Wednesday 7 August 2013

ये कांग्रेस भी मस्त पार्टी है एक जवान की तरह



श्रीगंगानगर-सालों पहले हिन्दी की रीडर डाइजेस्ट पुस्तक में एक किस्सा पढ़ा। पहले वो,उसकेबाद असल बात। सेना का जनरल बार्डर पर गया। एक जवान से उसकी बात हुई। जनरल ने पूछा,ये पूर्व में मोर्चा क्यों? सर,सूबेदार के आदेश पर,जवान ने बताया। पश्चिम में मोर्चा किसलिए,जनरल का प्रश्न था। मेजर के निर्देश पर,जवान का जवाब था। फिर ये उत्तर में किस वजह से,जनरल ने सवाल किया। जवान ने उत्तर दिया
सर,कर्नल का हुकम था। अरे तो ये दक्षिण  में क्यों बना रखा है मोर्चा? जनरल ने झुंझला कर पूछा। जवान ने बताया सर,बड़े साहब ने कहा था। जनरल को गुस्सा आया,बोले जब हमला करने की जरूरत होगी तो कौनसा मोर्चा काम में लोगे? इनमें से कोई नहीं। मौके की नजाकत के हिसाब से हमला होता है। वही  मैं करूंगा,जवान ने शांत मन से उत्तर दिया। तो जनाब,आप इस जवान को कांग्रेस हाई कमान समझ सकते हैं और जनरल को कांग्रेस कार्यकर्ता या वह आदमी जिसकी राजनीति में रुचि है। विभिन्न दिशाओं के जो  मोर्चे हैं उनको कांग्रेस की ब्लॉक कमेटी,जिला कमेटी,प्रदेश कमेटी और चुनाव कमेटी मान लो तो ठीक रहेगा। कांग्रेस हाई कमान उस जवान की तरह किसी को नाराज नहीं करता। सबको मान देता है। इसलिए छोटी बड़ी सभी कमेटी ले रहीं हैं टिकट के  आवेदन। देने वाला भी खुश और लेने वाला भी। इतनी कमेटियाँ इतने दावेदार लेते रहो आवेदन। एकत्रित करते रहो हर बंदे का बायोडाटा। बनाते रहो पैनल- शैनल। ये पैनल-शैनल तैयार करने वाले भी जानते हैं कि उनकी सिफ़ारिश कितना दम रखती है। आवेदन करने वाला भी इस सच्चाई को पहचानता है कि टिकट के मामले में इन पैनलों की कितनी अहमियत है। मगर सब के सब शामिल हैं टिकट वितरण के इस पारदर्शी नाटक में। सब शानदार अभिनय भी कर रहे हैं। ताकि किसी को कोई शक ना हो....जन जन का विश्वास बना रहे। कार्यकर्ता को लगे कि टिकट यहीं से तय होगा। चलो मोर्चे पर चलें....अगर जवान उन मोर्चे के हिसाब से युद्ध के दौरान जवाबी हमला करेगा तो वह कनफ्यूज हो जाएगा....किस को काम में ले किस को ना ले। इसलिए वह खुद निर्णय लेता है। यही कांग्रेस हाई कमान करता है। सबसे पैनल लेता है। लाओ भई, तुम भी लाओ और तुम भी बनाओ। सुनो सबकी करो मन की। किसकी हिम्मत है जो पूछ सके के हमारे पैनल पर क्या चर्चा हुई? कौन सवाल जवाब करेगा हाईकमान से कि हमारे पैनल से क्या निष्कर्ष निकला? कुछ  भी नहीं। अलग अलग कमेटी के पैनल जाएंगे तो स्वाभाविक है नाम भी अलग अलग होंगे। एक तो हो नहीं सकता....क्योंकि सबके अपने अपने उम्मीदवार हैं और सबके अलग अलग गुट। एक नाम  जाए तो फिर हाईकमान को इतनी मगज़मारी करने की जरूरत ही ना पड़े।  उसकी मजबूरी है उस जवान की तरह जो कई मोर्चे तैयार करता है। और युद्ध के समय जैसे  जवान खुद फैसला करता है ऐसे ही कांग्रेस हाईकमान वक्त पर फैसला लेता है कि टिकट किसको देनी है। मोर्चे,मारचे,पैनल -शैनल पता ही नहीं लगते किधर गए। यही होता आया है। अब भी यही होगा। राजनीति और युद्ध में सब जायज है।

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