एक तस्वीर
ना जाने
कहाँ से
एकदम
सामने आ गई,
आँखों से होकर
दिल में समा गई,
ऐसा कहाँ है
हमारी तकदीर में
कि हम भी हों
तुम्हारी तस्वीर में।
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Sunday, April 10, 2011
Thursday, March 17, 2011
रंग छोड़ कर अंग लगा ले
लगा गुलाल
गया मलाल
मन में उमड़ा
प्रीत का ज्वार
दोनों मिले
बाहें पसार।
----
आया भरतार
लगाया ना रंग ,
प्यासी गौरी
लग गई अंग।
-----
रंग छोड़ के
अंग लगा ले
हो जाउंगी लाल रे,
मौका और
दस्तूर भी है
तू
बात ना मेरी टाल रे।
----
झीने कपड़ों पर
साजन ने मारी
प्रेम भरी पिचकारी ,
सकुचा कर
अपने आप में
सिमट गई सजनी
सारी की सारी।
-----
गया मलाल
मन में उमड़ा
प्रीत का ज्वार
दोनों मिले
बाहें पसार।
----
आया भरतार
लगाया ना रंग ,
प्यासी गौरी
लग गई अंग।
-----
रंग छोड़ के
अंग लगा ले
हो जाउंगी लाल रे,
मौका और
दस्तूर भी है
तू
बात ना मेरी टाल रे।
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झीने कपड़ों पर
साजन ने मारी
प्रेम भरी पिचकारी ,
सकुचा कर
अपने आप में
सिमट गई सजनी
सारी की सारी।
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Monday, March 14, 2011
फाल्गुन कैसे गुजरेगा
दरवाजे पर खड़ी खड़ी
सजनी करे विचार,
फाल्गुन कैसे गुजरेगा
जो नई भरतार।
हार श्रृंगार छूट गए
रही ना कोई उमंग ,
दिल पर लगती चोट है
बंद करो ये चंग।
सजनी करे विचार,
फाल्गुन कैसे गुजरेगा
जो नई भरतार।
हार श्रृंगार छूट गए
रही ना कोई उमंग ,
दिल पर लगती चोट है
बंद करो ये चंग।
Monday, March 7, 2011
कैसे किया कमाल
बोफोर्स मामला बंद करने का
कैसे आया ख्याल,
आपकी मज़बूरी की
नहीं इस से बड़ी मिसाल।
---
मजाक मजाक में बीत गए
कई अमूल्य साल,
सच बतलाना मनमोहन जी
ये कैसे किया कमाल।
कैसे आया ख्याल,
आपकी मज़बूरी की
नहीं इस से बड़ी मिसाल।
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मजाक मजाक में बीत गए
कई अमूल्य साल,
सच बतलाना मनमोहन जी
ये कैसे किया कमाल।
लेबल:
कविता,
बोफोर्स,
मनमोहन सिंह
Saturday, March 5, 2011
अपना लगने लगा शैतान
अन्दर से डर जाता हूँ
देख भला इन्सान ,
अपना सा लगने लगा
जो बैरी था शैतान।
----
यही सोच कर सबके सब
होते हैं परेशान,
भ्रष्टाचार का कोई किस्सा
अब करता नहीं हैरान।
----
गली गली में बिक रहा
राजा का ईमान ,
सारी उम्मीदें टूट गईं
अब क्या करें भगवान।
देख भला इन्सान ,
अपना सा लगने लगा
जो बैरी था शैतान।
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यही सोच कर सबके सब
होते हैं परेशान,
भ्रष्टाचार का कोई किस्सा
अब करता नहीं हैरान।
----
गली गली में बिक रहा
राजा का ईमान ,
सारी उम्मीदें टूट गईं
अब क्या करें भगवान।
लेबल:
कविता,
भ्रष्टाचार
Wednesday, March 2, 2011
कौने कौने में महंगाई
डिब्बी से डिब्बे
और
कनस्तर से पीपे
तक ,रसोई के
कौने कौने में
फ़ैल गई महंगाई,
जिन्दगी की तरह
पल पल सिकुड़
रही है
आम आदमी की कमाई।
और
कनस्तर से पीपे
तक ,रसोई के
कौने कौने में
फ़ैल गई महंगाई,
जिन्दगी की तरह
पल पल सिकुड़
रही है
आम आदमी की कमाई।
Sunday, February 27, 2011
मेरी जां सौ बहाने है
बेशक, शहर की
चर्चाओं में
तेरे-मेरे
सौ अफसाने हैं,
पर मिलने
के
भी
तो
मेरी जां
सौ बहाने हैं।
चर्चाओं में
तेरे-मेरे
सौ अफसाने हैं,
पर मिलने
के
भी
तो
मेरी जां
सौ बहाने हैं।
Friday, February 25, 2011
बिना शीर्षक के
एक क्षण में
एक बार नहीं
कई बार
मोबाइल फोन
टटोलता हूँ, फिर
अपने आप से
बोलता हूँ
किसका आएगा
किसके पास जायेगा
फोन,
एक एक करके
सब तो चले गए
बात करने वाला
रहा है कौन?
सबके सामने है
अहम् की दीवार
अपना मौन
तोड़ेगा कौन!
Sunday, February 13, 2011
वो प्यार है......
शोखियों में
घोला जाए
फूलों का शबाब
उसमे फिर
मिलाई जाए
थोड़ी सी शराब
होगा वो
नशा जो तैयार
वो प्यार है........
घोला जाए
फूलों का शबाब
उसमे फिर
मिलाई जाए
थोड़ी सी शराब
होगा वो
नशा जो तैयार
वो प्यार है........
Tuesday, February 8, 2011
बसंत नेताओं के खाते में
प्रत्येक ऋतु के
सभी बसंत
नेताओं के खाते में ,
आदमी
मारा गया
लोकतंत्र के
इस घाटे में
Friday, December 3, 2010
दिल जोड़ने का मन किया
आज ना जाने क्यूँ
रोने को मन किया,
मां के आँचल में सर
छुपा के सोने का मन किया,
दुनिया की भाग दौड़ में
खो चुके रिश्ते सब,
आज उन रिश्तों को सिरे से
संजोने का मन किया,
किसी दिन भीड़ में
देखी थी किसी की आँखें ,
ना जाने क्यूँ आज उन आखों में
खो जाने का मन किया,
रोज सपनों से बातें
करता था मैं,
आज ना जाने क्यूँ उनसे
मुंह मोड़ने का मन किया,
झूठ बोलता हूँ
अपने आप से रोज मैं,
आज ना जाने क्यूँ खुद से
एक सच बोलने का मन किया,
दिल तोड़ता हूँ सबका
अपनी बातों से मैं,
आज एक टूटा हुआ दिल
जोड़ने का मन किया।
-----
यह कविता मेरे मित्र और साहित्यप्रेमी आनंद मायासुत ने भेजी थी एस एम एस के द्वारा। खुद शिक्षक हैं। इनके पिता श्री मोहन आलोक राजस्थानी के जाने माने साहित्यकार हैं।
रोने को मन किया,
मां के आँचल में सर
छुपा के सोने का मन किया,
दुनिया की भाग दौड़ में
खो चुके रिश्ते सब,
आज उन रिश्तों को सिरे से
संजोने का मन किया,
किसी दिन भीड़ में
देखी थी किसी की आँखें ,
ना जाने क्यूँ आज उन आखों में
खो जाने का मन किया,
रोज सपनों से बातें
करता था मैं,
आज ना जाने क्यूँ उनसे
मुंह मोड़ने का मन किया,
झूठ बोलता हूँ
अपने आप से रोज मैं,
आज ना जाने क्यूँ खुद से
एक सच बोलने का मन किया,
दिल तोड़ता हूँ सबका
अपनी बातों से मैं,
आज एक टूटा हुआ दिल
जोड़ने का मन किया।
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यह कविता मेरे मित्र और साहित्यप्रेमी आनंद मायासुत ने भेजी थी एस एम एस के द्वारा। खुद शिक्षक हैं। इनके पिता श्री मोहन आलोक राजस्थानी के जाने माने साहित्यकार हैं।
Wednesday, November 3, 2010
तेरी चाहत की दीवानगी
---
मेरे मासूम
सवालों के
झूठे थे तेरे
सभी जवाब,
तेरी चाहत की
दीवानगी में
गुम हो गए
मेरे सभी ख्वाब।
----
अमावस का हूँ
अँधेरा, जो था
पूनम की रात,
दीप की भांति
जलो तो
बन जाये बात।
----
तुम्हारी तुला
तोलने वाले भी
तुम्हारे ही हाथ,
ऐसे में कोई
क्यूँ देने लगा
मेरा साथ।
-----
***गोविंद गोयल
मेरे मासूम
सवालों के
झूठे थे तेरे
सभी जवाब,
तेरी चाहत की
दीवानगी में
गुम हो गए
मेरे सभी ख्वाब।
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अमावस का हूँ
अँधेरा, जो था
पूनम की रात,
दीप की भांति
जलो तो
बन जाये बात।
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तुम्हारी तुला
तोलने वाले भी
तुम्हारे ही हाथ,
ऐसे में कोई
क्यूँ देने लगा
मेरा साथ।
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***गोविंद गोयल
Friday, October 22, 2010
Thursday, May 20, 2010
अँधेरा है,रोशनी नहीं है
अँधेरे का अपना
कोई
अस्तित्व नहीं है,
बस,
रोशनी नहीं है
इसलिए अँधेरा है,
वरना तो
जिधर देखो
उधर
सवेरा ही सवेरा है।
Wednesday, May 19, 2010
तुम क्या हो,कौन हो
मैं नहीं जानता
तुम क्या हो और
क्या बनना चाहते हो,
लेकिन तुम से
इतना अवश्य कहूँगा
तुम जो हो वही रहो
वो बनने की कोशिश
मत करो
जो तुम नहीं हो,
कहीं ऐसा ना हो कि
भविष्य का कोई झोंका
तुम्हारे वर्तमान अस्तित्व
कि मिटा दे,और
बाद में तुम
अपने अतीत को
याद करके अपनी
करनी पर पछताते रहो।
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