Friday, 19 February, 2016

दुविधा...

कमेंट्स करने से पहले पढ़ लेना प्लीज....
55
साल के इस गोविंद के कई रूप हैं। 55 साल का बेटा, भाई है तो लगभग 25 साल का पिता भी। पति, चाचा, मामा, दादा, ससुर, दोस्त,......जैसे कितने व्यक्ति एक के अंदर गईं....साथ मेँ पत्रकार भी है...आम इंसान भी ...जिज्ञासु.......किस गोविंद का जिक्र करूँ....समझ से परे......गोविंद के प्रेम का जिक्र नहीं होता तो गोविंद की कथा अधूरी है। उलझन है, दुविधा है, लेकिन कहानी है तो शुरू करनी ही होगी। अंत कैसा होगा क्या पता? वो तो क्लाइमेक्स लिखने के बाद ही मालूम होगा। प्रेम! प्रेम तो साथ चलेगा ही।

1-55 साल पहले 16 जनवरी के दिन माँ को सुबह ही अहसास होने लगा था कि मैं आने वाला हूँ। शाम होते होते यह अहसास प्रसव पीड़ा मेँ बदल गया। दादी ने धाओ दाई को बुला लिया। गजसिंहपुर मेँ पालिका पार्क के बिलकुल निकट घर के बीच वाले कमरे मेँ शाम को 7.34 बजे मैं गर्भ गृह से बाहर आया। मैंने इस अलौकिक, दिव्य और अद्भुद सृष्टि को नजर भर देखने की शुरूआत करने की बजाए रोना शुरू कर दिया। माँ से अलग करने के लिए धाओ ने नाल काट दी। माँ प्रसव की तीव्र पीड़ा के बावजूद खुश खुश रही होगी और मैं लड़का होने के बावजूद रो रहा था। शायद पीड़ा माँ को रही थी और रो मैं रहा था। धाओ ने मुझे पोंछ कर माँ के निकट लिटा दिया। माँ देखती रही। कुछ देर बाद कानों मेँ थाली बजने की आवाज सुनाई दी। माँ बताया करती थी, तू जब पैदा हुआ तब तेरे कान छिदे हुए थे। कानों मेँ छेद थे। शायद पिछले किसी जन्म मेँ तू कोई साधू, संत था...............

2 comments:

Udan Tashtari said...

55 साल के इस गोविंद के कई रूप हैं...सभी वन्दनीय है!!

नारदमुनि said...

o तेरी की