Tuesday 23 December 2014

मिट्टी मेँ दबा देना चाहिए ऐसे धर्म को....



श्रीगंगानगर-वह धर्म व्यर्थ है जो पति पत्नी के रिश्तों को असामान्य बना उसे तोड़ने की स्थिति मेँ ले आवे। उस धर्म को भी मिट्टी मेँ दबा देना चाहिए जो गृहस्थ आश्रम की जड़ें खोखली करने का काम करता है। वह धर्म भी किसी काम का नहीं जो हमेशा खिलखिलाते रहने वाले परिवार मेँ कलह का कारण बने। विवाद पैदा करे। संवेदनशील रिश्तों मेँ कड़वाहट घोल दे। पर धर्म तो ऐसा कुछ नहीं करता, कहीं नहीं करता। यह सब जो करता है वह धर्म की आड़ मेँ व्यक्ति का अहम, दंभ, अहंकार ही करता और करवाता होगा । कुंठा होती है किसी व्यक्ति की। उसका अवसाद भी हो सकता है या किसी अपने की उपेक्षा भी । फिर यही धर्म के रूप मेँ पग पग पर बाधा बन सामने आ खड़ा होता है। इंसान मन, कर्म, वचन से सात्विक रहने की बात करता है। रिश्तों की अहमियत भी समझता है ठीक से। उसकी मर्यादा को जानता है और मानता है। इसमें कोई शक नहीं कि धर्म इंद्रियों पर संयम रखने की बात करता है। यही धर्म गृहस्थ आश्रम को सबसे महत्वपूर्ण आश्रम भी मानता है। फिर भी गड़बड़ हो जाती है। दंपती मेँ से एक भी 24 घंटे धर्म मेँ लगा रहेगा, सत्संग की बात करेगा, अपने आप को भजन कीर्तन मेँ लीन रखेगा तो ये निश्चित है कि उनके दाम्पत्य जीवन मेँ रस का अभाव हो जाएगा । विचारों मेँ भिन्नता शुरू हो जाएगी। विवाद होगा। संभव है धर्म, सत्संग, भजन, कीर्तन मेँ मस्त रहने वाले व्यक्ति का मन झूमता रहे। उसे उमंग और आनंद का अनुभव हो, लेकिन दूसरा साथी, परिवार के बाकी सदस्य अपनी भावनाओं को आहत समझ कुंठित होने लगेंगे। ऐसे ही एक घर हुआ। उधर वैल क्वालिफाइड पति-पत्नी अलग अलग कमरों मेँ सोते। वह भी उस उम्र मेँ जब दोनों को एक दूसरे के सहारे, साथ की सबसे अधिक जरूरत होती है। परिणाम, एक इतना कुंठित हुआ कि उसका चेहरे का रंग बदरंग हो गया। फिर अधिक दिन जी भी नहीं सका। पता नहीं ये कौनसा धर्म,सत्संग था जो पति पत्नी को उनके रिश्ते निभाने से रोकता रहा ! ये कोई पहला और अंतिम उदाहरण नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे जीवन मेँ धर्म, सत्संग, कीर्तन हो, लेकिन ये सब इतने भी नहीं होने चाहिए कि पति-पत्नी एक बिस्तर पर एक दूसरे से मुंह फेर कर सोने लगे। एक दूसरे की भावना,पसंद को अपने धर्म पर कुर्बान कर दें या फिर भोग को वासना की विषय वस्तु मान उसकी निंदा शुरू कर दें । गृहस्थ आश्रम मेँ वासना भी होती है और तृष्णा भी। संतोष भी है तो कामना भी। केवल एक की प्रधानता से गृहस्थी नहीं चल सकती। वह काल खंड और था जब इतनी उम्र मेँ गृहस्थ आश्रम, उतनी उम्र मेँ वाणप्रस्थ और उसके बाद सन्यास आश्रम का निर्वहन होता था । तब की परिस्थितियां , खान-पान, रहन सहन कुछ और था अब कुछ अलग। तो फिर आज की परिस्थिति मेँ कैसे इनका विभाजन किया जा सकता है। कौन करेगा वाणप्रस्थ का पालन? कौन निकलेगा सन्यास के पथ पर? कौन जाएगा वन को? असल मेँ धर्म तो मन, कर्म और वचन मेँ होता है। वह खंडन, विखंडन का नहीं संयोग और योग का पक्षधर है। वह विवाद नहीं निर्विवाद करता है। धर्म को धारण करने वाले के अंदर तो लगाव होना चाहिए किसी के प्रति अलगाव नहीं । ज़िम्मेदारी से भागना , अपनों से दूर रहना, उनकी भावनाओं को उचित महत्व ना देना धर्म, सत्संग, कीर्तन नहीं कुछ और ही होता है। यह क्या होता है वही जाने जिसमें यह होता है।

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