Sunday 3 February 2013

रिश्तों में संवाद टूटता है तो दीवार बनती ही है



श्रीगंगानगर-पचास साल पहले जो रिश्तों की महक पूरे परिवार को सुगंधित कर गौरव का अनुभव करती थी वह अब गायब हो चुकी है। महक तो गई सो गई संवाद भी अपने साथ ले गई। संवाद टूट चुके हैं। दीवारें बन चुकी हैं। कुछ देखा और कुछ सुना। सालों पहले एक कस्बे में तीन भाइयों के तीन मकान एक साथ थे। तीनों भाइयों का भरा पूरा परिवार। बेटे,बहू,पोते,पोतियाँ....... । भोजन जल्दी कर लिया जाता था। शाम को  भोजन के बाद तीनों भाई एक भाई के यहां एकत्रित होते। सर्दी होती तो कमरे में गद्दे पर बैठते सब और  गर्मी में बाहर चबूतरे पर लकड़ी के पट्टे पर जमती महफिल। वहीं उनके लड़के भी आ जाते। बच्चे भी आस पास ही उछल कूद करते। चर्चा कुछ खास होती भी और नहीं भी। लेकिन बैठक जरूर होती थी। तब तक घरों में महिलाएं अपना काम काज निपटा लिया करती थी। चाहे उनके काम अलग थे। उनकी सोच भिन्न रही होगी। एक दूसरे की मदद भी ना करते हों। लेकिन उनमें संवाद हमेशा कायम रहा। मिलना भी नियमित रूप से होता। कुछ छोटी मोटी कोई बात भी किसी से हुई होती तो वह मिलने-मिलाने से मिट जाती।वक्त ने ऐसी करवट बदली की घर घर की तस्वीर भी बदल गई। मस्त तो अपने अपने घर में सब के सब पहले की तरह ही हैं। किन्तु अब भाइयों में वैसा मिलना नहीं रहा। मिलना तो बड़ी बात है हजारों हजार परिवार तो ऐसे हैं जहां भाइयों में राम रमी तक नहीं है। इससे उसको कोई लेना देना नहीं और उसको इससे। किसी के कुछ भी हो कोई मतलब नहीं। एक दीवार है...एक भाई के उत्सव है लेकिन इस  उत्सव की उमंग,जोश,आनंद.....दीवार के उस तरफ भाई के मकान तक नहीं पहुंचता। एक भाई संकट में हो तो दूसरा उसकी परवाह नहीं करता। उसको संकट का दर्द भी शायद ही महसूस होता हो।बहिन का मुंह पूर्व में है तो भाई का पश्चिम में। जब सगे बहिन भाइयों में ही संवादहीनता की स्थिति है तो उनके बच्चों में कोई ताल मेल कैसे रह पाएगा? उनके लिए चाचा,ताऊ,बुआ के रिश्तों के प्रति आदर-मान रहना कैसे संभव है। अंदर के झूठे,खोखले अहंकार वाले इस वक्त ने इंसान को  सब कुछ रहते हुए भी अकेला कर दिया। उसके मन की शांति,सुकून,उमंग,उल्लास सब कुछ छीन लिया। ऐसा नहीं है कि उनको इसका दुख ना होता हो, अकेलेपन में अंदर का सन्नाटा अपनों की याद ना दिलाता हो। मगर करें क्या....जैसे जैसे समय आगे बढ़ा  रिश्तों के बीच की दीवार बड़ी  होती चली गई, उनके कद से भी बड़ी। अब तो उस तरफ झांक भी नहीं सकते। शर्म भी आती है। झिझक होती है। दौड़ के एक दूसरे को गले लगाने की बात तो करना ही बेमानी है। सपना है। ख्याल है। भविष्य क्या होगा यह सोचकर ही दिल की धड़कन तेज हो जाती है।  

1 comment:

gurpreet singh Butter said...

सच है।
....
http://yuvaam.blogspot.com/2013_01_01_archive.html?m=0