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Sunday, January 4, 2009

वाह ! ताज, आह ! ताज

दुनिया में ताजमहल अपने आप के एक ऐसा अजूबा है कि इंसान हर सम्भव उसको देखने,छूने,उसके आस पास फोटो खिंचवानेको लालायित रहता है। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही था। मथुरा गए तो आगरा जाने से अपने आप को नहीं रोक सके। २८ दिसम्बर संडे का दिन। दोपहर १२-३० बजे लाइन में लगे। लाइन इतनी लम्बी की क्या कहने। ३-३० बजे जब प्रवेश द्वार के निकट आए तो सुरक्षा कर्मियों ने बताया कि लेडिज जेंट्स अलग अलग लाइन में लगेंगें। अब हो भी क्या सकता था। जेंट्स अन्दर चले गए,लेडिज फ़िर से लाइन में। ये सुरक्षा कर्मी पहले ही बता देते तो बाहर से परिवार सहित आने वालों को परेशानी तो नहीं होती।प्रवेश द्वार पर इस से भी बुरा हाल। जेंट्स की तलाशी लेने वाले सुरक्षा कर्मी तो ठीक व्यवहार कर रहे थे। लेडिज सुरक्षा कर्मी तो चिडचिडी हो चुकी थी, पता नहीं घर की कोई परेशानी थी या भीड़ के कारन उनका ये हाल था। तलाशी के समय एक लेडिज के आई कार्ड उसने फेंक दिए। लेडिज ने काफी तकरार की। एक अन्य लड़की के पर्स में ताश थी वह उस सुरक्षा कर्मी ने कूडेदान में डाल दी। उसका व्यवहार सबके लिए परेशानी का सबब बना हुआ था मगर प्रदेश में बोले कौन लेकिन ताज के निकट जाते ही केवल वाह ! वाह ! के अलावा कुछ मुहं से निकल ही नही सकता था। उस ज़माने में जब निर्माण के लिए कोई आधुनिक मशीनरी नहीं होती थी तब ताज का निर्माण हुआ। यमुना नदी के किनारे ताज प्रेम,पति-पत्नी के अनूठे,अनमोल तथा गरिमामय संबंधों का साक्षी बनकर अटल,अविचल खड़ा हुआ है। साधुवाद उनको जिन्होंने इसकी कल्पना कर उसको अमली जामा पहनाया। साधुवाद उनको जो आज अपनी इस विरासत को बनाये रखने के लिए जी जान से लगे हुए हैं। साधुवाद उनको भी जो घंटों लाइन में लगे रहते हैं केवल इसलिए ताकि उनको भी ताज को जी भरकर देख लेने,उसको छू लेने का अवसर मिल सके। घंटों की प्रतीक्षा और सुरक्षा कर्मियों का कभी कभार होने वाला रुखा व्यवहार भी उनको ताज देखने से रोक नहीं पाता। वाह ! वाह! ताज।