोटी और होती है। अगर रोटी आधी से डेढ़ हो गई तो समझो सांई बाबा ने आपकी मन्नत पूरी कर दी। सात दिन तक उस बरतन को खोलना नहीं है। अब जो डेढ़ रोटी है, उसको या तो आधी आधी करके तीन व्यक्तियों को बाँट दो। अगर कोई ना लेना चाहे तो पानी में प्रवाहित कर दो। जो आधी रोटी लेगा उसे सात दिन तक उसकी पूजा करनी होगी। यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहता है। श्रीगंगानगर के कई इलाकों में इन दिनों सांई बाबा के इस "चमत्कार" की धूम मची है। बड़ी संख्या में लोग अपनी मन्नत पूरी करवाने के लिए इस "रोटी" की शरण में जा रहें हैं। जैसे जैसे शरण में आने वालों की संख्या बाद रही है वैसे वैसे "चमत्कार" टॉक ऑफ़ द टाऊन होता जा रहा है।

Wednesday 15 April 2009

पुलिस ने मचाया ग़दर

श्रीगंगानगर जिले में दो स्थानों पर पुलिस ने ग़दर मचाया। पहला ग़दर उसने रात के अंधेरे में एक किसान के घर मचाया। किसी मुलजिम की तलाश में गए इन पुलिस वालों ने घर वालों को इतना पीटा किउनको हॉस्पिटल में भरती करवाना पड़ा। घर के मुखिया ने बताया भी कि वह वो नहीं है जिसकी तलाश में छपा मारा गया। पुलिस ने नहीं सुनी। पुलिस ने महिलाओं के कपडे फाड़ डाले। पुलिस जानती थी कि जिस घर में छपा मारा गया वह मुलजिम का नहीं है। क्योंकि वह पहले भी आ चुकी थी। घटना के तीन दिन बाद तक एसपी को नहीं मालूम हुया। एसपी से इस बाबत जानकारी लेने के लिए बात कि तो उनका कहना था कि दो दिन बाद आना तब तक मैं सारी पड़ताल करवा लूँगा। इस परिवार ने अब गृह मंत्री से लेकर मानवाधिकार आयोग तक से न्याय की गुहार लगाई है। दूसरी घटना में पुलिस ने हिरासत में चार युवको को बुरी तरह पीटा। घायल युवकों के समर्थन में जिले का एक क़स्बा बंद रहा,मिनी सचिवालय को घेरा गया। उसके बाद कहीं जाकर थानाधिकारी और दो उप निरीक्षकों को ठाणे से हटाया गया। यह आन्दोलन किया कांग्रेस विधायक के पिता और पूर्व मंत्री ने। मतलब कांग्रेस की सरकार में कांग्रेस नेता को पुलिस के खिलाफ मैदान में आना पड़ा। इस जिले की हालत इस से अधिक और ख़राब क्या हो सकती है। जबकि यह जिला पाकिस्तान सीमा पर है। आजकल तो वैसे भी चुनाव का मौसम है। पुलिस का अंदाज अब यह है तो बाद में कैसा होगा?

Monday 13 April 2009

खो गया आम आदमी

देश में चुनाव की गहमा गहमी में आम आदमी गुम हो गया है। गाँव से लेकर देश की राजधानी तक इस बेचारे की कोई चर्चा ख़बर नही है। कोई पत्रिका,अखबार,न्यूज़ चैनल देख लो किसी में आम आदमी आपको नहीं मिलेगा। जब वह कहीं नहीं है तो इसका मतलब वह खो गया है। "गुम हो गया", "खो गया", ग़लत है, असल में तो उसको गुम कर दिया गया है। जब राजनीति कारोबार बन जाए,मुद्दे बेअदब चलती जुबान के नीचे दब कर दम तोड़ने लगे,जन हित की बजाये हर हाल में सत्ता को पाना ही लक्ष्य हो तो फ़िर आम आदमी की याद किसको और क्यों आने लगी। बड़े बड़े नेता हर रोज़ पता नहीं कहाँ कहाँ जाते हैं। उनके पीछे पीछे होता है मीडिया। लेकिन इनमे से कोई अगर बाजार जाए [ मॉल नहीं] तो इनको महंगाई से लड़ता फटे हाल में आम आदमी मिल जाता। किंतु किसको समय है आम आदमी के लिए! चीनी ३० रूपये के आस पास आने को है। गुड़ चीनी से आगे निकल गया है। दाल क्यों पीछे रहने लगी, उसने भी अपने आप को ऊपर और ऊपर ले जाना आरम्भ कर दिया। आम आदमी महंगाई से लड़ कर दम तोड़ रहा है, नेता आपस में लड़ रहें हैं। यह हैरानी की बात नहीं कि देश में जिस आम आदमी की संख्या सब से ज्यादा है वही चुनाव से गायब है। उसकी चिंता किसी को नहीं। कोई नेता एक बार बाजार जाकर रोजमर्रा की जरूरत वाले सामान के भाव तो पूछे! पूछ भी लेगा तो उसकी सेहत पर क्या असर पड़ेगा? उसकी जेब से कुछ जाना नहीं है। उसके पास तो आना ही है। उस से तो कोई ये भी नहीं पूछता कि भाई तुम ऐसा क्या काम करते हो जिस से तुम्हारी सम्पति हर पाँच साल में दोगुनी,तीन गुनी हो जाती है। क्या कोई ऐसा दल भी है जो आम आदमी को महंगाई के दल दल से निकल कर उसको थोडी बहुत राहत प्रदान कर सके। उम्मीद तो नहीं है, जिस देश में सरकार आई ऐ एस, आई पी एस के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का ऐलान करती हो वहां आम आदमी की क्या हैसियत है यह अनुमान लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है। हैसियत है ही नहीं। कोई हैसियत होती तो उसको खोजने के लिए अब तक तो पता नही क्या क्या हो चुका होता। आम आदमी गुम ही रहे तो ठीक है उनकी बला से।

Saturday 11 April 2009

धर्मनिरपेक्ष राजनीति की सच्चाई

----चुटकी----

हिन्दुओं को
जितनी अधिक गालियाँ,
आपकी झोली में
उतनी अधिक तालियाँ,
दूसरों को पुचकारो
करो लाड-प्यार,
आपके गले में होंगे
ढेर सारे
फूलों के हार,
यहाँ जो बात
हमने आपको बताई है,
यह कोई
मजाक नहीं
धर्मनिरपेक्ष भारतीय
राजनीति की सच्चाई है।

Friday 10 April 2009

जूता फेंका हुआ बवाल

---- चुटकी----

जूता फेंका
हुआ बवाल
सज्जन,टाईटलर गए
अपने घर जी,
इसी को
कहतें हैं डेमोक्रेसी
व्हाट एन
आइडिया सर जी।

Thursday 9 April 2009

भूत पिशाच निकट नहीं आवै


बुद्धि हीन तनु जानिके
सुमिरो पवन कुमार,
बल,बुद्धि,विद्या देहु मोहिं
हरहु कलेस विकार।

Wednesday 8 April 2009

सिख समाज ने लड्डू बांटे

videoभारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंकने वाले जरनैल सिंह के समर्थन में सिख समाज आगे आने लगा है। श्रीगंगानगर में इस समाज के अनेक व्यक्तियों ने गाँधी चौक पर लड्डू बांटे। "उन्होंने कहा, इस देश में सिखों के लिए इंसाफ ना मुमकिन है। सिख इस देश की अदालतों से भी नाउम्मीद हो गए हैं। ...........जमीर की आवाज पर सिख जो भी फैसला लेंगे विश्व जनमत उसकी अनदेखी नहीं कर पायेगा।" आगामी रणनीति तय करने के लिए सिख समाज की १२ अप्रैल को बैठक होगी। शाम को सोनिया गाँधी,जगदीश टाईटलर, सज्जन कुमार के पुतले जलाये जायेंगें। यहाँ की सिख संगत ने जरनैल सिंह को इक्यावन हजार रूपये का ईनाम देने का ऐलान किया है। इन सबके बीच यह सवाल जरुर जहाँ में आता है कि जरनैल सिंह के स्थान पर कोई गोविन्द,मोहन,राम लाल,लालू राम, छैला मल.........जैसा कोई आम आदमी होता तो क्या गृह मंत्री उसको माफ़ कर देते? चलो माफ़ करना और माफ़ी मांगना तो बडापन है, मगर क्या पुलिस और खुफिया विभाग उसको आधे घंटे में घर जाने देते? ये तो जरनैल सिंह सिख समाज का और पत्रकार था,ऊपर से चुनाव। बात वोटों की हो तो फ़िर क्या कहने।

Tuesday 7 April 2009

शर्मसार हुई पत्रकारिता,नेता बने जरनैल सिंह

दैनिक जागरण के जरनैल सिंह नामक पत्रकार को आज सारी दुनिया जान गई। उनका समाज उनको मान गया होगा। इन सबके बीच पत्रकारिता पर ऐसा दाग लग गया जो कभी नही मिट सकता। पत्रकारिता कोई आसान और गैरजिम्मेदारी वाला पेशा नहीं है। ये तो वो काम है जिसके दम पर इतिहास बने और बनाये गये हैं। देश में यही वो स्तम्भ है जिस पर आम जनता आज भी विश्वास करती है। जिसकी कहीं सुनवाई नहीं होती वह मीडिया के पास आता है। वह इसलिए कि उसको विश्वास है कि मीडिया निष्पक्ष,संयमी और गरिमा युक्त होता है। मगर जरनैल सिंह ने इन सब बातों को झूठा साबित करने की शुरुआत कर दी। वह पत्रकारिता से ख़ुद विश्वास खो बैठा। पत्रकार की बजाए एक ऐसा आदमी बन गया जिसके अन्दर किसी बदले की आग लगी हुई थी। इस घटना से वह पत्रकारिता तो शर्मसार हो गई जिसके कारण जरनैल सिंह को पी चिदंबरम के पत्रकार सम्मलेन में जाने का मौका मिला। हाँ, जरनैल सिंह अपने समाज का नया लीडर जरुर बन गया। पत्रकार के रूप में जो वह नहीं पा सका होगा सम्भव है वह अब लीडर बन कर पा ले। हो सकता है कोई पार्टी उसको विधानसभा या लोकसभा के चुनाव में टिकट दे दे। ऐसे लोग पत्रकारिता के काबिल भी नहीं हो सकते जो इस प्रकार का आचरण करते हों। इस प्रकार का आचरण तो नेता करते हैं। शायद अब यही जरनैल सिंह किया करेंगें। जरनैल सिंह ने पत्रकारिता के साथ साथ "जागरण" ग्रुप की भी साख पर बट्टा लगाया है जिसका वह प्रेस कांफ्रेंस में प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जरनैल सिंह को "हीरो" बनने पर बधाई और उनके आचरण पर शेम शेम।

ये कैसी सरकार!

---- चुटकी-----

ना घर
ना कार,
ये कैसी
"सरकार"

Monday 6 April 2009

नारदमुनि को वापिस भेजा

धर्मराज के दरबार के अन्दर की कार्यवाही शुरू हो चुकी थी। उसके बाहर भीड़ के साथ मीडिया के लोग बड़ी संख्या में जमे हुए थे। कल की तरह यम् के दूत नारदमुनि को लेकर दरबार में हाजिर हुए। चित्रगुप्त ने कहा, महाराज फैसले से पहले कुछ पूछना चाहते हैं। इसका मुकदमे से कोई सम्बन्ध नहीं है। महाराज अपनी जिज्ञासा शांत करना चाहते हैं।
धर्मराज ने पूछा--ये राहुल कौन है? नारदमुनि--हिंदुस्तान के युवराज हैं महाराज। धर्मराज--तुम्हारा युवराज तो कमाल का है। उसके पास कार तक नहीं है। नारदमुनि--महाराज हिंदुस्तान में तो लाखों परिवार ऐसे हैं जिनके पास घर बार और रोटी तक नही है। फ़िर राहुल के पास तो सरकार है,उसको कार क्या करनी है। धर्मराज--लोगों के पास घर बार और रोटी नहीं है! ये तो भारत के न्यूज़ चैनल नहीं दिखा रहे। वे तो बार बार यही बता रहें है कि राहुल के पास कर नहीं है। नारदमुनि--महाराज आम आदमी के अभाव,दर्द,प्रताड़ना,उसके साथ होने वाला अन्याय ,जुल्म हिंदुस्तान में कोई ख़बर नहीं मानी जाती है। वहां का मीडिया तो बड़ों के लिए है।
धर्मराज--तो फ़िर.......... नारदमुनि--महाराज क्या क्या पूछोगे,मैं जानता हूँ मैं वहां कैसे रहता हूँ। एक जरा से झूठ की वजह से मुझे पकड़ कर यहाँ लाया गया। हिंदुस्तान में तो केवल और केवल झूठ की चलता है। सच तो इधर उधर झूठ के डर से दुबका रहता है। महाराज आप अपना फैसला सुनाओ। धर्मराज--तुमको आरोप मुक्त किया जाता है। दूत नारदमुनि को वापिस हिंदुस्तान भेज दिया जाए। दरबार में बैठे सभी देवी देवताओं के चेहरों पर मुस्कान दिखाई दी। चित्रगुप्त ने आकर मीडिया को फैसले की जानकारी दी। फ़िर वे शुरू हो गए अपने अपने अंदाज में।

Sunday 5 April 2009

धर्मराज का दरबार

धर्मराज का दरबार। महामहिम धर्मराज अपने सिंहासन पर विराजमान थे। देवी देवता,यक्ष,सहित सभी अपने अपने स्थान पर मौजूद थे। धर्मराज का चेहरा भाव हीन था। देवी-देवताओं के मुखमंडल पर चिंता की लकीरें देखी जा रही थी। इन्द्रलोक,स्वर्ग ,नरक के टीवी न्यूज़ चैनल और अखबारों के बड़े बड़े रिपोर्टर अपने अपने हथियारों के साथ अपना अपना स्थान पहले ही रोक चुके थे। टीवी वाले तो चिल्ला चिल्ला कर लाइव दिखा रहे थे। अचानक सब लोग एक ओरदौड़े। यम के दूत नारदमुनि को ला रहे थे। नारदमुनि के हाथ में हथकड़ी पैरों में बेड़ियाँ थी। जुबान पर वही एक मात्र नारायण नारायण का नाम। जैसे ही दूत नारदमुनि को लेकर धर्मराज के सामने हुए,चित्रगुप्त बोले, नारदमुनि को लाने में इतना समय कैसे लगा? ये हिंदुस्तान की संसद नहीं जहाँ समय की कीमत नहीं समझी जाती। दूत ने कांपते हुए बताया कि इन दिनों इस रोड पर ट्रैफिक बहुत अधिक था इसलिए देर हुई।
धर्मराज के संतुष्ट होने के बाद नारदमुनि को बताया गया कि उनको इस प्रकार से क्यों लाया गया था। उन पर अपनी मौत की झूठी ख़बर लिखने का आरोप है। धर्मराज ने कहा- अगर नारदमुनि ऐसा करेगा तो फ़िर विश्वास किस पर किया जाएगा। नारदमुनि को अपनी बात कहने का अवसर दिया गया। नारदमुनि बोले-- महाराज जिस लोक में मैं आजकल रहता हूँ वहां बच्चे से लेकर बूढे तक के चेहरे से मुस्कान गायब हो चुकी है। हँसी ठट्ठा भी संता बंता के नाम से किया जाता है। लोग किसी कि खुशी में खुश नही होते। लोग एक दूसरे को जिन्दा ओर खुशहाल देखकर अन्दर ही अन्दर मरते रहते हैं। इस लिए मैंने अपनी मौत की बात की। वह भी पहली अप्रैल को।
आप मेरा ब्लॉग देख लो इसी झूठ पर कई जने मुस्कुराये। महाराज मैंने किसी ओर को हंसने-हँसाने का पात्र नहीं। इसके लिए मैंने अपने आप को प्रस्तुत किया। महाराज किसी ओर पर हंसना गुनाह हो सकता है अपने आप पर नहीं।
नारदमुनि की बात पर दरबार में काना फूसी शुरू हो गई। कुछ टिप्पणियां भी धीमे धीमे आने लगी। भारत की तरह न्यूज़ वालों को यहाँ कहीं भी आने की आजादी नही थी। इसलिए वे दरबार से बाहर अपनी अपनी तरह से इस ख़बर का प्रसारण कर रहे थे।
नारदमुनि ने अपनी बात ख़तम कर धर्मराज की ओर देखा। धर्मराज ने कुछ क्षण चित्रगुप्त से बात की। उसके बाद उन्होंने फैसला कल सुनाने की बात कह कर कार्यवाही समाप्त कर दी। उनके प्रवक्ता ने आकर मीडिया को यह जानकारी दी। उसके बाद भी टीवी वाले अपने अपने अनुमान फैसले के बारे में बताते और सुनाते रहे। जो तेज थे उन्होंने एक्सपर्ट अपने स्टूडियो में बुला लिए और बहस आरम्भ कर दी। बेले दर्शकों से राय मांगी जाने लगी। सारा दिन इसी में निकल गया।

Wednesday 1 April 2009

नारदमुनि अब नहीं रहे

यह ख़बर बड़े दुःख और शोक के साथ पढ़ी जाए कि नारदमुनि [ गोविन्द गोयल] अब इस दुनिया में नही रहे। उनको दो दिन पहले दिल का जबरदस्त दौरा पड़ा था। उसके बाद उनको आईसीयू में रखा गया । जहाँ रात को उनका निधन हो गया। उनका अन्तिम संस्कार आज दोपहर बाद पाँच किया जाएगा।
आप मुझे नहीं जानते। मैं नारदमुनि का दोस्त हूँ। उन्होंने खास तौर से मुझे ये जिम्मेदारी सौंपी थी। ताकि सभी को पता लग जाए कि नारदमुनि इस लोक की यात्रा पूरी करके चले गए।
आप कोई शोक संदेश देना चाहते हो तो ०९८४५०२२६६३ , ०९४१४२२०६६६ ,०९४१४५८०७८७,
आओ उनकी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।