Thursday 13 May 2010

तुम्हारी किताब की किस्मत

मुझसे अच्छी है तुम्हारी इन
किताबों की किस्मत
जिन्हें हर रोज तुम
अपने सीने से लगाती हो,
मेरे बालों से भी
अधिक खुशनसीब हैं
तुम्हारी किताबों के पन्ने
जिन्हें तुम हर रोज
प्यार से सहलाती हो,
मेरी रातों से भी हसीं हैं
तेरी इन किताबों की रातें
जिन्हें तुम अपने
पास सुलाती हो,
इतनी खुशनसीबी देखकर
तुम्हारी इन किताबों की
मेरी आँखे सुबह शाम
बार बार बस रोती हैं,
क्योंकि हर नए साल
तुम्हारे सीने से लगी
एक नई किताब होती है,
और वो पुरानी किताब
पड़ी रहती है
अलमारी में एक तरफ
गोविंद की तरह
इस उम्मीद के साथ कि
एक बार फिर उठाकर
अपने सीने से लगा लो
शायद तुम उस किताब को ।

3 comments:

Udan Tashtari said...

महाराज!! सब ठीक ठाक तो है न!! :)


बहुत उम्दा रुमानी रचना उतार लये प्रभु!!

नारायण नारायण!!

दिलीप said...

ati sundar...chaahne ki bhi had hai..

shikha varshney said...

गज़ब का दर्द छलक रहा है ...बेहद उम्दा रचना.