Saturday 20 February 2016

दुविधा

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शिशु की दिनचर्या जैसी होती है मेरी भी थी। रोना, सोना और दूध पीना। सरका , घुटनों के बल चला। और फिर पैरों पर। आँगन बड़ा था। दहलीज़ ऊंची थी। बाहर जा नहीं सकते थे। पाँच साल का हुआ। सरकारी स्कूल मेँ भर्ती हो गया। फेल होने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। एक कायदा, एक स्लेट और एक तख्ती, यही होता था, कपड़े के थैले मेँ। जो आजकल स्कूल बैग के नाम से जाना जाता है। स्कूल जाने से पहले और आने के बाद खेलना। वह कंचे, सिगरेट की डब्बी, गेंद, शाम को कबड्डी। पतंग उड़ाना। दूसरी, तीसरी मेँ हो गए। दादी जी प्रस्थान कर गईं। स्मृति इसलिये है कि मरने पर जो आज होता है, तब भी वैसा ही हुआ था। मैं नहीं गया था, श्मशान मेँ। गली मेँ खेल रहा था। दादा की दुकान थी। पिता कारखाने मेँ काम करते थे। एक दिन मैंने और चचेरे भाई ने दुकान से दस दस पैसे चुरालिए थे। जो होना था हुआ। पहले लाइन से उस पार स्कूल मेँ था। फिर घर के पास स्थित स्कूल मेँ लगा दिया गया। पड़ोस मेँ एक लड़के की शादी हुई। लड़का परदेश रहता था। उसकी बहू बिलकुल अनपढ़। उन्होने मुझे लिखना सिखा दिया। परदेश से जो पत्र उसके पिया जी उसे भेजते। वह मुझसे पढ़वातीं। चूंकि गली मेँ हम ही ज्ञानवान, गुणवान और राज को राज ही रखने मेँ निपुण थे, इसलिये मुझे वह पत्र पढ़ कर सुनाना होता और उसका जवाब भी लिखना होता। इसके बदले मुझे मिलते दस पैसे, कभी कभी पच्चीस पैसे। कभी पैसे की जरूरत होती तो मैं पूछ लेता, चिट्ठी आई क्या? वह सिर हिला देती। कई बार झिड़क कर कहती...नई आई रे। क्यों जान खा रहा है। काम करने दे.....दोनों उदास। वो अपने कारण और मैं अपनी दस्सी की वजह से। ये तो अब मालूम हुआ कि चिट्ठी आई होती तो मुझे तो पता लग ही जाता.....

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