Saturday, 19 September, 2015

अरे! कोई तो नजर उतारो अपने श्रीगंगानगर की

 श्रीगंगानगर। श्रीगंगानगर। अपने शहर के नाम का श्री तो कब का ही इधर उधर हो चुका। अब तो गंगानगर से महाराजा गंगा सिंह जी का नाम भी हटा दिया जाए तो ठीक रहेगा। क्योंकि जिस व्यक्ति की आन-बान-शान सात समंदर पार तक थी, उसके नाम पर बसे शहर मेँ वह हो रहा है, जिसकी उम्मीद किसी ने भी नहीं की होगी। जो व्यवस्था है, उससे हर कोई हैरान, परेशान है। किन्तु कोई करे भी क्या।  यह सब हमारी ही बनाई हुई है। धोरों की मिट्टी गिर गई इस पर। हालात इतने बुरे और हाथ से निकल गए कि क्या कहें? दबंग जन प्रतिनिधि को अपना सम्मान बचाने के लिए पूर्व जन प्रतिनिधियों के साथ संघर्ष समिति बनानी पड़ती है। तो फिर जनता अपने सम्मान के लिए किस जन प्रतिनिधि के पास जाएगी? जो खुद अपने सम्मान के लिए भागदौड़ कर रहा हो, उससे जनता क्या आश रखे? जिन अमीर, व्यापारिक परिवारों को जनता मेँ आदर्श पेश करना चाहिए, उनकी मर्यादा, शर्म, संस्कार सड़कों पर तमाशा बन चुके हैं। जो फैसला गुप चुप होने चाहिए, वह सड़क पर करवाने की कोशिश हुई। कलक्टर कहता है कि अखबार मत पढ़ो। इसके बावजूद मीडिया मेँ कोई हलचल नहीं। उनकी फोटो, खबर मीडिया मेँ पहले की तरह ही देखने को मिलती हैं। बड़े अखबार का एक मालिक, संपादक लोकायुक्त के समक्ष इन शब्दों मेँ बेबसी प्रकट करता है कि कुछ भी किसी के बारे मेँ छाप लो कि फर्क नहीं पड़ता। एक मालिक संपादक ब्रॉड बैंड ठीक से ना चलने  की खबर अखबार मेँ छाप, फेस बुक पर उसे ठीक करने संबंधी पोस्ट डालता है। वह भी सहज रूप से। एक टीवी रिपोर्टर अपने चैनल हैड की फोटो के साथ फेसबुक पर अपने आपको उनका सेवक कहता है। ये सब दृश्य इस शहर की कमजोरी दिखा रहे हैं। बता रहे हैं कि कितना बेबस हो गया ये शहर। अपना श्रीगंगानगर ऐसा तो नहीं था। बेशक यह चंडीगढ़ का बच्चा नहीं बन सका, फिर भी जैसा था, वैसा बहुत ही जानदार, शानदार, दमदार था। सबका उसके काम और पद के अनुसार रुतबा था। आवाज थी। मर्यादा और संस्कार थे। डर बेशक ना रहा हो, लेकिन शर्म जरूर थी। आज तो जैसे बेड़ा गर्क हो गया। जन प्रतिनधि का सम्मान खतरे मेँ है। मीडिया की शक्ति क्षीण हो गई है। जिन परिवारों से कुछ सीखने की जरूरत समझी जाती थी, वे खुद बहुत  कुछ सीखने के काबिल दिखाई पड़ते हैं। अफसरशाही  हावी है। जब नामी हस्तियां इस हाल मेँ हैं तो मुझ जैसे किसी आम आदमी की बिसात ही क्या है! वह तो किसी गिनती मेँ ही नहीं। उसे तो एसपी, डीएम क्या एक दबंग ही ऐसा सबक सिखाए कि नगर के दूसरे आम आदमी भी घास का तिनका मुंह मेँ लेकर फरियाद करते नजर आएं। ऐसा आभास होता है जैसे किसी की नजर लग गई इस अलबेले  शहर को। शायद इसी वजह से इसकी इतनी दुर्गति हो रही है।  जिधर हाथ रख दो उधर से ही आह! की आवाज सुनाई देती है। जिससे चाहे बात कर लो, यही कहता है कि शहर की ऐसी हालत इससे पहले कभी नहीं हुई थी। तो फिर विचार करने की जरूरत है। चिंतन तो होना ही चाहिए कि ऐसा कैसे हुआ? जब तक चिंतन ना तो तो नजर उतरवाने का इंतजाम ही कर लो । कोई कहीं नीबू-मिर्च टांग दे। कोई रात को मिर्च आग मेँ जलाए । कोई बत्ती जला दे। नून राई कर दे। किसी का  कोई टोटका तो असर करेगा ही। बाकी राम जाने। 

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