संवेदनशील कवि की दो लाइन से बात आरम्भ करते हैं-प्रश्नोत्तर चलते रहे,जीवन में चिरकाल,विक्रम मेरी जिन्दगी,वक्त बना वेताल। ये पंक्तियां देश के आम आदमी को समर्पित हैं। उस आदमी को जिसे मैं तब से जानता हूँ जब से अखबार पढना शुरू किया था। आम आदमी!मतलब,जो किसी को नहीं जानता हो और कोई खास आदमी उसको ना पहचानता हो। अपने काम से काम रखने को मजबूर। ना साधो से लेना न माधो का देना। पीपली लाइव के नत्था से भी गया गुजरा। इसी फिल्म के उस लोकल पत्रकार से भी गया बीता। जिसकी मरने के बाद भी पहचान नहीं होती। देश के न्यूज़ चैनल्स में तो यह लापता है, हाँ कभी कभार प्रिंट मीडिया के किसी कौने में जरुर इसके बारे में पढ़ने को मिल जाता है। इन दिनों ऐसे ही एक आम आदमी से साक्षात मिलने का मौका मिला। जिस पर एक कवि की ये लाइन एक दाम फिट है--एक जाए तो दूसरी मुश्किल आए तुरंत,ख़त्म नहीं होता यहां इस कतार का अंत।
आम आदमी ने अपना कर्म करके कुछ रकम जोड़ी, पांच सात तोला सोना बनाया। सोचा, घर जाऊंगा ले जाऊंगा। परिवार के काम आयेंगे। बहिन की शादी में परेशानी कम होगी। घर जाने से पहले ही चोर इस माल को ले उड़ा। थाने में गया, परन्तु मुकदमा कौन दर्ज करे? चलो किसी तरह हो गया तो चोर के बारे में बताने,उसे पकड़ने की जिम्मेदारी भी इसी की। घर में इतना सामान क्यों रखा? इस बारे में जो सुनना पड़ा वह अलग से। मोहल्ले वालों ने बता दिया। इस बेचारे ने समझा दिया। पुलिस पुलिस है, समझे समझे,ना समझे ना समझे। बेचारा आम आदमी क्या कर सकता है। जिस पर शक है वह मौज में है। इसी मौज में वह वहां चला जायेगा जिस प्रदेश का वह रहने वाला है। आम आदमी अब भी कुछ नहीं कर पा रहा बाद में भी कुछ नहीं कर पायेगा।
पेट काट कर सरकारी कालोनी में भूखंड लिया। सोचा मकान बना लूँ। बैंक आम आदमी के लिए होता है। यह सोचकर वह वहां चला गया उधार लेने। किसी ने एक लाख उधार पर साढ़े तीन हजार मांगे किसी ने तीन हजार। कोई जानता नहीं था इसीलिए किसी ने उसकी सूनी नहीं, मानी नहीं। यह रकम देनी पड़ी। लेकिन मकान का निर्माण इतनी आसानी से तो शुरू नहीं हो सकता ऐसे आदमी नक्शा बनना पड़ेगा। वह पास होगा। तब कहीं जाकर आदमी मकान की नीव भर सकता है। सरकारी कालोनी थी। कब्ज़ा पत्र लिया था। वह गुम हो गया नक्शा पास करवाने की जो फाइल ऑफिस में थी वह ऑफिस वालों से इधर उधर हो गई। सरकारी,गैर सरकारी जितनी फीस लगती है उससे डबल फीस देनी पड़ी। अब यह क्या जाने की किस काम के कितने दाम लगते हैं। कई दिन तक घर ऑफिस के बीच परेड होती रही, काम नहीं हुआ। होता भी कैसे आम आदमी जो ठहरा। उस पर आवाज ऐसी मरी मरी जैसे कोई जबरदस्ती बुलवा रहा हो। यह तो उसकी कई दिनों की कहानी है। टटोले तो अन्दर और भी दर्द हो सकते हैं। मगर हमें क्या पड़ी है। ऐसे आदमी का पक्ष लेने की जिसको कोई नहीं जानता। उस से जान पहचान करके भी क्या फायदा! देश में पता नहीं ऐसे कितने प्राणी है जो इस प्रकार से अपने दिन कटते हैं। इसके लिए तो यही कहना पड़ेगा--कैसे तय कर पायेगा, वो राहें दुशवार,लिए सफ़र के वास्ते, जिसने पाँव उधार। नारायण नारायण।
Thursday, August 26, 2010
Tuesday, August 24, 2010
बसंत को पतझड़ समझते हैं
अपनों के बीच
बेगाने की तरह
रहता हूँ,
कोई क्यों जाने
क्या क्या
सहता हूँ,
वो पतझड़
समझते हैं
जो
बसंत कहता हूँ।
बेगाने की तरह
रहता हूँ,
कोई क्यों जाने
क्या क्या
सहता हूँ,
वो पतझड़
समझते हैं
जो
बसंत कहता हूँ।
Sunday, August 22, 2010
चाहिए आशीर्वाद बेटी के लिए
Monday, August 16, 2010
पीपली लाइव के संग दो घंटे

आजादी की ६३वी सालगिरह,सावन की बरसात,दोस्त के साथ, चले गए पीपली लाइव देखने। सालों बाद किसी फिल्म को थियेटर में देखने का मन बना था। बनना ही था। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने इसकी इतनी बल्ले बल्ले की कि हमें ऐसा लगा अगर पीपली को नहीं देखा तो हमारा जीना ही बेकार हो जायेगा। लोग ताने मार मार के हमें जिन्दा ही मार देंगे। अंत देखकर यही सोचा कि क्यों आ गये इसे देखने। सब कुछ ठीक था। मीडिया जो असल में करता है वह तो फिल्म में जानदार शानदार और दमदार तरीके से दिखाया गया है। लेकिन आखिर में मीडिया को क्या हो जाता है। वह ऐसा तो नहीं है कि उसे पता ही ना लगे कि मरने वाला नत्था नहीं लोकल पत्रकार है। पोस्ट मार्टम के दौरान भी पहचान नहीं हुई कि मरने वाला नत्था नहीं है। जबकि दोनों के पहनावे, बदन की बनावट में काफी अंतर था। इससे भी कमाल तो ये कि "नत्था" की लाश को ख़बरों में दिखाने से पहले ही मीडिया छूमंतर हो गया। ऐसा होता नहीं है। मुझे तो लगता है यह फिल्म किसान की स्थिति पर नहीं मीडिया के प्रति दिल में छिपी कोई भड़ास निकालने के लिए है। इसमें कोई शक नहीं कि लोकल लेवल की किसी बात का बतंगड़ इसी प्रकार बनता है। मगर ये नहीं होता कि किसी को पता ही ना लगे कि मरने वाला नत्था था या कोई ओर। जिस तमन्ना से फिल्म देखने और दिखाने ले गए थे वह पूरी नहीं हुई। लेकिन फिर भी दो घंटे तक दर्शक इस उम्मीद के साथ थियेटर में बैठा रहता है कि कुछ होगा और फिल्म ख़त्म हो जाती है। समस्या के साथ समाधान भी होता हो अच्छा होता।
Thursday, August 12, 2010
बड़ी खबर सात दिन बाद आई
बात की शुरुआत रहीम जी के दोहे से करते हैं। वे कहते हैं, अब रहीम मुश्किल परी, कैसे काढ़े काम, सांचे से तो जग नहीं,झूठ मिले ना राम। कई घंटों से मन दुविधा में है। सात दिन पहले शराब,पोस्त के ठेकेदार,बिल्डर, कोलोनाइजेर, सत्ता के गलियारों में ख़ास पहुँच रखने वाले अशोक चांडक ने लगभग तीन दशक पुराने मामले में कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण किया। कोर्ट ने उसको केन्द्रीय कारागृह भेज दिया। दुविधा चांडक के जेल जाने की नहीं है। दुविधा ये कि यह खबर कल शाम से पहले मिडिया से गायब रही। चांडक की खबर तब थोड़ी सी छापनी पड़ी जब इसी मामले में सीनियर वकील पीडी लूथरा ने कल कोर्ट के सामने सरेंडर किया। श्रीगंगानगर के मिडिया की गिनती ताकतवर मिडिया में होती है। ये तो मानने को दिल नहीं कहता कि ये खबर मिडिया को पता नहीं लगी होगी। ये समझ से परे है कि आखिर ऐसी कौनसी बात थी जो मिडिया ने एक लाइन भी नहीं दी कि अशोक चांडक ने सरेंडर कर दिया। बस दुविधा यही है। अख़बार में क्या प्रकाशित होगा,टीवी में कौनसी खबर दिखाई जाएगी, इसमें आम आदमी की कोई भागीदारी नहीं होती। संपादक,मालिक की मर्जी है, वह जो चाहे छापे, दिखाए , नहीं इच्छा तो ना प्रकाशित करे न दिखाए। कोई कुछ नहीं कर सकता सिवाए यह सोचने के कि ये खबर छपी क्यों नहीं? जब छोटी छोटी ख़बरें कवर करने के लिए बड़ी संख्या में प्रेस फोटोग्राफर, कैमरा मैन पल भर में मौके पर पहुँच जाते हैं तो ऐसा क्या हुआ कि एक भी रिपोर्टर कोर्ट, कचहरी या जेल के आस पास नहीं पहुँच सका। मिडिया का प्रबंधन कैसा है ये वो जाने जिनका वो घराना है। हाँ ये सच है कि अशोक चांडक का मैनेजमेंट जबरदस्त है कि उसने अपने सरेंडर की खबर को हवा तक लगने नहीं दी।
१३ अगस्त १९८२ को श्रीगंगानगर के सैसन जज रणवीर सहाय वर्मा ने अशोक चांडक,पीडी लूथरा,जसजीत सिंह और सुनील भाटिया को कातिलाना हमले का मुजरिम करार देकर चारों को चार चार साल की कैदे बामशक्कत की सजा सुनाई थी। सैसन जज के इस निर्णय के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील करीब २७ साल तक लंबित रही। १३ जनवरी को हाई कोर्ट ने अपील ख़ारिज करते हुए निचली अदालत का फैसला बहाल रखा था। गत २८ सालों में अशोक चांडक और पीडी लूथरा ने अपने अपने क्षेत्रों में काफी नाम और दाम कमाया। आज दोनों जेल में हैं।
१३ अगस्त १९८२ को श्रीगंगानगर के सैसन जज रणवीर सहाय वर्मा ने अशोक चांडक,पीडी लूथरा,जसजीत सिंह और सुनील भाटिया को कातिलाना हमले का मुजरिम करार देकर चारों को चार चार साल की कैदे बामशक्कत की सजा सुनाई थी। सैसन जज के इस निर्णय के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील करीब २७ साल तक लंबित रही। १३ जनवरी को हाई कोर्ट ने अपील ख़ारिज करते हुए निचली अदालत का फैसला बहाल रखा था। गत २८ सालों में अशोक चांडक और पीडी लूथरा ने अपने अपने क्षेत्रों में काफी नाम और दाम कमाया। आज दोनों जेल में हैं।
Wednesday, August 11, 2010
डाकू जी को सादर प्रणाम
नॉएडा की एक महिला अपने पति को डाकुओं के गढ़ से वापिस ले आई।
महिला की हिम्मत को स्वतंत्रता दिवस का सलाम। खबर यही होती तो भी बहुत था लेकिन इसके साथ तो एक और बड़ी खबर है जो हमें सोचने को मजबूर कर देती है। खबर यह कि डाकू ने महिला का चरण स्पर्श किये, उसको शगुन के ५१०० रूपये दिए। इस दौरान उसकी आँखे भर आई। अब डाकू को डाकू जी कहना पड़ेगा। जो कुछ डाकू जी ने किया वह तो हमारे नेता भी नहीं करते। डाकू ने बीहड़ में रहकर रिश्तों को नए तरीके से परिभाषित कर दिया। फिरौती लेकर अपने धंधे के प्रति ईमानदारी रखी और घर आई महिला का सम्मान कर भारतीय संस्कारों को मान दिया। बुराई में रहकर इतना बढ़िया आचरण! जिनसे उम्मीद होती है उनके कदम तो डगमगा जाते हैं और जिनसे कोई उम्मीद नहीं होती वे समाज के लिए उदाहरण पेश कर देते हैं। सावित्री के साथ भी तो यमराज ने ऐसा ही किया था। उसके पति के प्राण के साथ साथ उसको अपने वरदानों के साथ विदा किया था यमराज ने। हमारा मकसद किसी की किसी के साथ तुलना करना नहीं है। तुलना तो किसी की किसी के साथ हो ही नहीं सकती। काश! हमारे देश के नेता, अफसर इस डाकू से कुछ आदर्श,प्रेरणा,संस्कार लेकर देश की जनता के बारे में सोचे। नारायण नारायण।
महिला की हिम्मत को स्वतंत्रता दिवस का सलाम। खबर यही होती तो भी बहुत था लेकिन इसके साथ तो एक और बड़ी खबर है जो हमें सोचने को मजबूर कर देती है। खबर यह कि डाकू ने महिला का चरण स्पर्श किये, उसको शगुन के ५१०० रूपये दिए। इस दौरान उसकी आँखे भर आई। अब डाकू को डाकू जी कहना पड़ेगा। जो कुछ डाकू जी ने किया वह तो हमारे नेता भी नहीं करते। डाकू ने बीहड़ में रहकर रिश्तों को नए तरीके से परिभाषित कर दिया। फिरौती लेकर अपने धंधे के प्रति ईमानदारी रखी और घर आई महिला का सम्मान कर भारतीय संस्कारों को मान दिया। बुराई में रहकर इतना बढ़िया आचरण! जिनसे उम्मीद होती है उनके कदम तो डगमगा जाते हैं और जिनसे कोई उम्मीद नहीं होती वे समाज के लिए उदाहरण पेश कर देते हैं। सावित्री के साथ भी तो यमराज ने ऐसा ही किया था। उसके पति के प्राण के साथ साथ उसको अपने वरदानों के साथ विदा किया था यमराज ने। हमारा मकसद किसी की किसी के साथ तुलना करना नहीं है। तुलना तो किसी की किसी के साथ हो ही नहीं सकती। काश! हमारे देश के नेता, अफसर इस डाकू से कुछ आदर्श,प्रेरणा,संस्कार लेकर देश की जनता के बारे में सोचे। नारायण नारायण।
Tuesday, August 10, 2010
तीज पर झूला
श्रीगंगानगर के गुप्ता बाल भारती स्कूल में तीज उत्सव के दौरान झूला झूलती लड़कियां। स्कूल में हर साल तीज उत्सव मनाया जाता है।
Sunday, August 1, 2010
रिमझिम रिमझिम बूंदे पड़ती
---- चुटकी----
रिमझिम रिमझिम
बूंदें पड़ती
ठंडी चले
बयार रे,
आजा अब तो
गले लग जा
छोड़ सभी
तकरार रे।
-----
आज फ्रेंडशिप डे है।
रिमझिम रिमझिम
बूंदें पड़ती
ठंडी चले
बयार रे,
आजा अब तो
गले लग जा
छोड़ सभी
तकरार रे।
-----
आज फ्रेंडशिप डे है।
Saturday, July 31, 2010
हंगामा,तोड़फोड़ और कारोबार
प्राइवेट हॉस्पिटल के अन्दर बाहर हंगामे की खबर चंद पलों में ही शहर की हवा में घुल गई। गली,नेशनल हाई वे, गाँव, शहर के छोटे बड़े ,नामी बेनामी नेता हॉस्पिटल पहुँच गए। उनके आगे पीछे आये मीडिया कर्मी। हॉस्पिटल कैम्पस में स्ट्रेचर। उस पर एक पूरी तरह से ढका हुआ एक शव। स्ट्रेचर के निकट दर्जन भर लोग लुगाई। रोना पीटना, हल्ला गुल्ला। नेताओं के पहुंचते ही माहौल गरमा गया। प्रतीकात्मक तोड़ फोड़ हुई। मीडिया कर्मी जुट गए अपने काम में ,नेता अपने।फोटो,बातचीत,कमेन्ट,तर्क- वितर्क के साथ कुतर्क भी। तमाशबीनों की भीड़ आ डटी। पोलिसे अधिकारी भी आ गए दल बल के साथ। नगर के जाने माने नागरिक, डाक्टर के रिश्तेदार, मित्रों ने भी आना ही था। ऐसे मामले में नेताओं से वार्ता करने वाले भी आ गए, बुला लिए गए। नेताओं ने स्ट्रेचर के निकट खड़े लोगों से जानकारी ली और डाक्टर व उसके स्टाफ को दोषी करार देकर उनकी गिरफ्तारी की मांग कर डाली। मध्यस्थों ने डाक्टर से बात की। डाक्टर का कहना था कि उसने इनमे से किसी का या उसकर रिश्तेदार का इलाज नहीं किया। ना हॉस्पिटल में किसी की इलाज के दौरान मौत हुई है। लेकिन डाक्टर की बात सुनाने वाला वहां कोई नहीं था। डाक्टर की सफाई के बाद हंगामा और बढ़ गया। नारेबाजी में अधिक जोर लगा, तोड़ फोड़ फिर हुई। मीडिया कर्मियों को नए सीन मिले। पुलिस अलर्ट हुई। तमाशबीन थोडा पीछे हते, हटाये गए। कई घंटे इसी प्रकार गुजर गए। सयाने आदमी आगे आये। भीड़ से डाक्टर के प्रति कमेंट्स आने लगे। समझौता वार्ता आरम्भ हुई। माइक लग गया। नेता गला साफ करने लगे। हॉस्पिटल में जो भर्ती थे वे हाथों में ग्लूकोज की बोतल, पेशाब की थैली पकडे कहीं ओर चले गए। हॉस्पिटल में नेताओं ओर उनके समर्थकों का कब्ज़ा था। स्ट्रेचर के आस पास जितने लोग लुगाई शुरू में दिखे वे अब वहां नहीं थे। लम्बी वार्ता के बाद समझौता हो गया। डाक्टर आइन्दा लापरवाही नहीं करेगा। जो कुछ हुआ उसकी माफ़ी मांगेगा। पीड़ित पक्ष थाना में अर्जी देगा तो मुकदमा दर्ज किया जायेगा। वे चाहे तो पोस्टमार्टम करवा ले, पुलिस दवाब नहीं डालेगी। नेताओं ने माइक पर समझौते का ऐलान करते हुए अन्य अस्पतालों को सावचेत किया। अब शुरू हुआ शव के परिजनों को माइक पर बुलाने की कोशिश। किसी को मालूम ही नहीं था कि परिजन कौन है? शव किस का है? आदमी का या महिला का? तलाश आरम्भ। हॉस्पिटल की फाइल देखी गई। हर किसी की जुबान पर यही था कि शव को छोड़ कर उसके परिजन कहाँ चले गए ? एक दूसरे से पूछा , कोई जानता हो तो बताये । पुलिस हैरान। हॉस्पिटल का मालिक डाक्टर उनसे अधिक परेशान हैरान। पुलिस का कम बढ़ गया। वह आगे आई। अम्बुलैंस बुलाई गई। स्ट्रेचर से लाश उठाकर जब अम्बुलैंस में राखी जाने लगी तो हवा से कपड़ा क्या उड़ा कि साथ में सबके होश भी उड़ गए। वह कोई इंसानी लाश नहीं पुतला था। नया बखेड़ा खड़ा हो गया। नेता समझौता करवा के जा चुके थे। धीरे धीरे तमाशबीन भी चले गए। पुलिस, डाक्टर और उसके परिजन ही बाकी बचे थे। पुलिस पुतले को देख रही थी और डाक्टर अपने हॉस्पिटल तथा सबके सामने कटी जेब को। उन्होंने किसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने से इंकार कर दिया। पुलिस पुतले का क्या करती! वहीँ सड़क पर फैंक कर लौट गई। पुतला पता नहीं कब तक सड़क पर पड़ा रहा।
एक काल्पनिक घटनाक्रम।
एक काल्पनिक घटनाक्रम।
लेबल:
एक काल्पनिक घटनाक्रम।
Friday, July 30, 2010
Thursday, July 29, 2010
मंत्री केंद्र के,मन में राजस्थान
केंद्र सरकार के मंत्री हैं श्री सीपी जोशी। इनके पास ग्रामीण विकास और पंचायत राज विभाग है। केंद्र के मंत्री के नाते इन पर पूरे देश की जिम्मेदारी है। लेकिन हाय रे मन! इनका अधिक समय राजस्थान में बीतता है। २००८ में इनको राजस्थान में मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जाता था। केवल एक वोट से चुनाव हार गए। उसके बाद इनको भीलवाड़ा से लोकसभा का चुनाव लड़वाया गया। जीतने के बाद केंद्र में मंत्री बन गए। ऐसा लगता है कि जितना समय इन्होने मंत्री के रूप में अपने ऑफिस में नहीं बिताया होगा उतना राजस्थान में बिता दिया। राजस्थान के अख़बार देख लो आप को पता लग जायेगा कि जोशी राजस्थान के किस हिस्से में हैं। अख़बार में ना हो तो ई टीवी राजस्थान देख लेना, आपको उनकी पल पल की खबर मिल जाएगी। शायद ही कोई दिन ऐसा होगा जब ये मंत्री राजस्थान में ना होते हों। इनके पास राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी है। जोशी जी को चाहिए तो ये कि वे देश के ग्रामीण इलाकों का भ्रमण कर वहां के हालत देखें, किन्तु मन का क्या करे। वह तो राजस्थान में पड़ा हुआ है, मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहा है। सपने देखना तो अच्छी बात है, देखो, मगर उनके सपने तो पूरे करो जिनका मंत्रालय आपके पास है जनाब। आज जोशी जी का जन्मदिन है। उनको इस ये संकल्प लेना चाहिए कि वे आज से राजस्थान के साथ साथ देश भर के ख्याल करेंगे, उन गांवों की संभाल करेंगे, जिनके बारे में ये कहा जाता है वहां असली हिन्दूस्तान रहता है। ये ऐसा नहीं करते तो फिर सोनिया मैडम को कुछ करना चाहिए।
Friday, July 23, 2010
आदर्श ग्राम योजना में सरपंच नहीं
केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना का शुभारम्भ आज श्रीगंगानगर जिले के १८ बीबी गाँव में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत,केंद्र के ग्रामीण विकास मंत्री सी पी जोशी और सामाजिक न्याय मंत्री मुकुल वासनिक ने किया। मंच पर राज्य के कई मंत्री, विधायक, चुनाव में हारे हुए कांग्रेस नेता सहित अनेक लोग थे। लेकिन विडम्बना ये थी कि समारोह में इस गाँव की सरपंच मौजूद नहीं थी। यहाँ की सरपंच महिला है। यूँ तो सभी महिलाओं के बारे में बड़ी बड़ी बात करते हैं लेकिन आयोजकों ने उस गाँव की सरपंच को भी बुलाना उचित नहीं समझा जिस गाँव को आदर्श ग्राम योजना के लिए चुना गया और जिसका शुभारम्भ करने के लिए राजस्थान के मुख्यमंत्री खुद यहाँ आये। पता नहीं कांग्रेस का यह कैसा पंचायती राज है। गाँव में इतना बड़ा कार्यकर्म हो और गाँव की संसद की मुखिया को बुलाया तक नहीं गया तो फिर कोई क्या कहे।
Thursday, July 15, 2010
बूढों की जवान प्रेम कहानी
एक बार बूढे दम्पति घर में अकेले बैठे अपने पुराने दिनों की यादें तजा कर रहे थे। अचानक वृद्ध पति बोला--चलो कहीं डेट पर चलते हैं। जैसे जवानी में जाते थे। पत्नी बड़ी रोमांचक अंदाज में बोली--हाँ बहुत आनंद आएगा। दम्पति ने स्थान तय किया। निश्चित तिथि पर पति उस स्थान पर पहुँच गया। पत्नी नहीं आई। पांच मिनट,दस मिनट, पंद्रह मिनट, आधा घंटा, एक घंटा और फिर दो घंटे बाद भी पत्नी नहीं आई तो पति उदास हो गया। घर आया तो देखा पत्नी सोफे पर उदास सी बैठी है। पति को गुस्सा आ गया, बोला - कमाल करती हो, तुम आई क्यों नहीं? पत्नी शरमा कर बोली- मम्मी ने आने ही नहीं दिया।
Monday, July 12, 2010
सबकी जड़ें हिल जाएँगी
कल रात को स्टार न्यूज़ पर एक परिचर्चा हो रही थी। विषय, विषय तो ऑक्टोपस बाबा के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता था। उसमे कई ज्योतिषविद ,तर्क शास्त्री और वैज्ञानिक भाग ले रहे थे। चैनल का खेल संपादक उसका संचालन कर रहा था। सबकी अपनी अपनी राय, तर्क,कुतर्क थे। इसमें एक बात बड़ी जोरदार थी। जैसे ही संचालक किसी ज्योतिषाचार्य को अपनी बात कहने के लिए माइक देता, स्टूडियो में काम करने वाला एक बड़ा पत्रकार [ शायद ] आकर जबरदस्ती उससे माइक लेकर अपनी बात कहने लगता। बात भी पूरी गुस्से में कहता। एक बार नहीं ऐसा बार बार हुआ। परिचर्चा का संचालन करने वाला उसको बुलाता या नहीं वह आ जाता। ज्योतिषाचार्य अपनी बात शुरू भी नहीं कर पाते कि वह टपक पड़ता। संचालक भी उसको ऐसा करने से रोक नहीं रहा था। जब चैनल ने उनको बुलाया है, अपनी बात कहने के लिए तो उनको अपना कथन पूरा ना करने देना कहाँ की सभ्यता है। फिर ऐसे कार्यकर्म में तथाकथित नास्तिकों को हिन्दू धर्म, देवी देवताओं, उनसे जुड़ी मान्यताओं को गाली निकालने का खुला मौका मिल जाता है या ये कहें कि दिया जाता है।। गलत को गलत कहना बुरी बात नहीं लेकिन केवल अपनी ही बात को सच साबित करने के लिए जोर से बोलना, दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुँचाना कौनसा वैज्ञानिक तथ्य है। चैनलों पर बैठ कर हिन्दुओं, देवी-देवताओं को अपमानित करने वाले इस प्रकार से किसी और धर्म के बारे में एक शब्द भी बोल कर दिखाएँ। चैनल से लेकर सरकार तक की जड़ें हिल जाएँगी। बात कहने वालों का चैनल से बाहर आना मुश्किल हो जायेगा। आप सच्चें हैं, आपका तर्क वैज्ञानिक कसौटी पर खरा है। मगर चैनल वाले ने जिस को बुला रखा है वह भी तो कुछ ज्ञान रखता होगा। मेरी इस पोस्ट से भी ऐसे नास्तिकों के पेट में मरोड़ उठेगी। चलो ठीक है पेट साफ हो जायेगा। ऐसी वार्ता संचालन करने वालों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि स्टाफ को कोई बन्दा यूँ किसी की बात को ना काटे। अगर उसको बुलाना मज़बूरी है तो उसको भी परिचर्चा में शामिल कर लो। जिस से बीच बीच में माइक छीन कर वह किसी का अपमान ना कर सके। तर्क शास्त्रियों पर भी किसी धर्म की निंदा करने पर रोक होनी चाहिए। आप समालोचना करो, तर्क से अपने कथन की सार्थकता सिद्ध करो, ये क्या कि जब कोई बस ना चले तो आपे से बाहर होकर किसी का अपमान करना शुरू कर दो। ताकि दूसरा कोई जवाब ही न दे सके। नारायण,नारायण।
Sunday, July 11, 2010
Saturday, July 10, 2010
Thursday, July 8, 2010
सरकार से भी बड़ा डीएम
श्रीगंगानगर के डीएम आशुतोष एटी पेडणेकर राज्य सरकार के मंत्रियों,बड़े अफसरों से भी बहुत बड़े पद के हैं। इसी कारण उन्होंने अपने पास आने जाने वालों पर निगाह रखने के लिए पांच सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं। इनकी नजर से बचना बहुत ही मुश्किल है। एक अफसर के लिए इतने कैमरे दिल्ली में भी नहीं होंगे। डीएम से मिलने के लिए छोटा सा वेटिंग रूम है। वहां दो कैमरे हैं। एक वहां बरामदे में है जहाँ से वोटिंग रूम में दाखिल होते हैं। एक बरामदे से बाहर। इसके अलावा एक कैमरा उनके निजी सचिव के कमरे के बाहर है। इतने सीसीटीवी कैमरे जयपुर में किसी मंत्री,अधिकारी के ऑफिस या घर में नहीं मिलेंगे। पता नहीं डीएम को किस से क्या डर है जो इतने कैमरे लगाने की जरुरत पड़ी। डीएम इस बारे में कुछ भी नहीं कहते।
एक बात और, नव दम्पति विवाह का पंजीयन करवाने के लिए डीएम [मैरीज रजिस्ट्रार ] के समक्ष पेश होते हैं। ये जोड़े वहां से कोई अच्छी याद अपने साथ लेकर नहीं जाते। पेडणेकर जी पहले तो उनको लम्बा इंतजार करवाते हैं। जोड़े इंतजार के दौरान वहां आने आने वालों की नज़रों से अपने आप को असहज महसूस करते हैं। बहरहाल, युगल जब उनके दरबार में पहुँचते हैं तो डीएम उनसे उनके नाम पता यूँ पूछते जैसे नव विवाहित दम्पति नहीं बंटी-बबली जैसे कोई शातिर मुजरिम हों। या शादी करके उन्होंने कोई गुनाह कर लिया हो। पहले तो इंतजार के कारण मूड ऑफ़ उस पर पुलिसिया स्टाइल की पूछताछ । कोई कुंवारा साथ हो तो शादी करने से तोबा कर ले। साहब जी हमारी सलाह मानो तो ऐसे दम्पतियों को स्नेह से कुर्सी पर बिठाओ,उनका मुहं मीठा करवाओ। मिठाई ना हो तो मिश्री इलायची चलेगी। उनको दूधो नहाओ, पूतो फलो का आशीर्वाद दो। फिर देखो। कहने को तो ये केवल बात है। आपके मुहं से निकलेगी तो उनके लिए सोगात हो जाएगी। वे बाहर आकर हर जगह आपके गीत गायेंगे। अपने बच्चों को आपके बारे में बताएँगे। उनका ही नहीं आपका सूना चेहरा भी खिल उठेगा। डीएम जी बड़े वही होते हैं जो बड़ा पन दिखाते हैं। वरना तो बड़े दही में पड़े होते है। जिनको चटकारे लेकर खाया जाता है।
" कहना है इतना कुछ, मगर कह नहीं सकते,फितरत है अपनी भी चुप रह नहीं सकते।"
एक बात और, नव दम्पति विवाह का पंजीयन करवाने के लिए डीएम [मैरीज रजिस्ट्रार ] के समक्ष पेश होते हैं। ये जोड़े वहां से कोई अच्छी याद अपने साथ लेकर नहीं जाते। पेडणेकर जी पहले तो उनको लम्बा इंतजार करवाते हैं। जोड़े इंतजार के दौरान वहां आने आने वालों की नज़रों से अपने आप को असहज महसूस करते हैं। बहरहाल, युगल जब उनके दरबार में पहुँचते हैं तो डीएम उनसे उनके नाम पता यूँ पूछते जैसे नव विवाहित दम्पति नहीं बंटी-बबली जैसे कोई शातिर मुजरिम हों। या शादी करके उन्होंने कोई गुनाह कर लिया हो। पहले तो इंतजार के कारण मूड ऑफ़ उस पर पुलिसिया स्टाइल की पूछताछ । कोई कुंवारा साथ हो तो शादी करने से तोबा कर ले। साहब जी हमारी सलाह मानो तो ऐसे दम्पतियों को स्नेह से कुर्सी पर बिठाओ,उनका मुहं मीठा करवाओ। मिठाई ना हो तो मिश्री इलायची चलेगी। उनको दूधो नहाओ, पूतो फलो का आशीर्वाद दो। फिर देखो। कहने को तो ये केवल बात है। आपके मुहं से निकलेगी तो उनके लिए सोगात हो जाएगी। वे बाहर आकर हर जगह आपके गीत गायेंगे। अपने बच्चों को आपके बारे में बताएँगे। उनका ही नहीं आपका सूना चेहरा भी खिल उठेगा। डीएम जी बड़े वही होते हैं जो बड़ा पन दिखाते हैं। वरना तो बड़े दही में पड़े होते है। जिनको चटकारे लेकर खाया जाता है।
" कहना है इतना कुछ, मगर कह नहीं सकते,फितरत है अपनी भी चुप रह नहीं सकते।"
Monday, July 5, 2010
मां का आँचल,अगली पीढ़ी
--------------
मां के आँचल
में सोने का सुख
अगली पीढ़ी
नहीं ले पायेगी,
क्योंकि
जींस पहनने वाली
मां आँचल
कहाँ से लाएगी।
मेरे मित्र राजेश कुमार द्वारा भेजा गया एक एस एम एस।
मां के आँचल
में सोने का सुख
अगली पीढ़ी
नहीं ले पायेगी,
क्योंकि
जींस पहनने वाली
मां आँचल
कहाँ से लाएगी।
मेरे मित्र राजेश कुमार द्वारा भेजा गया एक एस एम एस।
Sunday, July 4, 2010
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