Tuesday 10 July 2012

“पापा आप हमारे स्कूल मत आया करो”


श्रीगंगानगर-बात चार पांच पुरानी होगी। 1971 से 1976 तक बड़ा मंदिर स्कूल में साथ पढ़े एक साथी ने रोका। बोला,यार बड़ी समस्या है। कई आशंका मेरे मन में आई...इससे पहले कि मैं कुछ कहता दोस्त कहने लगा....मेरे बच्चे फलां स्कूल [ बहुत बड़ा अंग्रेजी माध्यम का स्कूल ] में पढ़ते हैं। मैंने कहा, ये तो अच्छी बात है।स्टेट्स सिंबल है। अरे नहीं,साथी कहने लगा, यही समस्या है...बच्चे कहते हैं कि पापा आप स्कूल मत आया करो। स्कूल में दूसरे बच्चों के सामने हमें अच्छा नहीं लगता। क्योंकि यह साथी कमीज पायजामा पहनता है। और जब पापा कमीज पायजामा पहन कर बड़े स्कूल में जाएगा तो फिर बच्चों की रेपुटेशन पर तो असर पड़ेगा ही। मेरे पास साथी की समस्या का कोई समाधान नहीं था। पता नहीं ये वर्तमान शिक्षा का नजरिया है या समाज के बदले रूप का परिदृश्य। यह भी नहीं पूछ सका कि भाई ये बच्चों की सोच के प्रति तेरी पीड़ा है या बड़े स्कूल में पढ़ाने का अफसोस।
दिल्ली से श्रीगंगानगर की बस में। दो लड़कियां,एक लड़का पीछे वाली सीटों पर थे। बात चीत से संस्कारी लगे। पढ़ाई की बात चली तो शहर के बारे में पूछा। दोनों ने कहा अबोहर जाएंगे। अबोहर प्रोपर! दोनों ने एक दूसरे से पूछा। नहीं सादुलशहर। दोनों का जवाब था। दोनों के परिवार सालों से वहीं रहते थे, लेकिन चूंकि ये दोनों बच्चे वर्षों से बाहर रह कर पढ़ाई कर रहे थे, इसलिए एक दूसरे के परिवार से अंजान था। हां इनको नोएडा,गुड़गांव,दिल्ली,जयपुर जैसे बड़े शहरों की तो जानकारी थी,लेकिन अपने उस कस्बे की नहीं जहां उनका बचपन बीता । जहां रहकर उनके परिवार ने उनको इस काबिल बनाया कि वे बड़े शहरों को जान सकें निकट से। सादुलशहर है कितना। एक कौने से कोई बोले तो दूसरे कौने पर सुनाई दे।
दो उदाहरण काफी है  वर्तमान स्थिति को रेखांकित करने के लिए। बच्चों का भविष्य तो बहुत शानदार,जानदार,दमदार हो  गया। मगर बच्चे हमारे होकर भी हमारे नहीं रहे। उनकी दुनिया दादा,नाना के परिवार से बहुत अलग हो गई। उनकी अपनी दुनिया है। उसमें खून के रिश्तों,बचपन के साथियों,निकट के रिशतेदारों के लिए समय नहीं है। ये पैसा तो गाहे बगाहे भेज सकते हैं। समय नहीं दे सकते।बुजुर्ग होते माता  पिता के पास बैठ कर उनको दिलासा देने का समय इनके पास नहीं है। वे उनके पास बैठ कर ये नहीं कह सकते...पापा-मम्मी आप चिंता मत करो मैं हूं ना...आपकी, आपके रिश्तों की चिंता करने के लिए। उनका निर्वहन करने के लिए।कचरा की लाइन हैं --पुरवाई सी तेरी चाल काली घटाएँ तेरे बाल,तू चले तो सावन बरसे तू रुके तो बिजली कड़के,दुनिया नाचे दे ताल पे ताल....।

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