Monday, 20 May, 2013

बरगद हो जाना कोई आसान बात नहीं है


श्रीगंगानगर-गजसिंहपुर के एक बड़ के पेड़ की धुंधली सी छाया है स्मृतियों मेँ। चारों तरफ फैला हुआ...खूब मोटा तना....भरा भरा...पता नहीं कितना पुराना था। उसके  नीचे सब्जी वाला होता, राहगीर भी। बच्चे भी उसकी छाया मेँ गर्मी काटते। टहनियों पर अनेक प्रकार के परिंदों की आवा जाही। क्या मालूम उसे ऐसा बनने मेँ किता समय लगा। अपने आप को कितने दशकों तक धूप,गर्मी,आँधी,सर्दी,गहरी रात मेँ अपने आप को अचल रखा होगा तभी तो शान से खड़ा था वह बड़/बरगद का पेड़। किसी पेड़ पौधे ने  कभी शिकायत नहीं की कि हाय! यह बड़ का पेड़ उन्हे बढ़ने नहीं देता, खिलने नहीं देता। यह शिकायत राजनीति मेँ ही होती है। राजनीति मेँ भी बरगद के पेड़ का जिक्र हुआ है। राजनीति मेँ कोई किसी के कहने से नहीं आता। सबकी अपनी मर्जी। आए आए,ना आए तो ना आए। कुछ अपवाद को छोडकर सबके लिए बराबर चांस...वही रास्ते...वही मंजिल। किसी को खाद,पानी समय पर नहीं मिलता तो बीज धरती मेँ ही सड़  जाता है। कोई अंकुरित होता तो है लेकिन किसी कारण से जल्दी मुरझा जाता है। कोई पौधा रह जाता है। कोई पेड़ बन कर संतुष्ट होता है। अब हर कोई बरगद या बड़ का पेड़ तो बन नहीं सकता। कितना समय लगता है। क्या क्या सहना पड़ता है। कितनों को शरण देनी पड़ती है अपनी छांव मेँ। कोई पल रुकता है कोई दो पल। फिर किसी को कोई रोक तो नहीं रहा बरगद का पेड़ बनने से। राजनीति मेँ कितने ही व्यक्ति हैं जो उन लोगों के साथ ही राजनीति की गली मेँ आए जिनको आज बरगद कहा जाता है। वो बरगद हो गए और जो अपने आप को बरगद का पेड़ नहीं बना सके वे ये कहने लगे कि बरगद उनको बढ़ने नहीं देता। किसी बरगद से डर लगता है तो खुद बरगद बनो। उससे ऊंचा....उससे घना...विशाल...ताकि वह बोना हो जाए। जो उसकी छाया मेँ सुकून पाते हैं वे आपके सानिध्य मेँ चैन महसूस कर सकें। चूंकि बरगद का मुक़ाबला नहीं कर सकते इसलिए उसका कोई महत्व नहीं...ये नहीं हो सकता। उसको काट दो ....उसे नजर अंदाज कर दो...ये कैसे मुमकिन है। सीधे सीधे बात करें तो राधेश्याम गंगानगर बेशक बरगद हो गए हों,उनका लाड़ला रमेश राजपाल नहीं हो सका। गुरजंट सिंह बराड़ होंगे बड़ का पेड़ लेकिन उनका बेटा बलदेव बराड़ हो सकता है क्या? किसी जमाने मेँ श्रीकरनपुर क्षेत्र मेँ कंग ही कंग थे....आज कहां गए ये बरगद। हीरा लाल इंदौरा को अपने क्षेत्र का बरगद माने तो कुलदीप इंदौरा को देख लो। इसका ये मतलब नहीं कि पिता अपने  पुत्रों को बरगद बनते नहीं देख सकते थे। अर्थ ये कि उनमें क्षमता नहीं आई अभी तक बरगद बनने की। बरगद होना आसान नहीं है। बड़ी कठिन डगर है। हर पेड़ बरगद जैसा हो तो फिर बरगद की अहमियत ही क्या रहेगी। बरगदों को कोसने से कुछ नहीं होने वाला....बरगद बनने की क्षमता हो तो किसी की हिम्मत कहां है रास्ता रोकने की।

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