Sunday, October 28, 2012

रात को बीमार होने का हक नहीं तुझे....समझे!


श्रीगंगानगर- रात को लगभग सवा नौ बजे का समय होगा। डॉक्टर के पास रोगी को लाया गया। रोगी लंबे समय से इसी डॉक्टर से ईलाज करवा रहा था। डॉक्टर की मैडम ने दरवाजा खोलते ही कह दिया कि डॉक्टर साहब तो घर नहीं है। रोगी की हालत गंभीर...नर्सिंग होम पहुंचे...कोई फायदा नहीं....दूसरे हॉस्पिटल आए...नर्सिंग स्टाफ ने जांच कर डॉक्टर से बात की....डॉक्टर ने उसे दूसरे के पास जाने की सलाह दी। नर्सिंग स्टाफ क्या करता! उसने रोगी के परिजनों को बता दिया। गंभीर रोगी को फ़र्स्ट एड देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। वह कोई वीआईपी थोड़े था।  तीसरे डॉक्टर के पहुंचे। वह भी नहीं....आखिर किसी को फोन करके एक नर्सिंग होम संचालक से आग्रह  किया गया। उसने बहुत बड़ा अहसान करते हुए ईलाज शुरू किया। किसी डॉक्टर को इस बात का अंदाजा कि इस पूरी प्रक्रिया में रोगी के परिजनों के दिलों पर क्या बीती होगी? जीवन-मौत तो ईश्वर के हाथ है लेकिन डॉक्टर कुछ प्रयास तो करे। किसी ने कहा हमारे यहां ये सुविधा नहीं। किसी ने बोल दिया डॉक्टर नहीं। आदमी मरे तो मरे डॉक्टर का क्या जाता है! रात को किसी आम आदमी के लिए ना तो डॉक्टर आएगा। ना मरते हुए इंसान को कोई फर्स्ट एड देने की कोशिश होगी। क्योंकि साधारण परिवार के किसी व्यक्ति को रात को गंभीर बीमार होने का हक है ही नहीं।  किसने दिया उसे यह हक ? नहीं होना चाहिए उसे बीमार। वह ऐसी क्या चीज है जो वह रात को बीमार हो, वह भी गंभीर। उसे शर्म आनी चाहिए। इस नगर में रात को बीमारी की बजाए उसे शर्म से डूब मरना चाहिए। वह क्या समझता कि उसकी बीमारी से किसी डॉक्टर का दिल पसीजेगा! कोई उसके परिजनों के दर्द को समझेगा! नर्सिंग होम के दरवाजे उसके ईलाज  के लिए खोल दिये जाएंगे! रात को कोई क्यूँ करे उसका ईलाज । उसकी अहमियत ही क्या है इस क्षेत्र में। उसको जीने का हक ही किसने दिया....बीमार हो जाए रात को और मर जाए ईलाज के अभाव में। हमें क्या? हम तो नहीं करेंगे ईलाज। ईलाज! अरे! हम तो फ़र्स्ट एड भी नहीं देंगे। कौनसी इंसानियत?..दया...फर्ज.... । अजी छोड़ो जी, ये सब किताबी बातें हैं। हम केवल वही किताब पढ़ते हैं जिसकी जेब में दाम हो....खूब नाम हो....प्रतिष्ठित व्यक्ति हो.....बड़ा अफसर हो.... । आम आदमी....उस पर रात को गंभीर बीमार....उसको कहा किसने था रात को बीमार होने के लिए। रात को कोई नर्सिंग होम का डॉक्टर “रिस्क” नहीं लेता। कुछ हो गया तो तोड़ फोड़ का अंदेशा। बस यही एक तर्क है डॉक्टर के पास। सही भी है ये बात, किन्तु इसका यह मतलब तो नहीं कि हर मरीज के परिजन हाथों में पत्थर लिए नर्सिंग हॉस्पिटल आते हैं ईलाज करवाने। अफसोस तो ये कि इनसे पूछने की हिम्मत कौन करे? अभी ये हाल है।उसके बाद तो पता नहीं क्या होगा। जो भी हो किन्तु आम आदमी रात को गंभीर बीमार ना हो। उसे रात को बीमार होने का हक ही नहीं है। एक शायर ने कहा है....पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे,ज़िंदगी इधर आ तुझ को हम गुजारेंगे।



Wednesday, October 24, 2012

सरकार से तो बिना शर्त प्यार करना पड़ता है


श्रीगंगानगर-सरकारी मेडिकल कॉलेज मिलेगा लेकिन सड़क पर नहीं मेज पर। धमकी से नहीं आग्रह से। मुख्यमंत्री सहित सभी जनप्रतिनिधियों से दूर रहकर नहीं उनसे मिल कर। उनको आँख दिखाकर नहीं आँख से आँख मिलाकर। किसी व्यक्ति विशेष या किसी संगठन की अपनी शर्तों पर नहीं,सरकारी नियम,कानून,कायदों के हिसाब से।किसी से कुछ लेने के कायदे होते हैं चाहे वह हमारा हक ही क्यों न हो। हक तो बाप का संतान पर और संतान का माँ-बाप पर भी होता है। पति-पत्नी का एक दूसरे पर जो हक होता है उससे अधिक तो कहीं कुछ हो ही नहीं सकता। इन रिश्तों में भी लेने-देने की मर्यादा है। दान देने की मर्यादा से तो शास्त्र भरे पड़ें हैं। दान तो ऐसे दिया जाए कि दूसरे हाथ को भी पता ना लगे....यह सतयुग की बात थी। अब दूसरा जमाना है...एक रुपया भी दो तो बजा के। सरकार लेने को तैयार भी है। वैसे ये जरूरी नहीं कि सरकार से मेडिकल कॉलेज मांगने के लिए उसे  सौ,दौ सौ,पांच सौ करोड़ रुपए का चैक दिखाना जरूरी है। खाली हाथ जनता भी सरकार से यह सब मांग सकती है। परंतु सरकार सरकार है। जनता के सामने झुक भी सकती है और किसी को झुकाने पर आए तो उसे दोहरा कर देती है। सरकार को कोई डराना चाहे तो गड़बड़ हो जाती है। सरकार कुछ देर डरने का नाटक तो कर सकती है लेकिन असल में वह डरती नहीं। ना तो किसी दानवीर से और ना बड़े से बड़े उद्योगपति अथवा बाबा से। सरकार किसी उद्योगपति से डरती तो टाटा को अपना कारख़ाना बंगाल से गुजरात में ना शिफ्ट करना पड़ता। कोई सरकार किसी बाबा से कांपती तो रामदेव पता नहीं क्या से क्या हो जाते। सरकार ने पहले  तो बाबा से मिलने कई मंत्री भेजे फिर उसी सरकार ने उसे महिलाओं के कपड़े पहन कर भागने के लिए मजबूर किया। दानवीर तो ना जाने कितने हैं जो दशकों से दिये जा रहे हैं।सरकार ना तो उनसे डरती है ना वे डराने की कोशिश करते हैं। दोनों एक दूसरे का यथा योग्य मान सम्मान करते हैं। सरकार होती ही ऐसी है। एक पल कुछ दूसरे ही पल और कुछ। सरकार कहीं भी चाहे किसी की भी हो वह किसी से नहीं डरती। हां अगर आपके पास उसे लूटने का गट्स है तो उसे लूट लो चाहे जितना।वह तैयार रहती है लुट जाने को। ये गट्स नहीं तो फिर उससे लेने की कोई तरकीब हो आपके पास। कोई दिक्कत नहीं। मिल जाएगा जो चाहोगे। परंतु बात फिर वही....यह सब होगा एक प्रक्रिया के तहत। सरकार के कायदे कानून से ना कि मेरे,उसके,इसके कहने या शर्त पर। सरकार के साथ बीमारी ये कि वह शर्तों के साथ प्यार नहीं करती। बस,बिना शर्त प्यार करो.....उसके बाद उसके पास जो है वह हमारा। यहां उलटा होता है।

Thursday, October 11, 2012

कॉलेज के लिए बी डी अग्रवाल ने दिया सौ करोड़ रुपए का चैक


श्रीगंगानगर-विकास डब्ल्यू एसपी लिमिटेड के सीएमडी बी डी अग्रवाल ने सरकारी क्षेत्र में मेडिकल कॉलेज के निर्माण के लिए सौ करोड़ रुपए का चैक सरकारी मेडिकल कॉलेज बनाओ संघर्ष समिति को दिया है। श्री अग्रवाल इसके लिए समिति के बुलावे पर पंचायती धर्मशाला पहुंचे। जहां समिति के पदाधिकारी मौजूद थे। अपने संक्षिप्त सम्बोधन में बी डी अग्रवाल ने कहा कि वे आंदोलन के बारे में कुछ नहीं कहेंगे लेकिन सरकारी मेडिकल कॉलेज के लिए सौ करोड़ रुपए का चैक लेकर आया हूँ। उन्होने कहा कि अगर इसकी स्वीकृति मिलती है तो वे बहुत जल्दी ही ऐसे मेडिकल कॉलेज का निर्माण करवाएंगे कि आस पास कोई नहीं होगा। उन्होने कहा कि वे केवल फाइनेंस का काम करेंगे। हमारी इच्छा है कि कॉलेज सरकारी बने। श्री अग्रवाल ने कहा कि अगर वे चाहते तो प्राइवेट मेडिकल कॉलेज बना सकते थे...लेकिन दुकान खोलने की कोई मंशा नहीं। श्री अग्रवाल ने हरियाणा में उनके परिवार द्वारा किए गए इसी प्रकार के जन हित के कार्यों के बारे में बताया। वे बोले कि हमारा मकसद सरकारी स्तर पर अधिक से अधिक सुविधा उपलब्ध करवाना है। श्री अग्रवाल ने बताया कि यूनिसेफ के माध्यम से बच्चों की बीमारी के इलाज के विशेषज्ञ का प्रबंध किया जाएगा। ये सब कुछ प्राइवेट में नहीं हो सकता। उन्होने बताया कि ये सौ करोड़ रुपए का चैक राजकीय चिकित्सालय के नाम से है। उन्होने कहा कि यह समझ नहीं आ रहा कि सरकारी मेडिकल कॉलेज क्यों नहीं स्वीकृत हो रहा। जबकि हम सभी प्रकर के संसाधन देने को तैयार हैं। उन्होने कहा कि बढ़िया मेडिकल कॉलेज बना कर देंगे। सामग्री हम लगाएंगे। मल्टी स्टोरी कॉलेज होगा। जो दुनिया देखेगी। उन्होने घोषणा की कि अगर सौ करोड़ से अधिक खर्च आया तो वह भी हम देंगे। उनके द्वारा दिया गया चैक एक्सिस बैंक का है। उन्होने बजरंग दास अग्रवाल के खाते से यह चैक दिया है। इस मौके पर महेश पेड़ीवाल,नरेश शर्मा,रतन लाल गणेशगढ़िया,सोनू नागपाल,गुरबलपाल सिंह, गिरधारी लाल गुप्ता,नर्ष अग्रवाल मुन्ना आदि व्यक्ति मौजूद थे।

Thursday, October 4, 2012

कपड़ों और सूरत से नहीं होती इंसान की पहचान


श्रीगंगानगर-एक परिचित विप्रवर को घर छोड़  गया। विप्रवर भी क्या! आज के सुदामा से कुछ बीस लगे। बुजुर्ग पतले दुबले । दांत थे भी और नहीं भी। हल्की सफ़ेद दाड़ी। बाल बिखरे हुए। कलाई पर घड़ी। जिसका फीता इससे पहले पता नहीं कब बदला होगा। उसका वास्तविक रंग फीका पड़ बे रंग का हो चुका था। धागे निकले हुए थे।  कमीज-धोती थी तो साफ लेकिन झीनी ।गज़ब की फुर्ती। आते ही  नंगे पैर बाथरूम में गए। वापिस आए, हाथ पैर धोए। आसन बिछा था बैठ गए। मन में  भाव उमड़े  कि ये किस पंडित को छोड़ गए वो.....। इससे पहले कि सोच आगे बढ़ती...विप्रवर ने अपने  अनुभव से मेरे चेहरे  और मन के भाव पढ़ लिए। विप्रवर बोले,रिटायर्ड टीचर हूँ। 1960-61 में लगा था नौकरी। मन के भाव,विचार सब बदल गए साथ में चेहरे का रंग भी । वे बताने लगे...1300 रुपए  पेंशन मिलती है।क्योंकि हमारे जमाने में तनख़ाह कम ही हुआ करती थी। जिस चेहरे पर  कुछ देर पहले दीन-हीन जान तरस आ रहा था उसके प्रति अब श्रद्धा हो गई। उनकी बातों में रस आने लगा। भोजन करते हुए वे बोले,हिन्दी और गणित पढ़ाया करता था। अब तो गणित बहुत मुश्किल हो गया। बच्चों को ना तो हिन्दी की ग्रामर आती है ना अंग्रेजी की। इसी वजह से उनके नंबर कम आते हैं। भोजन की तारीफ के साथ उनके अनुभव का ज्ञान भी मिल रहा था। वे बताने लगे, सिरसा के एक सेठ की सिफ़ारिश पर श्रीकरनपुर गया नौकरी लेने। तहसीलदार पटवारी लगाना चाहता था। लेकिन मेरी इच्छा मास्टर लगने की थी। तहसीलदार ने बहुत कहा,पर मैं मास्टर ही लगा। कुछ समय पहले जो दीन हीन लग रहा था वह ज्ञान और अनुभव से घनवान था।अपने अंदर आशीर्वादों का भंडार लिए हुए था वह बुजुर्ग विप्रवर। यह सब लिखने का अर्थ केवल उस विप्रवर की तारीफ करना नहीं है। बल्कि इस बात का जिक्र करना है कि इंसान की सूरत,कपड़े और उसके साधन देख कर  ही समाज उसके बारे में अपनी राय कायम कर लेता है। जैसा पहनावा और सूरत वैसी ही उसको तवज्जो मिलती है। यह कोई आज नहीं हो रहा। सदियों से ऐसा ही है। हर युग में इन्सानों ने सूरत, कपड़ों और धन को केंद्र में रख दूसरे इंसान को महत्व दिया। इंसान की सूरत कैसी भी हो, कपड़े चाहे जैसे हों, धन है या नहीं लेकिन उसने अपनी मधुर वाणी, अपने ज्ञान और अनुभव से, अपनी बड़ी सोच से, किसी के व्यक्तित्व को पहचाने के इस माप दंड को हर बार गलत भी साबित किया। जैसे आज इस विप्रवर ने किया। जाते हुए पंडित जी ने संस्कृत में एक श्लोक बोला...जिसका अर्थ था कि पद और पैसा तो ठीक  है किन्तु हर बार फलित तो भाग्य ही होता है। ये कह वे अपनी साइकिल पर सवार हो चले गए। ये संकेत उन्होने अपने लिए दिया या हमारे लिए वही जानें। शायर मजबूर कहते हैं...दिल है पत्थर,दिल है मोम भी मजबूर,दिल पर हर चोट के निशां होते हैं। 

Tuesday, October 2, 2012

मेहमान हैं टेम्प्रेरी कलेक्टर के रूप में


श्रीगंगानगर-जब शब्दों का महत्व ही ना रहे तब खामोशी ठीक है और जब शब्दों की जरूरत ही ना हो समझने समझाने में तब होता है मौन। खामोशी!मतलब कुछ भी कहो,सुनो,लिखो किसी पर कोई असर नहीं होने वाला। मौन! अर्थात जब सब बिना बोले,कहे,लिखे ही एक दूसरे की बात समझ जाएं। श्रीगंगानगर के संदर्भ में दोनों  स्थिति थोड़ी थोड़ी है। शब्दों का महत्व भी है और इनकी जरूरत नहीं भी। इसलिए कुछ लिखा जाएगा और कुछ बिना लिखे समझना होगा। यही ठीक रहेगा। मेहमान के सामने। मेहमान! अपने नए जिला कलेक्टर श्री राम चोरडिया। टेम्प्रेरी कलेक्टर। मेहमान कलेक्टर। कुछ माह बाद रिटायर हो जाएंगे। जो मेहमान है उसके सामने परिवार वाले कुछ बोलते हैं और कुछ इशारों में एक दूसरे को समझाते हैं। क्योंकि मेहमान को घर की समस्या बताई नहीं जाती।  सभी बातें उनके सामने कहना संस्कार नहीं है न हमारे। अब उनको ये कैसे कह दें कि हमारा सीवरेज अभी तक नहीं बना। चार साल से लगे हैं नेता और प्रशासन। कान पक गए सुनते सुनते। ओवरब्रिज का क्या होगा! मिनी सचिवालय का भी प्रस्ताव है...ऐसे  कितने ही मुद्दे हैं। किन्तु मेहमान को ये सब कैसे बताएं। अच्छा नहीं होता ना मेहमान को घर की समस्या बताना। आपसी विवाद को दर्शाना । हमें तो मेहमान की तो आवभगत करनी है। “अतिथि देवो भव:।“ बस नो दस महीने अब हमारा यही काम है कि अपने काम भूलकर मेहमान कलेक्टर की सेवा करें। हमारा फर्ज है ये ,मेहमान कलेक्टर पर कोई अहसान नहीं। मेहमान लंबे समय तक रुके तब  भी उससे ये उम्मीद तो नहीं कर सकते कि वह कोई बड़ी सहायता करेगा हमारी....हां आते जाते कोई सब्जी ले आया या बच्चे को उसकी जरूरत की चीज दिला लाया तो अलग बात है। इससे अधिक उम्मीद करेंगे तो रंज और अफसोस का कारण होगा। मेहमान भी कैसे कलेक्टर जैसे। अब मेहमान तो टेम्प्रेरी ही होते है। वैसे सरकार ने  टेम्प्रेरी कलेक्टर लगा दिया। ना भी लगाती  तो क्या तो यहां के लीडर कर लेते और क्या विपक्ष। अब ये कलेक्टर कुछ महीने शहर को समझने में लगाएंगे। जब तक समझेंगे तब विदाई की वेला निकट आ जाएगी। विदाई समारोह होंगे। उपहार  दिये जाएंगे। कार्य  की तारीफ होगी। व्यक्तित्व की सराहना की जाएगी। बस उसके बाद चुनाव आ ही जाएंगे।  वैसे भी जब प्रस्थान का समय हो तो इंसान ‘राम-राम” करके समय पास करता है। जो मिल जाए वही अपना। श्रीराम चोरडिया को तो कलेक्टर का पद तो मिल ही गया। और जो कुछ मेहमान के रूप में उनको मिलेगा वह अलग से होगा।  कलेक्टर के रूप में उनकी पहली और अंतिम पोस्टिंग शायद यही होगी। इस शहर का क्या होगा? जो अब तक होता आया है वही होगा।

अफसरशाही का राज है “शासन” पर


श्रीगंगानगर-जो सरक सरक के काम करे वह सरकार। जैसे राजस्थान सरकार। जिसे शायद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की टीम नहीं बल्कि अफसरों का एक दल चला रहा है। एक तबादला। फिर उसका तबादला। तबादले पर तबादला। जो करना है एक बार कर दो। ये क्या थोड़ी देर पहले कुछ,कुछ पल बाद कुछ और। आईएएस की सूची आई। रवि जैन को कलेक्टर लगाया। कितने ही व्यक्तियों ने गिफ्ट तैयार की। समाज के नाम पर मिलेंगे। गिफ्ट देंगे। रिश्ते बनाएंगे। अब ये गिफ्ट किसी और के काम आएगी। कितने आरएस बदले। श्रीगंगानगर में नगर विकास का सचिव लगाना है ये “भूल” गए। एक डीएसओ था, जैसा भी था था तो सही। उसको हटा दिया। वैसे बूआ जाऊँ जाऊँ कर रही थी...फूफा लेने आ गया। तीन सीओ हटाए एक लगाया। डीजीपी हरीश मीणा की मेहरबानी से अशोक मीणा पोने दो साल निकाल गए। तब से लाइन में लगे राजेन्द्र ढिढारिया को अब मौका मिला श्रीगंगानगर सीओ लगने का।अब एससी/एसटी प्रकोष्ठ और ग्रामीण सीओ के लिए सरकार या तो किसी डिजायर का इंतजार कर रही है या फिर इन पदों के लायक उनके पास कोई अफसर नहीं।वरना लिस्ट में सौ नाम हों वहां दो और बढ़ जाएं तो कौनसा कंप्यूटर लिस्ट निकालने से मना कर देता है। कंप्यूटर मना नहीं करता.....बड़े अफसर की पूछ कम हो जाती है। सभी कुर्सी एक साथ भर गई तो विधायक इनकी लल्ला लोरी कैसे करेंगे।  अब जब आप तबादले कर ही रहो हो तो कोई सीट खाली क्यों रखते हो। लगे हाथ सभी काम क्यों नहीं निपटाते। आगे दौड़। पीछे छोड़। यही नीति “सरकार” की शह पर अफसरों ने बना रखी है। और नहीं तो क्या! अब जो खाली सीट हैं उनको भरना तो पड़ेगा ही। जैसे भी अफसर हैं उनसे। जो खाली रह गई सीट उसके लिए फिर लिस्ट निकालनी पड़ेगी। फिर वही प्रक्रिया...वही मगज़मारी..... । श्रीगंगानगर में तो खैर कोई फर्क नहीं पड़ता कोई अफसर है या नहीं। किन्तु सरकार की प्रतिष्ठा पर तो असर पड़ता ही है। ये क्या सरकार हुई जो हर लिस्ट में कोई ना कोई घर खाली छोड़ देती है। उसको भूल जाती है। कई महीने तक याद ही नहीं करती कि कौनसी कुर्सी खाली रह गई। इसका चार्ज उसको....उसका चार्ज किसी को। एक कुर्सी का काम ठीक से हो नहीं पाता कि दूसरे में और उलझा दिया। अब अधिकारी उसमें अधिक रुचि लेता है जिसमें माल के साथ प्रचार मिले। लोगों को मालूम हो कि हां इस नाम का भी कोई अधिकारी है। सरकार बेचारी क्या करे....वह तो खुद अफसरों के भरोसे है। अफसरशाही पर सरकार का शासन नहीं अफसर सरकार पर शासन कर रहे हैं।

Saturday, September 22, 2012

जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखे.....



श्रीगंगानगर-अद्भुत। आश्चर्यजनक। अकल्पनातीत। वंडरफुल। अहा! क्या बात है। वाह! क्या संस्कार है,सोच है। मतलब परस्त,अविश्वास से भरी और भौतिकवादी सोच से लबरेज समझे जाने वाले इस समाज में ऐसा भी संभव है। पढ़ा हो तो कहानी समझ कर भूल जाएं। कोई सुनाए  तो विश्वास ही ना हो। लेकिन यह सब हुआ जो यहाँ लिखा गया है।  दोपहर 12 बजे का समय। पॉश क्षेत्र। एक बुजुर्ग साइकिल पर एक बैग टांगे किसी का घर पूछ रहा था। मुझसे भी पूछा,लेकिन मैं खुद उसका घर फोन पर पूछ रहा था जिसके पास जाना था। मुझे घर मिल गया क्योंकि वह बंदा बाहर आ गया, जिससे मिलना था। बुजुर्ग ने उससे भी “...” का घर पूछा। बंदे ने बता दिया....लेकिन एक क्षण बाद ही वह बोला,बाबा आप धूप में हैं अंदर आ जाओ.... । आया तो मैं था मिलने...अब साथ में वह बुजुर्ग भी हो गया। थका सा। उदास चेहरा। निढाल। सजे धजे शानदार ड्राइंग रूम में बैठ गए। मुझसे बात शुरू होती इससे पहले उस बंदे ने बुजुर्ग का हाथ अपने हाथ लिया और बोला...आप उदास क्यों हो...क्या बात है...क्या परेशानी है...सब कुछ बताओ.....दिल खोल कर कहो....सब ठीक होगा। इतना बोल बंदा काम वाली को ठंडा दूध लाने की आवाज लगाता  हुआ कमरे से बाहर चला गया। बुजुर्ग की आँख भर आई। दिल रोने लगा..... मैंने पूछा....आप इसको कभी मिले। बुजुर्ग बोला नही,कभी नहीं। मेरा दूसरा सवाल था...आपको कैसा लगा जब उसने आपका हाथ अपने हाथ में लेकर परेशानी पूछी ? बुजुर्ग ने जेब से रुमाल निकाला। आँख में आए स्नेह और खुशी के आंसुओं को उसमें सहेजा और फिर बोला... आज तक मेरे किसी बच्चे ने इस प्रकार से मुझसे प्यार,अपनापन नहीं दिखाया। इसने बिना जान पहचान के यह किया। घर का मालिक वह बंदा वापिस ड्राइंग रूम में आया।  साथ में दो गिलास दूध लिए काम वाली भी थी। ठंडे दूध का गिलास उसको देकर  बंदा फिर बुजुर्ग से कहने लगा लगा....खोल दो मन की सारी गांठ....आज हँसना है...पिकनिक मनानी है। हालांकि बुजुर्ग ने बताया कि उसके तीन बच्चे हैं...सब सैट हैं। किन्तु उस बंदे ने बुजुर्ग का हाथ अपने हाथ में लेकर उसके चेहरे की उदासी में जैसे  कुछ पढ़ना शुरू किया।बंदा बोला,मेरी आँख में आँख डाल कर कहो सब ठीक है। बुजुर्ग की आँख फिर भीग गई...शब्द गले में रुक गए....उसने कुछ कहने की बजाए उस बंदे का हाथ स्नेह,लाड़,दुलार से चूम लिया। बंदे के स्नेह से लबरेज अपनेपन ने  बुजुर्ग का पीछा नहीं छोड़ा....आपका मोबाइल नंबर दो आपसे बात करूंगा....घर आऊंगा। यह सब कुछ मिनट में ही हो गया। जो कुछ मिनट पहले एक दूसरे से अंजान थे वे परिचित हो गए। दोनों की उम्र का फासला...स्टेटस में फर्क...किन्तु सब मिटा दिया उस बंदे ने। अपने शब्दों से। अपनेपन से।  ऐसा लगा जैसे कोई मासूम बालक अपने घर के किसी बुजुर्ग से जिद कर रहा है कुछ देने की,बड़ी ही मासूमियत के साथ। पता नहीं वह कौन है....कोई फ़ैमिली काउन्सलर या कोई टीचर। पथ  प्रदर्शक या फिर अपने मालिक (ईश्वर) की धुन में खोया कोई दीवाना। या इंसान के रूप में किसी मालिक का कोई दूत। मैंने कभी इस प्रकार से दो अंजान व्यक्तियों को परिचित होते नहीं देखा। मुझे तो उससे पहली बार मिलने का मौका मिला था। मिला क्या था! मिलना तो उनका ही था। मुझे तो बस साक्षी की भूमिका मिली थी यह सब लिखने के लिए।  उसी बंदे की दो लाइन से बात को विराम देंगे.... साड्डी दोस्ती है दोस्तो सवेरैयां दे नाल,कोई साड्डा कम्म नई अंधेरैयां दे नाल।
 



Thursday, September 20, 2012

सांसद पहुंचे मंत्री के घर, सबंध सुधारने की कोशिश


 
श्रीगंगानगर-सूरज अपनी यात्रा पूरी करके पश्चिम में अस्त हो अंधेरा करने के अंतिम चरण में था। इसी दौरान कांग्रेस सांसद भरतराम मेघवाल अपनी राजनीति पर छाए अंधेरे को दूर करने के लिए मीरा मार्ग के पाश्चिम में स्थित एक घर पहुंचे। यह निवास था कृषि विपणन मंत्री गुरमीत सिंह कुन्नर का। वे खुद अपने अंदर वाले कमरे में अपने भतीज दामाद तेजदीप सिंह के साथ थे।  सांसद भरत राम मेघवाल पूर्व विधायक महेंद्र सिंह बराड़,एडवोकेट रामस्वरूप मांझु   के साथ उनके पास पहुंचे। उसके बाद कमरा बंद। लगभग ढाई घंटे तक अंदर वह हुआ जो राजनीतिक संबंध सुधारने,राजनीति में आगे बढ़ने के लिए पहली बार सांसद बने एक व्यक्ति द्वारा किया जाना जरूरी था। कमरे के अंदर दो बार चाय पानी गया।  वार्ता बहुत गरमा गरम हुई। कई बार तेज आवाज आई...अनेक बार वे शब्द  सुनाई दिये जो  कोई दीन दीन स्थिति में अपने से बड़े,ताकतवर को कहता है,सम्बन्धों में आई खटास को मिठास में बदलने के लिए। वार्ता के दौरान पूर्व सांसद शंका पन्नू भी अंदर गए। लेकिन चूंकि उनको पता नहीं था कि अंदर कौन किस लिए बैठा है इसलिए  वे कुछ क्षण बाद ही आ  गए।  मनिन्दर सिंह मान भी इसी प्रकार गए और कुछ समय बाद लौट आए। लगभग ढाई घंटे के बाद कमरा खुला....गुरमीत सिंह कुन्नर के साथ सब बाहर आए। किसी के चेहरे पर भी वह नेचुरल मुस्कान नहीं थी जो संबंध सुधरने का संकेत देती। मुख पर तनाव था और जबरदस्ती लाई गई मुस्कान। श्री कुन्नर अपनी गाड़ी में बैठे...भरत राम मेघवाल ने चरण छूए,इजाजत ली ...महेंद्र सिंह बराड़ बोले...बड़े तो बड़े ही रहेंगे,क्षमा बड़न को चाहिए। उसके बाद गुरमीत सिंह कुन्नर रवाना हो गए। भरत राम मेघवाल से जब पूछा गया तो इतना ही कहा कि हमारे सम्बन्धों में कोई खटास थी ही नहीं। सूत्रों का कहना है कि बंद कमरे में हुई बैठक के बाद गुरमीत सिंह कुन्नर एक बार तो सांसद भरत राम मेघवाल के साथ समारोह में आने के लिए तैयार हो गए। मंत्री गुरमीत सिंह कुन्नर ने पूछने पर बताया कि अब एक बार तो मैं समारोह में आऊँगा। बाकी बाद में देखेंगे। मतलब अभी बहुत कुछ बाकी है शायद।  

Wednesday, September 19, 2012

गर्भवती महिलाओं का अल्ट्रासाउंड तीन दिन से बंद,रेट भी बढ़ाए


श्रीगंगानगर-नगर के सभी अल्ट्रासाउंड केन्द्रों ने गर्भवती महिलाओं का अल्ट्रासाउंड करना बंद कर दिया है। ये कदम प्रशासन और केन्द्रों में रोज रोज होने वाली किच-किच,खिच-खिच से तंग आए केंद्र संचालकों ने प्रशासन पर दवाब बनाने के लिए उठाया है। इसका नुकसान ना तो प्रशासन को होगा ना केंद्र संचालकों को। आपसी विवाद में नुकसान होगा आम जनता का। आर्थिक रूप से भी और शारीरिक रूप से भी। अल्ट्रासाउंड केंद्र संचालकों ने सोमवार से गर्भवती महिलाओं का अल्ट्रासाउंड करना बंद कर दिया। जिस कारण गर्भवती महिलाओं को बहुत अधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। एक लेडी डॉक्टर ने बताया कि गर्भ में बच्चे की स्थिति की जांच के लिए कई प्रकार के अल्ट्रासाउंड करवाने  बहुत जरूरी होते हैं।अगर वो ना हों तो बड़ी दुर्घटना होने की आशंका रहती है। कई बार महिला को ब्लिडिंग होती है,उसका कारण  जानने के लिए अल्ट्रासाउंड जरूरी है। कई बार गर्भ में बच्चे को खून का फलो कम होता है उस स्थिति में लेडी डॉक्टर केवल अल्ट्रासाउंड से ही इलाज का फैसला करती है। कई बार महिला को  पेन नहीं होता, इसके बावजूद बच्चे को आउट करना पड़ता है। यह सब बिना अल्ट्रासाउंड के संभव नहीं। प्राइवेट केन्द्रों पर गर्भवती महिलाओं के अल्ट्रासाउंड हो नहीं रहे और सरकारी हॉस्पिटल में लाइन लंबी है। इसके अलावा रिपोर्ट भी देरी से मिलती है। इतना ही नहीं वहाँ कोई रेडिलोजिस्ट नहीं है। ऐसी हालत में किस गर्भवती महिला के साथ क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता।
उधर रेडिलोजिस्ट प्रशासन की रोज रोज की कार्यवाही से डरे हुए  हैं। क्योंकि “एफ” फार्म के कारण सबसे अधिक परेशानी आती है। रेडियोलोजिस्ट वही सूचना उसमें भरेगा जो मरीज बताएगा। कोई गलती रही तो मशीन सीज। कुछ चिकित्सकों का कहना है कि “एफ” फार्म खुद प्रशासन भरे। चूंकि प्रशासन को रेडिलोजिस्ट पर विश्वास नहीं इसलिए वह अपने दफ्तर में ऐसी व्यवस्था करे। फार्म वहाँ भरे जाएं। रेडियोलोजिस्ट  अधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर देखते ही अल्ट्रासाउंड कर देंगे। तीन दिन से अल्ट्रासाउंड बंद हैं  इस बारे में प्रशासन को जानकारी है या नहीं,पता नहीं। लेकिन रेडियोलोजिस्ट गत दिवस प्रशासनिक अधिकारियों से मिले जरूर थे। प्रशासन ने दोनों पक्षों में संवाद हीनता ना हो इसके लिए एक कमेटी के गठन कर रहा है। यह विचार कई दिनों से पेंडिंग है। रेडियोलोजिस्ट अपने नाम दे चुके हैं। इस कमेटी में प्रशासन के अधिकारी भी होंगे। इस बीच अपनी मोनोपॉली के चलते अल्ट्रासाउंड केंद्र संचालकों ने रेट भी बहुत अधिक कर दिये हैं। जो अल्ट्रासाउंड पहले 250 रुपए तक में हो जाता था अब उसी के 800 रुपए तक देने होंगे। केंद संचालकों का तर्क है कि हमने प्रशासन को संतुष्ट करने के लिए ट्रैकर लगवाए। रिकॉर्ड देने के लिए स्टाफ रखा। कानूनी कार्यवाही से बचाने के लिए लाखो रुपए वकीलों को फीस दी। इससे खर्चे बढ़े तो मजबूरी में हमें भी अल्ट्रासाउंड के रेट बढ़ाने पड़े। इस स्थिति में क्या होगा? किसी को कुछ नहीं पता। फिलहाल सबसे अधिक मुश्किल में गर्भवती महिला और उसके परिजन हैं। जिन से ना तो प्रशासन को कोई सहानुभूति है ना डॉक्टर्स की।


श्रीगंगानगर की ओफिसियल वेबसाइट में महाराजा गंगा सिंह का जिक्र तक नहीं


श्रीगंगानगर-श्रीगंगानगर की ओफिसियल वेबसाइट “श्रीगंगानगर डॉट निक डॉट इन” में महाराजा गंगा सिंह  का जिक्र तक नहीं है। हिन्दी,अंग्रेजी,पंजाबी और राजस्थानी में श्रीगंगानगर क्षेत्र के बारे में जो थोड़ी बहुत जानकारी दी गई है वह भी अलग अलग है। जो अंग्रेजी में है वह पंजाबी में नहीं। जो राजस्थानी में है वह हिन्दी में नहीं।अंग्रेजी में  एक दर्जन लाइन में श्रीगंगानगर की जानकारी है तो हिन्दी में केवल साढ़े छः लाइन। ऐसा लगता है कि या भिन्न भिन्न विचारों वाले व्यक्तियों से लिखाया गया है। जिसको श्रीगंगानगर जैसा दिखा,लगा वैसा लिख दिया श्रीगंगानगर के बारे में। सरकारी वेबसाइट ही तो है....क्या फर्क पड़ता है।  वेबसाइट में लिखा है कि श्रीगंगानगर दो भागों में है...एक व्यावसायिक क्षेत्र दूसरा रिहायशी। लिखने वाले ने शायद सालों से श्रीगंगानगर शहर का भ्रमण नहीं किया। या फिर वे समझ नहीं सके नगर के मिजाज को।  क्योंकि अब तो रिहायशी क्षेत्रों में भी बड़े बड़े बाजार बन चुके हैं। दो भागों वाली बात दशकों पुरानी हो सकती है। इस बात का जिक्र राजस्थानी में है कि श्रीगंगानगर कभी रामनगर हुआ करता था। पंजाबी,अंग्रेजी और हिन्दी में इसका उल्लेख नहीं है। इस वेबसाइट में 16 चित्र भी चिपकाए गए हैं। चित्रों में सूरतगढ़ का थर्मल स्टेशन है। अंध विद्यालय को अनेक चित्रों के माध्यम से दर्शाया गया है। इस नगर से अंजान व्यक्ति उन चित्रों को देखे तो उसको मालूम ही ना हो कि वे किसके चित्र हैं। उनका क्या महत्व है। क्योंकि इन चित्रों के नीचे ऊपर कुछ लिखा ही नहीं। बस चित्र लगा दिये। सबसे हैरानी की बात तो ये कि इन चित्रों में दर्शन कोडा चौक का चित्र तो है। केदार जी भी हैं।  लेकिन महाराजा गंगा सिंह का नाम कहीं नहीं है। जिनके नाम पर श्रीगंगानगर की स्थापना की गई थी। जब नगर को बसाने वाले का चित्र ही नहीं तो फिर महात्मा गांधी,भगत सिंह,बी आर अंबेडकर,बीरबल चौक, लाल बहादुर शास्त्री की अलग अलग स्थानों पर लगी प्रतिमाओं के चित्र वेबसाइट पर लगाए जाने की कल्पना करना ही मूर्खता है। दर्शन कोडा का इतिहास बताओ....कौन रोकता है?लेकिन महाराजा गंगा सिंह,भगत सिंह,महात्मा गांधी....के बारे में जानकारी देने में कोई हर्ज है क्या! राजस्थान की सबसे बड़ी निर्यातक इकाई विकास डब्ल्यूएसपी का कहीं नाम नहीं है। होटल की लिस्ट बहुत पुरानी है। श्रीगंगानगर में लगातार क्या बदलाव हुए या हो रहें हैं। इसके बारे में दो चार पांच लाइन होती तो थोड़ी जान पड़ती वेबसाइट में। इसकी वजह भी है...वह यह कि नगर के दक्षिण और पूर्व में प्राइवेट कालोनियों का विकास। जिनको लोग देखने जाते हैं।  वेबसाइट होती ही इसीलिए है कि हजारों मील दूर रहने वाला भी किसी भी विषय के बारे में सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ जान सके। इस सरकारी वेबसाइट की तो बात ही निराली है। कई भागों में विभाजित इस वेबसाइट के माध्यम से लोग प्रशासन के बारे में तो संभव है बहुत कुछ जा सकें लेकिन श्रीगंगानगर के बारे में नहीं। शायद इसको अप डेट करने वालों को या तो फुर्सत नहीं। फुर्सत है तो कोई बताने वाला नहीं। या फिर किसी को प्रशासन से अधिक किसी में रुचि नहीं। हां,अब समाचार प्रकाशित होने के बाद इस और कोई गंभीरता दिखाई जाए तो बात अलग है।

Sunday, September 9, 2012

रिश्ते! कभी गुड़ से मीठे कभी नीम से कड़वे


श्रीगंगानगर-इंसान हूं। दिल कमजोर है। कई बातें अंदर को झकझोर देती हैं। दिलो दिमाग में हा-हा कार मच जाता है। घटना सुनने से ही वो सब बाते कल्पना बन के सामने आ खड़ी होती हैं जो आँखों ने देखी नहीं होती। मन यह सोचने के सिवा कुछ नहीं कर पाता की क्या ऐसा भी होता है। होता है तभी तो हुआ....फिर भी जिंदा हैं हम।  क्योंकि मरे नहीं हैं। ये कहना बेमानी है कि ऐसी जिंदगी का क्या मतलब....ऐसी जिंदगी का भी कोई अर्थ है। है, ऐसी ज़िंदगी का मतलब भी और अर्थ भी। लेकिन ये सभी को कहाँ दिखता है। आसान ज़िंदगी तो सभी जी लेते हैं। ऐसे भी तो हों जो मुश्किलों में से ज़िंदगी को निकालते और जीते हैं। बात ऐसे ही शुरू नहीं की। एक युवती है पूरे दिनों से। कई माह से पीहर में।पता नहीं क्या हुआ उसके साथ पति से इस हद तक नफरत करती है कि उसका नाम तक भी लेना नहीं चाहती। किन्तु वाह रे भारतीय नारी....इसके बावजूद उसकी खुशी की दुआ करती है। बच्चे ने समय पर होना ही है.....माँ की गोद तो होगी...पिता का दुलार कब मिलेगा, क्या पता। अच्छे घर की बहू अपनी छोटी सी बेटी को ले पीहर जा बैठी। गई थी सामान्य रूप से अब आना नहीं चाहती।  ससुराल में सुबह से लेकर शाम तक जो भी करना वह फोन पर माँ से पूछ कर। कैसे रहना है ....यह उसको माँ समझती। पति से कैसे बर्ताव करना है यह माँ  सिखाती। ससुराल वालों ने समझाया तो बस.....ना आती है....ना कुछ नक्की होता है। हो गई मुश्किल, एक परिवार को नहीं,लड़का –लड़की दोनों के परिवारों को। सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है। बच्चों की ज़िंदगी का सवाल है। नाव बीच में हैं। इस किनारे लगे या उस किनारे। बीच में रहेगी तो सौ प्रकार की आशंका। कोई बड़ी भयानक लहर नाव को उलट-पलट ना दे। समुद्री जीव जन्तु का ग्रास ना बन जाएं। किनारे पर पहुँचने की बजाए कहीं रास्ता भटक कर ऐसे ही ज़िंदगी की शाम हो जाए। इस प्रकार की स्थिति में सुखद कल्पना नहीं होती...आशंकाएं ही रह रह कर दिमाग में आती हैं। सकारात्मक सोच की फिलोसफ़ी यहां फेल हो जाती है। तीसरी बात सुनो....सालों से पति-पत्नी परिवार के साथ रहते हैं। विडम्बना,विवशता देखो कि दोनों के विचार पहले दिन से नहीं मिले। पसंद जुदा। सोच भिन्न। इसके बावजूद एक ही छत्त के नीचे घर में रहते हैं। सामाजिक ज़िम्मेदारी भी निभाते हैं और घर भी चलाते हैं। रिश्ते कभी गुड से भी मीठे और कभी नीम  से अधिक कड़वे। जिंदगी चल रही है। क्योंकि यह समाज है। सामाजिक बंधन निभाने पड़ते हैं। इसलिए नहीं कि हम मजबूर हैं। कोई और रास्ता भी नहीं।  इसलिए भी कि हमारे साथ हमारे परिवार,रिश्तेदार को भी समाज में रहना है। जिंदगी को जीना है। रिश्तो को बीच में तोड़ कर,छोड़ कर जी तो सकते हैं किन्तु वह ज़िंदगी अधूरी होती है। एक से नाता तोड़ दूसरे से जोड़ कर भी जिंदगी को जिया जाता है किन्तु उसके साथ पुरानी ज़िंदगी का साया साथ चलता है। जो ना जीने देता है और ना मरने। अब पति-पत्नी के झगड़े निपटाए भी कौन। खुद ही निपटा सकते हैं। देर कितनी लगती है। बस कोई एक कदम बढ़ा दे तो बात बन जाए। यही एक कदम मुश्किल हो जाता है बढ़ाना। क्योंकि अहम बहुत दूर जो ले आया है। ये बेशक घर घर की कहानी नहीं होगी....लेकिन हमारे आस पास ऐसी अनेक कहानियां बिखरी हैं। जिनको समेटने वाला आज कोई मुखिया किसी गली में नहीं रहता। “कचरा”पुस्तक की लाइन है--- तुम करते रही दिल्लगी ,हम लुटाते रहे प्यार ,मैं तो नादां था चलो ,तुमने भी तो नहीं किया इंकार।