Friday, 5 April, 2013

मन लागा मेरा यार फकीरी में..जुदा -जुदा फकीरी




श्रीगंगानगर-फकीरी! जिस के पास सब है उसका फक्कड़ अंदाज फकीरी है। जिसके पास कुछ लेकिन वह ऐसे जीता है जैसे दुनियाँ की सभी सुख सुविधा उसके कदमों में है तो उसका यह अहसास फकीरी है। हर हाल में मस्त। हर स्थिति में उमंग। प्रत्येक परस्थिति में उल्लास। जीवन के क्षण क्षण को खुशी से जीने का उत्साह ही शायद फकीरी है। आदर्श नगर पार्क में सत्संग के दौरान संत जी भजन गा रहे थे.....मन मेरा लागा यार फकीरी में........। जिस हिस्से में कथा हो रही थी कई सौ व्यक्ति इसी में रमे थे। संभव है वे संत,उसके शब्दों,भजन की फकीरी के निकट अपने आप को महसूस कर रहे थे। दूसरे छोर पर कई ग्रुप तास में मस्त थे। वे दीन-दुनिया  की खबर से बेखर गुलाम,बेगम,बादशाह के साथ नहले पर दहला करने में लगे थे। उनकी अपनी फकीरी थी। किसी से कोई मतलब नहीं। ना सत्संग का। न माहौल का और ना भीड़ का। नजर उठती तो सामने वाले खिलाड़ी पर बस! एक तरफ माँ बच्चे पर ममता की फकीरी में इस कदर डूबी थी कि उसे अपने आंचल के सरकने की भी परवाह नहीं थी। वात्सल्य से सराबोर वह कभी बच्चे को गोद में लेकर झूला झुलाती और कभी उसको नेचे छोड़ उसके पीछे भागती। बच्चा ममत्व की फकीरी से सराबोर था। जो माँ के साथ हो उसे किसी और फकीरी की जरूरत भी कहां। अनेक ऐसे बच्चे भी थे जो अपने बचपन की फकीरी में खोए थे। कभी सत्संग वाली साइड में धमा चौकड़ी करते तो कभी तास खेलने वालों के निकट जाकर। उनका मन ना तो संतों के प्रवचनों में था और ना तास में। उनके लिए तो बचपन,खेल,मासूमियत,शरारत ही फकीरी थी। पार्क की दुनिया यहीं समाप्त नहीं होती। शाम के समाज सैर करने वाली महिलाएं भी थीं। एक निश्चित समाय के बाद वे व्यास गद्दी और तास खेलने वालों के निकट से गुजरती। उनकी एक क्षण के लिजे नजर तो उठती लेकिन वे बातों की फकीरी में डूबी थीं। उनके लिये  शायद प्रवचन करने,सुनने और तास खेलने वालों में अधिक फर्क नहीं था। भीड़ थी उनके लिए। मनचले भी थे। जिनकी आँख ना तो व्यास गद्दी की तरफ जाती थी ना और कहीं। जाती थी तो उन युवतियों की तरफ जो पार्क से होकर गुजर रहीं थी। इस उम्र में वे इसी  सौंदर्य दर्शन को फकीरी मान रहे थे। एक लड़की लड्डू गोपाल को गोद में लिए थी।लड़की उसे अपना दोस्त मानती है। लड्डू गोपाल से दोस्ती लड़की की फकीरी है। मन लागा मेरा यार फकीरी  में....भजन के स्वर मंद होने लगे...बंद।  संत भी प्रस्थान कर गए और उनको सुनने आए लोग भी। लेकिन बाकी तास के खिलाड़ी,माँ,बच्चे,मनचले,सैर वाले सब अभी भी अपनी अपनी फकीरी में मस्त है। ये  पार्क की छोटी दुनिया है। सब की अलग अलग फकीरी है....फकीरी है भी यही...हर हाल में मस्त...बाकी दुनिया से बेखर। मन लागा मेरा यार फकीरी में.........।

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