Saturday, 15 May, 2010

कुछ पाने के लिए बहुत खोया


ठीक है कुछ पाने के लिए
कुछ ना कुछ
खोना ही पड़ता है,
मगर ये नहीं जानता था कि
मैं, कुछ पाने के लिए
इतना कुछ खो दूंगा कि
मेरे पास कुछ और पाने के लिए
कुछ भी तो नहीं बचेगा,
और मैं थोडा सा कुछ
पाने के लिए
अपना सब कुछ खोकर
उनके चेहरों को पढता हुआ
जो मेरे पास कुछ पाने की
आस लिए आये हैं,
लेकिन मैं उनको कुछ देने की बजाए
अपनी शर्मसार पलकों को झुका
उनके सामने से
एक ओर चला जाता हूँ
किसी और से
कुछ पाने के लिए।

6 comments:

दिलीप said...

insaan ki fitrat bata di aakhiri panktiyon me ....bahut khoob..

सूर्यकान्त गुप्ता said...

नारायण नारायण! प्रभू की लीला भी गजब की है। बुद्धि तो सबमे दिया है। विवेक इस्तेमाल की शक्ति हासिल करना उन पर छोड़ दिया है। और यही कारण है कि आपकी लिखी अंतिम पंक्तियों मे इन्सान की फ़ितरत दिखाई पड रही है। बधाई।

पी.सी.गोदियाल said...

नारायण-नारायण !!

पी.सी.गोदियाल said...

वैसे एक बात बोलूँ , नारद का ये नारायण-नारायण सुमन जी के nice से कुछ कम नहीं :)

SKT said...

आपकी पोस्ट में खो कर पा गए हम!

डॉ. मनोज मिश्र said...

BADHIYA LIKHA HAI AAPNEN.