Friday 27 September 2013

अजी! कुछ भी दिलाओ, परंतु सलीका तो सिखाओ


श्रीगंगानगर।  बेशक अपने लाडले-लाडलियों को महंगी बाइक और कार दिलवाओ, लेकिन इसके साथ-साथ उनको सडक़ पर चलने-चलाने का सलीका भी सिखाया जाना जरूरी है। जिनको ना तो रेड लाइट की परवाह है, न ड्यूटी पर खड़े कांस्टेबल का डर। उम्र के खुमार में उनको अपनी जि़न्दगी की फिक्र तो होने का सवाल ही नहीं। उन माता-पिता का भी ख्याल उनको नहीं है, जिन्होंने कितने लाड से उनको पाला है। कितने सपने वो अपने इन लडक़े-लड़कियों में देख रहे हैं। इनके सपने पूरे हों, ये समाज में प्रतिष्ठित होकर स्थापित हों, इनका अपना घर-संसार हो, इसके लिए अपनी क्षमता से, कभी-कभी तो क्षमता से आगे जाकर उनकी लगभग हर डिमांड पूरी करते हैं। ऐसे बच्चों को जब अपने परिवार की चिन्ता नहीं तो दूसरों की होने का प्रश्न ही कहां पैदा होता है। चाहे बाइक, कार खरीदने के नियम हों न हों लेकिन इनको सडक़ पर चलाने के नियम-कायदे जरूर होते हैं। कुछ सरकार के बनाये हुए और कुछ शहर की व्यवस्थाओं के अनुरूप अलिखित, अघोषित। जैसे ऑटोमेटिक लाइट्स सिग्नल, चौराहे पर खड़ा ट्रैफिक सिपाही, जेब्रा कॉसिंग आदि-आदि। ये सब इसलिए ताकि वाहन चालक खुद भी सुरक्षित रहें और दूसरों को भी उनकी लापरवाही, मस्ती से वाहन चलाने की आदत से नुकसान न हो। परंतु अफसोस शहर के हर बड़े-छोटे चौराहे पर, हर वक्त यही हो रहा है। ऐसे लोग रेड लाइट होने के बावजूद तेजी से निकलते हैं, जिससे बड़ी दुर्घटना की आशंका रहती है। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसे वाहन चालकों को रोकने की जिम्मेदारी ट्रैफिक पुलिस की है। मगर वाहन चालकों की भी तो होती है कोई जिम्मेदारी, कोई कत्र्तव्य। उनको रेड लाइट पर रुकना चाहिए, जब कांस्टेबल रोकेगा तो न केवल उन्हें बल्कि उनके परिजनों को भी टेंशन हो जायेगी। हद है ऐसे लोगों की भी जिनको यह नहीं पता कि किस साइड में जाने के लिए सडक़ पर कहां चलना चाहिए। जहां मर्जी हो उधर वाहन चलाते हैं और फिर अचानक से इधर-उधर मुड़ जाते हैं।  जिससे उनका खुद का जीवन तो संकट में पड़ता ही है, दूसरों को भी परेशानी होती है। दुर्घटना की आशंका बन जाती है। इनको कम से कम इतना तो पता होना ही चाहिए कि बाईं ओर मुडऩे के लिए अपने वाहन को सडक़ के बाईं ओर और दाईं ओर मुडऩे के लिए दाईं ओर रखना पड़ता है। सीधे चलने वाले को अपना वाहन बीच में रखना चाहिए। ऐसा होता नहीं है, क्योंकि यह सब न तो माता-पिता बताते हैं और न ही वे स्कूल-कॉलेज जिनमें ये पढ़ते हैं। सडक़ों पर दिनोदिन भीड़ लगातार बढ़ेगी, बेहतर है हम सब सडक़ पर चलने का सलीका तो कम से सीख ही लें, ताकि हम भी सकुशल रहें और दूसरे भी। साथ में जिंदा रहें हमारे परिवार के सपने।

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