Monday, 21 July, 2014

विधायक गंगानगर की,वकालत हनुमानगढ़ की,बाऊ खुश


श्रीगंगानगर- सबसे पुराने वरिष्ठ राजनेता राधेश्याम गंगानगर आज बहुत खुश होंगे.ख़ुशी केवल मन चाहा पा लेने से ही नहीं होती. ख़ुशी तो किसी भी बात से हो सकती है. राजनेताओं की ख़ुशी तो वैसे भी कुछ अलग  प्रकार की होती है. मन तब भी प्रसन्न हो झूमने लगता है जब विरोधी गलतियां करें.राजनीति में आज के दिन राधेश्याम गंगानगर का कामिनी जिंदल से बड़ा विरोधी कोई हो ही नहीं सकता. कामिनी जिंदल कहो या बी डी अग्रवाल एक ही बात है. वो राजनैतिक गलतियां करेंगे तो बाऊ जी के मन में लड्डू फूटेंगे ही. अब देखो, कामिनी जिंदल विधायक तो श्रीगंगानगर की हैं और एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के लिए वकालत
हनुमानगढ़ की कर रही हैं. जमींदारा पार्टी को श्रीगंगानगर  जिले ने दो विधायक दिए और उसकी विधायक कामिनी गीत हनुमानगढ़ के गा रहीं हैं. जितने वोट इस पार्टी को श्रीगंगानगर जिले में मिले और कहीं नहीं. इसके बावजूद इस पार्टी की एक प्रभावशाली विधायक द्वारा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी हनुमानगढ़ में खोलने की वकालत करना ना केवल वोटर्स के साथ अन्याय है बल्कि श्रीगंगानगर जिले का दुर्भाग्य है.प्रदेश में क्या देश में शायद ही कोई ऐसा जन प्रतिनिधि होगा जिसने कभी अपने क्षेत्र को छोड़ दूसरे क्षेत्र की वकालत की हो. मगर जमींदारा पार्टी की कामिनी जिंदल की बात ही अलग है. बड़े लोगों की बात अलग ना हो तो फिर काहे के बड़े. हैरानी है कि जिस समय श्रीगंगानगर जिले के लोग,विधायक,एमपी  अपने अपने ढंग से यह यूनिवर्सिटी श्रीगंगानगर में खुलवाने की कोशिशों में लगे हैं,तब कामिनी जिंदल द्वारा हनुमानगढ़ की वकालत करना यह दर्शाता है कि उनका मकसद यूनिवर्सिटी को खुलवाना नहीं बल्कि उसमें अड़ंगा लगाना है. हैरानी इस बात की कि कोई विरोध नहीं कर रहा.
इधर कोई बोलेगा नहीं और हनुमानगढ़ में जय जय कार होगी.ये सच है कि कामिनी जिंदल के हनुमानगढ़ जिले में यूनिवर्सिटी खोलने के पत्र से कुछ नहीं होने वाला,लेकिन उनकी मंशा तो पता लगती ही है. जनता शायद  ही इससे पहले कभी अपने किसी विधायक से इतना डरी सहमी रही हो,जितना वो कामिनी जिंदल से डरी हुई है. अगर वे डरे हुए नहीं है तो फिर वे  भरे हुए हैं.शर्म से बोल नहीं पा रहे. डरा हुआ या भरा हुआ इंसान कैसे बोले.वरना  अब तक तो बवाल मच गया होता. कोई विधायक अपने क्षेत्र के अतिरिक्त दूसरे क्षेत्र की वकालत करे तो बवाल मचना स्वाभाविक है. यह उनके हकों पर कुठाराघात है.अपने हक़ को किसी दूसरे को कोई कैसे दे सकता है. मगर विधायक कामिनी जिंदल ऐसा करने की कोशिश करे तो कोई नहीं चुसकेगा. कौन नाराजगी  ले बी डी अग्रवाल की  बेटी और आई पी एस की विधायक बीवी से. बाऊ जी और उनके बन्दे घर बैठ तमाशा देखेंगे ही. उनके लिए तो यह सब घर बैठे गंगा आने के समान है. वे तो जमींदारा पार्टी और उनकी प्रभावशाली विधायक की हर राजनैतिक गलती से खुश होंगे. जितनी गलती वे करेंगी उतनी ही बाऊ जी की बल्ले बल्ले. कामिनी जिंदल की झोली वोटों से  भरने  वाली जनता ही नहीं बोल रही तो बाऊ जी क्यों बोलेंगे. वे तो हारे हुए हैं. जनता द्वारा बुरी तरह नकारे हुए हैं. कांग्रेस नेताओं से उम्मीद ही क्या करें! इस पार्टी के नेता तो बात बात पर बी डी अग्रवाल की हाजिरी बजाते हैं. खुद विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी सहित.बाकी बची जनता.वह तो सीधे सीधे किसी का विरोध करती नहीं. फिर दानवीर बी डी अग्रवाल ने उअन्का क्या बिगाड़ा है जो वे उनकी बेटी की इत्ती से बात का विरोध करें.यूनिवर्सिटी खुले ना खुले उनकी बला से. आज इस क्षेत्र की स्थिति वैसी ही है जैसी तब थी जब धुरंधर सुरेन्द्र सिंह राठौड़ विधायक चुने गए थे भारी बहुमत से.ठीक कामिनी जिंदल की तरह. तब भी राधेश्याम एंड कंपनी,कांग्रेस,जनता  खामोश रही थी.परिणाम अगले चुनाव में राधेश्याम गंगानगर पार्टी बदलने के बावजूद विधायक चुन लिए गए. अब जब इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है तो  बाऊ जी का खुश होना अस्वाभाविक तो नहीं कहा जा सकता. दो लाइन पढ़ो--इस दौर में बे मतलब की बात करता है, ये जनाब तो पुराने ज़माने का लगता है. 

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