Monday 22 December 2014

मुझे तो पाक से कोई सहानुभूति नहीं है



श्रीगंगानगर [गोविंद गोयल] बेशक यह खुशी मनाने का दिन नहीं है, क्योंकि दुश्मन की मौत पर भी खुशी और उमंग का इजहार करना भारत की संस्कृति नहीं है। मगर पेशावर की घटना पर रंज प्रकट करना। पाक के प्रति सहानुभूति दिखाना भी हिंदुस्तान के लिए उचित नहीं लगता । किस के प्रति सहानुभूति! रंज किस देश और कैसे इन्सानों के लिए ! मोमबत्ती जगा किसको राह दिखाना चाहते हैं ! आतंकवादी हमला पाकिस्तान मेँ हुआ है, हिंदुस्तान मेँ नहीं। वह भी उस पाक मेँ जिसने अस्तित्व मेँ आने के बाद से ही हिंदुस्तान को कभी चैन से जीने नहीं दिया। कश्मीर पर कब्जा, घुसपैठ, 1965 और 1971 का युद्ध, प्रोक्सी वार, आतंकवाद, करगिल, हिंदुस्तान की आन, बान और शान संसद पर आक्रमण, ताज होटल पर हमला कर ना जाने कितने ही जख्म पाक ने हमको दिये। एक बार नहीं ना जाने कितनी बार। कितने हिन्दुस्तानी देश की खातिर शहीद हुए। निर्दोष मारे गए। इन घटनाओं मेँ जो हिन्दुस्तानी शहीद हुए उनके घरों मेँ जाकर देखोगे तब पता लगेगा उनके जख्मों के असहनीय दर्द का। किसी ने पिता खोया किसी ने बेटा। किसी का हाथ की मेहँदी मिटने से पहले ही सुहाग मिट गया। जो भी शहीद हुए वे भी किसी के बेटे तो थे ही। साथ मेँ वे पिता, चाचा, ताऊ, भाई जैसे कितने ही रिश्तों से भी बंधे हुए थे। इनके जाने से किस किस के कैसे कैसे सपने टूटे होंगे, कोई इनसे पूछ कर देखो। क्योंकि किसी ने कहा है- बाप है तो सपने है, बाजार के सारे खिलौने अपने हैं। इनकी भावनाओं को तो समझो। इनके मन को टटोलो। उनसे कोई तो पूछे इनका दर्द । लगे हैं सब के सब पाक के प्रति सहानुभूति दिखाने मेँ। हौड़ लगी है मोमबत्ती जगाने की। तो क्या सभी ने पाक का किया धरा भुला दिया! माफ कर दिया उसकी करतूतों को! वाह! कमाल के संस्कार हैं हिंदुस्तानियों के। बार-बार सलाम करने के योग्य है संस्कृति। दुश्मन की पीड़ा हमारे सीने मेँ भी दर्द करती है। उनके शोक मेँ हमारी आँख भी नम होती है। परंतु जनाब, पाक नहीं समझ सकता हमारी भावनाओं,सद्भावनाओं को। वो नहीं जान पाएग हमारे मन को। उसके दिल मेँ किसी प्रकार की कोई अच्छी भावना नहीं है हमारे देश और देशवासियों के प्रति। इसलिए उसके प्रति किसी प्रकार की कोई सहानुभूति जताने की जरूरत नहीं। रोने दो उसे अकेला। सहने दो अपने जख्म खुद । ताकि उसे मालूम हो कि आतंकवाद की फसल बोने का क्या मतलब होता है! उसका डंक कैसा लगता है। ये हमारे पीएम नरेंद्र मोदी को भी पता नहीं क्या हो गया ! स्कूलों मेँ दो मिनट का मौन ! शांति का नोबल पुरस्कार के लिए इतनी जल्दी। खैर, सरकारों को करने दो अपनी कूटनीति। बोलने दो सहानुभूति की भाषा। निभाने दो सरकारी रस्म। आम जनता को इससे क्या। चर्चा कर लो किसी भी आदमी से , सब के सब यही कहेंगे कि ठीक हुआ पाक मेँ। चलो माना, बच्चों के साथ ऐसी बर्बरता ना हो। उनको टार्गेट नहीं बनाना चाहिए, लेकिन जो इधर मारे गए वे भी तो किसी के बच्चे ही थे। फिर ये खेल भी तो पाक ने ही शुरू किया था। ये भी ठीक है कि नफरत को नफरत से नहीं जीता जा सकता। परंतु, एक तरफा प्यार आखिर कितने दशक तक। हम प्यार जताते रहें और वो नफरत। यह कब तक सहें। जो कुछ पाक ने मेरे हिंदुस्तान के साथ किया उसको याद करके मुझे तो आज पाकिस्तान से कोई सहानुभूति नहीं है। किसी और को हो तो हो। मुझे तो वो तमाम जख्म दिखाई दे रहे हैं जो पाक ने समय समय पर मेरे हिंदुस्तान को दिये। जय जय हिंदुस्तान। जय जय उसके संस्कार और संस्कृति।

1 comment:

Kavita Rawat said...

रोने दो उसे अकेला। सहने दो अपने जख्म खुद । ताकि उसे मालूम हो कि आतंकवाद की फसल बोने का क्या मतलब होता है! उसका डंक कैसा लगता है।