Friday, September 11, 2015

प्राइवेट डॉक्टर्स की तो कोई खबर बनती ही नहीं

श्रीगंगानगर। फुफेरे भाई ने रोक लिया और बोला, तुम अपनी ज़िम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहे। मैं हैरान! कैसी ज़िम्मेदारी? पारिवारिक या सामाजिक? मैंने पूछा। अरे नहीं। पत्रकारिता की, अखबार की, उसने कहा। पूरा मीडिया सरकारी हॉस्पिटल की पीछे पड़ा रहता है। छोटी से छोटी बात सुर्खियां बन जाती है। जबकि प्राइवेट होस्पिटल्स के बारे मेँ कोई कुछ नहीं बोलता। जुकाम दिखाने जाओ तो एक हजार रुपए खत्म। टेस्ट करवाते हैं। कुछ नहीं निकलता। फिर वही टेस्ट। एक्सरे करवाएंगे। ठीक से उसे देखेंगे भी नहीं कि टीएमटी करवाने को कहेंगे। कई मिनट तक उसने अपने मन की बात कही। मैंने ये कह कर बात को विश्राम दिया कि पब्लिक भी तो नहीं बोलती। कहीं से कोई विरोध के स्वर तो उठें। तभी मीडिया आगे बढ़े।  हालांकि बातचीत तो समाप्त हो गई, लेकिन उसकी बात मेँ दम था। सोचा, खूब सोचा। परंतु प्रश्न ये कि लिखा क्या जाए? क्या ये खबर लिखें  कि डॉक्टर्स ने अपनी फीस बढ़ा दी। या फिर ये कि हर प्रकार की जांच के भी अब पहले से अधिक रुपए लगेंगे। पेट दर्द के लिए छोटे से छोटा अल्ट्रासाउंड दर्द को और बढ़ा देगा, क्योंकि बड़ी राशि देनी पड़ती है। टीएमटी करवाने मेँ सांस चढ़ जाएगा। ईसीजी का चार्ज धड़कन बढ़ा देगा। कमरों का किराया होटल की तरह से है। जैसी सुविधा वैसा कमरा। महिलाओं की सेवा भी मेल नर्स ही करते हैं। लेकिन जवाब फिर भी नहीं मिला। प्रश्न फिर वहीं का वहीं कि खबर आखिर शुरू कहां से हो? हो किस बात पर। ये न्यूज भी कैसे बने कि पहले प्राइवेट हॉस्पिटल मेँ मेडिकल की दुकान किसी और की होती थी। मोटे किराए पर। फिर डॉक्टर पार्टनरशिप करने लगे। अब खुद ही मेडिकल की दुकान खोल लेते हैं। दवाएं भी अपनी बनवाते हैं। जो कहीं और से मिलती ही नहीं। लेनी ही पड़ेगी। चाहे जो भी कीमत हो। यूं यो डॉक्टर्स को दिखाने से लेकर ठीक होने तक, हर स्टेज पर खबर है। लेकिन बनती नहीं। आजकल तो इसी से संबन्धित अनछुई खबर भी है। वो ये कि अब तो कई संस्थाएं  भी नए नए डॉक्टर्स को लॉन्च करती  हैं। उनके लिए कैंप लगते  हैं। कैंसर की जांच वैन आपके घर तक लाएँगे। साथ मेँ अपने ही भाई, भतीजे, सगे संबंधी किसी कैंसर विशेषज्ञ का पता भी बता देंगे। और क्या चाहिए आपको, बोलो।  समाज का भला करने वाली इन संस्थाओं की खबर क्यूं लिखूँ, जो डॉक्टर्स की मार्केटिंग करती हैं। उस सज्जन, सर्जन के बारे मेँ लिख कर मैं ही बुरा क्यूँ कहलाऊं जिसकी एग्जामिनेशन  टेबल पर मर्यादा का हरा पर्दा तक नहीं। जिस कारण पिता को बेटी के वे अंग देखने पड़ते हैं, जिसे कोई पिता नहीं देखना चाहता। डॉक्टर को तो बीमारी के इलाज हेतु एग्जामिन करने ही पड़ेंगे । सज्जन, सर्जन अपने युवा मेल नर्स को भी बाहर जाने के लिए नहीं कहता। शहर मेँ रहना है भाई! इसलिए ये खबर भी नहीं बन सकती। तो फिर क्या खबर बने! ये बात तो पुरानी हो गई कि रात को कोई डॉक्टर किसी रोगी को नहीं देखता। इसमें शिकायत की बात नहीं। ना ही ये कोई खबर है। मर्जी है डॉक्टर की। जब इच्छा होगी रोगी को देखेगा। नहीं इच्छा, नहीं देखता। तो फिर खबर क्या हो? फीस बढ़ाने की बात हो गई। टेस्टिंग भी ऊपर हो गया। कमरे और दवाइयों की भी चर्चा  हो गई। लेकिन कोई खबर तो नहीं बनी ना। हो भी तो लिखेंगे नहीं । क्योंकि हमें भी तो जाना होता है इनके पास। सामाजिक, आर्थिक रिश्ते हैं हमारे इनसे। अब आम जनता के लिए मीडिया उनसे अपने रिश्ते तो नहीं बिगाड़ सकता,  जिसकी जरूरत कभी भी पड़ सकती है। इसलिए प्राइवेट होस्पिटल्स वालों के बारे मेँ खबर लिखना कैंसल। ऐसी खबरों के लिए तो सरकारी हॉस्पिटल है । कुछ भी लिखो। कौन रोकता है। चूंकि उधर भीड़ है, व्यवस्था नहीं। विश्वास भी कम ही है। सरकार पर विश्वास कम ही होता है। इसलिए हम जैसों को तो प्राइवेट मेँ आना ही होगा, जब इधर आना है तो कोई खबर होकर भी नहीं हो सकती है। नमक का हक तो अदा करना ही पड़ता है। इतनी मर्यादा तो मीडिया मेँ है ही अभी। वैसे भी कहीं आईएमए ने मेरे खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित कर मेरे और मेरे परिवार का इलाज ना करने का निर्णय कर लिया तो मीडिया, वीडिया सब धरा रह जाएगा। इसलिए सॉरी भाई जान। प्राइवेट डॉक्टर्स के बारे मेँ मैं तो कुछ नहीं लिख सकता ।  दो लाइन पढ़ो—

हाथ से ये 
वक्त क्या दूर गया , 
मेरा आइना 
मेरा ही चेहरा भूल गया।

Tuesday, September 8, 2015

तीन विवाहित बेटों वाले परिवार मेँ केवल एक टीवी !


श्रीगंगानगर। हमारे आस पास बहुत कुछ अच्छा होता है। संस्कारों, पारिवारिक प्रबंधन और  प्रेम के अनेक  उदाहरणों से भी हम मेँ से कोई ना कोई  रोज नहीं तो कभी कभार तो रूबरू होता ही है। कुछ प्रेरणादायी बात भी हमारी आँखों के सामने आ जाती हैं, गाहे बगाहे । परंतु ये सब सामान्य रूप से होता लगता और दिखता है।  इसलिए इसमें हमें कुछ खास दिखाई  नहीं देता या हम इसे रूटीन जान कोई विशेष तवज्जो नहीं देते। मगर इन सब पर कभी कोई चिंतन मनन करे तो लगेगा कि जो सामान्य है, वही तो है बहुत अधिक खास, विशेष और समाज को प्रेरणा देने वाला । बात आगे बढ़ाते हैं। क्या आज के इस दौर मेँ कोई ये सोच सकता है कि कहीं  संयुक्त परिवार होगा? चलो संयुक्त परिवार तो मिल जाएगा। किन्तु क्या ये संभव है कि उस परिवार मेँ टीवी केवल एक ही हो। वह भी तब जब परिवार के सभी लड़के विवाहित हैं। उनके बच्चे हैं। सबके अलग कमरे हैं। सुनने, पढ़ने मेँ बेशक विश्वास ना हो। कोई बताए तो भी यकीन करना मुश्किल हो। लेकिन ये सत्य है। आज के दिन, पूरी तरह सच। चाहे तो कोई देख ले जाकर उस परिवार मेँ, जिसका जिक्र किया जा रहा है। एल ब्लॉक हनुमान मंदिर के पास एक परिवार है। तीन लड़के हैं। तीनों विवाहित। तीनों के सात- आठ बच्चे हैं। कुल मिला कर एक दर्जन से अधिक व्यक्तियों का परिवार। टीवी केवल एक। जो लॉबी मेँ लगा हुआ है। किसी लड़के के कमरे मेँ अलग से टीवी नहीं है। जिसने टीवी देखना है, उसे यहीं देखना है। ऐसा नहीं है कि बच्चों मेँ आपसी किच किच ना होती हो। बिलकुल होती है। टीवी एक जो है। मगर कुछ क्षण मेँ सब ठीक। चचेरे भाई बहिन आपस मेँ किच किच नहीं करेंगे तो उनमें आपसी समझ कैसे आएगी और अपनापन कैसे पनपेगा एक दूसरे के प्रति। फिर बच्चों की किच किच की भी क्या चर्चा। पल मेँ झगड़ा, दूजे पल प्यार। उसके बाद तो याद ही नहीं रहता कि किच किच हुई किस बात पर थी। इतना ही नहीं कोई बेटा-बहू भोजन अपने कमरे मेँ नहीं करता। सबको भोजन लॉबी मेँ करना है। कमरों मेँ भोजन तभी जाएगा, जब कोई मजबूरी हो। कोई बच्चा बीमार है। किसी को स्कूल का काम करवाना है और उसे टीवी से भी दूर भी रखना है। हर कोई इस बात को समझ सकता है कि भोजन एक साथ ना भी किया जाए, पास पास बैठ कर तो किया ही जाएगा।  तब आपसी संवाद कितना बेहतर होगा! संवाद है तो कोई बड़ा झंझट नहीं होता परिवार मेँ। सौ प्रकार की सलाह, विचार विमर्श हो जाता है, साथ बैठने से। थोड़ी खिट पिट होती भी है तो बात चीत से गायब। वरना तो रात को काम से आए और सब के सब चले गए अपने अपने कमरे मेँ भोजन और बच्चे लेकर। कौन किस से संवाद करेगा और किस से कैसे सलाह होगी! सब के सब अकेले। जब कोई एक दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता तो फिर सबको अकेला ही रहना पड़ता है। यह दस्तूर है। अब इस व्यवस्था को कोई हिटलर शाही कहे या सास को ललिता पवार की संज्ञा दे तो उसकी मर्जी।  ये व्यक्ति की नजर और सोच पर निर्भर है कि वह इसमें क्या, किस रूप मेँ  देखता है?  परंतु इसमें कोई शक नहीं कि आज के दौर मेँ ऐसे शानदार, संस्कारी, गरिमामय पारिवारिक प्रबंधन के बारे मेँ सोचा भी नहीं जा सकता। इन शब्दों मेँ जिस परिवार का जिक्र किया गया है, वह आर्थिक रूप से सम्पन्न है। ये जिक्र  उनकी अप्रोच, धन का  नहीं बल्कि  चर्चा उस नई लीक की है, जो उन्होने बनाई है। यह परिवार कोई अंजाना नहीं। सबका नहीं तो अधिकांश का जाना पहचाना है। ये परिवार है चेम्बर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष बी डी जिंदल का । इन शब्दों पर भी गौर करो---
नए दौर मेँ संस्कृति और संस्कारों का बंटाधार हो गया,चाचा चाचू, मामा मामू, जीजा जीजू और बाप यार हो गया। 

Sunday, September 6, 2015

मदन अरोड़ा ने की दिल की बात


श्रीगंगानगर, 6 सितंबर। साहित्य और लेखन में निरंतरता अत्यंत आवश्यक है। पढऩा भी और लिखना भी। इनमें से एक भी अगर छूट गया तो लेखक के पिछडऩे की आशंका रहती है। मैं भी अगर इस मामले में ढिलाई न करता तो आज स्थिति कुछ और होती। यह स्वीकारोक्ति है साहित्यकार मदन अरोड़ा की। वे रविवार को यहां श्री आत्मवल्लभ जैन पब्लिक स्कूल में सृजन सेवा संस्थान की ओर से आयोजित कार्यक्रम लेखक से मिलिएमें श्रोताओं से रूबरू थे। उन्होंने कहा कि  लघुकथा लेखन की ओर मुड़े तथा उनके इस प्रयास को स्वीकार तो किया ही गया, देश भर में सराहना भी मिली। कविता की जापानी विधा हाइकू भी राजस्थान में सबसे पहले उन्होंने ही लिखने प्रारंभ किए परंतु बाद में स्थितियां ऐसी बनी कि वे निरंतरता नहीं रख पाए और इन विधाओं की पुस्तकें प्रकाशित नहीं करवा पाए। इस मौके पर उन्होने रचनाएँ प्रस्तुत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार गोविंद गोयल ने की। उन्होंने अरोड़ा की रचनाओं और उनके जीवन संघर्ष को सराहा और माना कि संवेदनशीलता ही रचनाओं को पाठक के हृदय से जोड़ती हैं। उन्होने मदन अरोड़ा को कुछ सुझाव भी दिये। संस्थान के अध्यक्ष डॉ. कृष्णकुमार  आशुने मदन अरोड़ा परिचय देते हुए बताया कि की कुसुम और बूंद भी सागर भी शीर्षक से दो पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार मोहन आलोक और  डॉ. विद्यासागर शर्मा ने भी संबोधित किया।


Friday, September 4, 2015

जागरूक नागरिक का गृह मंत्री को पत्र, हेलमेट को बताया अव्यावहारिक



श्रीगंगानगर। नगर के जागरूक नागरिक रवि सरावगी ने राजस्थान के गृह मंत्री को पत्र लिख हैलमेट की  अनिवार्यता संबंधी आदेश को  अव्यावहारिक बताया है। श्री सरावगी ने अपने पत्र मेँ गृह मंत्री को लिखा है कि  क्या इसके लिये छोटे शहरों और कस्बों की सड़कों की हालत और उनकी भौगोलिक स्थिती का अध्ययन किया गया है??  गंगानगर जैसे शहर जहां प्रति सौ फुट के बाद चौराहा है, बीस से अधिक की स्पीड पर वाहन चलाना मुश्किल है, और सड़कों में गड्ढे नहीं बल्कि गड्ढों में सड़कें हैं, एैसे में हैलमेट सुरक्षा नहीं बल्कि बोझ है श्री सरावगी के अनुसार हेलमेट अनिवार्य करने का आदेश देना पहले से ही आपकी सरकार द्वारा उत्पीड़ित गंगानगर की जनता के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। श्री सरावगी का कहना है कि  यदि सुधार करना है तो. शहरी क्षेत्र में तेज दूधिया लाईटें लगाकर हाईबीम पर चलने वाली गाड़ियों के चालान काटना, ओवर लोडेड ट्रैक्टर ट्रालियों, ट्रकों, थ्रीव्हीलरों को सीज़ करने,.शहरी क्षेत्र में बड़े साईज की स्कूली बसों का संचालन बंद करने, अवैध रूप से रात्रिकाल में लकड़ी का परिवहन करने वाले ऊंटगाडा से प्रतिवर्ष कितने लोग मरते हैं उन पर बैन लगाने , और साथ ही यह सर्वे करवाने का आग्रह किया है  कि शहरों में हैड इंज़री से कितने और बसों ट्रकों और ट्रैक्टर ट्रालियों के नीचे दबकर कितने लोग मरे हैं सरावगी के अनुसार इस सर्वे के बाद ही श्रीगंगानगर मेँ हेलमेट की अनिवार्यता के आदेश देने चाहिए। 

Thursday, September 3, 2015

अब और विकास की जरूरत नहीं है गंगानगर को


गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। महाराजा गंगासिंह की नगरी गंगानगर । अपने आप मेँ मस्त शहर। शरीफ नागरिकों का शहर। बेफिक्र लोगों का शहर। अफसर इधर की भाषा नहीं जानते। वे किसी नेता की बात नहीं मानते। विपक्षी दलों के नेताओं को ताव नहीं आता। आम आदमी किसी मुद्दे पर किसी के साथ नहीं आता । क्योंकि शरीफ लोग गांधी जी के पद चिन्हों पर चलते हैं। बुरा देखना नहीं। बुरा बोलना नहीं और बुरा सुनना नहीं। जय राम जी की। होता रहेजो होता हैहमें क्या मतलबा। हम इस गली की बजाए उस सड़क से निकल लेंगे। घर के सामने की सड़क साफ हो तो पूरा नगर नरक बनेहमें क्या?ट्रैफिक पुलिस वाला चौराहे पर ट्रैफिक व्यवस्थित करने की बजाएइधर उधर खड़ा रह बाइक वालों को हेलमेट पहनाता है। दुकानदार पार्किंग लाइन के अंदर सामान रख ग्राहक बुलाता है। करोड़ों रुपए खर्च हो गएसीवरेज नहीं बनता। ओवरब्रिज हमने बनने नहीं देना। ए माइनर के किनारे की सड़क बने तो नाक कटती है। काम शुरू भी नहीं होता कि शरीफ व्यक्ति उसमें टांग अड़ाने के लिए आ जाते हैं। फिर भी कोई उम्मीद करें कि इस शहर को विकास के लिए फंड मिले। अनुदान दिया जाए। इसका विकास किया जाए। मेडिकल कॉलेज बने। एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी हो। जनाबजो  है उसकी तो सार संभाल होती नहींऔर मिल जाए। जो सरकारी हैवह हमारी हैकी सोच रखने वाले इस नगर के शरीफ लोगों की शराफत की जितनी जय जय कार की जाए कम है। ऐसी गांधी वादी सोच वाले शरीफ लोगों के इस नगर को कुछ नहीं मिलना चाहिए। सरकार इधर से आँख बंद कर ले। राजनैतिक कृपा तो है ही। विधायकसभापति दोनों ही बीजेपी के नहीं है। दोनों सत्तारूढ़ पार्टी के होते तो सौ टंटे होते। विकास के लिए पैसे की उम्मीद होती। योजना बनती। अड़ंगे लगते। पार्षदों की नई नई उम्मीदें जवां होती। अब किस्सा समाप्त। ना विधायक को मतलब और ना सभापति को। दोनों की मौज। कुछ नहीं करना। कोई कुछ भी कहेबीजेपी को किसी भी सूरत मेँ सभापति को पार्टी मेँ शामिल नहीं करना चाहिए। पार्टी मेँ शामिल होते ही फंड की मांग करेंगे। विकास की उम्मीद जगेगी। बाद मेँ टिकट की लाइन मेँ लगेगा। नित नए क्लेश । आंधा न्योतोदो बुलाओ। ऐसा करने की जरूरत ही नहीं। जो जहां हैउधर रहे। जिसको पता नहींसभापति का मतलब क्या होता हैउसको पार्टी मेँ लेकर करना भी क्या! जिस शहर की जनता को कुछ चाहिए ही नहींउसे देकर करना भी क्या! इसलिए सरकार को तो गंगानगर के संबंध मेँ टेंशन रखने की अब जरूरत नहीं। क्योंकि सब के सब खाते पीते नागरिक हैं। इनको कुछ चाहिए ही नहीं। इनके नगर मेँ जो हैवो भी अधिक ही है। यही वजह है कि जो है उसकी ठीक से देखभाल नहीं हो पाती। जो अफसर हैंवे भी स्टेट के सबसे काबिल हैं। इस कारण उनके प्रति भी किसी को कोई शिकायत होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। मोदी जी बेकार मेँ स्मार्ट सिटीस्मार्ट सिटी की रट लगा रहे हैं। अरेदेश मेँ सिटी स्मार्ट नहीं स्मार्ट नागरिक होने चाहिए। और यह  स्मार्टनेस आती है आत्मसंतुष्टि से। जो केवल गंगानगर के नागरिकों मेँ है। बेशकदेश भर मेँ सर्वे करवा लोऐसे संतोषी जीव कहीं नहीं मिलेंगे। कितने भी अत्याचार कर लोपैसे देंगेहाथ जोड़ेंगे , घर बैठ जाएंगे। किसी को कानों कान खबर तक नहीं होने देंगे। दो लाइन पढ़ो
बहुत अच्छा है शहर
लोग भी सब शरीफ हैं इधर के,
फिर भी तू इनकी
नजरों से बच बचा के आया कर। 


Monday, August 31, 2015

नहीं तो फिर तीन पूली पर ब्रेड पकोड़े खाओ जनाब !

गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। राजनीति मेँ सक्रिय खास व्यक्तियों की मीडिया मेँ प्रशंसा, आलोचना, समालोचना होना सामान्य बात है। जिनकी  अच्छी, बुरी चर्चा ही ना हो तो फिर वह काहे के नेता। इसलिए राधेश्याम गंगानगर, राजकुमार गौड़ और कामिनी जिंदल का जिक्र इस स्थान पर करने के बाद जगदीश जांदू को नजरंदाज करना उनके प्रति अन्याय होगा, और अन्याय उचित नहीं । वैसे  भी इत्ती सी बात पर किसी को नाराज किया भी क्यूँ जाए। नगर परिषद की राजनीति के विशेषज्ञ जगदीश जांदू।  पार्षदों के प्रिय सभापति जगदीश जांदू । नागरिकों का ईमानदार, कर्मठ  सभापति जगदीश जांदू। बानिया सभापति जगदीश जांदू। विनम्र, सहनशील, लचकदार जगदीश जांदू। नगर परिषद की राजनीति को नई दिशा और दशा देने वाले सभापति जगदीश जांदू। सभापति के चुनाव मेँ निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मेँ ताकत दिखाने वाले जगदीश  जांदू। इसी ताकत, लोकप्रियता  को देख कांग्रेस को मजबूर होना पड़ा था उनको विधानसभा चुनाव मेँ उम्मीदवार बनाने के लिए। ऐसे नेता की जितनी बड़ाई करें, उतनी कम। ऐसे काबिल बंदे का जिक्र ना करें तो क्या करें! जनता ने उनको विधायक बनने का मौका नहीं दिया। मौका क्या, उनको उनकी जमानत राशि तक भी वापिस नहीं की। असल मेँ गंगानगर विधानसभा की अघोषित सवर्ण सीट पर ओबीसी वाले जगदीश जांदू की उम्मीदवारी जनता को पसंद नहीं आई। इसलिए रख ली उनकी जमानत। कर दिया उनकी राजनीति का बंटाधार। शरीफ आदमी को कहीं का नहीं छोड़ा। अगली बार टिकट मांगने लायक भी नहीं रखा, लाडले जांदू जी को। चलो जांदू जी के साथ तो जो होना था हुआ, उनके साथ साथ बीजेपी वालों के भी कान खड़े हो गए। अपने आप को बाऊ जी का विकल्प मान कर राजनीति कर रहे व्यक्ति जगदीश जांदू जी की स्थिति देख अब तक सन्नाटे मेँ हैं। जबकि चुनाव को काफी समय हो चुका है। लगता नहीं ये टिकट मांगने की हिम्मत करेंगे। करेंगे भी तो दूसरे जगदीश जांदू का चिट्ठा सामने रख देंगे कि देख लो ओबीसी उम्मीदवार का क्या हाल हुआ था। फिलहाल जांदू जी के पास अब अधिक विकल्प भी नहीं दिखते । सादुलशहर मेँ तो उनके नाम राशि आ चुके हैं। गंगानगर ने उनको अपनाया नहीं। ऐसे मेँ क्या किया जाए? ये प्रश्न तो उनके और उनके समर्थकों के जहन  मेँ भी होगा ही। इस स्थिति मेँ या तो वे जिला परिषद की राजनीति मेँ अपने आप को सक्रिय करें या फिर से नगर परिषद के चुनावों का इंतजार। नगर के छोटे, बड़े आंदोलन मेँ सूरत दिखाओ। ऐसा नहीं कर सकते तो फिर तीन पूली पर बैठ कर अपने दोस्तों के साथ ब्रेड पकोड़े खाओ। वैसे कितनी हैरानी की बात  है कि आज के दिन गंगानगर की राजनीति मेँ गुरु - चेला दोनों,  एक ही मुकाम पर खड़े दिखाई देते हैं। ये भी नहीं कह सकते कि इनका किस्सा समाप्त हो गया। क्योंकि राजनीति मेँ कौन, कब, किस वक्त कहां पहुँच जाए, कौन जाने । ना, ना इससे पहले के कॉलम मेँ राधेश्याम गंगानगर को समय की प्रतिकूलता  देख मात्र  चुप रहने की सलाह भर दी गई है। कोई ये समझने की भूल ना करे कि राजनीति मेँ उनका किस्सा ही समाप्त हो गया। वक्त ने साथ दिया तो वे फिर कोई नया किस्सा लिख सकते हैं। जैसा 2003 की हार के बाद लिखा था।
दो लाइन पढ़ो—
जब बच्चा था ,तब अच्छा था

वो सब करता, जो मन करता। 

कार की टक्कर से घोड़ी की मौत



श्रीगंगनागर। पी ब्लॉक मेँ काली माता मंदिर के पास रात को हुई एक सड़क दुर्घटना मेँ घोड़ी की मौत हो गई। आज सुबह तक घोड़ी मालिक अनिल धोबी मुकदमा दर्ज करवा आगे की कार्यवाही करवाने मेँ लगा था। पुलिस भी मौके पर थी। रात को लगभग साढ़े नो बजे अनिल बग्गी वाले की घोड़ी सुखाडिया सर्किल से विनोबा मार्केट की तरफ आ रही थी। उस पर लड़का भी सवार था। कार की टक्कर से घोड़ी गिर गई। कार उसकी गर्दन के ऊपर से निकल गई। जिससे घोड़ी के बहुत गहरा घाव हो गया। घोड़ी खून से नहा गई। तड़फ रही घोड़ी के इलाज के लिए डॉक्टर को फोन कर बुलाया गया। आधी रात को घोड़ी ने तड़फ तड़फ कर जान दे दी। दुर्घटना के बाद  घटना स्थल पर लोगों की भीड़ लग गई। घोड़ी के मालिक अपने परिवार सहित मौके पर रहा। समाचार लिखे जाने के समय तक उसके परिवार के सदस्य मृत घोड़ी के पास बैठे थे। पुलिस वाले कार्यवाही मेँ लगे थे। पुलिस के अनुसार केस दर्ज हो चुका है। गाड़ी कब्जे मेँ ले ली गई है। कार मालिक के खिलाफ नंबर के आधार पर नामजद रिपोर्ट दर्ज होगी। 

Friday, August 28, 2015

यह प्राचीन शिवालय है बाबू, इधर कोई वीआईपी नहीं


श्रीगंगानगर। [गोविंद गोयल] नगर मेँ बड़ा धार्मिक आयोजन, अनुष्ठान और कर्ता लाइम लाइट मेँ नहीं। है ना अचरज की बात। लेकिन अनुष्ठान  प्राचीन शिवालय मेँ हो तो किसी को कोई अचरज नहीं हो सकता। क्योंकि शिवालय कोई टॉफी, गोली, झांकी, बाँकी, सीधी वाले बाबा जी का स्थान तो है नहीं कि कर्ता और उसके खास मीडिया मेँ छाए रहें। नगर की गली गली मेँ आयोजन के बहाने लोग अपना प्रचार करें। सौ प्रकार के आडंबर कर धर्म की मार्केटिंग करें। ये तो वो जगह है जहां कर्ता और कारक केवल शिव है। इसलिए इधर आने वाला हर व्यक्ति समान है। शिवालय मेँ  23 अगस्त से नव कुंडीय श्री महरुद्र यज्ञ हो रहा है। जिसकी पूर्णाहुति 29 अगस्त शनिवार को दोपहर सवा बारह बजे होगी। अनुष्ठान के प्रेरक, कर्ता सब कुछ सांसारिक रूप से तो महंत कैलाश नाथ जी हैं। परंतु वे ये बात नहीं मानते। उनके शब्दों मेँ तो सब कुछ शिव ही करता और करवाता है। इस आयोजन मेँ कैलाश नाथ जी कभी भी, किसी भी समय अगुआ के रूप मेँ दिखाई नहीं दिये। उनकी प्रकृति मेँ ही नहीं है दिखावा, आडंबर। वे या तो अपनी कुटिया मेँ बैठे होते हैं या फिर बरामदे मेँ। कभी जी किया तो दूर बैठे यज्ञ को निहार लिया।  मन मेँ आया तो किसी काम को देखने के लिए आ खड़े हुए, बस। उनके स्थान पर कोई और ऐसा यज्ञ करवाने वाला होता तो अब तक ना जाने कितने वीआईपी के साथ उनके फोटो मीडिया तक पहुँच गए होते। अफसरों को बुलाया जाता। नेताओं को पटाया जाता। उनकी आवभगत कर फोटो खिचवाते, छपवाते। उनको सम्मानित करते। खुद होते। फूल मालाओं का आदान प्रदान होता। कितने ही व्यक्ति इन वीआईपी को माला पहना अपने आप को धन्य समझते।  परंतु ये प्राचीन शिवालय है। शिव का स्थान। कोई अफसर आए या नेता, सब के सब बराबर। इधर कोई चोर दरवाजा ही नहीं है। ना भोजन के लिए और ना दर्शन के वास्ते। किसी को कोई वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं। चाहे कोई तुर्रम खाँ आ जाए, कोई आगे पीछे नहीं घूमता। कोई कहीं बैठा है, तो कोई उठाता नहीं। खड़ा है तो कोई बैठने के लिए नहीं कहता। जब शिवालय सभी का है तो कौन किसकी आवभगत करे! बाबा जी को कोई प्रणाम करने आ गया, तो कोई अहंकार नहीं। नहीं आया तो कोई गिला नहीं। ना साधो से लेना, ना माधो का देना। ऐसे ही इस अनुष्ठान मेँ लगे सेवादार हैं। अंजान व्यक्ति को तो पता ही ना लगे कि ये सेवादार हैं। क्योंकि बाकी स्थानों की तरह कोई बैज, बिल्ला, विशेष ड्रेस अथवा पटका नहीं है किसी सेवादार के पास। सब के सब चुपचाप उस काम मेँ लगे हैं, जो बाबा जी ने सौंप रखा है। हर सेवादार बाबा जी के इशारों को समझता है। उनके प्रति श्रद्धा और विश्वास रखता है। शायद शिवालय ही एक ऐसा धर्मस्थल है, जिधर बिना आडंबर के धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। वरना तो छोटे छोटे आयोजनों पर उतना खर्च नहीं होता, जितना आयोजक अपनी फोटो छपवाने के लिए खर्च कर देते हैं। कर्ता, कारक, यजमान और विप्रवर सभी खुश और आनंदित नजर आते हैं। बाकी तो वह शिव जाने, जिसकी छत्रछाया मेँ यह अनुष्ठान हो रहा है। दो लाइन पढ़ो—तेरे प्यार से भरा हूँ, बस इसलिए खरा हूँ। 

Thursday, August 27, 2015

सभापति ने विधायक से पूछी उनके वादों की हकीकत


श्रीगंगानगर। सभापति अजय चाण्डक ने विधायक श्रीमती कामिनी जिंदल सिंगला से विधानसभा चुनावों में जमींदारा पार्टी द्वारा किए गए वादों की हकीकत के बारे मेँ पूछा है ?एक प्रेस नोट मेँ सभपति ने सवाल किया है कि  विधायक कोटे के दो करोड़ रुपए के अलावा निजी तौर पर खर्च किए जाने वाले 18 करोड़ रुपए कहां हैं? विधायक के कार्यकाल के दो साल पूरे होने जा रहे हैं, जिसके हिसाब से अब तक शहर में 36 करोड़ रुपए खर्च होने चाहिए थे, जबकि अब तक उन्होंने निजी तौर पर फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं की। साथ ही, वोट बटोरने के लिए शुरू की गई स्कूली बच्चों की छात्रवृत्तियां और बुजुर्गां की पेंशन भी बंद कर दी गई हैं। जनता के साथ हुए छलावे का हिसाब विधायक को सार्वजनिक मंच पर देना चाहिए।
सभापति ने विधायक श्रीमती कामिनी जिंदल सिंगला की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा है कि विधानसभा चुनाव के समय उनकी पार्टी ने डबल डेकर नहर बनाने, हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बॉर्डर खुलवाने, गरीबों के लिए 44 बीघा जमीन पर स्कूल बनाकर मुफ्त शिक्षा देने तथा हजारों युवाओं को रोजगार देने जैसे झूठे ख्वाब दिखाकर वोट बटोरने की ओछी राजनीति की, जबकि अब जनता ऐसे सब्जबागों की हकीकत से वाकिफ हो चुकी है। यही वजह है कि सोमवार को चक्काजाम के दौरान विधायक के साथ एकमात्र उनका पीए ही पहुंचा था और बाकी समर्थक गायब थे। सभापति ने कहा है कि विधायक बनने के बाद से ही जनता की आंखों से ओझल हो गई। श्रीमती कामिनी जिंदल सिंगला कोतवाली पुलिस थाना में गुमशुदगी रिपोर्ट दिए जाने के बाद ही नजर आनी शुरू हुई हैं। अभी जुम्मा-जुम्मा हफ्ते-दो हफ्ते से दोबारा जनता के बीच आई विधायक को यह गलतफहमी हो गई है कि वे जो कुछ भी कहेंगी, जनता मान लेगी और उनके पीछे हो लेगी। जबकि हकीकत यह है कि जमींदारा पार्टी को जनता पिछले लोकसभा चुनावों, पंचायत चुनावों और अभी हाल ही में हुए निकाय चुनावों में आइना दिखा चुकी है। सभापति अजय चाण्डक ने विधायक से बयानबाजी करने की बजाए काम करने को कहा है, क्योंकि जनता ने उन्हें विकास कार्य करवाने के लिए जिताया था, उनके तथाकथित एंग्री यंग वूमैन वाले डायलॉग सुनने के लिए नहीं।



Wednesday, August 26, 2015

नेतृत्व का दमदार मौका गंवा दिया विधायक ने

नेतृत्व का दमदार मौका गंवा दिया विधायक ने
गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर।  राजनीति मेँ भीड़ उसी की होती है जो मौके पर उसे कब्जा ले। जलसा, जुलूस का नेतृत्व भी वही करता है, जो भीड़ को कब्जाने का हुनर जानता हो। कोई नेता किसी अधिकारी के चेम्बर मेँ जन हित के किस मुद्दे पर उसके साथ चाहे जैसा बरताव करे, कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन यही नेता सड़क पर भीड़ के सामने अधिकारी को लताड़े , आँख दिखाए, उसे ऊपर नीचे करे तो वह जन जन मेँ लोकप्रिय हो जाता है । जनता जनार्दन उसकी जय जय कार करती है। कुछ ही क्षण मेँ उसकी रॉबिन हुड स्टाइल वाली छवि के चर्चे सबकी जुबान पर आ जाते हैं। ऐसा हुनर दिखाने के मौके कभी कभी ही आते हैं। जो ऐसे मौके को  कैश कर ले, वही सिकंदर। वही लीडर। चूक गए तो गए काम से और साथ मेँ नाम से भी। छोटी उम्र मेँ एतिहासिक जीत दर्ज कर विधायक बनीं कामिनी जिंदल के पास भी ऐसा ही अवसर था, अहिंसा सर्किल पर। उस अहिंसा सर्किल पर जहां  जनता सड़क निर्माण के लिए चक्का जाम की तैयारी मेँ थी। बीजेपी के अलावा सभी पार्टी के नेता थे। साथ मेँ थे, व्यापारिक संगठनों के पदाधिकारी। अनेक पार्षद। भीड़ तो थी ही। नहीं था तो केवल नेतृत्व। कामिनी जिंदल चाहती तो अपनी लंबी अनुपस्थिति को एक झटके मेँ ही दमदार उपस्थिति मेँ बदल सकती थीं। लेकिन ऐसा हो ना सका। उनको कुछ अधिक नहीं करना था। थोड़ा आक्रामक होना था और उसी के अनुरूप जोश से लबरेज तोड़ा एक्शन होता। उसके बाद तो जो होता उसका जिक्र लंबे समय तक रहता। आप विधायक हैं। उस बी डी अग्रवाल की बिटिया हैं, जो बिंदास बोलने के लिए जाने जाते हैं। साथ मेँ हो आईपीएस की बीवी। बैठ जाना था सड़क पर। हल्ला करना था, प्रशासन और सरकार के खिलाफ। मांग लेकर कलक्टर के पास जाने की बजाए उनको मौके पर बुलाना था। कलक्टर को आना पड़ता। खुद तो आते ही साथ मेँ लाते संबन्धित विभाग के अधिकारी। आखिर उस  विधायक की बात को कब तक अनसुनी करते, जो बीच सड़क पर जनता के साथ विकास की जायज मांग के लिए बैठा हो। कुछ ही देर मेँ खबर जिला प्रशासन से होती हुई जयपुर मेँ सत्ता के गलियारों तक पहुँच चुकी होती। पूरा का पूरा प्रशासन हाथ बांधे सड़क पर विधायक कामिनी जिंदल के सामने खड़ा होता। और शहर की जनता अहिंसा सर्किल पर, विधायक के आस पास। वे नेता भी फिर विधायक की हां मेँ हां मिलाते जो उधर आए हुए थे। मीडिया तो है ही विधायक कामिनी जिंदल का। उसके बाद तो वही होता जो विधायक कहतीं। आखिर वे विधायक हैं। विधायक होना कोई छोटी मोटी बात नहीं। विधायक पार्षद नहीं होता, जिसे कलक्टर कुछ भी कह कर शर्मिंदा कर दे। कुछ ही देर मेँ विधायक कामिनी जिंदल की बल्ले बल्ले हो जाती। ये तो पता नहीं कि विधायक के  इस एक्शन से सड़क बनती या नहीं, लेकिन छवि जरूर बनती। बल्ले बल्ले जरूर होती। राजनीति मेँ ऐसा होता ही आया है। मंच होता किसी का है, कब्जा कोई लेता है। परंतु ये सब होता है अनुभव के साथ। अनुभव मेँ समय लगता है।  समय नहीं हो तो फिर कोई गाइड करने वाला हो। अगर दोनों ही नहीं तो मौके ऐसे ही हाथ से जाते रहेंगे। सबको पता है कि राजनीति मेँ ऐसे मौके रोज रोज आते नहीं। कचरा पुस्तक की दो लाइन—
सरकार की तरह मस्त रहो जनाब

पेट भरे ना भरे दिखाते रहो ख्वाब। 

Tuesday, December 23, 2014

मिट्टी मेँ दबा देना चाहिए ऐसे धर्म को....



श्रीगंगानगर-वह धर्म व्यर्थ है जो पति पत्नी के रिश्तों को असामान्य बना उसे तोड़ने की स्थिति मेँ ले आवे। उस धर्म को भी मिट्टी मेँ दबा देना चाहिए जो गृहस्थ आश्रम की जड़ें खोखली करने का काम करता है। वह धर्म भी किसी काम का नहीं जो हमेशा खिलखिलाते रहने वाले परिवार मेँ कलह का कारण बने। विवाद पैदा करे। संवेदनशील रिश्तों मेँ कड़वाहट घोल दे। पर धर्म तो ऐसा कुछ नहीं करता, कहीं नहीं करता। यह सब जो करता है वह धर्म की आड़ मेँ व्यक्ति का अहम, दंभ, अहंकार ही करता और करवाता होगा । कुंठा होती है किसी व्यक्ति की। उसका अवसाद भी हो सकता है या किसी अपने की उपेक्षा भी । फिर यही धर्म के रूप मेँ पग पग पर बाधा बन सामने आ खड़ा होता है। इंसान मन, कर्म, वचन से सात्विक रहने की बात करता है। रिश्तों की अहमियत भी समझता है ठीक से। उसकी मर्यादा को जानता है और मानता है। इसमें कोई शक नहीं कि धर्म इंद्रियों पर संयम रखने की बात करता है। यही धर्म गृहस्थ आश्रम को सबसे महत्वपूर्ण आश्रम भी मानता है। फिर भी गड़बड़ हो जाती है। दंपती मेँ से एक भी 24 घंटे धर्म मेँ लगा रहेगा, सत्संग की बात करेगा, अपने आप को भजन कीर्तन मेँ लीन रखेगा तो ये निश्चित है कि उनके दाम्पत्य जीवन मेँ रस का अभाव हो जाएगा । विचारों मेँ भिन्नता शुरू हो जाएगी। विवाद होगा। संभव है धर्म, सत्संग, भजन, कीर्तन मेँ मस्त रहने वाले व्यक्ति का मन झूमता रहे। उसे उमंग और आनंद का अनुभव हो, लेकिन दूसरा साथी, परिवार के बाकी सदस्य अपनी भावनाओं को आहत समझ कुंठित होने लगेंगे। ऐसे ही एक घर हुआ। उधर वैल क्वालिफाइड पति-पत्नी अलग अलग कमरों मेँ सोते। वह भी उस उम्र मेँ जब दोनों को एक दूसरे के सहारे, साथ की सबसे अधिक जरूरत होती है। परिणाम, एक इतना कुंठित हुआ कि उसका चेहरे का रंग बदरंग हो गया। फिर अधिक दिन जी भी नहीं सका। पता नहीं ये कौनसा धर्म,सत्संग था जो पति पत्नी को उनके रिश्ते निभाने से रोकता रहा ! ये कोई पहला और अंतिम उदाहरण नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे जीवन मेँ धर्म, सत्संग, कीर्तन हो, लेकिन ये सब इतने भी नहीं होने चाहिए कि पति-पत्नी एक बिस्तर पर एक दूसरे से मुंह फेर कर सोने लगे। एक दूसरे की भावना,पसंद को अपने धर्म पर कुर्बान कर दें या फिर भोग को वासना की विषय वस्तु मान उसकी निंदा शुरू कर दें । गृहस्थ आश्रम मेँ वासना भी होती है और तृष्णा भी। संतोष भी है तो कामना भी। केवल एक की प्रधानता से गृहस्थी नहीं चल सकती। वह काल खंड और था जब इतनी उम्र मेँ गृहस्थ आश्रम, उतनी उम्र मेँ वाणप्रस्थ और उसके बाद सन्यास आश्रम का निर्वहन होता था । तब की परिस्थितियां , खान-पान, रहन सहन कुछ और था अब कुछ अलग। तो फिर आज की परिस्थिति मेँ कैसे इनका विभाजन किया जा सकता है। कौन करेगा वाणप्रस्थ का पालन? कौन निकलेगा सन्यास के पथ पर? कौन जाएगा वन को? असल मेँ धर्म तो मन, कर्म और वचन मेँ होता है। वह खंडन, विखंडन का नहीं संयोग और योग का पक्षधर है। वह विवाद नहीं निर्विवाद करता है। धर्म को धारण करने वाले के अंदर तो लगाव होना चाहिए किसी के प्रति अलगाव नहीं । ज़िम्मेदारी से भागना , अपनों से दूर रहना, उनकी भावनाओं को उचित महत्व ना देना धर्म, सत्संग, कीर्तन नहीं कुछ और ही होता है। यह क्या होता है वही जाने जिसमें यह होता है।

Monday, December 22, 2014

मुझे तो पाक से कोई सहानुभूति नहीं है



श्रीगंगानगर [गोविंद गोयल] बेशक यह खुशी मनाने का दिन नहीं है, क्योंकि दुश्मन की मौत पर भी खुशी और उमंग का इजहार करना भारत की संस्कृति नहीं है। मगर पेशावर की घटना पर रंज प्रकट करना। पाक के प्रति सहानुभूति दिखाना भी हिंदुस्तान के लिए उचित नहीं लगता । किस के प्रति सहानुभूति! रंज किस देश और कैसे इन्सानों के लिए ! मोमबत्ती जगा किसको राह दिखाना चाहते हैं ! आतंकवादी हमला पाकिस्तान मेँ हुआ है, हिंदुस्तान मेँ नहीं। वह भी उस पाक मेँ जिसने अस्तित्व मेँ आने के बाद से ही हिंदुस्तान को कभी चैन से जीने नहीं दिया। कश्मीर पर कब्जा, घुसपैठ, 1965 और 1971 का युद्ध, प्रोक्सी वार, आतंकवाद, करगिल, हिंदुस्तान की आन, बान और शान संसद पर आक्रमण, ताज होटल पर हमला कर ना जाने कितने ही जख्म पाक ने हमको दिये। एक बार नहीं ना जाने कितनी बार। कितने हिन्दुस्तानी देश की खातिर शहीद हुए। निर्दोष मारे गए। इन घटनाओं मेँ जो हिन्दुस्तानी शहीद हुए उनके घरों मेँ जाकर देखोगे तब पता लगेगा उनके जख्मों के असहनीय दर्द का। किसी ने पिता खोया किसी ने बेटा। किसी का हाथ की मेहँदी मिटने से पहले ही सुहाग मिट गया। जो भी शहीद हुए वे भी किसी के बेटे तो थे ही। साथ मेँ वे पिता, चाचा, ताऊ, भाई जैसे कितने ही रिश्तों से भी बंधे हुए थे। इनके जाने से किस किस के कैसे कैसे सपने टूटे होंगे, कोई इनसे पूछ कर देखो। क्योंकि किसी ने कहा है- बाप है तो सपने है, बाजार के सारे खिलौने अपने हैं। इनकी भावनाओं को तो समझो। इनके मन को टटोलो। उनसे कोई तो पूछे इनका दर्द । लगे हैं सब के सब पाक के प्रति सहानुभूति दिखाने मेँ। हौड़ लगी है मोमबत्ती जगाने की। तो क्या सभी ने पाक का किया धरा भुला दिया! माफ कर दिया उसकी करतूतों को! वाह! कमाल के संस्कार हैं हिंदुस्तानियों के। बार-बार सलाम करने के योग्य है संस्कृति। दुश्मन की पीड़ा हमारे सीने मेँ भी दर्द करती है। उनके शोक मेँ हमारी आँख भी नम होती है। परंतु जनाब, पाक नहीं समझ सकता हमारी भावनाओं,सद्भावनाओं को। वो नहीं जान पाएग हमारे मन को। उसके दिल मेँ किसी प्रकार की कोई अच्छी भावना नहीं है हमारे देश और देशवासियों के प्रति। इसलिए उसके प्रति किसी प्रकार की कोई सहानुभूति जताने की जरूरत नहीं। रोने दो उसे अकेला। सहने दो अपने जख्म खुद । ताकि उसे मालूम हो कि आतंकवाद की फसल बोने का क्या मतलब होता है! उसका डंक कैसा लगता है। ये हमारे पीएम नरेंद्र मोदी को भी पता नहीं क्या हो गया ! स्कूलों मेँ दो मिनट का मौन ! शांति का नोबल पुरस्कार के लिए इतनी जल्दी। खैर, सरकारों को करने दो अपनी कूटनीति। बोलने दो सहानुभूति की भाषा। निभाने दो सरकारी रस्म। आम जनता को इससे क्या। चर्चा कर लो किसी भी आदमी से , सब के सब यही कहेंगे कि ठीक हुआ पाक मेँ। चलो माना, बच्चों के साथ ऐसी बर्बरता ना हो। उनको टार्गेट नहीं बनाना चाहिए, लेकिन जो इधर मारे गए वे भी तो किसी के बच्चे ही थे। फिर ये खेल भी तो पाक ने ही शुरू किया था। ये भी ठीक है कि नफरत को नफरत से नहीं जीता जा सकता। परंतु, एक तरफा प्यार आखिर कितने दशक तक। हम प्यार जताते रहें और वो नफरत। यह कब तक सहें। जो कुछ पाक ने मेरे हिंदुस्तान के साथ किया उसको याद करके मुझे तो आज पाकिस्तान से कोई सहानुभूति नहीं है। किसी और को हो तो हो। मुझे तो वो तमाम जख्म दिखाई दे रहे हैं जो पाक ने समय समय पर मेरे हिंदुस्तान को दिये। जय जय हिंदुस्तान। जय जय उसके संस्कार और संस्कृति।

Monday, August 18, 2014

कृष्ण की ड्रेस पहनने से कोई कृष्ण नहीं बनता



श्रीगंगानगर- केवल कृष्ण का रूप धरने मात्र से कोई कृष्ण बन सकता है? सवाल ही पैदा नहीं हो सकता। कृष्ण बन जाना। कृष्ण हो जाना,बहुत बड़ी और दुर्लभ बात है।ऐसा युगों युगों में कभी होता है। ठीक है, सच्ची का कृष्ण बनना असंभव है,लेकिन यह कोशिश तो हो ही सकती है कि कृष्ण बनने और बनाने वाले कृष्ण को समझें। अपने आचरण में कम से कम एक दो प्रतिशत तो कृष्ण को उतारें। और नहीं तो केवल प्रेम को ही ले आएं,यही बहुत है। क्योंकि जहां प्रेम हैं वहां कोई झंझट,संकट होता ही नहीं। इसमें किसी की जेब से कुछ नहीं लगता । अभिभावक अपने बच्चों को कृष्ण के परिधान पहनाने तक की सीमित ना रहें। वे बच्चे में कृष्ण से संबन्धित जानकारी दें। उसकी कथा,कहानियां बच्चों को बताएं। क्योंकि कृष्ण की तो हर उम्र में कोई ना कोई कथा है। उसकी हर लीला प्रेरणा है। कृष्ण ने  हर कदम धर्म की स्थापना के लिए बढ़ाया। कौनसे कष्ट थे जो उसने नहीं सहे। बचपन से ही विपत्तियों का सामना करना कृष्ण ने शुरू कर दिया था। कृष्ण कर्म की प्रेरणा देते हैं। प्रेम का संदेश देते हैं। अपनों को भरोसा देते हैं।अन्याय बर्दाश्त नहीं करते। जुल्म का सामना करने से नहीं डरते।परिस्थिति कैसी भी हो अपने लक्ष्य को नहीं भूलते। सखा सुदामा जैसा निर्धन हो या अर्जुन जैसा राजकुमार,कृष्ण भेद नहीं करते। जो सुदामा को चाहिए था वह सुदामा दिया और जो अर्जुन को चाहिए था वह उसे। वे कूटनीति के ज्ञाता है। धर्म के अधिष्ठाता हैं। भाव को महत्व देते हैं। ऐसे कृष्ण का थोड़ा सा भी आचरण किसी बच्चे में आ गया तो समझो,हो गया समाज निहाल। इसमें कोई शक नहीं कि आज के युग में कृष्ण बन बन जाना असंभव है। लेकिन इसके बावजूद अभिभावकों और स्कूलों को केवल इतनी कोशिश तो करनी ही चाहिए कि कृष्ण बनने वाला बच्चा बिगड़े तो ना। मात्र प्रतियोगिता जीतने के लिए ही कृष्ण बनना या बनाना कोई महत्व नहीं रखता। नगर में कृष्ण के प्रति श्रद्धा,विश्वास, लगाव बढ़ा है या जन्माष्टमी पर बाजारवाद का असर है,मालूम नहीं,लेकिन ये सच है कि लोगों में अपने बच्चों में कृष्ण बनाने की होड़ लगी रहती है। शिशु से लेकर किशोर अवस्था तक तक के बच्चे हर आयोजन में कृष्ण बने नजर आते हैं। जन्माष्टमी के निकट सामाजिक,धार्मिक संगठन ही नहीं स्कूलों में भी कृष्ण बनाओ प्रतोयोगिताओं का आयोजन होने लगा है। परंतु इनकी सार्थकता तभी होगी जब अभिभावक और स्कूल बच्चों में अभी से कृष्ण का आचरण लाने के प्रयास करें।

Sunday, July 27, 2014

एसपी/डीएम जी!कभी आदमी बन के शहर में घूमो


श्रीगंगानगर-सरकार को इस क्षेत्र का दौरा करके गए एक माह होने को आया. ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे ये लगे कि सरकार का दौरा सफल रहा. जिले के एसपी और डीएम आज तक शायद ही कभी दफ्तरों से बाहर निकलें हों. एसपी और डीएम के रूप में तो निकले ही होंगे,किसी प्रोग्राम में चीफ गेस्ट के नाते. किसी कार्यक्रम का उद्घाटन करने के लिए. किसी सेठ या नेता के साथ किसी साईट पर. परन्तु इनसे यह पता नहीं लगता कि शहर के हालत क्या है. एसपी/डीएम  आम आदमी के रूप में
शहर की गलियों में निकले तो उनको ज्ञात होगा कि उनके राज में इस शहर में हो क्या रहा है. एसपी को शायद दिखाई दे जाए कि उनका ट्रैफिक इंचार्ज सिवाए चालान काटने के कुछ नहीं करवाता.ट्रैफिक व्यवस्था को ठीक करवाना शायद वह अपनी ड्यूटी नहीं समझता. एसपी को यह भी दिख जाएगा कि गली गली में किस प्रकार लावारिस गाड़ियां खड़ी रहती हैं जो ट्रैफिक व्यवस्था में बाधा बनती है.मगर ट्रैफिक इंचार्ज को इससे कोई मतलब नहीं.इतना ही नहीं आम आदमी के रूप में ही वे जान पाएंगे कि किस किस क्षेत्र में लड़कियों का सहज रूप से सड़क पार करना मुश्किल हो चुका है. जो पुलिस कर्मी ड्यूटी पर लगाये जाते हैं वे उन लड़कों के साथ गलबहियां होते हैं जिनकी नजर लड़कियों पर रहती है. जब एसपी आम आदमी के रूप में सड़क पर आएंगे तो शायद ये जान सकें कि किस गली में गलत काम होता है और उनका बीट कांस्टेबल इस बात से अनजान है. ऑफिस में बैठे बैठे एसपी साहब वह सब नहीं जान सकते जो पब्लिक जानती है. आपके सभी मातहत क्या कर रहे हैं ये केवल आम आदमी बन जान सकते हो. डीएम हर सप्ताह अनेक बैठके लेते हैं. सड़क पर निकले तो खुद मान जाएंगे कि इन बैठकों का कोई अर्थ नहीं है. नगर परिषद हो या नगर विकास न्यास दोनों के अधिकारी क्या कर रहे हैं यह सड़क पर आने से ही मालूम होगा डीएम को. कोई सड़क ऐसी नहीं जिस पर कब्ज़ा ना हो प्रभावशाली को कोई पूछता नहीं.डीएम साहब,आप आम आदमी के रूप में रात को किसी प्राइवेट हॉस्पिटल में अपना इलाज करवा के दिखा दो.कोई हॉस्पिटल वाला दरवाजा तक नहीं खोलता. आपने जानकारी से खुलवा लिया तो वे सीधे आपको रैफर कर देंगे लुधियाना,जयपुर. कोई कुछ नहीं कर सकता. आप कलक्टर बन कर कितनी ही बार सरकारी हॉस्पिटल गए. कभी आम आदमी बन के जाओ तो पता लगे कि कैसे क्या होता है. कौन कितने मुश्किल में है.केवल आदेश और निर्देश देने से कुछ नहीं होता.एक साधारण इंसान जैसे आप शहर का दौरा करोगे तो आपको खुद ये महसूस होगा कि आप जो ऑफिस में कर रहे हैं उससे कहीं अधिक करने की जरुरत है. एसपी/डीएम के रूप में आपको वही दिखेगा जो अफसर दिखाएंगे. वह नहीं जो आम जन भोगता है. इधर कोई नेता नहीं है. जनता भी मस्त है, इसलिए आपका काम चल रहा है. कोई पूछने वाला नहीं.जिम्मेदारी याद दिलाने वाला नहीं. इसलिए जो आप दफ्तरों में बैठकर करो ठीक लगता है. लेकिन ऐसा नहीं है. सड़क पर आम आदमी बन कर आओ तब पता लगेगा कि क्या हो रहा है और क्या होना चाहिए. 

Monday, July 21, 2014

विधायक गंगानगर की,वकालत हनुमानगढ़ की,बाऊ खुश


श्रीगंगानगर- सबसे पुराने वरिष्ठ राजनेता राधेश्याम गंगानगर आज बहुत खुश होंगे.ख़ुशी केवल मन चाहा पा लेने से ही नहीं होती. ख़ुशी तो किसी भी बात से हो सकती है. राजनेताओं की ख़ुशी तो वैसे भी कुछ अलग  प्रकार की होती है. मन तब भी प्रसन्न हो झूमने लगता है जब विरोधी गलतियां करें.राजनीति में आज के दिन राधेश्याम गंगानगर का कामिनी जिंदल से बड़ा विरोधी कोई हो ही नहीं सकता. कामिनी जिंदल कहो या बी डी अग्रवाल एक ही बात है. वो राजनैतिक गलतियां करेंगे तो बाऊ जी के मन में लड्डू फूटेंगे ही. अब देखो, कामिनी जिंदल विधायक तो श्रीगंगानगर की हैं और एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के लिए वकालत
हनुमानगढ़ की कर रही हैं. जमींदारा पार्टी को श्रीगंगानगर  जिले ने दो विधायक दिए और उसकी विधायक कामिनी गीत हनुमानगढ़ के गा रहीं हैं. जितने वोट इस पार्टी को श्रीगंगानगर जिले में मिले और कहीं नहीं. इसके बावजूद इस पार्टी की एक प्रभावशाली विधायक द्वारा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी हनुमानगढ़ में खोलने की वकालत करना ना केवल वोटर्स के साथ अन्याय है बल्कि श्रीगंगानगर जिले का दुर्भाग्य है.प्रदेश में क्या देश में शायद ही कोई ऐसा जन प्रतिनिधि होगा जिसने कभी अपने क्षेत्र को छोड़ दूसरे क्षेत्र की वकालत की हो. मगर जमींदारा पार्टी की कामिनी जिंदल की बात ही अलग है. बड़े लोगों की बात अलग ना हो तो फिर काहे के बड़े. हैरानी है कि जिस समय श्रीगंगानगर जिले के लोग,विधायक,एमपी  अपने अपने ढंग से यह यूनिवर्सिटी श्रीगंगानगर में खुलवाने की कोशिशों में लगे हैं,तब कामिनी जिंदल द्वारा हनुमानगढ़ की वकालत करना यह दर्शाता है कि उनका मकसद यूनिवर्सिटी को खुलवाना नहीं बल्कि उसमें अड़ंगा लगाना है. हैरानी इस बात की कि कोई विरोध नहीं कर रहा.
इधर कोई बोलेगा नहीं और हनुमानगढ़ में जय जय कार होगी.ये सच है कि कामिनी जिंदल के हनुमानगढ़ जिले में यूनिवर्सिटी खोलने के पत्र से कुछ नहीं होने वाला,लेकिन उनकी मंशा तो पता लगती ही है. जनता शायद  ही इससे पहले कभी अपने किसी विधायक से इतना डरी सहमी रही हो,जितना वो कामिनी जिंदल से डरी हुई है. अगर वे डरे हुए नहीं है तो फिर वे  भरे हुए हैं.शर्म से बोल नहीं पा रहे. डरा हुआ या भरा हुआ इंसान कैसे बोले.वरना  अब तक तो बवाल मच गया होता. कोई विधायक अपने क्षेत्र के अतिरिक्त दूसरे क्षेत्र की वकालत करे तो बवाल मचना स्वाभाविक है. यह उनके हकों पर कुठाराघात है.अपने हक़ को किसी दूसरे को कोई कैसे दे सकता है. मगर विधायक कामिनी जिंदल ऐसा करने की कोशिश करे तो कोई नहीं चुसकेगा. कौन नाराजगी  ले बी डी अग्रवाल की  बेटी और आई पी एस की विधायक बीवी से. बाऊ जी और उनके बन्दे घर बैठ तमाशा देखेंगे ही. उनके लिए तो यह सब घर बैठे गंगा आने के समान है. वे तो जमींदारा पार्टी और उनकी प्रभावशाली विधायक की हर राजनैतिक गलती से खुश होंगे. जितनी गलती वे करेंगी उतनी ही बाऊ जी की बल्ले बल्ले. कामिनी जिंदल की झोली वोटों से  भरने  वाली जनता ही नहीं बोल रही तो बाऊ जी क्यों बोलेंगे. वे तो हारे हुए हैं. जनता द्वारा बुरी तरह नकारे हुए हैं. कांग्रेस नेताओं से उम्मीद ही क्या करें! इस पार्टी के नेता तो बात बात पर बी डी अग्रवाल की हाजिरी बजाते हैं. खुद विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता रामेश्वर डूडी सहित.बाकी बची जनता.वह तो सीधे सीधे किसी का विरोध करती नहीं. फिर दानवीर बी डी अग्रवाल ने उअन्का क्या बिगाड़ा है जो वे उनकी बेटी की इत्ती से बात का विरोध करें.यूनिवर्सिटी खुले ना खुले उनकी बला से. आज इस क्षेत्र की स्थिति वैसी ही है जैसी तब थी जब धुरंधर सुरेन्द्र सिंह राठौड़ विधायक चुने गए थे भारी बहुमत से.ठीक कामिनी जिंदल की तरह. तब भी राधेश्याम एंड कंपनी,कांग्रेस,जनता  खामोश रही थी.परिणाम अगले चुनाव में राधेश्याम गंगानगर पार्टी बदलने के बावजूद विधायक चुन लिए गए. अब जब इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है तो  बाऊ जी का खुश होना अस्वाभाविक तो नहीं कहा जा सकता. दो लाइन पढ़ो--इस दौर में बे मतलब की बात करता है, ये जनाब तो पुराने ज़माने का लगता है. 

Saturday, July 19, 2014

कैलाश पर्वत को देख श्रद्धा का झरना फूट पड़ा आंखों से

श्रीगंगानगर-अपने आप को कैलाश पर्वत के सम्मुख पा अनेक यात्रियों की आँखों से श्रद्धा बहने लगी. अनेक विस्मय से सब देख रहे थे बिना पलक झपके. कई तो   ऐसे हो गए कि किस दृश्य को आंखों में समेटे और किसको छोड़ें. सब के सब श्रद्धा से अभिभूत.ख़ुशी से सराबोर.जिस अलौकिक दृश्य के बारे में केवल किताबों में पढ़ा था,संतों और कथा वाचकों के मुख से सुना था, वह साक्षात  उनकी आंखों के सामने था. दृष्टि उससे परे जाने को तैयार ही नहीं थी. पुलकित और आनंदित मन  उस शिव से हटने को तैयार नहीं,जिसके बारे में कहा जाता है कि वह आज भी कैलाश पर्वत पर विराजमान है.प्राचीन शिवालय के महंत कैलाश नाथ जी कैलाश मानसरोवर की तीसरी बार यात्रा करके आए हैं.इससे पहले वे 1998 और 2001 में यह यात्रा कर चुके हैं. वे सामान्य बात चीत ये सब बताते हैं.इस बार की यात्रा अधिक महत्वपूर्ण थी. क्योंकि इस बार कुम्भ है कैलाश पर. इसलिये  इस बार की यात्रा कैलाश मानसरोवर की 13 यात्रों  के तुल्य है.वे कभी किसी को बता देते हैं कि  पूर्णिमा की रात को उधर ऐसा अद्भुद दृश्य था, जिसको शब्दों में बांधा नहीं जा सकता. उस रात को कैलाश पर्वत के निकट  जिसने जो देखा और महसूस किया वह बताना मुश्किल है. ऐसा लगा जैसे चन्द्रमा अपनी पूरी क्षमता से शिव की परिक्रमा  के साथ वंदना कर रहा हो.सबकी अपनी अपनी अनुभूति. कैलाश पर्वत के चारों तरफ आठ पहाड़ हैं.उसकी आकृति शिव की तरह है.पीछे शिव की जटा दिखाई देती है.अग्र भाग में कैलाश के सामने नंदी है. कैलाश पर्वत पूरी तरह सफ़ेद. मन को मोहित कर देने वाला. आंखों सम्मोहित कर देने वाला.स्फटिक मणि की तरह से. उस कैलाश की  परिक्रमा कर भगवान शिव को याद किया गया,जो उसी पर्वत पर विराजमान रहते हैं. कैलाश नाथ जी तीन दिन उधर ठहरे. हवन किया. जिसकी पूरी सामग्री वे अपने साथ लेकर गए थे. दो दिन वे मानसरोवर रुके. उसकी प्रक्रिमा कर स्नान किया. उधर क्या अनुभव हुआ? क्या देखा? क्या दिखाई दिया? इन प्रश्नों का उनके पास एक ही जवाब था, यह सब बताना असंभव है. उन्होंने मोबाइल से अपने एक साथ यात्री से बात करवाई. वह भी इतना ही कह सका,मैंने यात्रा की नहीं,मुझे तो ऐसे लगा जैसे कोई मेरी ऊँगली पकड़ कर यात्रा करवा रहा हो. क्योंकि यह संसार की सबसे विकट यात्रा है. वह बोला,मैं तो कैलाश के सामने बैठ गया. कैलाश पर्वत को निहारता रहा. उसकी छवि नेत्रों में बसाने की कोशिश की. दर्शनों के लिए जैसे ही शिव का आभार प्रकट किया,आँख से आंसू बहने लगे.ऐसा  एक बार नहीं कई बार हुआ.करोड़ों व्यक्तियों में से शिव ने मुझे अपने निकट बुलाया इससे अधिक मेरे लिए सौभाग्य की कोई बात हो ही नहीं सकती,बस! जब से कैलाश नाथ यात्रा से लौटे हैं तब से उनके पास  यात्रा की बातें सुनने के लिए लोगों का आना जाना लगा हुआ है.यात्रा की किसी फोटो को देख रोमांच और विस्मय होता है तो किसी फोटो पर नजर पड़ते ही  मन में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है. कैलाश नाथ  कहते हैं, पैर फिसला तो समझो,जय राम जी की. अर्थात सीधे काली गंगा में जाएगा यात्री. वे बताते हैं,यात्रा के दौरान ऐसी गुफा आती है जिसमें पारिजात का वृक्ष है. कामधेनु गाय है.भैरों की जीभ है. सफ़ेद हंस. सब के सब पत्थर के. ये सब वही हैं जिनका जिक्र शास्त्रों में हैं.भैरों की जीभ से लार टपकती रहती है. कैलाश नाथ के शब्दों में,मौसम बर्फानी रहता है. कैलाश पर्वत पर कभी बरसात नहीं होती. सुबह तमाम देव शिव की आराधना कर बर्फ की चादर उस पर चढ़ाते हैं.वहां की हवा  इंसान के शरीर को काला कर देती हैं.कैलाश नाथ के अनुसार वे पांच दिन तक सोए नहीं. लेटते थोड़ी  देर,फिर उठकर बैठ जाते. चाइना सरकार ने यात्रियों के लिए बढ़िया इंतजाम कर रखा था. हर प्रकार की सुविधा थी. पहले इतने इंतजाम नहीं हुआ करते थे. यात्रा में भी किसी प्रकार की कठिनाई नहीं हुई. सरकार की ओर से डॉक्टर,गाइड की व्यवस्था होती है.भारतीय क्षेत्र में भारत  सरकार की व्यवस्था होती है और  चीन की तरफ चीन सरकार की. 22  दिनों में तीन सौ किलोमीटर की यात्रा करनी होती है.काली गंगा के किनारे किनारे.हर यात्री को यात्रा के बाद प्रमाण पत्र दिया जाता है. जिस पर उसका चित्र भी होता है. कैलाश नाथ जी को आए अभी अधिक दिन नहीं हुए कि वे अगले साल फिर इस यात्रा पर जाने की योजना बना रहे है.बातें बहुत हैं,लेकिन बहुत सी ऐसी होती हैं जिनको बताने और  लिखने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं.वैसे भी श्रद्धा से जुडी बातों का ना तो कोई आदी होता है और ना अंत. शायद तभी तुलसीदास ने कहा था--हरि अनंत हरि कथा  अनंता,कहहु सुनहु बहु विधि सब संता. 

Saturday, June 14, 2014

खुद के बच्चों की तारीफ करने में कंजूस हैं हम

श्रीगंगानगर- मित्र के नौवीं में पढने वाले बेटे से मिलने उसके साथी आए. मित्र ने उनसे पूछ लिया, मोनू में ऐसी क्या खास बात है जो तुम उसे घेरे रहते हो? उनका जवाब था, अंकल! ये हमें छोटी छोटी बात पर हंसाता रहता है. मित्र के चेहरे पर मुस्कान आ गई. परन्तु बेटे से कुछ नहीं कहा.एक दो दिन बाद उसने मोनू की तारीफ की. उसकी पीठ थपथपा के नहीं बल्कि लिख कर.किशोरवय अपने पुत्र की तारीफ पिता लिखकर करता है. उसकी बातों को सराहता है. उस पर गर्व होने की बात कहता है. अपने बेटे की प्रशंसा बहुत अच्छी बात है,लेकिन हैरानी इस बात की कि पिता को अपनी भावना लिख कर बतानी पड़ी. जबकि पुत्र कोई हॉस्टल में नहीं रहता. साथ रहता है. पिता भी कोई बड़ा बिजनेसमैन या अधिकारी नहीं कि वक्त ना निकाल पाते हों अपने बच्चों से बात करने के लिए.पढ़े लिखे ठीक ठाक परिवार की सच्ची बात है ये. अपने बच्चे की तारीफ उसी को करने में पता नहीं क्यों हिचक होती है! दूसरों के सामने खूब बड़ाई करेंगे,बच्चे को अपनी भावना से अवगत नहीं करवाएंगे.उससे नहीं कहेंगे,तुझ पर हमें गर्व है. तेरा आचरण हमें पसंद है. पढाई से संतुष्ट हैं. दूसरी गतिविधियां भी प्रशंसा के काबिल हैं. इसके विपरीत यही सब कुछ दूसरे के बच्चों में हो तो खूब तारीफ करेंगे उसकी. सबके सामने उसकी पीठ थपथपा शाबाशी देंगे. चाहे उसका खुद का बच्चा पास ही खड़ा हो. जिसकी तारीफ कर रहे हैं,पीठ थपथपा रहे हैं वह बच्चे का दोस्त ही क्यों ना हो. पास खड़ा वह यह सोचता भी होगा कि पापा ने इन सब गुणों के लिए मेरी तो कभी तारीफ नहीं की. मां ने मुझे तो कभी शाबाशी नहीं दी. हालांकि बच्चे की परवरिश में कोई परिवार वाला कमी नहीं छोड़ता. अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से बढ़िया से बढ़िया करता है. परन्तु प्रशंसा के मामले में सब के सब कंजूस और खड़ूस.हिम्मत ही नहीं कर पाते पैरेंट्स अपने बच्चे की तारीफ कर उसमें और अधिक आत्मविश्वास बढ़ाने की. इसे यूं भी कह सकते हैं कि उनकी हिचक नहीं खुलती ऐसा करने के लिए. इसके विपरीत पैरेंट्स दूसरों से अपने बच्चों की मौजूदगी में बच्चों के लिए ये कहते तो सुने जा सकते हैं कि इसने क्या करना है! सारा दिन तो टीवी देखता है. पढाई में क्या निहाल करेगा! उसका बच्चा देखो, कितना समझदार है! बच्चे की तरफ आंखें करके,एक ये है कि नालायक का नालायक ही रहा. ये वाक्य गुस्से और प्रेम में हर घर में सुने जा सकते हैं. बच्चे के लेट उठने पर चिक चिक. खुद के जूते साफ़ ना करने पर डांट. बाइक-साइकिल साफ़ न करने पर फटकार. होम वर्क करने के बाद किताबें,बैग वहीँ छोड़ देने पर कौनसे पैरेंट्स मुंह नहीं चढ़ाते होंगे. पैरेंट्स क्या इस मामले में तो बड़े भाई बहिन भी ऐसा ही करते हैं. घर घर में हर रोज यही होता है. तो क्या किसी भी बच्चे में ऐसी कोई खूबी होती ही नहीं जो उसे अपने पैरेंट्स,दादा-दादी और बड़े भाई बहिन की प्रशंसा का पात्र बना सके. होती है जी होती है! हर बच्चे में होती है. प्रत्येक बालक-बालिका में ऐसा जरूर होता है जो उसे बाकियों से अलग करता है. लेकिन पता नहीं यह खूबी पैरेंट्स को अपने बच्चे की बजाए दूसरों के बच्चों में क्यों नजर आती है! स्कूलों में पैरेंट्स मीटिंग के दौरान कितने ही पैरेंट्स 95 प्रतिशत से अधिक अंक लेने वाले अपने बच्चे को ये कहते सुने जा सकते हैं,देखा राहुल ले गया ना एक नंबर अधिक. मैंने कहा था,पढ़ ले,पढ़ ले. सुनी नहीं. हो गया ना पीछे. बच्चे में प्रतिस्पर्धा की भावना भरना बढ़िया बात है. उसे दुनिया की दुश्वारियों से लड़ने की शिक्षा देना भी बुरा नहीं. बस, इसके साथ-साथ पैरेंट्स बेटा-बेटी की तारीफ भी करने लगें तो सोने पर सुहागा. छोटी सी बात के साथ बात समाप्त करूंगा. किशोरवय बेटा नहाकर बाथरूम में पाटा उलटा कर देता.पैरेंट्स बच्चे को तो कुछ नहीं कहते,लेकिन आपस में चिक चिक करते. एक दिन पैरेंट्स का मूड ख़राब था. जैसा ही बेटा नहाकर निकला, उसे डांट दिया,ये क्या रोज रोज तू पाटा उलटा कर देता है. बेटे का जवाब था, आपके नहाने से पहले पाटा सूख जाए इसलिए पाटा उलटा करके आता हूं. पैरेंट्स बेटे की बात सुन निरुत्तर हो गए. है ना किशोरवय बेटे की ये खास बात. लेकिन तारीफ नहीं करेंगे. क्योंकि हमें आदत नहीं है,अपने ही बच्चे की तारीफ करने की.