Wednesday, February 23, 2011

कलेक्टर मक्खनबाजी और असली बात


श्रीगंगानगर--कलेक्टर मैडम की जनसुनवाई। भीड़ इतनी की मैडम दिखाई नहीं दे रही। उनके कहे शब्द कान में पड़ेंगे यह सोचना बेकार था। इसके लिए इंतजार करना पड़ा। जिनकी सुनवाई हुई वे चले गए। अब मैडम दिख भी रहीं थी और उनके कहे शब्द कानों तक पहुँच भी रहे थे। नगर का एक प्रतिष्ठित आदमी आवेदन लेकर मैडम के समक्ष आया। उसने एक सरकारी कर्मचारी की शिकायत की-मैडम वह कभी ऑफिस में नहीं आता। उसके अधिकारी को भी बताया मगर कुछ नहीं हुआ। मैडम बोली, आपको उस से क्या तकलीफ है? मुझ से उसका कान मरोड़ कर अपना काम निकलवाना चाहते हो। खैर, मैडम ने आवेदन रख लिया। केसरीसिंहपुर से दो तीन लोग थे। एक बोला,मैडम गैस एजेंसी वाले ने इसके साथ मारपीट की। एफआईआर करवाई क्या? मैडम ने पूछा। मैडम कहने लगी, सरकारी एजेंसी तो है नहीं। वैसे भी गैस एजेंसी वाले जनता से बहुत अधिक दुखी हैं। किसी दिन छोड़ कर चले जायेंगे। मैडम ने डीएसओ से पता करवाने का आश्वासन देकर आवेदन ले लिया। एक पुराना कांग्रेसी किन्ही लोगों के साथ आया। वह उनकी पीड़ा बताने लगा तो मैडम ने उस से परिचय पूछ लिया और फिर सीधे पीड़ित से मुखातिब हो गई। कांग्रेसी ने बताया कि हर कलेक्टर कार्यवाही की कहता है। हुआ आज तक कुछ नहीं। मैडम ने टिप्पणी के रूप में कुछ लाइन कही । हमें [ पी आर ओ भी वहीँ खड़े थे ] हंसी आई। मेरी नजर में वह यहाँ लिखना गरिमा के अनुकूल नहीं। एक बुजुर्ग कांग्रेसी को देख मैडम बोली, आप हर जनसुनवाई के समय होते हो। आखिर आप हो कौन? बुजुर्ग ने अपने बारे में बताया और अतिक्रमण तोड़ने का आग्रह के साथ कहा, नाजायज कब्जे तोडना जायज नहीं। मैम ने कहा, अतिक्रमण तो नाजायज ही होते हैं। इस प्रकार से लगभग पचास व्यक्तियों की दुःख,तकलीफ,पीड़ा से कलेक्टर मैडम रूबरू हुईं। ये तो थी कलेक्टर की मक्खनबाजी । अब असली बात।
जिला कलेक्टर। अर्थात ,जिले का मालिक। सरकार का जिले में सबसे बड़ा प्रतिनिधि। जिस से मंत्री तक को काम पड़ता है। उसके पास कोई कब जायेगा? तभी ना जब किसी को लगेगा कि अब तो बस कलेक्टर पर ही उम्मीद है। आने वाले सच्चे भी होंगे,झूठे भी। इसका पता लगा उचित कार्यवाही करना कलेक्टर का काम है। एक तरफ तो कलेक्टर सरकारी दफ्तरों में छापे मार कर यह निरीक्षण करते हैं कि कितने कर्मचारी उपस्थित हैं। दूसरी तरफ कलेक्टर उस शहरी को निरुत्साहित कर रहीं हैं जो लिखित में उनको बता रहा है कि फलां कर्मचारी कभी आता ही नहीं। डीएसओ गैस उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए नए नए फंडे इस्तेमाल करते हैं और कलेक्टर मैडम जनसुनवाई में ये कहती हैं कि गैस एजेंसी वाले लोगों से दुखी हैं। कलेक्टर मैडम गलत हैं । सीधे सीधे ये कहने की हिम्मत तो नहीं हैं। लेकिन अगर वे अपने पास फरियाद लेकर आये किसी इन्सान के सामने ही दूसरे का पक्ष लेंगी तो फिर उनके पास कोई जायेगा ही क्यों? वे जाँच करवाएं। पता लगवाएं। अगर शिकायत करने वाला गलत है तो उसको चेतावनी दें। उसके विरुद्ध कार्यवाही करें। उसको सबक सिखाएं ताकि वह आइन्दा किसी की झूठी शिकायत कर कलेक्टर जैसे अधिकारी का समय ना ख़राब करे। शिकायत करते ही अपना फैसला सुना देना तो उसके साथ अन्याय है जो चल कर आपके दरबार में आया है कलेक्टर मैडम। रामसनेहीलाल शर्मा"यायावार" का शेर है--हमने शीशे के घरोंदे पर अभी चन्दन मला है ,और उनके हाथ में पत्थर नहीं पूरी शिला है।

Tuesday, February 22, 2011

क्रांति की बात करो ,क्रांति नहीं

श्रीगंगानगर --मिश्र,लीबिया सहित अरब देशों की जनक्रांति की ख़बरें देख सुन पढ़े लिखे लोगों के दिल में ये उम्मीद जगी है कि यहाँ भी ऐसा ही कुछ हो सकता है। नहीं होगा। ऐसा कुछ होने वाला नहीं। सम्पूर्ण क्रांति तो क्या क्रांति भी नहीं होने वाली। किस के दिल में है ऐसी चिंगारी जो शोला बनकर पहले खुद जलाने को आगे आए। जिस देश का प्रधानमंत्री भावहीन चेहरा लेकर बार बार ये कहे कि वह मजबूर है। जिस देश की जनता को प्याज,दाल, रोटी का जुगाड़ करने के लिए पूरा दिन खपाना पड़ता हो। हजार नहीं लाखों करोड़ों के घोटाले होते हो। आम आदमी की शासन ,प्रशासन में सुनवाई का सवाल ही पैदा ना होता हो। वोट बैंक देश के दुश्मनों से असल में किये जाने वाले बरताव को प्रभावित करता हो। नेताओं से विश्वास उठ गया हो। सभी राजनीतिक दल, सत्ता और विपक्ष के नेताओं का नाता घी-खिचड़ी हो। और भी बहुत कुछ ऐसा है जो यह बताता है कि देश के अनेक हिस्से तो ऐसे हैं जहाँ यह आभास ही नहीं होता कि वहां सरकार नाम की कोई चीज है। कम शब्दों में सच्ची बात ये कि किसी को ये समझ नहीं आ रहा कि देश में हो क्या रहा है? किसकी सरकार है? कौन चला रहा है? जवाबदेही किस पर है? किस के लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाये? जिस से बात करो वही पल्ला झाड कर यह कह देता है कि मैं तो बेकसूर हूँ! मैं मजबूर हूँ! अरब देशो में के हालत भी ऐसे ही रहे होंगे। तभी वहां के लोग अपने काम छोड़कर सड़कों पर आए और दुर्दशा के दोषी नेताओं को चलता कर दिया। यहाँ ऐसा नहीं हो सकता। बात नकारात्मक सोच या निराश होने की नहीं है। क्रांति जैसी जज्बा उन लोगों में होता है जिनके अन्दर कोई चिंगारी हो। फिर उसमे कोई फूंक मारे। तब कहीं क्रांति की सूरत उभरती है। हम ये नहीं कहते कि यहाँ के लोगों के दिलों में चिंगारी नहीं है। है, मगर वह शोला बनने से पहले ही बुझा दी जाती है। यहाँ के राजनीतिक दलों के संचालक जनता से अधिक समझदार हैं। उन्होंने देश में ऐसा सिस्टम बनाया कि किसी के अन्दर की चिंगारी शोला बनकर क्रांति में तब्दील ना हो। ये सब जनता की आँखों के सामने होता है। इसमें सबकी भागीदारी है। इस सिस्टम का नाम है चुनाव। यहाँ की जनता पांच साल में अपने अन्दर की चिंगारी को मतदान बूथ पर ठप्पा लगाते हुए, बटन दबाते हुए कई बार बुझाती है। बूथ से हर कोई यह सोच कर ख़ुशी ख़ुशी बाहर आता है कि अब सब ठीक हो जायेगा। किन्तु नहीं होता। वह फिर आहें भरता है। हर रोज तिल तिल मरता है। बेबसी पर रोता है। फिर कोई चिंगारी उसके अन्दर जन्म लेती है। इस बीच फिर कोई चुनाव आ जाता है। वही बूथ। वही मशीन। जो चिंगारी बनी वह फिर से बुझ गई। श्रीगंगानगर में देख लो। २००८ में विधानसभा चुनाव। २००९ में पहले लोकसभा और फिर नगर परिषद के चुनाव। २०१० में पंचायत चुनाव। इतने से समय में जनता को अपने अन्दर की भड़ास तीन बार निकालने का मौका मिल गया। भड़ास निकल गई तो चिंगारी कहाँ से आएगी। चिंगारी नहीं तो शोला नहीं। शोला नहीं तो आग और क्रांति की बात केवल दिल को बहलाने के लिए एक अच्छे ख्याल के अलावा कुछ भी नहीं है। वैसे भी हम तो डरे सहमे लोग हैं। जो हर बात पर यही कह कर अपना फ़र्ज़ पूरा कर लेता ही कि कोई नृप होए हमें क्या हानि! सब अपने नफे नुकसान तक सीमित हैं। जब सबका यही हाल है, यही सोच है तो फिर क्रांति का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। क्रांति तो तब जन्म लेती है जब जन जन को देश की फ़िक्र हो।

Saturday, February 19, 2011

सॉरी , और कुछ भी नहीं

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Thursday, February 17, 2011

सोनिया बीबी को समझाओ

--- चुटकी---

मजबूर नहीं
मजबूत
प्रधानमंत्री लाओ,
अरे! कोई तो
ये बात
सोनिया को
समझाओ।

ये तो हमारी मज़बूरी है मनमोहन जी

श्रीगंगानगर- "पापा इतने बिजी होते हैं कि हमें उनसे मिलने के लिए सुबह छः बजे उनके पास पहुंचना पड़ता है। उसके बाद उनसे दिन भर मुलाकात नहीं हो सकती।" यह बात देश के मजबूर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह ने जयपुर में एक पत्रकार से कही थी। ये बात यहाँ लिखना इसलिए जरुरी हो गया कि मीडिया प्रधानमंत्री की मज़बूरी को प्रेस कांफ्रेंस बता रहा है। जबकि ऐसा है नहीं। वह तो तरस खाकर प्रधानमंत्री ने संपादकों को ओब्लाइज कर दिया अपने साथ बैठाकर। वरना उनके पास समय ही कहाँ है देश की बात सुनने का। मनमोहन सिंह ने तो दिल खोलकर कह दिया कि मैं मजबूर हूँ। उन्होंने सौ मजबूरियां गिना दी। संपादक तो यह भी नहीं कह सके। ऐसे मजबूर प्रधानमंत्री के साथ बात करने की उनकी पता नहीं क्या मज़बूरी थी। संसार के सबसे शानदार,दमदार,जानदार लोकतंत्र के लिए विख्यात भारत के प्रधानमंत्री बार बार ये कहे कि वो मजबूर हैं, मजबूर हैं। इस से ज्यादा बड़ी बात और क्या हो सकती है। ये तो सब जानते और समझते हैं कि जब समाज में कोई बार बार ये कहता है कि मैं मजबूर हूँ तो हर कोई आपको यही कहता सुनाई देगा--चलो छोड़ो यार बेचारा मजबूर है। देश का आम आदमी तो आज मजबूर है किन्तु ताकतवर देश का प्रधानमंत्री ये कहे कि वो मजबूर है तो फिर कोई क्या कर सकता है। दिमाग तय नहीं कर पा रहा कि मजबूर प्रधानमंत्री की इस मज़बूरी पर हँसे,रोए,अफ़सोस करे या ईश्वर से उनकी मज़बूरी दूर करने की प्रार्थना करे। देश इस बात पर विचार तो करे कि प्रधानमंत्री की क्या मज़बूरी हो सकती है। जिस देश का प्रधानमंत्री ही मजबूर है तो उस देश का क्या होगा? कौन उसकी बात को मानेगा,सम्मान करेगा,गंभीरता से लेगा। मजबूर प्रधानमंत्री से बारी बारी से एक सवाल पूछ कर या अपना परिचय दे कर देश के मीडिया का प्रतिनिधित्व करने वाले टी वी चैनलों के संपादकों/मालिक को कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाना है। कैसी विडम्बना है कि प्रधानमंत्री अपने आप को मजबूर बता कर एक समान रहम की भीख मांग रहा है। "हे! संपादकों मेरी मज़बूरी समझो। मेरा साथ दो। मैंने मक्खन नहीं खाया। मैं तो मजबूर हूँ मक्खन खा ही नहीं सकता। कोई खा रहा है तो उसको रोक नहीं सकता। क्योंकि मैं मजबूर हूँ। चूँकि मैं मजबूर हूँ इसलिए दया,रहम को हकदार हूँ।"
मनमोहन सिंह जी आप तो क्या मजबूर हैं , मजबूर तो हम हैं जो आपको ढो रहे हैं। देश की इस से बड़ी मज़बूरी क्या होगी कि वह सब कुछ जानता है इसके बावजूद कुछ नहीं कर पा रहा। एक लाइन में यह कि हमारा दुर्भाग्य तो देखो कि हमारा प्रधानमंत्री खुद अपने आप को मजबूर बता रहा है। जिस देश का प्रधानमंत्री मजबूर हो उस देश की जनता की मज़बूरी का कोई क्या अंदाजा लगा सकता है। मजबूर के शब्द हैं-अब तुम ही कहो क्या तुमसे कहें, वो सहते हैं जो सह नहीं सकते।

Wednesday, February 16, 2011

पी एम मजबूर है

--- चुटकी---

पी एम
मजबूर है,
उनका यही
सबसे बड़ा
कसूर है।
दे दो इस्तीफा
छोड़ दो पद
सोनिया का घर
कौनसा दूर है ।

Sunday, February 13, 2011

वो प्यार है......

शोखियों में
घोला जाए
फूलों का शबाब
उसमे फिर

मिलाई जाए

थोड़ी सी शराब

होगा वो

नशा जो तैयार

वो प्यार है........

मंदिर हुआ व्यापार

--- चुटकी---

मंदिर हमने
बना दिए
श्रद्धालुओं की
लगी कतार
,
खाली झोली
लौट गए सब
मंदिर हुए व्यापार।

Saturday, February 12, 2011

पतझड़ का कब होगा अंत

---- चुटकी---

सुना है हर
पतझड़ के बाद
आता है बसंत,
पता नहीं
मेरे जीवन के
पतझड़ का
कब होगा अंत।

ये दोस्ती टूटे ना

Both Friends Will Think The Other Is Busy And Will Not Contact. Thinking It May Be Disturbing. As Time Passes Both Will Think Let The OTher Contact. After That each Will Think Why I Should Contact First ? .Here Your Love Will Be Converted To Hate .Finally Without Contact The Memory Becomes Weak .They Forget Each Other. So Keep In Touch With All And Pass This TO All Your Friends... . I Don`t Want To One Of This Kind. So Here I Am sending Mail To you To Say Dear
I Am Fine Here Please keep in touch with me.... Ha Ha Ha Ha ... Have a Nice Day....

Thursday, February 10, 2011

सत्य मेव जयते! सॉरी रोंग नंबर

सच्चाई की जीत होती है। सच से बड़ा कोई नहीं। सच कभी नहीं हारता। सदा सच ही बोलो। ये वाक्य मास्टरों से लेकर घर के बड़ों से सुनते आये हैं। सद्पुरुष भी यही कहते हैं। शास्त्रों, ग्रन्थों में भी ऐसा ही लिखा हुआ है। अगर किसी ने इस सच्चाई का सामना ना किया हो तो वह चुटकियों में रूबरू हो सकता है। अशोक स्तम्भ! कौन नहीं जानता! सरकार का राज चिन्ह। संवैधानिक पदों का प्रतीक। इसके नीचे लिखा हुआ है, सत्य मेव जयते! ये हमने या आपने नहीं लिखा। सरकार ने लिखा। आज तक लिखा रहता है। भारतीय नोटों पर भी यही अंकित है। परन्तु व्यवहार में सबकुछ इसके विपरीत है। दो और दो को चार कहना अपने आप को संकट में डालना है। आप से सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ छीना जा सकता है। यही तो हो रहा है आमीन खां के साथ। कांग्रेस कल्चर को सहज भाषा में बताना,कार्यकर्ताओं को समझाना उनके लिए परेशानी का सबब बन गया। उन्होंने उदाहरण देकर अपनी बात में वजन डाला। यही वजन अब उनसे, उनके आकाओं से सहन नहीं होगा। सरकार आजादी के बाद से जिस सत्य मेव जयते का ढिंढोरा पीट रही है वही सत्य आमीन खां के लिए चिंता का कारण बन गया। जिस सत्य को संवैधानिक पद के लिए अशोभनीय टिप्पणी बताया जा रहा है उसी संवैधानिक पद के प्रतीक अशोक स्तम्भ के नीचे हमेशा से लिखा हुआ है -सत्य मेव जयते। तो क्या यह गलत लिखा हुआ है। संवैधानिक पद सत्य मेव जयते से भी बड़ा हो गया! या इस पद पर विराजमान इन्सान के पास सत्य का सामना करने की ताकत नहीं। मुख्य सतर्कता आयुक्त भी तो संवैधानिक पद है। श्री थामस कौनसी संवैधानिकता का निर्वहन कर रहे हैं? आमीन खां का बयान सत्य है तो उनको सजा क्यों मिले! पद से वो लोग हटें जिन्होंने चरण चाटुकारिता के जरिये पद प्राप्त किये हैं। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि सच की अपनी गरिमा होती है। सच कहाँ,किसके सामने,किसके लिए,किस बारे में,कब कहना है, यह बहुत ही महत्वपूर्ण होताहै। कोई सच चारदीवारी में ही सबको अच्छा लगता है। यही सच बाहर आते ही अफसाना बनते देर नहीं लगाता। यही हुआ आमीन खां के साथ। किसने किस की रसोई में काम किया और किसने लड़की शादी में झूठे बर्तन साफ़ किये। ये सब आपसी सम्बन्धों पर निर्भर करता इन रिश्तों को महसूस किया जाता है,उजागर नहीं। क्योंकि इसको सब जानते ही होतेहैं। सहज भाषा में आमीन खां ने एक सच कहा और आज वह उनके लिए भारी पड़ गया। उनको पता होता कि मेरे साथ ऐसा होगा तो वे कभी इस बारे में कुछ नहीं कहते। वैसे आजकल सच बोलने वाले हैं ही कितने! सच सुनने वालों की संख्या भी ऐसी ही होगी। हकीकत तो ये कि सच सुनने की हिम्मत नहीं रही इसलिए बोलने वाले भी नहीं रहे। कभी किसी की जुबां से गलती से सच निकल भी जाये तो उसको निगलना मुश्किल हो जाता है। यही हुआ आमीन खां के साथ और यही हो रहा है उसके बाद। पंजाबी में किसी ने कहा है --इन्ना सच ना बोलीं कि कल्ला रह जावें, चार बन्दे छड्ड देंवी मोड्डा देण लई।

Tuesday, February 8, 2011

हे! अफसर आपको सलाम

श्रीगंगानगर-देश -विदेश के नेताओं की तरफ फैंके गए सभी जूतों को प्रणाम और मायावती की "खडाऊं" को वंदना। मुख्यमंत्री मायावती के जूते एक अफसर ने साफ़ क्या कर दिए मीडिया में हल्ला मच गया। जैसे अफसर ने राजकीय मेहमान कसाब जैसा कोई गुनाह कर दिया। उसकी मज़बूरी तो किसी को दिखाई नहीं दी। नौकरी करनी है तो ऐसा करना ही पड़ता है। सबके सामने जूते पर रुमाल या कपड़ा मार दिया तो अफसाना बन गया,क्या पता अन्दर पालिश भी करनी उसकी मज़बूरी हो। फिर अफसर ने किसी ऐरेगेरे नत्थू खेरे के जूतों के तो हाथ नहीं लगाया। अफसर का सौभाग्य है कि उसे इस युग में ऐसी महिला के जूते चमकाने का मौका मिला जो देश के दलितों की किस्मत चमकाने के लिए अवतरित हुई है। अवतार रोज रोज इस धरा पर नहीं आते। पता नहीं कितने ही सद्कर्मों के उपरांत इस अफसर को इस अलौकिक आत्मा रूपी मायावती के जूते चमकने का अवसर मिला होगा। धन्य हो गया उसका जन्म। बडभागी है उसका परिवार। भाग्यशाली हैं वे लोग जो उस अफसर को जानते हैं,उस से मिलते हैं, उसके साथ रहते हैं। मीडिया कुछ दिखाए और लिखे। हे ! अफसर आपको विचलित नहीं होना है। जब भी इस प्रकार की सेवा मिले तुरंत करना। महान आत्माओं की निष्काम सेवा, चाकरी से बढ़कर इस कलयुग में और कुछ नहीं है। ऐसी चरण चाकरी से ही तुझे इस संसार में आगे बढ़ने के ढेरों मौके मिलेंगे। अगर तू आलोचनाओं से घबरा गया, भटक गया तो कल्याण नहीं होगा। मोक्ष को तरस जायेगा। माया तो क्या किसी भिखारी के जूते भी हाथ लगाने को उपलब्ध नहीं होंगे। हे! पुलिस अधिकारी तू तो मिसाल है विनम्रता की,सेवा भावना की। पुलिस वाले तो अपने जूते साफ़ करवाने के मास्टर होते हैं। तूने एक दलित महिला के जूते साफ़ कर देश की तमाम पुलिस का सर गर्व से ऊँचा कर दिया। ये साबित कर दिया कि पुलिस कितनी कर्तव्य परायण है। हे! अफसर तूने दिखा दिया कि हम ताकतवर के जूते चमकाने में कोई जलालत महसूस नहीं करते। आज गोपी फिल्म का यह गाना सार्थक हो गया-चोर उचक्के नगर सेठ और प्रभु भगत निर्धन होंगे,जिसके हाथ में होगी लाठी भैंस वही ले जायेगा। हे!अफसर ऐसी विनम्र निष्काम सेवा को देख कर पुलिस तुझे अपना आदर्श मानेगी। हो सकता है जलोकडे किस्म के पुलिस वाले , जिनको इस सेवा के काबिल नहीं समझा गया, आपसे बैर रखे। आपके काम में बाधा डालने की की कोशिश करे। पर हे!महान पुलिस अधिकारी तुमको इनकी ओर ध्यान नहीं देना। ऐसे कलयुगी प्राणी तेरी इस अनोखी तपस्या को भंग करने का प्रयत्न कर सकते हैं। क्योंकि ये खुद तो सेवा कर नहीं सकते कोई करे तो इनके पेट में दर्द होने लगता है। ऐसे ना समझ प्राणियों के प्रति दिल में कोई भेद मत रखना। हे! अफसर अब तेरा स्थान इस सबसे से ऊपर बहुत ऊपर है। आप कोई साधारण इन्सान हो नहीं सकते। इतनी महान सेवा के लिए संसार में कोई नोबल,आस्कर होता तो वह आज आपके पास आकर गौरवान्वित हो जाता । देश की पुलिस संभव है कोई नई शुरुआत करके इतिहास में नया पन्ना जोड़े। हे ! अफसर आपके नाम, काम के बिना तो भारत का आधुनिक इतिहास पूरा ही नहीं हो सकता। उस दिन इस देश की शिक्षा में चार चाँद लग जायेंगे जब आपकी सेवा के तराने हर शिक्षण संस्था में गर्व से गए जायेंगे। मजबूर का शेर है--आदत है ज़माने कि दिल रखने की,कह दे जो साफ वो मेहरबां अच्छा।

बसंत नेताओं के खाते में

प्रत्येक ऋतु के
सभी बसंत
नेताओं के खाते में ,
आदमी
मारा गया
लोकतंत्र के
इस घाटे में

Sunday, February 6, 2011

पेट्रोल पम्प लूटने वाला पकड़ा

श्रीगंगानगर पुलिस ने पेट्रोल पम्प पर लूट करने वाले गैंग के एक आदमी को पकड़ा है। इसके लिए पुलिस अधिकारियों को अपने दल के साथ रात को कई घंटे म्हणत करनी पड़ी। इस मुलजिम को पंजाब के अबोहर से पकड़ा गया। यह और इसके साथी एक कार पर सवार थे। कार को नाकाबंदी करके कई स्थानों पर रोकने की कोशिश की गई मगर मुलजिम नाके तोड़ कर कार को भगा ले गए। यहाँ के एस पी रुपिंदर सिंह ने पंजाब पुलिस के अफसरों से बात की। दोनों पुलिस के सामंजस्य के बाद एक आदमी पकड़ा गया। पुलिस उस से पूछताछ कर रही है।

नहीं है सरकार

--चुटकी--

क्रांति की जरुरत
वहां होती है
सरकार,
जहाँ मौजूद हो
कोई सरकार।

Thursday, February 3, 2011

मुग्धा सिन्हा का बनवास,रावण की लंका

श्रीगंगानगर--बात नए कलेक्टर की। मुग्धा सिन्हा ने आते ही कहा कि उनका पग फेरा अच्छा रहेगा। एक पत्रकार ने पूछा था कि आपको श्रीगंगानगर में आते ही आग का सामना करना पड़ा। कैसा महसूस हुआ? तब मुग्धा जी ने उक्त लाइन कही। अपनी माता जी उदृत करते हुए मुग्धा जी ने कहा, रावण के पास सोने की लंका थी और राम के पास चौदह साल का बनवास। उनके मुस्कुराते चेहरे के भीतर जितना गहरा उनका व्यक्तित्व लगा यह वाक्य उस से कम गहराई वाला नहीं है। रावण आज हो तो भी अपने आप को रावण नहीं कहेगा। इसलिए मुग्धा जी जिस राम के बनवास की बात कर रहीं हैं वह निसंदेह वह उनके खुद के लिए है। इतिहास गवाह है कि बनवास चाहे राम ने काटा हो या पांडवों ने , हर बार पापियों,दुराचारियों ,समाज कंटकों का दलन ही हुआ। राम राज्य की स्थापना हुई। अगर मुग्धा जी की बात का संदर्भ यही है तो श्रीगंगानगर जिले के लिए इससे बढ़िया और क्या बात हो सकती है। बनवास यदि उनके व्यक्तिगत जीवन की किसी घटना से जुडाव रखता है तो बात जुदा है। ऐसे बनवास तो हर संजीदा,संवेदनशील आदमी की किताब में मिल जायेंगे। वह इसी अकेले ही काटता है।

दुर्गा मंदिर के निकट एक चौक। चार कौने पर चार पुलिस वाले। पुलिस जिप्सी। ट्रैफिक प्रभारी अमरजीत चावला को लेकर आती एक और जिप्सी। जिसे रिछपाल सिंह चला रहे थे। समय होगा सुबह नो बजे के आस पास का। वह समय जब सर्दियों में दिनचर्या शुरू होती है। पुलिस का इतना ताम झाम दूर से दिखा तो अन्दर कुछ खटका हुआ। अपने आप से पूछा,क्या हुआ? निकट जाकर देखा तो कोतवाली का एक एस आई गजेंदर सिंह जिप्सी के बोनट पर कोहनी टिकाये चालान काट रहा था। मतलब पुलिस मोहल्ले में लोगों को हेलमेट पहनाने के लिए जी जान लगाए हुए थी। जिस चौक पर पुलिस इतनी सुबह मुस्तैद थी वही पास ही में कुछ समय पहले बड़ी चोरी हुई थी। जिसके यहाँ चोरी हुई वह कोतवाली के कई चक्कर निकाल चुका। आज तक कुछ नहीं हुआ। पुलिस के पास जब्त कम है वरना हर घर के आगे एक सिपाही खड़ा होगा हाथ में चालान बुक लिए। बिना हेलमेट निकले और चालान हाथ में। वहां से आते समय एक घर के सामने मुखिया अपने बेटे को कह रहा था-हेलमेट लेकर निकलना। हर चौराहे पर पुलिस है। अन्दर से बेटे की आवाज आई--ए वी सवेरे सवेरेशुरू कर देंदे है। अभी तो कुछ भी नहीं। जान प्रतिनिधियों का आशीर्वाद ऐसे ही इन पर रहा तो कुछ और दृश्य देखने को मिलेंगे। पुलिस बीडी,सिगरेट बेचने वालों के यहाँ खड़ी होगी। डब्बी पर लिखा है,सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानि कारक है। पुलिस का यह फर्ज है कि वह आपके स्वास्थ्य की रक्षा करे। इसलिए जैसे ही आप सिगरेट पीने लगोगे आप पर आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा हो जायेगा। इसी प्रकार के सीन शराब की दुकानों के सामने होंगे। शराब की बोतलों पर तो जहर लिखा होता है। जब पुलिस को आम आदमी के सर की इतनी फ़िक्र है कि वह सारा काम छोड़ कर सर पर हेलमेट रखवाने के काम में लगी है। तो वह किसी को जहर थोड़ी ना पीने देगी। आखिर पुलिस है। उसकी जिम्मेदारी है आपकी रक्षा करना। जान है तो जहाँ है। लगे रहो पुलिस जी।

Tuesday, February 1, 2011

हेलमेट! अपरोधों की रोकथाम के लिए

श्रीगंगानगर--पुलिस जी जयहिंद!......आज आपको जयहिंद का जवाब देने का समय नहीं हैं। हो भी कैसे, सब के सब तो जनता को हेलमेट पहनाने में लगे हैं। आपने अपनी पूरी ताकत इसी काम में लगा रखी है। लगा क्या रखी है झोंक रखी है। क्योंकि आपकी नजर में शहर में होने वाले सभी अपराधों से मुक्ति पाने का हेलमेट ही एक मात्र उपाए हैं। "हेलमेट पहनाओ,अपराध घटाओ ।" यह नया नारा है। राजस्थान की पुलिस अपनी प्राथमिकता तय करती है। नगर के मिजाज के अनुसार वहां के अधिकारियों के सामने कुछ अलग प्रकार की प्राथमिकता भी हो सकती है। पुलिस जी आपकी एक मात्र प्राथमिकता है सबको हेलमेट पहनाना। नगर में चोरी,चैन स्नेचिंग, लड़कियों से छेड़छाड़, आवारा किस्म के लोगों की सड़कों पर मनमानी ,रात को इधर-उधर जाने पड़जाये तो लुटने का भय । यह सब कुछ उस दिन गधे की सर से सींग की तरह गायब हो जायेगा जब सब हेलमेट में नजर आयेंगे। साइकल पर आवाजाही करने वाले हो या पैदल चलने वाला सबको हेलमेट जरुरी करना होगा। पता नहीं कब इनमे से कोई सड़क पर दुर्घटना का शिकार हो जाये। सबकी सुरक्षा तो जरुरी है। वैसे पुलिस जी आपको डरते डरते बता दूँ कि आजतक शहर में एक भी दुर्घटना ऐसी नहीं हुई जो यह कहती हो कि हेलमेट नहीं था इसलिए मर गया। एक बात और , श्री पुलिस जी यहाँ समस्या हेलमेट की नहीं है। समस्या है अस्त व्यस्त ट्रैफिक। ट्रैफिक सिस्टम सही नहीं है तो फिर कितने भी हेलमेट पहना दो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। पुलिस जी आपने जितनी ताकत हेलमेट पहनाने में लगाई है उतनी ट्रैफिक सुधार में लगाते तो सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ तो ठीक हो जाता। पुलिस जी आप विचार करके देखो क्या यह शहर इतना बड़ा हो गया कि यहाँ हेलमेट के बिना काम नहीं चल सकता! ले दे के ढाई सड़क हैं। राजमार्ग १५, रविन्द्र पथ ,हनुमानगढ़ रोड बस। हेलमेट के लिए कानून के साथ व्यवहारिकता भी अपने साथ रखो पुलिस जी। शहर से बाहर जाने वाले मार्गों पर नाके लगाओ। वहां दो पहिया वाहन चालकों के ही क्यों उसके साथ बैठने वाले को भी हेलमेट पहनाओ। पुलिस जी शहर में कोई नेता,प्रभावशाली सामाजिक आदमी, आप तक यह बात कहने वाला कोई व्यापारी नेता नहीं इसलिए मुझे ही यह लिखना पड़ा। ये बात ऐसे ही नहीं कह रहा। पुलिस जी आपको बताऊँ , मैंने जनप्रतिनिधि,नेता,व्यापारी नेता,साथ,सामाजिक आदमी, सभी से बात की। मगर लगता है किसी की हिम्मत आपके समक्ष शहर की सच्चाई रखने की नहीं हुई। कोई क्यों आपको नाराज करने लगा। सौ काम पड़ते है पुलिस जी आपसे इनको। इसलिए सब देख रहे हैं आपका हेलमेट पहनाने का अभियान। जनता के फोन इनके पास जायेंगे। जनता पर अहसान जताने के लिए पुलिस जी ये आपको फोन करेंगे। आपके पास इन पर अहसान जताने का मौका होगा। इसी से सामाजिक सम्बन्ध ताकतवर बनते हैं। तो पुलिस जी ये तय रहा कि शहर में चोरी होती है तो होती रहे। वाहनों की चोरी की रिपोर्ट दर्ज करें या ना करे। कोई सरे राह किसी की चैन छीनता है तो छीने। लड़कियों को छेड़ता है तो छेड़े । सड़कों पर मर्जी से वाहन पार्क करके सड़क रोकता है तो रोके, आपको इनकी तरफ कोई ध्यान नहीं देना। पुलिस जी अब आपका एक ही लक्ष्य है कि श्रीगंगानगर में सड़क पर आवाजाही करने वाला कोई भी वह सर जो कार में ना हो बिना हेलमेट के नहीं रहना चाहिए। गुड लक। किसी शायर ने कहा है ...अब तो यकीं मानिए जीने को भी जी नहीं,पर जहर भी तो मुफ्त कब आवे है साहब जी।

Friday, January 28, 2011

हिन्दुमलकोट बोर्डर खोलने का आग्रह


जयपुर-राजस्थान के कृषि विपणन मंत्री गुरमीत सिंह कुनर ने केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा को पत्र लिख कर श्रीगंगानगर जिले के हिन्दुमलकोट बोर्डर से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार आरम्भ करने की सुविधा प्रदान करने का आग्रह कियाहै। श्री कुनर ने अपने पत्र में श्री शर्मा को बताया है कि भारत-पाक सीमा पर स्थित हिन्दुमकोट ग्राम आजादी से पूर्व व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। कपास मंडी के रूप में इसकी दूर दूर तक पहचान थी। आजादी के बाद कारोबार जगत की प्रमुख मंडी एक ग्राम बन कर रह गई। श्री कुनर का कहना है कि श्रीगंगानगर जिले में नरमा,कपास,गेंहू,मुंग,मोठ,सरसों,मूंगफली आदि फसलों का उत्पादन बहुत बड़ी मात्रा में होता है। यहाँ की कृषि जिंसों का निर्यात पाकिस्तान को लगातार हो रहा है। लेकिन इनका निर्यात अन्य स्थानों से होता है इसलिए परिवहन व्यय की वजह से इनकी कीमत बढ़ जाती हैं। श्री कुनर ने केन्द्रीय मंत्री को बताया कि मुनाबाब-खोखरापार मार्ग व बाघा चौकी से दोनों देशों के बीच व्यापार आरम्भ होने के बाद से राजस्थान और पंजाब में कारोबार बढ़ा है। श्री कुनर ने पत्र में कहा है कि यदि हिन्दुमलकोट बोर्डर व्यापार के लिए खोल दिया जाये तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रीगंगानगर में उत्पादित कृषि जिंसों का कारोबार बहुत अधिक बढ़ जायेगा। जिस से इलाके के किसान और व्यापारी लाभान्वित होंगे। श्री कुनर ने श्री शर्मा से इस बारे में जल्दी कार्यवाही करवाने का आग्रह किया है।

Thursday, January 27, 2011

अधिकारियों का समूह चित्र

श्रीगंगानगर--चार दशक पहले प्राइमरी स्कूल में पांचवी की अंतिम परीक्षा से पहले चौथी कक्षा के विद्यार्थियों ने पांचवी को विदाई पार्टी दी। उस दिन पांचवी के विद्यार्थियों ने मास्टरों के साथ समूह चित्र खिंचवाया। क्योंकि पांचवी के बाद सब यहाँ से चले जाने थे। कौन कहाँ जायेगा,फिर मिलेगा या नहीं? इसलिए चित्र के लिए सभी में उत्साह था। ताकि याद बनी रहे। ऐसा ही दृश्य गणतंत्र दिवस पर कलेक्टर की कोठी पर उस समय साकार हो गया जब सभी प्रशासनिक अधिकारियों ने कलेक्टर के साथ ग्रुप फोटो खिंचवाया। इसके लिए अधिकारियों को बुलाया गया। ज्याणी जी को आवाज लगाकर एक अधिकारी बोला, ज्याणी जी के बिना सब अधुरा है। इनमे फोटो के लिए ठीक वैसा ही जोश देखने को मिला जो पांचवी के बच्चों में था। ये तो फोटो खिंचवाने वाले जाने या सरकार कि कौन कौन विदा होने वाला है!
इस बार कलेक्टर के यहाँ कांग्रेस का कोई नेता,कार्यकर्त्ता नहीं पहुंचा। उनमे से भी कोई नहीं जो शादी के जश्न में इन्ही अधिकारियों की मेजबान के रूप में आव भगत में लगे थे। कांग्रेस का कोई धड़ा नहीं था। यूँ लगा जैसे समारोह का अघोषित बहिष्कार कर रखा हो। पूर्व,वर्तमान जिला प्रमुख को गिनती में शामिल ना करें तो बीजेपी का भी कोई बंदा नहीं था। यह अचरज की बात थी। निर्दलीय सभापति के साथ एक दो पार्षद आ गये थे बस। हर बार कलेक्टर,मंत्री या अन्य वीआईपी सोफे पर बैठते हैं। उनसे निकटता जताने के लिए जानकर लोग सोफे के आस पास वाली कुर्सियों पर कलेक्टर के आने से पूर्व ही बैठ जाते हैं। इस बार भी यही हुआ। किन्तु इस बार कलेक्टर उनसे अधिक चतुर है। वे सोफे पर बैठने की बजाये खड़े ही रहे। लोग अपने साथ लाये फोटोग्राफरों से कलेक्टर के निकट खड़े होकर फोटो उतरवाते रहे। एस पी साहब आये नहीं अभी इसलिए उनका ज़िक्र तब जब वे आ जायेंगें। फ़िलहाल तो डिप्टी राजेन्द्र सिंह कलेक्टर के लाडले बने हुए हैं। यूँ दीक्षा कामरा भी हैं। लो एस पी भी पहुँच गए। बदन पर पठानी सूट, पैरों में तिल्ले वाली पीली जूती। कोई कह ही नहीं सकता था कि ये इनोसेंट दिखने वाला सिख नौजवान श्रीगंगानगर जैसे जिले का एस पी है। उनके आने तक आधे से अधिक लोग जा चुके थे। कलेक्टर ने उनके साथ जलपान लिया। एक बात और अधिक हैरान कर देने वाली थी। वह यह कि इस बार कांडा बंधू नहीं आये। अशोक गहलोत के झटके का असर है या कोई जरुरी काम आन पड़ा,कौन जाने! मनिन्द्र कौर नंदा यह बताना नहीं भूलती थी कि वे एक माह कि विदेश यात्रा करके आई हैं। श्री कृष्ण लीला एंड कंपनी को पहली बार देखा गया। वे दो अम्बुलेंस कलेक्टर की मार्फ़त जनता का समर्पित करवाने आये थे। कलेक्टर के झंडी दिखाते ही वे वहां से चले गए। कलेक्टर के साथ एक झंडी डीवाईएसपी राजेन्द्र सिंह के हाथ में भी थी। अचानक सभापति भी आ गए। राजेन्द्र सिंह ने अपनी झंडी उनको पकड़ा डी। इसके साथ ही फोटो में कई चेहरे बढ़ गए। गणतंत्र और स्वतन्त्र दिवस के मुख्य समारोह के बाद कलेक्टर निवास पर जलपान समारोह होता है। झंडा फहराने के लिए कोई मंत्री आया हो तो यहाँ आने वालों की संख्या अधिक होती है। समारोह में कौन आ सकता है,कौन नहीं? किसको किस कारण से निमंत्रण दिया जाता है। इस बारे में कुछ खास नहीं मालूम। ये पता जरुर है कि हर बार पुरानी लकीर ही पीटी जाती है। नासिर काज़मी कहते हैं-फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आये,फिर पत्तों की पाजेब बजी तुम याद आए। एसएमएस--एक मेंढक ज्योतिषी के पास गया। ज्योतिषी बोला-बच्चा!आज तेरी किस्मत में एक लड़की है। वो तेरे बारे में सबकुछ जानना चाहती है। मेंढक ने खुश होकर पूछा-मगर महाराज वो मिलेगी कहाँ? ज्योतिषी ने गंभीरता से कहा,बायो लैब में।

Tuesday, January 25, 2011

सम्मान! कोई कारण भी तो हो

श्रीगंगानगर--प्रशासन के छोटे -बड़े वे बाबू इसे अपने दिल पर ना लें जो मन,कर्म,वचन से भ्रष्ट आचरण से बचने की कोशिश में लगे रहते हैं। भ्रष्टाचार कभी का शिष्टाचार बन कर सिस्टम का जरुरी हिस्सा मान लिया गया है। आज २६ जनवरी है। गणतंत्र दिवस है। वह संविधान लागु हुआ जो राजनेताओं की वोटों की लालसा के चलते बार बार संशोधित होता रहा है। इसी दिन प्रशासन उन लोगों को सम्मानित करता है जिन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया हो। प्रशासन हर साल जिनको यह सम्मान देता है उनमे अधिकांश उसके अपने सरकारी कर्मचारी होते हैं। इस बार ३८ में से २१ प्रशासन के अपने हैं। कोई ये पूछने वाला नहीं कि इन्होने ऐसा क्या किया जिसके लिए इनको सम्मान के लायक समझा गया। सरकार का जो काम ये करते हैं उनकी तनख्वाह लेते हैं। जिसकी सेलरी लेते हैं उसका काम करना ही पड़ेगा। सरकारी काम के अलावा इन सम्मानित कर्मचारियों ने समाज,राज्य,देश के लिए क्या उल्लेखनीय,वन्दनीय,सराहनीय कर्म किया? अगर है तो फिर प्रशासन ही क्यों उसको तो हर स्थान पर सम्मान मिलना चाहिए।हर साल यही होता है। बारी बारी से सभी कर्मचारी सम्मानित हो जाने हैं। कितनी हैरानी की बात है कि इतने बड़े जिले में प्रशासन को केवल अपने कर्मचारी ही क्यों नजर आते हैं? जिले में अनेक प्रकल्प समाज के लिए चलाये जा रहे हैं। परिवार अपने परिजनों की मृत देह का संस्कार करने की बजाये शिक्षा के लिए उसको दान कर इस बात को झूठा साबित करने में लगे हैं की मरने के बाद आदमी किसी काम का नहीं रहता। मतलब पशु से भी गया बीता है। ये तो बस उदाहरण हैं। प्रशासन तो बहुत कुछ पता करवा सकता है। किन्तु वह अपने तालाब से बाहर निकले तभी ना। निहाल हो गया-- गौड़ साहब के तीन ख्याल, बनवारी,जे पी ,शिवदयाल। शिवदयाल पहले निहाल हो चुका है। जे पी कल हो गया अपने बेटे की शादी का जश्न देख कर। साधारण से इस आदमी के परिवार ने कभी ख्वाब में भी इस बात की कल्पना नहीं की होगी कि उसके बुलावे पर सब चले आयेंगे। सुखवंत पैलेस के गेट पर बावर्दी सिपाही सिटी बजाकर आने वालों के वाहन ठीक से लगवा रहा था। प्राइवेट वाहनों की तो गिनती ही क्या लाल बत्ती का ताज लगाए सरकारी वाहन भी कांग्रेस ब्लाक अध्यक्ष के यहाँ आकर गौरवान्वित हो भी रहे थे और गौरवान्वित कर भी रहे थे। जिला कलेक्टर सहित नागरिक,पुलिस प्रशासन के अधिकारी,कर्मचारी जे पी श्रीवास्तव को बधाई देने पहुंचे हुए थे। विधायक राधेश्याम गंगानगर के अलावा बीजेपी के कई नेता भी वहां थे जो पहले कांग्रेस में रहे थे । वर्तमान में गौड़ साहब से जुडा हर छोटा बड़ा नेता कार्यकर्त्ता तो था ही इस जश्न में। शायद जे पी को पहली बार अहसास हुआ होगा कि वो खुद क्या चीज है आज के दिन। उसके लिए तो यह सब एक सपने जैसा था। ऐसा सपना जिसके ख़त्म होने की कोई नहीं सोचता।

तिरंगा ना फहराना

--- चुटकी---

लाठी,गोली
बम
कुछ भी चलाओ,
बस
लाल चौक पर
तिरंगा
न फहराओ।