Thursday 3 December 2015

एक बार माननीय अदालत खुद देखे शहर के हालात


श्रीगंगानगर। देश की सभी अदालतों को मेरा सादर प्रणाम। वंदन और अभिनंदन। अदालत छोटी बड़ी नहीं होती। जहां न्याय होता हो, वह छोटी कैसे हो सकती है। न्याय के पक्षधर बड़े ही होते हैं। विशाल हृदय के मालिक। न्याय के लिए इधर से आदेश निर्देश जारी होते हैं। उनकी पालना सभी को करने होती है। कोई चूँ चपड़ नहीं कर सकता। क्योंकि अदालत का सम्मान सर्वोपरि है। चाहे कोई हो। आम आदमी हो या फिर खुद सरकार। सबको अदालत के समक्ष दंडवत करना है। सिर झुकाना  है। न्याय के सामने दंडवत करने और सिर झुकाने से उसकी मर्यादा की पालना होती है। उसका सम्मान बढ़ता है। अदालतें सबसे बड़ी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी बड़ी। न्याय छोटा हो ही कैसे सकता है। जिस भी अदालत का जो भी, जैसा भी आदेश हो उसे सभी को मानना है। इसमें अदालत का कोई स्वार्थ नहीं होता। इसमें असहिष्णुता भी नहीं हो सकती। चूंकि देश मेँ अदालत का सबसे ऊंचा और सम्मानित स्थान है, वही सर्वोच्च है तो फिर अपने मन की बात उसी से कही जाए। पीड़ा उसी को सुनाई जाए। उसी के सामने गुहार हो, जो न्याय को समझते हैं। करने मेँ पूरी तरह सक्षम है। चूंकि यह सब न्याय के लिए करना है और न्याय करने वाला ईश्वर तुल्य है, इसलिए शब्दों की मार्फत माननीय, समाननीय अदालत से निवेदन है कि वह खुद एक बार श्रीगंगानगर को अपनी आँखों से देखे। उसकी दुर्दशा को देख कर जाने उसकी पीड़ा । शहर की पीड़ा के साथ साथ जन जन की पीड़ा भी। शहर का और आम आदमी का दुर्भाग्य भी। माननीय अदालत यह भी देखे कि इस दुर्दशा का जिम्मेदार कौन ? किस किस ने इस शहर का बेड़ा गर्क करने मेँ अपना योगदान दिया। आज शहर के पास अदालत के सिवा कोई विकल्प ही नहीं बचा, जिसको वह अपनी पीड़ा बता सके। सुना सके। जो उसकी पीड़ा को महसूस कर न्याय कर सके। माननीय अदालत द्वारा शहर का दौरा संभव है!  यह न्याय  के लिए त्वरित जरूरत भी है। यह किसी भी प्रकार से असंभव नहीं, क्योंकि अदालत ने तो न्याय के लिए आधी रात को भी अपने दरवाजे खोले हैं। इसी लिए तो अदालत सर्वोच्च है। गंगानगर के दौरे से एक और नई नज़ीर पेश की जा सकती है। गंगानगर मेँ ना तो नेतृत्व है और ना ही वह प्रशासन जो शहर हित की बात करे। जन हित के लिए काम करे। लावारिस की तरह जी रहे गंगानगर वालों का कोई लीडर नहीं। प्रशासन सुनने को तैयार नहीं। ऐसी स्थिति मेँ शहर अदालत के समक्ष ही फरियाद कर उसे अपना दर्द सुनाएगा। अदालत दौरा करके यह जान सकती है कि कहाँ कहाँ क्या हुआ? दुर्दशा करने वाले कौन हैं? लोग कैसे प्रताड़ित हो रहे हैं? बेबस, कमजोर, लाचार शहर की सुध अगर अदालत ले लो तो शहर उसे सिर आँखों पर बैठाए। उसकी जय जय कार करे । इससे भी बढ़कर उसके बाद जो न्याय होगा वह नया इतिहास लिखेगा। यह जरूरी भी है और गंगानगर की मजबूरी भी। वह खुद तो चल के तो अदालत जा नहीं सकता। जो व्यक्ति माननीय अदालत को बताते दिखाते हैं, उन मेँ उनका खुद का स्वार्थ होता ही है। मगर अदालत तो निस्वार्थ करेगी। न्याय के लिए देखेगी। चूंकि अदालत न्याय के लिए ही है, इसलिए उसी से प्रार्थना है कि वह समय निकाल कर एक बार आए और गंगानगर को देखे अपनी आँख से। अपने नजरिए से।

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