Wednesday 5 February 2014

सदियों पुराने विज्ञान पर भारी पड़ा क्रिकेट


श्रीगंगानगर-सदियों से दुनिया की तरक्की में योगदान दे रहा विज्ञान आज क्रिकेट के सामने छोटा पड़ गया। हार गया विज्ञान क्रिकेट से। ऐसे भी कह सकते हैं कि मीडिया ने विज्ञान को क्रिकेट से हरा दिया। क्योंकि मीडिया ने उसे विज्ञान की  तुलना में अधिक महत्व दिया। उस विज्ञान के जिसका तरक्की में सबसे अधिक योगदान होता है। मीडिया के  वर्तमान आधुनिक स्वरूप में भी विज्ञान का योगदान है ना कि क्रिकेट का। वैज्ञानिक सीएनआर राव और क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया गया। लेकिन मीडिया ने जिस प्रकार से सचिन को प्रमुखता दी उससे तो ऐसे लगता है जैसे श्री राव को उनके सामने कोई अस्तित्व ही नहीं है। श्री राव की तुलना में सचिन की ये बड़ी बड़ी फोटो। खबरों में उनसे बड़े अक्षरों में नाम। अखबारों में नाम भी श्री राव से पहले लिखा गया सचिन का। जैसे सचिन के सामने वे तो कुछ हैं ही नहीं। एक क्रिकेटर को वैज्ञानिक की तुलना में इतनी अहमियत! जितना श्री राव को विज्ञान का अनुभव होगा उतनी उम्र होगी सचिन की। दो चार साल आगे पीछे से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ऐसे में कौन चाहेगा वैज्ञानिक बन देश और विज्ञान की सेवा करना। सब के सब क्रिकेटर बनना पसंद करेंगे। तब कैसे कौन करेगा खोज?कैसे होंगे अनुसंधान? कैसे आगे बढ़ेगा विज्ञान? कैसे और कौन करेगा सृजन? सब का सब रुक जाएगा जहां है वहीं। जड़ हो जाएगा विकास का काम साथ में विज्ञान। जिस देश का राष्ट्रपति वैज्ञानिक रह चुका हो। उस देश के मीडिया में विज्ञान की एक खेल के सामने इतनी तौहीन। वह भी उस खेल के सामने जिसे पूरी दुनिया के देश खेलते तक नहीं। जबकि विज्ञान तो दुनिया के हर कौने में है। विज्ञान के बिना तो कुछ भी संभव नहीं। विज्ञान और वैज्ञानिक तो पुरातन है और क्रिकेट और क्रिकेटर कल के। कैसी विडम्बना है कि मीडिया विज्ञान,वैज्ञानिक और उनकी उपलब्धियों को क्रिकेट से छोटा मान रहे हैं। आज देश का महान वैज्ञानिक उस खिलाड़ी के सामने मीडिया में छोटा हो गया जिसका समाज,देश और दुनिया के लिए ऐसा कोई योगदान नहीं जिसे जमाना धरती रहने तक याद रख सके। कोई खिलाड़ी उस खेल के लिए  महान हो सकता है। भगवान भी उसके समर्थक उसे कहें तो किसी को क्या आपत्ति है लेकिन वह किसी भी सूरत में वैज्ञानिक से बड़ा नहीं हो सकता। क्योंकि उसकी खोज अनंत काल तक दुनिया को रास्ता दिखती है। नई खोज आगे बढ़ाने के लिए काम आती है। जबकि एक क्रिकेट खिलाड़ी के रिकॉर्ड किस के काम आएंगे! वे केवल कागजों में रहेंगे। अधिक से अधिक उस समय उनका  जिक्र हो जाएगा जब कोई उसकी बराबरी करेगा या आगे निकलेगा। वे किसी खिलाड़ी के लिए तो प्रेरणा हो सकते हैं पूरी दुनिया के लिए नहीं। जबकि विज्ञान,वैज्ञानिक और उसके अनुसन्धानों से इंसान,समाज,देश और दुनिया पता नहीं कहां से कहां तक ले जाने की प्रेरणा तो देते ही हैं साथ में विकास के नए नए मार्ग उपलब्ध करवाता है। इसके बावजूद पता नहीं मीडिया को क्या हो गया जिसने विज्ञान,वैज्ञानिक की तुलना में क्रिकेट और क्रिकेटर को कवरेज में इतनी अधिक प्रमुखता दी। शायद उसका कारोबारी फायदा विज्ञान,वैज्ञानिक और श्री राव की बजाए क्रिकेट,क्रिकेटर और सचिन को प्रमुखता देने मे अधिक था। आज कथा वाचक राधा कृष्ण शास्त्री की कही एक बात याद आ गई....उन्होने गंगानगर में कथा के दौरान कहा था, परिवारों में दो दो बच्चे ही हुए तो फिर संत,वैज्ञानिक और सैनिक कहां से आएंगे ? बेशक उन्होने यह बात किसी और संदर्भ में कही थी लेकिन है तो सटीक । समाज,देश और मीडिया में क्रिकेटर को वैज्ञानिक की तुलना में इतना अधिक महत्व मिलेगा तो फिर कोई क्यों बनेगा वैज्ञानिक। 

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