Wednesday, 26 August, 2015

नेतृत्व का दमदार मौका गंवा दिया विधायक ने

नेतृत्व का दमदार मौका गंवा दिया विधायक ने
गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर।  राजनीति मेँ भीड़ उसी की होती है जो मौके पर उसे कब्जा ले। जलसा, जुलूस का नेतृत्व भी वही करता है, जो भीड़ को कब्जाने का हुनर जानता हो। कोई नेता किसी अधिकारी के चेम्बर मेँ जन हित के किस मुद्दे पर उसके साथ चाहे जैसा बरताव करे, कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन यही नेता सड़क पर भीड़ के सामने अधिकारी को लताड़े , आँख दिखाए, उसे ऊपर नीचे करे तो वह जन जन मेँ लोकप्रिय हो जाता है । जनता जनार्दन उसकी जय जय कार करती है। कुछ ही क्षण मेँ उसकी रॉबिन हुड स्टाइल वाली छवि के चर्चे सबकी जुबान पर आ जाते हैं। ऐसा हुनर दिखाने के मौके कभी कभी ही आते हैं। जो ऐसे मौके को  कैश कर ले, वही सिकंदर। वही लीडर। चूक गए तो गए काम से और साथ मेँ नाम से भी। छोटी उम्र मेँ एतिहासिक जीत दर्ज कर विधायक बनीं कामिनी जिंदल के पास भी ऐसा ही अवसर था, अहिंसा सर्किल पर। उस अहिंसा सर्किल पर जहां  जनता सड़क निर्माण के लिए चक्का जाम की तैयारी मेँ थी। बीजेपी के अलावा सभी पार्टी के नेता थे। साथ मेँ थे, व्यापारिक संगठनों के पदाधिकारी। अनेक पार्षद। भीड़ तो थी ही। नहीं था तो केवल नेतृत्व। कामिनी जिंदल चाहती तो अपनी लंबी अनुपस्थिति को एक झटके मेँ ही दमदार उपस्थिति मेँ बदल सकती थीं। लेकिन ऐसा हो ना सका। उनको कुछ अधिक नहीं करना था। थोड़ा आक्रामक होना था और उसी के अनुरूप जोश से लबरेज तोड़ा एक्शन होता। उसके बाद तो जो होता उसका जिक्र लंबे समय तक रहता। आप विधायक हैं। उस बी डी अग्रवाल की बिटिया हैं, जो बिंदास बोलने के लिए जाने जाते हैं। साथ मेँ हो आईपीएस की बीवी। बैठ जाना था सड़क पर। हल्ला करना था, प्रशासन और सरकार के खिलाफ। मांग लेकर कलक्टर के पास जाने की बजाए उनको मौके पर बुलाना था। कलक्टर को आना पड़ता। खुद तो आते ही साथ मेँ लाते संबन्धित विभाग के अधिकारी। आखिर उस  विधायक की बात को कब तक अनसुनी करते, जो बीच सड़क पर जनता के साथ विकास की जायज मांग के लिए बैठा हो। कुछ ही देर मेँ खबर जिला प्रशासन से होती हुई जयपुर मेँ सत्ता के गलियारों तक पहुँच चुकी होती। पूरा का पूरा प्रशासन हाथ बांधे सड़क पर विधायक कामिनी जिंदल के सामने खड़ा होता। और शहर की जनता अहिंसा सर्किल पर, विधायक के आस पास। वे नेता भी फिर विधायक की हां मेँ हां मिलाते जो उधर आए हुए थे। मीडिया तो है ही विधायक कामिनी जिंदल का। उसके बाद तो वही होता जो विधायक कहतीं। आखिर वे विधायक हैं। विधायक होना कोई छोटी मोटी बात नहीं। विधायक पार्षद नहीं होता, जिसे कलक्टर कुछ भी कह कर शर्मिंदा कर दे। कुछ ही देर मेँ विधायक कामिनी जिंदल की बल्ले बल्ले हो जाती। ये तो पता नहीं कि विधायक के  इस एक्शन से सड़क बनती या नहीं, लेकिन छवि जरूर बनती। बल्ले बल्ले जरूर होती। राजनीति मेँ ऐसा होता ही आया है। मंच होता किसी का है, कब्जा कोई लेता है। परंतु ये सब होता है अनुभव के साथ। अनुभव मेँ समय लगता है।  समय नहीं हो तो फिर कोई गाइड करने वाला हो। अगर दोनों ही नहीं तो मौके ऐसे ही हाथ से जाते रहेंगे। सबको पता है कि राजनीति मेँ ऐसे मौके रोज रोज आते नहीं। कचरा पुस्तक की दो लाइन—
सरकार की तरह मस्त रहो जनाब

पेट भरे ना भरे दिखाते रहो ख्वाब। 

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