Sunday 6 September 2015

मदन अरोड़ा ने की दिल की बात


श्रीगंगानगर, 6 सितंबर। साहित्य और लेखन में निरंतरता अत्यंत आवश्यक है। पढऩा भी और लिखना भी। इनमें से एक भी अगर छूट गया तो लेखक के पिछडऩे की आशंका रहती है। मैं भी अगर इस मामले में ढिलाई न करता तो आज स्थिति कुछ और होती। यह स्वीकारोक्ति है साहित्यकार मदन अरोड़ा की। वे रविवार को यहां श्री आत्मवल्लभ जैन पब्लिक स्कूल में सृजन सेवा संस्थान की ओर से आयोजित कार्यक्रम लेखक से मिलिएमें श्रोताओं से रूबरू थे। उन्होंने कहा कि  लघुकथा लेखन की ओर मुड़े तथा उनके इस प्रयास को स्वीकार तो किया ही गया, देश भर में सराहना भी मिली। कविता की जापानी विधा हाइकू भी राजस्थान में सबसे पहले उन्होंने ही लिखने प्रारंभ किए परंतु बाद में स्थितियां ऐसी बनी कि वे निरंतरता नहीं रख पाए और इन विधाओं की पुस्तकें प्रकाशित नहीं करवा पाए। इस मौके पर उन्होने रचनाएँ प्रस्तुत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार गोविंद गोयल ने की। उन्होंने अरोड़ा की रचनाओं और उनके जीवन संघर्ष को सराहा और माना कि संवेदनशीलता ही रचनाओं को पाठक के हृदय से जोड़ती हैं। उन्होने मदन अरोड़ा को कुछ सुझाव भी दिये। संस्थान के अध्यक्ष डॉ. कृष्णकुमार  आशुने मदन अरोड़ा परिचय देते हुए बताया कि की कुसुम और बूंद भी सागर भी शीर्षक से दो पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार मोहन आलोक और  डॉ. विद्यासागर शर्मा ने भी संबोधित किया।


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