Saturday, May 10, 2014

जो सेवक बनने आया उसे शहंशाह बना दिया हमने

श्रीगंगानगर- चुनाव के समय   गली-गली,घर-घर घूम कर जन सेवा के लिए मौका मांग रहे नेता को हम  शहंशाह बना देते हैं.वोटों के लिए लोगों के दरबार में हाथ बांधे खड़े रहने वाले पंच,सरपंच,पार्षद,विधायक,सांसद बनते ही खुद का दरबार लगाना शुरू कर देते हैं.सेवक बनने के लिए आते हैं,शासक बन जाते हैं. ये कसूर उनका नहीं हमारा है. हम तो वोट देने के बाद भूल जाते हैंउनको. हम कभी उनको फोन नहीं करते. उनसे पूछते नहीं. किधर हो? कब आओगे? क्या करोगे? क्या योजना है? क्षेत्र के लिए सदन में क्या बोला? वो मजे से  दरबार लगाते हैं. हम उनको घर बैठे कोसते हैं. पहली बात तो ये कि पता ही नहीं लगता कि नेता कब आते हैं. आ भी जाएं  तो ये चंद लोगों के कब्जे में रहते हैं. कब्ज़ा ना भी हो तो जनता नहीं जाती इनके पास. किसी को दुकान से फुरसत नहीं किसी को नौकरी से. वोट दिया. काम ख़त्म. चूंकि वोटर कभी कुछ कहते नहीं,सवाल जवाब नहीं करते इसलिए नेता भी जनता की परवाह नहीं करते. मनमर्जी करते हैं. होना तो ये चाहिए कि जनता अपने पार्षद से लेकर सांसद तक के टच में रहे. इनको पता होना चाहिए कि जनता जाग रही है. वह हिसाब रखने लगी है उनका. विधायक हो या सांसद,इनसे इनके एक एक दिन का हिसाब मांगा जाए.किधर गए?क्या किया ?किस योजना  पर काम किया जा रहा है? कौनसी नई  योजना लाने की स्कीम है? विकास की क्या प्लानिंग है? कौनसा काम कब तक होगा? नहीं होगा तो क्यों नहीं होगा? एक एक बात पूछनी चाहिए. चैन से मत बैठने दो अपने विधायक और सांसद को. मतदाता कुछ कहते नहीं. बस इसलिए ये उनके बीच रहते नहीं. इनको मजबूर किया जाए जनता के बीच रहने के लिए. उनकी निजता को नुकसान पहुंचाए बिना पूरा हिसाब होना चाहिए उनका. बकरी मरे पर ना आए तो ना आए.अपने परिवार की शादी की शोभा भी बेशक मत बनाओ इनको. परन्तु क्षेत्र से दूर मत रहने दो. संपर्क करो,ताकि बता लगे कि वह बात करता है या नहीं. उसका व्यवहार कैसा है. बात नहीं करता तो उसकी उपेक्षा को सार्वजनिक करो. जन जन तक यह बात पहुंचाओ कि नेता को फोन किया था , उसने बात नहीं की. जब तक जनता  इन पर निगाह नहीं रखेगी, ये नहीं मिलेंगे. रवैया बदलना होगा जनता को अपना खुद का. उसके बाद नेता तो बदल ही जाएगा. मुर्दा रहने से कोई बात नहीं बनती. जिन्दा साबित करो अपन आप को. लाखों नहीं तो हजारों वोटर ही फोन करने लगें इनको तो इनका छिपना मुश्किल हो जाएगा. वरना तो वही होगा जो ये लोग चाहेंगे. बदलाव चाहिए तो एक सप्ताह में दो चार मिनट ही निकाल लो. इनको पुचकारने की बजाए इनको पुकारो. पुकार ना सुने तो लताड़ो. जनता इनकी कर्जदार   नहीं वे जनता के कर्जदार हैं. अपना दिया कर्ज पांच साल में वापिस लो. लेकिन इसके लिए कर्ज का तकादा करना होगा. बिना तकादा किये कोई कर्ज वापिस नहीं करता जी. वो जमाने गए जब लोग खुद कर्ज चुकाते थे. अब तो मांगने पर दे दें वही काफी है. असल में हमारी चुप्पी की वजह से विधायक,सांसद हमारे पालक हो गए.इसीलिए तो दरबार लगाते हैं. असल में होना तो ये चाहिए कि जनता दरबार लगाए.  उसमें विधायक,सांसद आए. जनता के सवालों के जवाब दें. परन्तु विडम्बना देखो कि सेवक कहलाने वाले दरबार लगाते हैं और  जनता अपनी फरियाद लेकर उनके पास जाती है. बस अब ये सिलसिला बंद होना चाहिए. सेवक को सेवक ही रखो. बंद कर दो उसे शहंशाह बनाने की परम्परा. एक बार कर के देख लो. ठीक लगे तो जारी रखना.  वरना बदल देना अगली बार.

Friday, May 2, 2014

तलाक से ज्यादा दहेज़ प्रताड़ना कानून ने तोड़े परिवार



श्रीगंगानगर-दो घटनाओं से बात  शुरू करते हैं. पहली-किसी पुलिस ऑफिसर के पास लड़के का पिता परिचित के साथ फरियाद लेकर आया.उसने बताया कि उसकी पुत्र वधु घर में केवल तीन दिन रुकी.उसके बाद पति के साथ शहर चली गई,जहां दोनों नौकरी करते थे. एक दिन  वापिस आई. ससुराल वालों के खिलाफ मुक़दमा किया. वापिस लौट गई ,पति केपास नहीं, अपनी नौकरी पर. पिता ने कहा, इस मामले में आज तक किसी पुलिस अधिकारी ने उनकी नहीं सुनी. दुखी बेबस पिता वापिस लौट गया. दूसरी-लड़की  की शादी बैंक कर्मी से हुई. दस दिन के बाद ही विवाद.पंचायत हुई. लड़के वालों ने दे दिया जो देना था. मगर विवाद नक्की नहीं हुआ. लड़की ने पंचायतियों पर ही केस कर दिया. इसमें कोई शक नहीं कि  लड़की और उसका परिवार वाले ऐसा करके  सुखी नहीं होंगे. लेकिन लड़के और उनके परिवारों पर भी  क्या गुजर रही होगी, ये भी चिंता के साथ साथ चिंतन और मंथन करने की जरुरत है.ऐसी केवल दो घटना नहीं है. सैकड़ों परिवार इस प्रकार से प्रताड़ित हो रहे हैं. उनका जीना ना जीने  के बराबर हो चुका है.  कसूरवार लड़का. उसकी मां,बहिन,जेठ,जेठानी. लड़के की बहिन शादी शुदा है तो बहनोई भी. ऐसे विवादों में जितनी भी पंचायतें होती हैं,उन सब में लड़के के परिवार को दबाया जाता है.जिन घरों की लड़कियों के नाम थानों तक पहुँच गए,उनका जीना भी क्या जीना. थानों में शर्म,लिहाज,संवेदनशीलता,इज्जत,व्यवहार सब कुछ तार तार कर उसके स्थान पर प्रताड़ना दी जाती है. वह भी ऐसी कि जिसकी कल्पना मुश्किल है. ऐसी जैसी उन्होंने बहु को भी नहीं दी होगी. नारीवादी संगठन भी बहु के पक्ष में झंडा लेकर मैदान में आ जाते हैं. इन संगठनों की नारियों को ये दिखाई नहीं देता कि जिनके खिलाफ हल्ला बोला गया है वे भी नारियां ही हैं. एक नारी को कथित न्याय दिलाने के नाम पर अनगिनत नारियों के साथ अन्याय ही तो होता है. बस हर कोई लड़की के नाम पर लड़के वालों के पीछे लट्ठ लेकर पड़ जाता है. पंचायत भी और पुलिस प्रशासन भी. सब के सब लोगों को यही लगता है कि इस दुनिया में अगर कोई दरिंदे हैं तो लड़के वाले. नारीवादी संगठन,वकील,अदालतें,पंचायतों के ठेकेदार और ऐसे मामलों की जाँच  करने वाले अधिकारियों  को  झांक कर देखना चाहिए इन घरों में,ताकि उनको मालूम हो सके कि उनकी जिंदगी कैसे नरक बानी हुई है जिन पर बहु ने मुकदमे कर रखे हैं.  लोग कैसे तिल तिल कर मर रहे हैं. सामाजिक प्रतिष्ठा तो मिटटी हुई ही इसके साथ साथ कदम कदम जो प्रताड़ना झेलनी पड़ती है उसका तो जिक्र ही नहीं होता. ना जाने कितने लोग तो भुगत रहे हैं और ना जाने कितने ही खामोश हो बहु और उसके परिवार की प्रताड़ना सहने को मजबूर है. बोले तो बहु सबको अंदर करवा देगी. और कुछ ऐसा वैसा कदम उठा लिया तो समझो गए सब के सब अंदर. जितने घर तलाक ने बर्बाद नहीं किये होंगे उतने  अकेले दहेज़ प्रताड़ना  कानून ने कर दिए होंगे.  ससुराल हो या पीहर महिला  की स्वाभाविक,अस्वाभाविक मौत दहेज़ हत्या के खाते में चली जाती है. उसके बाद लड़के वाले तो समझो ख़त्म. उनके समर्थन में कोई नहीं आता. समाज खामोश. कानूनविद बेबस. कानून बनाने वालों को ये सब देखने की जरुरत ही नहीं. वे तो समर्थ हैं. समर्थ को कोई दोष होता नहीं. इस कानून से पहले  महिलाओं की सुरक्षा,इज्जत,ससुराल में मान सम्मान नहीं होता था क्या ! इस कानून से  महिलाओं की कितनी सुरक्षा हुई. उनको समाज में कितना ऊँचा स्थान मिला ,पता नहीं लेकिन ये जरूर है कि घर घर की महिलाएं और पुरुष आतंकित जरूर हो गए इस कानून से. पता नहीं कब ऐसा होगा जब समाज और  कानून बनाने वाले लोग इस बारे में चिंतन कर बरबाद होते घरों को बचने के लिए कुछ सार्थक पहल करेंगे.लड़के वालों को बेखौफ इज्जत से जीने का हक़ देंगे.सच में किसी ससुराल में लड़की को प्रताड़ित किया गया है उसको तू सजा मिलनी ही चाहिए. उनमें से एक भी नहीं बचे. लड़की की ससुराल में नहीं बनी.किसी भी वजह से अड्जस्ट नहीं हो पाई. तो पूरे ससुराल को थाने में ला उनकी और अपने परिवार की मिटटी करने से तो बेहतर है आपस में बैठकर फैसला करना.अंत में होता तो यही फैसला ही है. जब यही फैसला होना है तो फिर  पहले ही क्यों ना कर लिया जाए. लड़की वाले भी सुखी और लड़के वाले भी.दो लाइन पढ़ो--तेरी याद से इश्क का कोई रिश्ता नहीं है, याद तो गैरों की भी आया करती है .

मोहब्बत तो कभी मरने की बात नहीं करती


मोहब्बत तो कभी मरने की बात नहीं करती 
श्रीगंगानगर-किस्सा फेसबुक से. ढाई दशक बाद एक व्यक्ति को महिला का सन्देश मिला, आई लव यू.व्यक्ति हैरान ! महिला ने बताया कि वो तो उससे तभी से मोहब्बत करती है जब शादी नहीं हुई थी. बन्दे को क्या पता. न कभी मिले . ना कभी जिक्र ही आया. फिर अब अचानक,ढाई दशक बाद, जब दोनों के बच्चों तक की शादी हो चुकी है.इक तरफ़ा मोहब्बत चलती रही,पलती रही.है ना मोहब्बत का अनूठा अंदाज. दूसरा,. दोनों की कास्ट अलग. मोहब्बत बे हिसाब. परिवार राजी नहीं. कोशिश की.शादी नहीं हो सकी. अलग अलग हो गए. तीस सालों में एक दो बार जब कभी मिले वैसी ही आत्मीयता वही मोहब्बत. तीसरा, लड़का सवर्ण ,लड़की दूसरी कास्ट की. संयोग ऐसा हुआ कि दोनों परिवारों को शादी करनी पड़ी. लड़की ने अपने आप को उस परिवार में ऐसा ढाला कि क्या कहने. किसी को कोई शिकवा शिकायत नहीं. चौथा,लड़का अपने इधर का. लड़की साउथ की. लड़का शानदार पोस्ट पर. परिवार उस लड़की से शादी करने को राजी नहीं. लेकिन लड़का-लड़की ने शादी कर ली. धीरे धीरे परिवार वालों ने भी उसे बहु के रूप में स्वीकार कर लिया. बहु जब भी पति के साथ छुट्टियों में  इधर आती है ,वह अपने संस्कार,काम और बोल चाल से ससुराल वालों का दिल जीतने की कोशिश करती है. ये किस्से कहानी नहीं हकीकत हैं.सब के सब जिन्दा और खुश हैं अपने अपने घर. परन्तु आजकल का तो प्रेम हो ही बड़ा अनोखा गया. इसमें मरने मारने की बात  पता नहीं कहां से आ गई. आजकल कभी प्रेमी-प्रेमिका के एक साथ मरने की घटना होती है तो कभी प्रेमी द्वारा प्रेमिका को मार देनी की. बड़ा अजीब है उनका प्रेम! साथ मरने का ये मतलब नहीं कि वे मरने के बाद साथ रहेंगे. ये फ़िल्मी डायलॉग है कि नीचे मरेंगे तो ऊपर मिलेंगे. दुनिया ने हमें इधर नहीं मिलने दिया,मरकर उधर मिलेंगे,आदि आदि.इस धरती पर मिलन उसी का होता है जो जिन्दा है. मरने के बाद की तथाकथित दुनिया किसने देखी. जो दुनिया देखी नहीं उसमें मिलने के लिए उस दुनिया से चले जाना जिधर मिलने की संभावना रहती है, कौनसी मोहब्बत हुई. ये तो मोहब्बत नहीं कोई आकर्षण था. मोहब्बत में सराबोर नहीं थे,शारीरिक आकर्षण में डूबे थे. जिन्दा रहोगे तो मिलने की आस रहेगी.मरने के बाद तो कुछ भी इन्हीं. मरने वाले बता नहीं सकते कि लो देखो, हम मर कर  मिल गए और सुखी हैं. भावुकता के अतिरेक में मर तो गए लेकिन उसके बाद!  तुम तो मर गए लेकिन परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा तो मिट्टी कर गए.तुम तो अपने ख्याल में मर कर मिल गए ,मगर परिवार को तो किसी से मिलने-मिलाने लायक नहीं छोड़ा. उन मां-बाप का क्या जो जिन्दा  लाश बन गए.घरमें रहो तो  की दीवारें खाने को आती हैं और बाहर लोगों की बातें तीर की तरह बींधती हैं. तुम तो चले गए,लेकिन बाकी भाई बहिन के रिश्तों पर ग्रहण लग जाता है. रिश्ते तो होंगे  लेकिन उनमें  समझौता अधिक होता होगा. जिसके किसी भाई-बहिन ने इस प्रकार मोहब्बत में जान दी हो,उनसे रिश्ते जोड़ने वाले मुश्किल से ही मिलते हैं. इसके लिए कसूरवार कौन है,ईश्वर जाने. लेकिन ये बड़ी अजीब बात है कि दशकों पहले जब इतना खुलापन नहीं था तब तो लोग मोहब्बत में जीने की बात करते थे. अब जब इण्टर कास्ट शादी आम होने लगी है. तब लड़का-लड़की का मरना हैरानी पैदा करता है. मोहब्बत तो जिंदगी में आनंद भरती है.लोग निराश,हताश,उदास होकर मरने क्यों लगे. ऊपर के किस्सों में दो रस्ते हैं.पहला , परिवार की इच्छा को मान देकर रस्ते बदल लो.मोहब्बत में त्याग को महत्व दो. दूसरा, अपनी परिवार की इच्छा को नजर अंदाज कर अपनी मर्जी करो. होता है जो हो जाने दो. समय की राह देखो, जो सब कुछ ठीक कर देता है. मरने की बात तो मोहब्बत में होनी ही नहीं चाहिए. शायद  पहले मोहब्बत बाजरे की खिचड़ी की तरह होती थी जो धीमी आंच पर धीरे धीरे सीज कर स्वादिष्ट बनती थी. अब तो  मोहब्बत दो मिनट की मैगी स्टाइल हो गई है.बनाओ,खाओ और भूल जाओ. दो लाइन पढ़ो--जीने की नहीं मरने की बात करता है हर वक्त, बड़ा कमजोर हो गया है ये नए दौर का इश्क .

Wednesday, April 2, 2014

पुरुषों को भी मिले महिला सशक्तिकरण का ईनाम

श्रीगंगानगर-"जहां नारी की पूजा होती है,वहीं देवता विराजते हैं." ऐसे वाक्य सदियों से  संसार में कहे,पढ़े  और सुने जाते हैं.हिंदुस्तान में तो धन,बुद्धि और शक्ति की मालिक ही देवियां हैं. श्रीराम से पहले सीता और श्रीकृष्ण से पहले राधा रानी का नाम लिया जाता है. शायद इसलिए ये कहा जाने लगा होगा कि सफल पुरुष के पीछे नारी होती है. मतलब,नारी सृष्टि का मूल आधार है. पुरुष जो कुछ है वह नारी के कारण ही है. हम भी क्यों इंकार करने  लगे. सत्य वचन हैं  सबके सब. शास्त्रों में लिखे ब्रह्म वाक्य हैं. परन्तु ये सब लिखने और साबित करने वालों को क्या पता था कि कलयुग  में कभी श्रीगंगानगर नामक एक शहर होगा. जहां ऐसे अनेक व्यक्ति और  संगठन इन वाक्यों को चुनौती देंगे. इनको अर्द्ध सत्य साबित करेंगे. नो! कोई टेंशन नहीं . कोई झगड़ा टंटा नहीं. किसी प्रकार की प्रतियोगिता भी नहीं. यह सब तो पुरुषों द्वारा महिलाओं को सशक्त करने के लिए किये जा  रहे उनके प्रयास  हैं. महिलाओं को समाज,देश में आगे और आगे बढ़ाने के लिए उनकी लगन और मेहनत  हैं. शहर में  नजर दौड़ाने पर अनेक ऐसे संगठन और महापुरुष दिखाई देंगे जो महिलाओं को भारत के नक़्शे पर स्थापित करने के लिए जी तोड़ प्रयास कर रहे हैं. ऐसे प्रेरणा पुरुष महिलाओं के संगठन बनाते हैं. उनको चलाते हैं. उनके एक से एक प्रोग्राम करवाते हैं. शहर से लेकर प्रदेश स्तर तक उनको सम्मानित करवाते हैं. कोई ऐसा तीज त्यौहार नहीं जब ऐसे प्रकाश पूंज महिलाओं को आगे ना रखते हों. कई बार तो ऐसा लगता है कि प्रशासन,सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए जो कुछ भी करती है वह इन महापुरुषों की तुलना में कुछ भी नहीं. सरकार को तो वोट लेने होते हैं. ये महापुरुष निस्वार्थ भाव से ये सब करते हैं.इनके काम को देख हमारा तो ये मानना है कि सरकार महिला सशक्तिकरण के नाम पर महिलाओं को गलत पुरस्कृत करती है. महिला सशक्तिकरण के लिए सम्मान,ईनाम तो उन देवतुल्य पुरुषों को मिलना चाहिए जो नारियों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं. ऐसे इंसान  तो पदम सम्मान लेने के हक़दार हैं जो महिलाओं को सशक्त कर यह  साबित करने में लगे हैं कि पुरुषों की सफलता के पीछे नारी होने की बात अब गुजरे जमाने की कथा  हो गई है. अब तो  सफल नारियों के पीछे पुरुष होते हैं. सरकार को इन संगठनों और पुरुषों के काम को गम्भीरता से लेना चाहिए. ताकि दूसरे शहरों के पुरुषों को भी इन से प्रेरणा मिल सके. अपने घर की नारियों के लिए तो सभी करते हैं,दूसरों का उत्थान और सशक्तिकरण करने वाले तो विरले ही होते हैं. ऐसे व्यक्तियों का सम्मान तो होना ही चाहिए. क्योंकि ऐसे ही पुरुषों के सद्प्रयासों की बदौलत भविष्य  के तुलसी दास नारी को ताड़ना का अधिकारी लिखने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे. 

Monday, March 24, 2014

मेरे मन को जानने वाले
गुम  हो गए दो नैन,
कौन सुनेगा किसको सुनाऊँ
कैसे मिले अब चैन.
[कचरा]

Thursday, February 27, 2014

खुशियां छोटी हो गई और पैकेज बहुत बड़े बड़े



श्रीगंगानगर-पहला  सीन-सुबह सुबह एक परिचित मिल गए। बाइक  पर आगे लगभग डेढ़ साल का क्यूट  बेबी था। साथ में  उसके पहनने,खाने,पीने और खेलने के सामान का बैग। दुआ सलाम के बाद बोला,बच्चे को क्रैच छोड़ने जा रहा हूं । बीवी नौकरी पर जाएगी। मुझे भी जाना है। क्या करें! अकेले से आजकल घर ही चल सकता है और कुछ नहीं। बीवी  ड्यूटी से आएगी तो इसे लेती  आएगी। दूसरा सीन-बड़े पैलेस में  बड़ों की शादी का बड़ा समारोह। पीठ की साइड में दो व्यक्ति बात कर रहे थे। एक, मेरा बेटा फलां कंपनी में है और इतने लाख का पैकेज ले रहा है। दूसरे ने अपने बेटे की कंपनी और पैकेज बताया। दोनों खुश। कुछ क्षण यही पैकेज की बात करते रहे। फिर उनकी आवाज में दर्द आने लगा। दोनों में से कोई कहा रहा था,बेटे को बिलकुल भी समय नहीं मिलता। छुट्टी के दिन भी फुरसत नहीं। ऑफिस जाने का समय तो है लेकिन आने का नहीं। दूसरे ने उसकी हां में हां मिलाई। कुछ क्षण पहले जो पैकेज की बात कर खुश हो रहे थे वे अचानक गंभीर हो गए। जबकि ना तो उनके बच्चों के पैकेज कम हुए थे और ना ही ऐसी कोई उम्मीद थी। लेकिन मन की पीड़ा कब तक रोकी जाती। जब एक ही किश्ती में सवार थे तो बात होनी ही थी, पैकेज की भी जिंदगी की भी। ये बेशक दो सीन हों लेकिन ऐसे दृश्यों की कोई कमी  नहीं है इस शहर में। बच्चे की तरक्की की खुशी अपनी जगह और उसकी जुदाई की पीड़ा अपनी जगह। दोनों को मन में आने से कोई नहीं रोक सकता। जिस स्टेज पर ऐसे बच्चे पहुँच गए वे इस शहर से तो गए ही साथ साथ गए अपने घर –परिवार,रिश्तेदारों और परिचितों से। क्योंकि उनके लिए इधर कोई स्टेटस नहीं है। उनके लायक कोई काम नहीं। कोई कंपनी नहीं जो उनको लाखों के पैकेज दे सके। जब इनका आना इधर होगा ही नहीं तो कौन रिश्तेदार,मित्र इनको याद रखेगा। धीरे धीरे सामाजिक रिश्ते भी समाप्त होने ही हैं। ऐसे पैकेज वाले बच्चों को छुट्टी मिलेगी तभी तो ये अपने दादा,नाना,दोस्त के परिवार में होने वाले विभिन्न समारोह में आ सकेंगे। आएंगे तभी तो रिश्ते और समाजिकता का नवीनीकरण होगा। वरना कौन उनको जानेगा और कौन पहचानेगा। लेता होगा किसी का बच्चा लाखों का पैकेज ! किसी को इससे क्या ! माता-पिता के पास पैसा तो लाखों करोड़ों में आ गया,मगर वह उनकी आंखों  से दूर हो  गया जिसकी खुशी और आनंद के लिए उन्होने दिन रात एक की। ये अपने घर,समाज,गली,मोहल्ले को छोड़ कर जा नहीं सकते। इनमें इनकी रूह बसती है।इनके संबंध इधर हैं। भाई चारा है। बच्चे इधर आ नहीं सकते। बुढ़ापे को अकेला,खामोश होना ही है। जब बच्चों को हमारी जरूरत थी तब हमने उनको अलग कर दिया । जब हमें उनकी आवश्यकता होगी  तो वे आ नहीं सकेंगे। जब सबसे अधिक बच्चों की जरूरत होती है तब अकेलापन! वह भी सब कुछ होते हुए। यही विडम्बना है इस पैकेज की। दो लाइन पढ़ो—मेरी तन्हाई  को वो यूं तोड़ गया, मेरे पास अपने रिश्ते के निशां  छोड़ गया। 

Friday, February 14, 2014

प्यार को मैगी मत बनाओ

प्यार को मैगी मत बनाओ
श्रीगंगानगर। प्यार, प्रीत, स्नेह, मोहब्बत दो मिनट में तैयार होने वाली मैगी नहीं है। यह तो वो बाजरे की खिचड़ी है जो धीमी-धीमी आंच पर सीजती है तभी खाने वाले और बनाने वाले को तृप्ति होती है। भूख बेशक मिट जाए लेकिन चाह नहीं मिटती। इस निगोड़े वेलेंटाइन डे ने सात्विक ,गरिमापूर्ण और मर्यादित प्रेम को मात्र जवां होते या हो चुके लड़का-लड़की के प्रेम में बांध दिया। इस अज्ञानी वेलेंटाइन डे को इनके अलावा और कोई दूसरा प्यार ना तो दिखाई देता है और ना उसमें इस प्यार को महसूस करने की क्षमता है। केवल लड़का -लड़की के मैगी स्टाइल प्यार को ही प्यार समझने वाले या तो ये जानते ही नहीं कि प्यार इससे भी बहुत आगे है या फिर उन्होंने यह जानने की कोशिश ही नहीं की प्यार तो इतना आगे है कि इसके अन्दर डूब जाने वाले व्यक्ति के लिए दुनिया अलौकिक हो जाती है। अलबेली बन जाती है। प्रीत से सराबोर व्यक्ति सहजता और सरलता की ओर बढ़ता है। घुंघरू होते तो उसके पांव में हैं और नृत्य उसका मन करता रहता है, हर क्षण। उसकी आखों में मस्ती दिखाई देती है। सबको अपने प्रेम में समाहित कर देने की चाहत नजर आती है। उसकी आंख को हर कोई अपना दिखाई देता है। जुबां पर मिठास और गुनगुनाहट रहती है। झूमता रहता है, गाता रहता है। कोई साथ है तब भी कोई फ्रिक नहीं नहीं है तब भी कोई चिन्ता नहीं। हर वक्त प्रेम के सुरूर में वह मदमस्त रहता है। लेकिन कितने अफसोस की बात है कि वेलेंटाइन डे ने प्यार को बाजार बना दिया। जो मन के अन्दर, आत्मा में, आखों में छिपाने की अधिक है दिखाने की कम, उसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने को मजबूर कर दिया। यह मोहब्बत नहीं बाजारूपन है। यह प्रीत नहीं, प्रीत का कारोबार है। स्नेह नहीं, स्नेह के रूपमें उपहारों की अदला-बदली है। इनको सुदामा की भक्ति में कृष्ण के लिए छिपा दोस्ती का प्यार दिखाई नहीं दे सकता। इनको यह भी याद नहीं होगा कि कभी किसी करमावती ने एक मुसलमान शासक को राखी भेजी और उस शासक ने भाई-बहिन के प्यार की एक नई परिभाषा लिखी। श्रवण कुमार का अपने माता-पिता के प्रति प्यार किसी वेलेंटाइन डे का मोहताज नहीं है। मां-बाप के बीमार होने की खबर सुन ससुराल से दौड़ी चली आने वाली लड़कियां वेलेंटाइन डे के किस्से पढ़कर बड़ी नहीं हुई थी। कृष्ण और राधा के प्रेम के समय तो इस कारोबारी वेलेंटाइन डे का अता-पता नहीं था। रावण ने कौनसा वेलेंटाइन डे पाठ पढ़ा था जो उसने अपनी बहिन सरूपनखा के लिए अपना सर्वस्य निछावर कर दिया। उर्मिला का लक्ष्मण के प्रति प्यार वेलेंटाइन डे पर निर्भर नहीं था। ये चंद उदाहरण वो हैं, जिन्होंने प्यार के रूप में रिश्तों के नए आयाम दिए। बहिन का भाई के प्रति प्यार और बाप का बेटी के प्रति प्यार बहुत बड़ा होता है। समाज में कौनसा ऐसा रिश्ता है जो प्यार के बिना एक क्षण के लिए भी कायम रह सके । परन्तु हमने कारोबार के लालच में प्यार, मोहब्बत, प्रीत, इश्क जैसे शब्दों को बहुत छोटा बना दिया जबकि ये समन्दर से भी अधिक विशाल है। इसकी गहराई भी समन्दर की तरह नापी नहीं जा सकती थी। बस, महसूस की जा सकती है और महसूस वही कर सकता है जिस के दिल में प्यार, प्रीत, स्नेह और मोहब्बत बसी हो।

Wednesday, February 5, 2014

सदियों पुराने विज्ञान पर भारी पड़ा क्रिकेट


श्रीगंगानगर-सदियों से दुनिया की तरक्की में योगदान दे रहा विज्ञान आज क्रिकेट के सामने छोटा पड़ गया। हार गया विज्ञान क्रिकेट से। ऐसे भी कह सकते हैं कि मीडिया ने विज्ञान को क्रिकेट से हरा दिया। क्योंकि मीडिया ने उसे विज्ञान की  तुलना में अधिक महत्व दिया। उस विज्ञान के जिसका तरक्की में सबसे अधिक योगदान होता है। मीडिया के  वर्तमान आधुनिक स्वरूप में भी विज्ञान का योगदान है ना कि क्रिकेट का। वैज्ञानिक सीएनआर राव और क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया गया। लेकिन मीडिया ने जिस प्रकार से सचिन को प्रमुखता दी उससे तो ऐसे लगता है जैसे श्री राव को उनके सामने कोई अस्तित्व ही नहीं है। श्री राव की तुलना में सचिन की ये बड़ी बड़ी फोटो। खबरों में उनसे बड़े अक्षरों में नाम। अखबारों में नाम भी श्री राव से पहले लिखा गया सचिन का। जैसे सचिन के सामने वे तो कुछ हैं ही नहीं। एक क्रिकेटर को वैज्ञानिक की तुलना में इतनी अहमियत! जितना श्री राव को विज्ञान का अनुभव होगा उतनी उम्र होगी सचिन की। दो चार साल आगे पीछे से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ऐसे में कौन चाहेगा वैज्ञानिक बन देश और विज्ञान की सेवा करना। सब के सब क्रिकेटर बनना पसंद करेंगे। तब कैसे कौन करेगा खोज?कैसे होंगे अनुसंधान? कैसे आगे बढ़ेगा विज्ञान? कैसे और कौन करेगा सृजन? सब का सब रुक जाएगा जहां है वहीं। जड़ हो जाएगा विकास का काम साथ में विज्ञान। जिस देश का राष्ट्रपति वैज्ञानिक रह चुका हो। उस देश के मीडिया में विज्ञान की एक खेल के सामने इतनी तौहीन। वह भी उस खेल के सामने जिसे पूरी दुनिया के देश खेलते तक नहीं। जबकि विज्ञान तो दुनिया के हर कौने में है। विज्ञान के बिना तो कुछ भी संभव नहीं। विज्ञान और वैज्ञानिक तो पुरातन है और क्रिकेट और क्रिकेटर कल के। कैसी विडम्बना है कि मीडिया विज्ञान,वैज्ञानिक और उनकी उपलब्धियों को क्रिकेट से छोटा मान रहे हैं। आज देश का महान वैज्ञानिक उस खिलाड़ी के सामने मीडिया में छोटा हो गया जिसका समाज,देश और दुनिया के लिए ऐसा कोई योगदान नहीं जिसे जमाना धरती रहने तक याद रख सके। कोई खिलाड़ी उस खेल के लिए  महान हो सकता है। भगवान भी उसके समर्थक उसे कहें तो किसी को क्या आपत्ति है लेकिन वह किसी भी सूरत में वैज्ञानिक से बड़ा नहीं हो सकता। क्योंकि उसकी खोज अनंत काल तक दुनिया को रास्ता दिखती है। नई खोज आगे बढ़ाने के लिए काम आती है। जबकि एक क्रिकेट खिलाड़ी के रिकॉर्ड किस के काम आएंगे! वे केवल कागजों में रहेंगे। अधिक से अधिक उस समय उनका  जिक्र हो जाएगा जब कोई उसकी बराबरी करेगा या आगे निकलेगा। वे किसी खिलाड़ी के लिए तो प्रेरणा हो सकते हैं पूरी दुनिया के लिए नहीं। जबकि विज्ञान,वैज्ञानिक और उसके अनुसन्धानों से इंसान,समाज,देश और दुनिया पता नहीं कहां से कहां तक ले जाने की प्रेरणा तो देते ही हैं साथ में विकास के नए नए मार्ग उपलब्ध करवाता है। इसके बावजूद पता नहीं मीडिया को क्या हो गया जिसने विज्ञान,वैज्ञानिक की तुलना में क्रिकेट और क्रिकेटर को कवरेज में इतनी अधिक प्रमुखता दी। शायद उसका कारोबारी फायदा विज्ञान,वैज्ञानिक और श्री राव की बजाए क्रिकेट,क्रिकेटर और सचिन को प्रमुखता देने मे अधिक था। आज कथा वाचक राधा कृष्ण शास्त्री की कही एक बात याद आ गई....उन्होने गंगानगर में कथा के दौरान कहा था, परिवारों में दो दो बच्चे ही हुए तो फिर संत,वैज्ञानिक और सैनिक कहां से आएंगे ? बेशक उन्होने यह बात किसी और संदर्भ में कही थी लेकिन है तो सटीक । समाज,देश और मीडिया में क्रिकेटर को वैज्ञानिक की तुलना में इतना अधिक महत्व मिलेगा तो फिर कोई क्यों बनेगा वैज्ञानिक। 

Sunday, January 19, 2014

रिश्ते इतने मतलबी क्यों होने लगे


श्रीगंगानगर। एक जमाना था जब उसका हर रस्ता “मुझ” से होकर गुजरता था। । ठीक उसी तरह जैसे किसी आशिक का रस्ता उसकी महबूबा के घर की गली से होकर जाता है। कोई भी समय हो। कहीं भी जाना हो। रस्ता मुझसे होकर ही आता- जाता। काम से। बे काम से मिलना। सुबह से लेकर शाम तक। कोई ऐसा दिन नहीं जब मिलना ना हो। जब हर रस्ता आपसे होकर गुजरे तो फिर बंदे की तारीफ करने को जी करता ही है,भई! कमाल का बंदा है। इतना प्रेम! इतना अपनापन! स्नेह की जैसे बरसात होने लगी। समय अचानक बदला । पता ही नहीं लगा कि जो हर रस्ता मुझ से होकर जाता था वह किधर को मुड़ गया। जब रस्ते ही नहीं होंगे तो लोग आएंगे भी कहां से। ये बात बेशक लेखक ने अपने आप को केंद्र बिन्दू बनाकर लिखी। किसी ओर को केंद्र मानता तो शायद गरिमामय ना होता। मगर हजारों ऐसे व्यक्ति,परिवार होंगे जिनको ये लगेगा कि ये तो उनके लिए ही लिखा गया है सब कुछ। क्योंकि वे जीवन में कितनी ही बार रिश्तों की बदलती इस परिभाषा को पढ़ते हैं।रिश्तों को मीठे से कसेला होते महसूस करते हैं। समय समय पर रिश्तों से गुलजार रस्तों पर पसरे सन्नाटे को देखते हैं। और फिर सवाल करते हैं अपने आप से,आखिर रिश्ते इतने मतलबी क्यों हो गए! इस हवा में कब ऐसा क्या घुला कि बिना मतलब के कोई बात ही नहीं। कोई काम है तो रिश्ता बना लो,वरना दफा करो। जब तक काम है तब तक चलते रहो साथ।हाथ मिलाते रहो। जय राम जी की बुलाते रहो। काम नहीं रहा तो बदल लो रस्ते। ढूंढ लो कोई दूसरा रस्ता काम का। बना लो फिर कोई रिश्ता जो काम का लगे। रिश्तों में एक दूसरे से काम निकलवाना कहां बुरा है! जब रिश्ते बनेंगे तो काम भी होंगे एक दूसरे को एक दूसरे से। लेकिन रिश्ता केवल काम के लिए ही बनाया जाए,इसे उचित नहीं कहा जा सकता। ये तो कोई ठीक बात नहीं। कोई जमाना था जब रिश्तों को आपस में बांधे रखने की वजह प्यार,अपनत्व,स्नेह थे। इनकी कच्ची डोर से रिश्ते मजबूती से बंधे रहते थे। परिवार,लोक-लाज,समाज का भी योगदान हुआ करता था रिश्तों के बंधन में। सामाजिक परंपरा भी निभाई जाती थी। अब तो रिश्तों को केवल जरूरत और मतलब ही बांधकर रखता है। जरूरत है तो रिश्ता, नहीं तो नहीं। मतलब के लिए ही रिश्ते बनाए जाते हैं। रिश्तेदारी निभाई जाती है। जिस से काम है या काम हो सकता है उससे ही रिश्ता रखने का रिवाज है आजकल। काम! काम तो कोई भी हो सकता है,छोटा,बड़ा। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष। बाकी के लिए तो हर कोई ये ही कहता है,अरे! क्या लेना है रिश्ता बना के! ये रिश्ते इस दौर में इतने मतलबी क्यों होने लगे हैं, इसका जवाब किसके पास है? कौन बताएगा कि ऐसा कैसे हो गया! किसको समझ है ये समझाने की। कोई समझने भी क्यों लगा! उसको जरूरत क्या है इसकी!