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Tuesday, November 18, 2008

वजूद ही ख़त्म हो जाए

मैं जानता था कि मेरे चारों ओर
स्वार्थी व मौका परस्त लोगों का जमघट है
मुझ ये भी मालूम था कि
ये सब अपने स्वार्थ के लिए
मेरे खून का कतरा कतरा
पीने से भी नहीं हिचकिचायेंगें
मगर मैंने ये नहीं सोचा था कि
यह सब इतनी जल्दी हो जाएगा
मुझे बिस्तर पर पड़ा देख
ये लोग यह सोचते हुए
मुझसे दूर चले जायेंगें कि
इसमे अब खून रहा ही कहाँ है
जो हमें पीने को मिलेगा
और मैं अकेला बिस्तर पर पड़ा
अपनी टूटी फूटी छत को घूरने लगा
यह सोचते हुए कि कहीं
यह उन लोगो की तरह
साथ छोड़ने के स्थान पर मुझे
अपने आँचल में सदा के लिए
ना छिपा ले
जिससे कि मेरा रहा सहा
वजूद ही ख़त्म हो जाए।

---गोविन्द गोयल