Saturday 1 June 2013

सेवा भावना हो तो कांडा जैसी समर्पण हो तो जिंदल जैसा


 श्रीगंगानगर-राम घर चल। राम घर से दुकान जा। दुकान पर काम कर। खाली मत बैठ। कभी पांच पैसे के कायदे में पढ़ी इन लाइनों का अर्थ आज उस समय समझा जब न्यास ऑफिस गया। सच्ची, अशोक गहलोत किसी और को चेयरमेन बना देते तो वह काम नहीं होना था जो अब हो रहा है। गहलोत ने एक ज्योति कांडा को लगाया। अब चंद्र प्रकाश जिंदल भी आ गए। अपने घर का करोड़ों रुपए का चलता हुआ कारोबार छोड़ जन जन की सेवा करने वाले कोई विरले ही होते हैं। इतना समय तो कोई अपने बच्चों को नहीं देता। ये दोनों लगें हैं नगर का रूप निखारने के लिए। श्री गहलोत जी जानते थे ज्योति जी की क्षमता। उनको ज्ञान था इस बात का कि इनको चेयरमेनी मिली तो फिर मिनी चेयरमेन खुद ये बना देंगे। पारस होते ही ऐसे हैं। अब कोई इनको मिनी चेयरमेन,एक के साथ एक फ्री या ओएसडी कहें क्या फर्क पड़ता है। ऐसी टिप्पणी करने वाले जलोकड़े होते हैं। खुद तो कुछ करते नहीं। कोई दूसरा करे तो बातें बनाते हैं। हे महामानवो! लोग कुछ भी कहें आप अपने कर्म से विचलित मत होना। पथ से हटना  मत।  जिस पथ पर चल रहे हो वो डगमगाने नहीं चाहिए। कर्म पथ पर किसी की सुने बिना बढ़ने वाला ही इतिहास बनाता है। आप तो कंधे से कंधा और कदम से कदम मिलकर एक दूसरे का साथ दो। यह साथ इस नगर के लिए है....आपका तो इसमें कोई स्वार्थ ही नहीं। यह नगर और इसका न्यास कितना सौभाग्यशाली है कि श्री गहलोत ने एक चेयरमेन बनाया। जिसे चेयरमेन बनाया उसकी सूझबूझ देखो....नगर के विकास के प्रति ललक देखो....इतिहास बनाने का संकल्प देखो...एक चेयरमेनजैसे को  अपने साथ रख लिया। है। ताकि श्री गहलोत के सपने कम समय में पूरे हो सकें। ऐसा तभी होगा जब कोई काम करने वाला हो। इससे पहले कोई ऐसा चेयरमेन नहीं हुआ जिसने अपने साथ एक चेयरमेन और रखा हो। जो उसी की तरह पूरा दिन काम करे। कुछ नहीं बाकी सब के सब जन प्रतिनिधि,अफसर किसी कर्म के नहीं। अरे!अपने साथ एक और बंदे को नहीं रख सकते। जिससे काम  जल्दी से जल्दी हो। सरकार को यह कानून ही बना देना चाहिए कि ऐसी पोस्ट उसी व्यक्ति को मिलेगी जिसके पास एक बंदा ऐसा हो जो उसके जैसा ही समर्पित भाव से काम कर सके। जो मॉडल श्रीगंगानगर न्यास ने पेश किया है वह अनोखा,अनूठा है। इसे पूरे प्रदेश में क्या पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए। 

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