Tuesday, 12 November, 2013

कामिनी के बढ़ते समर्थन से जांदू खेमे की मुस्कान बढ़ी


श्रीगंगानगर-जैसे जैसे जमींदारा पार्टी प्रत्याशी  कामिनी जिंदल के प्रति मतदाताओं का झुकाव बढ़ा है  वैसे वैसे कांग्रेस प्रत्याशी जगदीश जांदू खेमे की मुस्कान बढ़ रही है.ये राजनीति है . इधर ऐसा भी होता है. कोई अचरज की बात नहीं है.कभी कभी किसी प्रत्याशी को मिले वोट से वह खुद जीते ना जीते   लेकिन दूसरा,तीसरा जीत जाता है.ये कोई नई  बात नहीं है.इसके बावजूद चुनाव  पर पैनी नजर रखने वाले जगदीश जांदू को बहुत कमजोर उम्मीदवार क्यों मान रहें हैं,पता नहीं. या तो उनके पास आंकड़ों का विश्लेषण नहीं है या फिर वे सेठ जी के प्रभाव में आकर सही आंकलन कर नहीं पा रहे. उसका नाम जगदीश जांदू है. जो अब कांग्रेस का उम्मीदवार भी है. उस कांग्रेस का जिसका अपना एक वोट बैंक होता है. उस कांग्रेस का जिसने 2003 के चुनाव में अपने इतिहास की सबसे बड़ी हार झेल कर भी 31.87 प्रतिशत  वोट लिए थे. तब कांग्रेस का प्रत्याशी 35922 वोट से हारा था. उस कांग्रेस का जिसे दमदार  त्रिकोणीय मुकाबले में जीत मिलती है. श्रीगंगानगर सीट पर गैर कांग्रेस वोटों की संख्या कांग्रेस के वोटों से अधिक है. चूँकि वे किसी एक पार्टी से सबंधित नहीं है इसलिए जब जब इन वोटो का विभाजन हुआ कांग्रेस उम्मीदवार ने विजय प्राप्त की. गत कई चुनावों का विश्लेषण किया जाए तो यह तस्वीर साफ़ हो जाएगी. 2008 के चुनाव में कांग्रेस को 30 . 85 प्रतिशत और बीजेपी को 41 .05 प्रतिशत वोट मिले थे. बाकी 20 .59 प्रतिशत वोट मनिंदर सिंह मान और बीएसपी प्रत्याशी में बटें. बाकी गजेन्द्र भाटी और अन्य में. 1998 के चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबला हुआ 94 . 91   प्रतिशत वोट तीन उम्मीदवारों में बटें. कांग्रेस 42 . 05 प्रतिशत वोट लेकर चुनाव जीत गई. 1993 में 96 .74 प्रतिशत वोट तीन उम्मीदवारों में विभाजित हुए. कांग्रेस उम्मीदवार 36 03 प्रतिशत वोट लेकर विजयी हो गया. 1990 के चुनाव में 94 . 80 प्रतिशत वोटों का बटवांरा दो उम्मीदवारों में हुआ. कांग्रेस 44 . 62 प्रतिशत वोट लेकर भी हार गई. ऐसा ही होता है इधर श्रीगंगानगर में. अब इस चुनाव में भी कामिनी जिंदल ने मुकाबला त्रिकोणीय बना कर 25 प्रतिशत से अधिक वोट लिए तो फिर  कांग्रेस के जगदीश जांदू की जीत को कौन रोकेगा! उसके बाद इस सीट पर बीजेपी भी जाट नेता को ही टिकट देगी.सामान्य वर्ग का किस्सा समाप्त.  अगर कामिनी ने यह चुनाव जीत कर इतिहास बदल दिया तो फिर जाट नेता को उम्मीदवार बनाने से  पहले  पार्टियां कई बार सोचेंगी. लेकिन ऐसा होता लगता नहीं. क्योंकि कामिनी के साथ लगे लोग भी मानते हैं कि कामिनी जीत तो नहीं सकती लेकिन वह टक्कर में है. टक्कर में तो 1993 और 1998 में निर्दलीय सुरेन्द्र सिंह राठौड़ भी रहे थे और बीजेपी के दिग्गज भैरों सिंह शेखावत भी. क्या हुआ! इनसे अधिक टक्कर में कोई रहा भी है श्रीगंगानगर के चुनाव में. अब कामिनी जिंदल इन दोनों नेताओं से अधिक बड़ी टक्कर दे तो फिर कोई बात बने. लेकिन जिन नेताओं के हाथ में उनकी कमान है वे राठौड़ और शेखावत से बड़ी टक्कर दे पाएंगे यह समय बतायेगा. दो लाइन पढ़ो-मेरे सपनों में आना हर रोज सताना,इक बार हम चले आए तो बुरा मान गए.

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