Tuesday 5 November 2013

अपने बूते चुनाव जीतने का गुरु मन्त्र दिया या नहीं


श्रीगंगानगर-गुरु गर्व से फूला नहीं समाता जब उसका शिष्य उससे आगे बढ़ता है. गुरु का सीना अपने शिष्य की उपलब्धि सुनकर चौड़ा हो जाता है. शिष्य से पराजित होकर भी गुरु अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है. परन्तु ये रामायण-महाभारत काल की बात हैं. जब शिष्य गुरु की आज्ञा  से दिन की शुरुआत किया करते थे. शयन के लिए भी  अनुमति लेकर जाते. काश! राधेश्याम गंगानगर और जगदीश जांदू उस समय हुए होते. हुए  भी  होंगे तो हमको क्या पता. यह वर्त्तमान है,जो ना तो भूतकाल होता है  ना भविष्यकाल होने की क्षमता इसमें होती है. आज तो राधेश्याम गंगानगर उस घड़ी को कोस रहे होंगे जब उन्होंने सीधे साधे जगदीश जांदू को अंगुली पकड़ कर राजनीति के पथ पर चलना सिखाया था. 1999 में बाऊ जी ही थे कांग्रेस के सर्वे सर्वा. बाऊ जी ने ही जांदू को मास्टर भगवान दास के वार्ड से टिकट दी. भगवान दास घर घर भागे दौड़े. जांदू जी जीत गए. चेयरमेन के दो दावेदार थे. एक बाउ जी के शिष्य परम आदरणीय,प्रातः स्मरणीय जगदीश जांदू दूसरे किशन मील. बाऊ जी का आशीर्वाद शिष्य के साथ था. जांदू जी चेयरमेन बन गए. हालाँकि तब अनेक लोगों ने बाऊ जी को इशारा किया था कि ऐसा मत करो. जांदू को आगे मत बढ़ाओ. लेकिन बाऊ जी जांदू जी के सीधे पन पर फ़िदा थे. किसकी सुनते!जगदीश जांदू ने भी बड़ी श्रद्धा,विश्वास और निष्ठां से शिष्यत्व का निर्वहन किया. सुनह-शाम हाजिरी में जाना.गुरु की हर जरुरत पूरी करना उनका धर्म हो गया था. बाऊ जी धन्य और गदगद, ऐसा शिष्य पाकर. कितना मान करता था. कितना सम्मान देता था. [ सम्मान है सामान नहीं,कृपया गौर करें] घर जगमग करने लगा जांदू के शिष्यत्व से. अविश्वास प्रस्ताव आया.  तब भी बाऊ जी से कहा गया कि इस शिष्य से छुटकारा  पा लो. उसकी नजर आपकी गद्दी पर है. ना जी! बाऊ  जी पर तो शिष्य द्वारा दिया जा रहा सम्मान सर चढ़ कर बोल रहा था.फिर उसका साथ दे गुरुत्व की रक्षा की. समय किसके रोके रुकता है. बाऊ जी को बीजेपी में जाना पड़ा. इसके बावजूद गुरु-शिष्य के सम्बन्धों में कोई बदलाव नहीं आया. कलयुग में तो बाप बेटे के रिश्ते भी रिसने लगते हैं लेकिन क्या मजाल कि  गुरु-शिष्य बदले हों. शिष्य ने 2008 के विधानसभा चुनाव में खूब गुरु दक्षिणा दी. दिल खोलकर गुरु का नाम जपा. सबको पता था. भारतीय संस्कृति में शिष्य धर्म निभाने से कौन रोकता! गुरु की भक्ति  में शिष्य ऐसा बावरा हुआ कि अपनी पार्टी तक की परवाह नहीं की. गुरु को गद्दी मिल गई. 2009 में सभापति चुनाव आया. गुरु ने शिष्य को फिर आशीर्वाद दिया. तब भी बाऊ जी को समझाया गया. मत करो ऐसा. बाऊ जी का हाथ पकड़ा गया लेकिन गुरु तो शिष्य की श्रद्धा से अभीभूत था. पर हाय  रे! शिष्य प्रेम! बाऊ जी ने किसी की एक ना सुनी.  शिष्य जीत गया. इसी जीत ने शिष्य को गुरु के सामने ला खड़ा किया. बाऊ जी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनके चरणों में बैठने वाला शिष्य जांदू ही उनको ललकारेगा. गद्दी छीनने की कोशिश करेगा. शिष्य जांदू की नजर तो गुरु की गद्दी से कभी हटी ही नहीं.शिष्य के सारे कर्म केवल और केवल इसी गद्दी के लिए रहे हैं. अब देखना ये कि गुरु ने अपने शिष्य को अपने बूते चुनाव जीतने का गुरुमंत्र भी दिया है या नहीं. 

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