Monday 16 November 2009

ये तो अन्याय है

हमारे राजनेताओं ने कुर्सी पर अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए बहुत से फैसले किए। ऐसे ही एक फैसले का नाम है आरक्षण! इसमे कोई दो राय नहीं कि हर वर्ग,जाति के व्यक्ति को राजनीति में बराबर का मौका मिलना चाहिए। सभी को मौका दिलाने के फेर में राजनेता सामान्य वर्ग[सवर्ण] से अन्याय करने लगे। दूसरों के लिए जिसे न्याय बताया जा रहा है वही सामान्य वर्ग के लिए अन्याय बन गया। उसी फैसले से इस वर्ग को अब गुलाम बनाने की ओर कदम बढाये जा रहें हैं। मकसद यही कि इस वर्ग को राजनीति से बिल्कुल अलग कर दिया जाए। हमारे श्रीगंगानगर में नगर परिषद् के चुनाव में सभापति का पद सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित है। इस से पहले यह ओबीसी ,अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित था। जाहिर सी बात है कि तब इस पद पर उसी जाति के लोग आसीन हुए। तब सभापति का चुनाव सामान्य वर्ग के लोग नहीं लड़ सके,क्योंकि वह ओबीसी,अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित था। मगर अब इसके विपरीत है। अब जब यह पद सामान्य वर्ग के लिए है। अब हर जाति का व्यक्ति इस पद पर चुनाव लड़ सकता है। जैसे एक जाट जाति का कांग्रेस नेता जगदीश जांदू। श्री जांदू ने उस समय सभापति का पद प्राप्त किया, जब यह पद ओबीसी के लिए आरक्षित था। अब फ़िर श्री जांदू को यह पद चाहिए। तो जनाब कूद पड़े चुनाव में। क्योंकि आरक्षण में इस बात की छूट है कि सामान्य वर्ग के लिए "आरक्षित" पद पर कोई भी चुनाव लड़ सकता है। मतलब ये कि बाकी सभी जातियों को तो हर बात पर सौ प्रतिशत मौका और सामान्य वर्ग को एक प्रतिशत भी नहीं। यह तो सरासर अन्याय है। सामान्य वर्ग की जनता को गुलाम बनाने का फार्मूला है। अगर कोई इसे सामान्य वर्ग के साथ अन्याय नहीं मानता तो वह इतना जरुर समझ ले कि यह न्याय तो बिल्कुल भी नहीं है। क्योंकि न्याय वह होता जब सभी पक्ष वाह! वाह! करें। यहाँ तो सामान्य वर्ग ओह!आह! कर रहा है और बाकी सभी अहा!,वाह! कर रहें हैं। सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित सीट/पद पर केवल और केवल सामान्य वर्ग के लोग ही चुनाव लड़ सकें। ऐसा कोई नियम कानून होना चाहिए ताकि सभी को बराबरी का मौका मिल सके। अगर ऐसा नहीं होता तो यह इस वर्ग के साथ घोर पक्षपात है।

6 comments:

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

छोटे से बड़े तक एक
ही रीति दिखती है ....

पी.सी.गोदियाल said...

अन्याय शब्द स्तेमाल करना ही अब समाज विरोधी हो गया है !

आजातशत्रु said...

सामान्य श्रेणी के अतिसामान्य लोग जो अपने पुरखों द्वारा दलितों पर (न जाने कब ) किये गए तथाकथित अन्याय के कारण आज वही अन्याय स्वयं भोगने को बाध्य हैं.अब किया है तो भुगतो...पर क्या ये प्रारब्ध है या राजनीति क्षमा करें "गन्दी राजनीति"? जब दुनिया २१वी सदी में कुलांचे मार रही है तो हमारी सरकार केवल सत्ता के लिए ऐसे नियम को सहेज रही है जिसको १९६० तक हटा देने की पैरवी खुद अम्बेडकर ने की थी.

MANOJ KUMAR said...

दिलचस्प

राज भाटिय़ा said...

जब भारत के सबिधान मै लिखा गया है कि भारत के सभी नागरिक एक समान है तो फ़िर यह जात पात, ओर धर्म के नाम पर आरक्षण क्यो?

O.L. Menaria said...

आपकी चिंता वाजिब है. कुर्सी की राजनीती के रहते आरक्षण का विस्तार होता रहेगा. आज के सामान्य श्रेणी को यह अन्याय भुगतने की नियति बन गयी है.