Tuesday 12 July 2011

कांग्रेस का ताना बाना

श्रीगंगानगरकिसी पार्टी का जिलाध्यक्ष होने का मतलब ये नहीं कि वह किसी भी प्रकार का चुनाव जीतने या पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव जितवाने में सक्षम है। चुनावी जीत किसी जिलाध्यक्ष की सफलता,असफलता का मापदंड है तो फिर कांग्रेस के निवर्तमान जिलाध्यक्ष पृथ्वी पाल सिंह किसी काम के नहीं रहे। उनके राज में 2003 के चुनाव में कांग्रेस सभी सीट हारी। साथ में लोकसभा और ज़िला परिषद का चुनाव भी। 2008 में उस क्षेत्र से कांग्रेस धड़ाम हुई जहां से ये विधानसभा का टिकट मांग रहे थे। उस विधानसभा से कांग्रेस हारी जहां ये निवास करते है। सभापति और ज़िला प्रमुख के चुनाव में भी यही परिणाम रहा। गत नो साल में पृथ्वी पाल ने पार्टी को जीत दिलाई ना दिलाई मगर वे खुद हर बाजी जीतते चले गए। नई ज़िला कार्यकारिणी पर बस एक नजर पड़ते ही उनकी जीत का झण्डा दिखाई देने लगता है। उन्होने दिल खोलकर अपने बंदों को ओबलाइज किया। राजनीति में यह नहीं देखा जाता कि बंदे की योग्यता क्या है? वह पद के काबिल है या नहीं? यहां तो सफलता का पैमाना अपने समर्थकों को काम पर लगाना है। अधिक से अधिक संख्या में उनको एडजस्ट करना है। कुलदीप इंदौरा होंगे कांग्रेस के जिलाध्यक्ष। किन्तु कार्यकारिणी में पृथ्वी पाल सिंह का दबदबा है। ठीक है कि उनको कहीं से टिकट नहीं मिला। पार्टी की सत्ता आने के बाद उनको कोई पद नहीं मिला। जो था वह भी जाता रहा। इसका ये मतलब नहीं कि पृथ्वी पाल सिंह गुजरे जमाने की बात हो गए। गत नो साल में जिलाध्यक्ष रहते हुए दिल्ली से जयपुर के कांग्रेस गलियारों में जो संबंध पृथ्वी पाल सिंह ने बनाए वह कम नहीं है। वह भी उस दौरान जब ज़िले के सभी बड़े कांग्रेसी उनके खिलाफ थे। लाख कोशिश के बावजूद कोई कुछ नहीं बिगाड़ सका। राधेश्याम गंगानगर की तरह अपनी मर्जी से चलाई कांग्रेस। पहले पार्टी राधेश्याम कांग्रेस थी वह बाद में सरदार कांग्रेस बन गई। संभव है कई साल रहे भी। क्योंकि कुलदीप इंदौरा का लक्ष्य अनूपगढ़ सीट को फतेह करना है। और पृथ्वी पाल का श्रीकरणपुर से टिकट लेना। इनको अपने अपने लक्ष्य की प्राप्ति हो या ना हो मगर ये तो सत्य है कि दोनों एक दूसरे के मददगार तो होंगे ही। हों भी क्यों ना। इन्होने ज़िला कांग्रेस का ताना बाना ही ऐसा बुना है। मजबूर के शब्दों में--कहने को तो सब कुछ कह डाला,कुछ कहते हैं,कुछ कह नहीं सकते।

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