Thursday 19 July 2012

वक्त ने बदल दी मरघट की परिभाषा



श्रीगंगानगर-बात एक प्रसंग से शुरू करते है। परदेशी कबीर जी के घर गया। कबीर जी थे नहीं। उनकी पत्नी ने बताया कि वो तो अंतिम संस्कार में मरघट गए हैं,आप रुको,वो थोड़ी देर में आ जायेंगे। परदेशी ने कहा, नहीं मुझे जाना है। मैं मरघट होता हुआ चला जाऊंगा। बस मुझे कबीर जी की पहचान बता दो! कबीर जी की पत्नी ने बताया कि कबीर जी के सिर पर कलंगी उनकी पहचान है। परदेशी मरघट चला गया। वहां था सन्नाटा। लकड़ियों का चटकना,कुत्तों का भौंकना,सिसकियाँ इस सन्नाटे को तोड़ रही थी। चिता के चारों तरफ शोकाकुल लोग थे। लेकिन ये क्या....सभी  कलंगी वाले थे। परदेशी सोचने लगा, कबीर जी की पत्नी ने तो बताया था कि कबीर जी कलंगी वाले होंगे।  यहां तो सभी के कलंगी हैं। खैर,परदेशी रुका। संस्कार पूरा हुआ। लोगों ने अंतिम श्रद्धांजली दी और जाने लगे। परदेशी को और अचरज हुआ। जैसे जैसे लोग मरघट से निकल रहे थे वैसे वैसे उनकी कलंगी गायब हो रही थी। बस एक व्यक्ति बचा कलंगी वाला। निश्चित तौर पर  वे कबीर जी ही थे। परदेशी ने कबीर जी को प्रणाम किया। कलंगी होने,खोने के  प्रति जिज्ञासा प्रकट की। कबीर जी बोले, मरघट में चिता के पास खड़े लोग मौत से डरे हुए ईश्वर के ध्यान में थे। वे सांसारिक  मोह,माया,काम,क्रोध से दूर थे। तब ईश्वर की दृष्टि में सभी समान थे। इसलिए सभी के कलंगी थी।  परंतु मरघट से बाहर आते ही सब सांसरिक प्रपंच में लग गए तो ईश्वर से उनका नाता टूट तो कलंगी भी जाती रही.......
वर्तमान में ना तो मरघट रहे ना मरघट और चिता की मर्यादा। मरघट पिकनिक स्पॉट और जन संपर्क का माध्यम में बदल गए। शोक ग्रस्त परिवार के समक्ष हाजिरी लगाई और काम समाप्त। चिता जल रही है....किसी को शोक है...मरघट की गरिमा है...मर्यादा है उससे किसी को कोई मतलब ही नहीं रहा। मोबाइल फोन बज रहें हैं। कारोबार हो रहा है। निंदा चुगली...हंसी ठट्ठा चल रहा है। पार्क शानदार है...सब बैठे हैं अलग अलग ग्रुपों में। जाने वाले की अच्छाई...बुराई...उसके परिवार की कोई बात नहीं। जाने वाला समाज के लिए क्या करके गया....नहीं कर सका....कोई मतलब नहीं। ठीक है मरने वाले के साथ नहीं मर सकते। शो मस्ट गो ऑन।  परंतु चिता और मरघट की  मर्यादा तो कायम रख सकते हैं। मोबाइल मे साइलेंट मोड होता है। हंसी ठट्ठे की आवाज कम करने में क्या बुराई है? कारोबार की बात भी धीरे धीरे हो सकती है। राम राम नहीं करना है ना करो...किन्तु ऐसे आचरण से तो बचें जिससे शोक संतप्त परिवार की भावना आहत हो। वक्त ने मरघट को मरघट तो नहीं रहने दिया किन्तु इसे मर्यादा हीन गरिमाहीन  पिकनिक स्पॉट या चाय,काफी का अड्डा तो मत बनने दो। एक यही तो जगह है जहां इंसान अपना अंतिम समय देखता है। मौत से रूबरू होता है। किन्तु हमने कुछ भी ऐसा नहीं छोड़ा जिससे इंसान दो घड़ी  चिता के समक्ष खड़ा हो मनन कर सके अपने बारे में। लोक परलोक के बारे में। मरघट में तो मौत का भय होना स्वाभाविक है पिकनिक स्पॉट पर मौत का भय कहाँ से आएगा। वहाँ तो मस्ती और उल्लास होगा। चाहे कम हो चाहे अधिक। विकास समय की मांग है। लेकिन ऐसा विकास किस काम का जो मूल ही बदल दे।  ऐसा ही हुआ इस क्षेत्र में हर मरघटों के साथ। शबनम वहीद का शेर है...मेरे वजूद को दामन से झाड़ने वाले,जो तेरी आखिरी मंजिल है वो मिट्टी हूं मैं।  

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