Friday 16 October 2015

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा.................



श्रीगंगानगर। बच्चों की पढ़ाई के लिए बिरादरी का विरोध सहा। समाज की  उपेक्षा बर्दाश्त की । हुक्का पानी तक बंद कर दिया गया । दूसरों के सहारे, दूसरों के  मोहल्ले मेँ पनाह मिली। आज इस व्यक्ति के परिवार मेँ 11 डॉक्टर हैं। कोई सफलता के शिखर पर पहुँच गया तो कोई सफलता की सीढ़ी चढ़ रहा है। जिनका जिक्र हो रहा है, उनका नाम है नज़ीर अहमद। जो मौलवी नज़ीर अहमद के नाम से जाने जाते रहे। इनका बीते बुधवार को हनुमानगढ़ के निकट स्थित अपने गांव रोडांवाली मेँ 84 साल की उम्र मेँ इंतकाल हो गया । अपनी ज़िंदगी के कई दशक संघर्ष मेँ गुजारे उन्होने । अंतिम समय तक शिक्षा के लिए घर घर जाते रहे। हिंदुस्तान के विभाजन के समय उनकी बिरादरी पाक चली गई। उनको भी उधर जाने की धुन सवार हो गई। क्योंकि उनको लगा कि  इधर मदरसे नहीं होंगे। किसी से पूछ-ताछ कर  पाक की राह पकड़ी। रोडांवाली से धोलीपाल। फिर गंगानगर से पाकिस्तान। बार्डर पर एक लड़का और मिल गया। नज़ीर अहमद ने अपना तोलिया उसको दे दिया। वो उसे कंधे पर रख आगे निकल गया। नज़ीर अहमद पकड़े गए। जिसने पकड़ा उसने नाम पता पूछ लिया। पतले दुबले नज़ीर अहमद जैसे तैसे अपना हाथ छुड़ाकर भाग लिए । बार्डर पर तैनात सुरक्षा कर्मी ने गोली चलाई। गोली उस लड़के के लगी, जिसके कंधे पर तोलिया था। घर नज़ीर अहमद के मरने की खबर आई। मरने के बाद जो रस्म होती है, परिवार ने वो कर ली गई। नज़ीर अहमद ने पाक मेँ मदरसे मेँ तालीम हासिल की। हिकमत करना सीखा। लगभग दस-बारह साल बाद किसी तरह गाँव वापिस आए। कौन पहचानता? खैर! बाद मेँ सब ठीक हो गया। शादी हो गई। नज़ीर अहमद इधर उधर गांवों अपनी बिरादरी के बच्चों को पढ़ाने लगे। इसके लिए घर घर जाते। पर, वे अपने मकसद से बहुत पीछे थे। क्योंकि गरीब उनको ये कहता, पढ़ाने से कोई लाभ नहीं। बच्चे मजूरी करेंगे तो घर चलेगा। अमीर ये बोलता, हमें क्या जरूरत है। कौनसा नौकरी करवानी है। मस्जिद मेँ नमाज पढ़ाना शुरू किया। पैसे मिलते नहीं थे। कोई कुछ दे देता तो पेट भर जाता। हिकमत जानते थे। हाथ साफ था। लोग आने लगे। मस्जिद मेँ पढ़ाने का काम जारी रखा। मौलवी हो गए। इसमें भी महारत हासिल हुई। लोग दुख तकलीफ दूर करवाने आने लगे। इस बीच उन्होने अपने बच्चे को स्कूल मेँ लगा दिया। बस, विरोध शुरू हो गया। मौलवी का बेटा स्कूल मेँ जाएगा। पक्का हिन्दू बनेगा। बच्चे को स्कूल से हटाने का दवाब पड़ा। उन्होने बच्चे को स्कूल से हटाने से साफ इंकार करते हुए कहा, आप भी अपने बच्चों को स्कूल मेँ दाखिल करवाओ। क्योंकि दीन-दुनिया, दोनों की पढ़ाई जरूरी है। किसी ने नहीं सुनी। उनको मस्जिद से हटा दिया गया। समाज ने लगभग बाहर कर दिया। उपेक्षित, लेकिन बच्चों की पढ़ाई पर अड़े नज़ीर अहमद को गाँव वालों ने संभाला। मदद की। रहने को ठिकाना दिया। धीरे धीरे उनके ज्ञान की ख्याति दूर दूर तक हो गई। हर उम्र और वर्ग के लोग उनके पास अपने दुख, दर्द, तकलीफ लेकर आने लगे। लोगों के काम होते गए। उन पर विश्वास बढ़ता गया। खुदा ने सब कुछ दिया। आठ संतान। नाम, सम्मान और धन भी। उनका बेटा हिन्दी-अङ्ग्रेज़ी ही नहीं, अरबी, फारसी भी जानता है। कुरान को केवल पढ़ता ही नहीं, उस पर अमल भी करता है। नज़ीर अहमद के लड़कों के पास खुदा के फजलों करम से आज इतना कुछ है कि वे चाहें तो अपने गाँव मेँ पिता नज़ीर अहमद की स्मृति  मेँ बढ़िया स्कूल बना और चला सकते हैं। जिसमें उनके पिता की रूह तो रहेगी ही इसके साथ साथ पिता के प्रयास भी सार्थक होंगे, जो उन्होने अपने अंतिम समय तक किए। ऐसे लोग कम ही होते हैं। होते भी हैं तो जिक्र नहीं होता। [ नज़ीर अहमद के बेटे इमदाद अहमद से हुई अनौपचारिक बातचीत के आधार पर] दो लाइन पढ़ो—
वो नींद मेँ मुस्कराए हैं, शरमाए हैं
यकीनन उनके ख्वाब मेँ हम आए हैं।

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