Saturday 18 April 2009

ऐसा तो नहीं होता था

दो दिन से टेंशन में हैं नारदमुनि। टेंशन इस बात कि ये इस देश के राजनेता कौन से स्कूल में और किस से पढ़ते थे। नेता जिस प्रकार से मधुर वाणी बोल रहें हैं उसके लिए यह जानना जरुरी है कि उनको इतनी बढ़िया शिक्षा देने वाले मास्टर जी कौन हैं? ताकि जुबान से रस टपकाने वाले इन नेताओं के मास्टरजी को कुछ सम्मान दिया जा सके अगर उन्होंने शर्म से ऐसा वैसा ना कर लिया हो। बहुत मगजमारी की। इन्टरनेट पर भी खूब तलाश किया। इन नेताओं के कार्यकर्ताओं से पूछा। कोई नहीं बता सका कि ये कहाँ से पढ़ कर आयें हैं। १९७७ से चुनाव में रूचि है। पक्ष - विपक्ष के नेता एक दूसरे के खिलाफ बोलते थे,आलोचना होती थी, उसके जवाब दिए जाते थे। मगर सब कुछ मर्यादा में, एक दूसरे की गरिमा का ध्यान रखते हुए। अब तो ऐसा आभास होता है जैसे ये नेता न होकर किसी मोहल्ले के भाई हो, हफ्ता वसूल करने वाले, जो बीच चौराहे पर एक दूसरे की गर्दन पकड़ कर खडें हैं जनता को अपनी अपनी ताकत दिखाने के लिए। ताकि जनता पर प्रभाव डाल कर हफ्ता की डर बढाई जा सके। पता नहीं ये नेता किस की संगत करते हैं जो ऐसा गन्दा बोलते हैं। या तो इनको पढ़ाने वाले ग़लत थे या इनकी संगत ख़राब रही। सम्भव है उम्र का असर होने लगा हो। कोई ना कोई बात तो जरुर है,वरना भारत के नेता ऐसा तो नहीं बोलते थे। होगा तो कोई एक आधा होगा। अब तो सब के सब एक ही थाली के लगाते हैं। छाज के साथ साथ छलनियाँ भी बोलने लगी है। हमको जय हो बोलना चाहिए कि भय हो। हमारे पास तो कोई और विकल्प भी तो नहीं है। कोई है ऐसा जो इनको समझा और बता सके कि जो वे कर रहें हैं वह ग़लत और पूरी तरह से ग़लत है।

2 comments:

निरन्तर- महेन्द्र मिश्र said...

टेंशन छोडिये जनाब नारायण नारायण

prabhat gopal said...

in netao ko sudharne ka koi to tarika bataye