Friday, 6 November, 2015

बड़ी बेदर्द है नरेंद्र मोदी की सरकार


श्रीगंगानगर। पत्रकार से कोई भी कैसा भी सवाल कर सकता है। ऐसे ही दो सवाल मुझसे कर लिए एक व्यक्ति ने। पहला, गोविंद जी, प्रो श्याम सुंदर माहेश्वरी पदमश्री वापिस करेंगे? मैंने कहा, बड़े जतन से तो मिला है उनको पदमश्री, वो वापिस क्यों करने लगे। दूसरा सवाल, तो क्या स्वामी ब्रह्म देव जी ऐसा कर सकते हैं? मैं बोला, स्वामी जी तो हर इनाम, अवार्ड से ऊपर हैं। वो कौनसा मांगने गए थे। उन जैसे व्यक्ति को तो दो चार और मिलने चाहिए। जवाब दे के मैं तो चला आया। वो पता नहीं क्या सोच  रहा होगा। लेकिन इन सवालों से ये लगा की नरेंद्र मोदी की सरकार बड़ी बेदर्द सरकार है। फासीवादी सरकार है। असहिष्णु  सरकार है। मोदी जी और उनके मंत्रियों की असहिष्णुता बर्दाश्त के काबिल नहीं। ये सरकार बुद्धिजीवियों की भावना को नहीं समझती। उनकी कदर नहीं करती। इस उम्र मेँ उनको मानसिक, शररिक तकलीफ देने से बाज नहीं आती। यह सहन के योग्य नहीं। बेसमझ है ये सरकार। और क्या तो! कब से देश के कौने कौने से कलाकार, लेखक, गायक, कवि जैसे कितने ही प्राणी अपने अपने अवार्ड वापिस करने लगे हैं। नया दौर आया है देश मेँ। मोदी सरकार को कोई फिक्र ही नहीं। बड़ी असंवेदनशील है सरकार। त्याग को तो इस देश मेँ अच्छी नजर से देखा जाता है। त्याग करने वाले का सम्मान होता है। त्यागी व्यक्ति को तो इज्जत मिलनी चाहिए। इस बात का ख्याल रखे सरकार कि उसे मन, कर्म और वचन से कोई दर्द ना हो। परंतु कमाल की है मोदी सरकार। अभी तक बेपरवाह है। त्याग की भावना वाले बुद्धिजीवियों की भावनाओं का सम्मान करते हुए मोदी सरकार को तुरंत हर नगर मेँ ऐसे काउंटर खोलने चाहिए जहां ये महानुभाव अपने अवार्ड वापिस कर सकें। पल्स पोलियो की तरह घर घर सर्वे हो कि कौन कौन अवार्ड वापिस करने वाला है। उसे काउंटर तक लाया जाए। ताकि उसे अवार्ड वापिस करने मेँ ना तो देरी हो और ना कोई परेशानी। ऑन लाइन हो सकता है तो ऑन लाइन भी हो। आखिर देश डिजिटल हो रहा है। काउंटर पर ही न्यूज चैनल के रिपोर्टर हों। बहस के लिए खाली बुद्धिजीवी हों। चैनल वाले चाहे तो अपनी पसंद के बुद्धिजीवी को अपने साथ ले जावें। सब कुछ एक स्थान  पर। सिंगल विंडो सिस्टम। एक ही जगह, एक बार मेँ टंटा खत्म। ऐसे व्यक्तियों को, जिन्हें आजादी के बाद से इस देश मेँ केवल राम राज्य  दिखाई दिया। कुछ भी असहनीय नहीं देखा। जुल्म, अन्य, दंगे, कत्लेआम दिखाई नहीं दिये, उन अंधे, बहरे और गूंगे लोगों को अवार्ड अपने पास रखने ही नहीं चाहिए। अवार्ड ही क्यों, साथ मेँ मिली रकम भी आज के हिसाब से जमा करनी चाहिए। वह आदर, मान, और परोक्ष रूप से हुआ लाभ भी इसी काउंटर पर जमा हो, जो इनको अवार्ड मिलने के बाद मिला।  ताकि उनका त्याग इतिहास मेँ ठीक से दर्ज हो सके। लोग याद रखें कि थे कुछ ऐसे हिन्दुस्तानी बुद्धिजीवी जिनको बीजेपी  सरकार बर्दाश्त नहीं हुई। उन्होने उसके खिलाफ त्याग किया। बलिदान किया। अब ये इतने बुद्धिजीवी हैं कि मेरा जैसा कुछ भी लिखेगा वह बे सिर पैर का का माना जाएगा। मगर ये शब्द उन लोगों की भावना है, जो अपनी बात ना तो किसी मंच पर कह सकते हैं और ना लिख सकते हैं। उनको ये सहन नहीं हो रहा कि कोई इन बातों पर अवार्ड वापिस करें जिन पर किए जा रहे हैं। क्योंकि इससे  भी पहले बहुत कुछ हुआ है। ये सही है कि जो हुआ वो ठीक नहीं होगा उनकी नजर मेँ, किन्तु जो ये कर रहे हैं वो कौनसा ठीक है। दो लाइन पढ़ो—

इतने प्रपंच किए जीवन मेँ 
हाथ मगर कुछ ना आया,
मन, कर्म, वचन को साध लिया जब 
सब अपने आप चला आया। 

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